संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
७० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १९
७० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १९
भी जाननेवाले, ४२. क्लेशनाशनः — सब प्रकारके
क्लेशोंका नाश करनेवाले ॥ ७ ॥
अमित्रहा शिवो हंसो नायकः प्रियदर्शनः ।
शुद्धो विरोचनः केशी सहस्त्रांशुः प्रतर्दनः ॥ ८
४३. अमित्रहा — शत्रुनाशक, ४४. शिवः —
कल्याणस्वरूप, ४५. हंसः — आकाशरूपी सरोवरमें
विचरनेवाले एकमात्र राजहंस अथवा सबके आत्मा,
४६. नायकः — नेता अथवा नियन्ता, ४७. प्रियदर्शनः —
सबका प्रिय देखने या चाहनेवाले अथवा जिनका दर्शन
प्राणिमात्रको प्रिय है, ऐसे, ४८. शुद्धः — मलिनतासे
रहित, ४९. विरोचनः — अत्यन्त प्रकाशमान,
५०. केशी — किरणरूपी केशोंसे युक्त, ५१.
सहस्रांशुः — असंख्य किरणोंके पुञ्ज, ५२. प्रतर्दनः —
अन्धकार आदिका विशेषरूपसे संहार करनेवाले ॥ ८ ॥
धर्मरश्मिः पतंगश्च विशालो विश्वसंस्तुतः ।
दुर्विज्ञेयगतिः शूरस्तेजोराशिर्महायशाः ॥ ९
५३. धर्मरश्मिः — धर्ममयी किरणोंसे युक्त अथवा
धर्मके प्रकाशक, ५४. पतंगः — किरणरूपी पंखोंसे
उड़नेवाले आकाशचारी पक्षिस্বরূপ, ५५. विशालः —
महान् आकारवाले अथवा विशेषरूपसे शोभायमान, ५६.
विश्वसंस्तुतः — समस्त जगत् जिनकी स्तुति-गुणगान
करता है, ऐसे, ५७. दुर्विज्ञेयगतिः — जिनके स्वरूपको
जानना या समझना अत्यन्त कठिन है, ऐसे, ५८.
शूरः — शौर्यशाली, ५९. तेजोराशिः — तेजके समूह,
६०. महायशाः — महान् यशसे सम्पन्न ॥ ९ ॥
भ्राजिष्णुर्ज्योतिषामीशो विजिष्णुर्विश्वभावनः ।
प्रभविष्णुः प्रकाशात्मा ज्ञानराशिः प्रभाकरः ॥ १०
६१. भ्राजिष्णुः — दीप्तिमान्, ६२. ज्योतिषामीशः —
तेजोमय ग्रह-नक्षत्रोंके स्वामी, ६३. विजिष्णुः —
विजयशील, ६४. विश्वभावनः — जगत्के उत्पादक,
६५. प्रभविष्णुः — प्रभावशाली अथवा जगत्की
उत्पत्तिके कारण, ६६. प्रकाशात्मा — प्रकाशस्वरूप,
६७. ज्ञानराशिः — ज्ञाननिधि, ६८. प्रभाकरः — उत्कृष्ट
प्रकाश फैलानेवाले ॥ १० ॥
आदित्यो विश्वदृग् यज्ञकर्ता नेता यशस्करः ।
विमलो वीर्यवानीशो योगज्ञो योगभावनः ॥ ११
६९. आदित्यो विश्वदृक् — आदित्यरूपसे जगत्के
द्रष्टा या साक्षी अथवा सम्पूर्ण संसारके नेत्ररूप,
७०. यज्ञकर्ता — जगत्को जल एवं जीवन प्रदान करके
दानयज्ञ सम्पन्न करनेवाले, ७१. नेता — अन्धकारका
नयन — अपसारण कर देनेवाले, ७२. यशस्करः यशका
विस्तार करनेवाले । ७३. विमलः — निर्मलस्वरूप,
७४. वीर्यवान् — शक्तिशाली, ७५. ईशः — ईश्वर,
अध्याय १९ ] विश्वकर्माद्वारा १०८ नामोंसे भगवान् सूर्यका स्तवन ७१
७६. योगज्ञः — भगवान् श्रीहरिसे कर्मयोगका ज्ञान प्राप्त
करके उसका मनुको उपदेश करनेवाले*,
७७. योगभावनः — योगको प्रकट करनेवाले ॥ ११ ॥
७८. अमृतात्मा शिवः — अमृतस्वरूप शिव,
अमृतात्मा शिवो नित्यो वरेण्यो वरदः प्रभुः।
७९. नित्यः — सनातन, ८०. वरेण्यः — वरणीय — आश्रय
धनदः प्राणदः श्रेष्ठः कामदः कामरूपधृक् ॥ १२
लेनेयोग्य, ८१. वरदः — उपासकको मनोवाञ्छित वर
देनेवाले, ८२. प्रभुः — सब कुछ करनेमें समर्थ,
८३. धनदः — धनदान करनेवाले, ८४. प्राणदः —
प्राणदाता, ८५. श्रेष्ठः — सबसे उत्कृष्ट, ८६. कामदः —
मनोवाञ्छित वस्तु देनेवाले, ८७. कामरूपधृक् —
इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले ॥ १२ ॥
८८. तरणिः — संसारसागरसे तारनेवाले,
तरणिः शाश्वतः शास्ता शास्त्रज्ञस्तपनः शयः।
८९. शाश्वतः — सनातन पुरुष, ९०. शास्ता — शासक
वेदगर्भो विभुर्वीरः शान्तः सावित्रिवल्लभः ॥ १३
या उपदेशक, ९१. शास्त्रज्ञः — समस्त शास्त्रोंके ज्ञाता,
तपनः — तपनेवाले या ताप देनेवाले, ९२. शयः —
सबके अधिष्ठान या आश्रय, ९३. वेदगर्भः —
शुक्लयजुर्वेदको प्रकट करनेवाले, ९४. विभुः — सर्वत्र
व्यापक, ९५. वीरः — शूरवीर, ९६. शान्तः — शमयुक्त,
९७. सावित्रिवल्लभः — गायत्रीमन्त्रके अधिदेवता ॥ १३ ॥
९८. ध्येयः — ध्यान करनेयोग्य, ९९. विश्वेश्वरः —
सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर, १००. भर्ता — सबका भरण-
ध्येयो विश्वेश्वरो भर्ता लोकनाथो महेश्वरः।
पोषण करनेवाले, १०१. लोकनाथः — संसारके रक्षक,
महेन्द्रो वरुणो धाता विष्णुरग्निर्दिवाकरः ॥ १४
१०२. महेश्वरः — परमेश्वर, १०३. महेन्द्रः — देवराज
इन्द्र-स्वरूप, १०४. वरुणः — पश्चिम दिशाके अधिपति
'वरुण' नामक आदित्य, १०५. धाता — जगत्का धारण-
पोषण करनेवाले अथवा 'धाता' नामक आदित्य, १०६.
विष्णुः — व्यापक अथवा 'विष्णु' नामक आदित्य, १०७.
अग्निः — अग्निस্বরূপ, १०८. दिवाकरः — रात्रिका
अंधकार दूर करके प्रकाशपूर्ण दिनको प्रकट
करनेवाले ॥ १४ ॥
एतैस्तु नामभिः सूर्यः स्तुतस्तेन महात्मना।
उन महात्मा विश्वकर्माने उपर्युक्त नामोंद्वारा भगवान्
उवाच विश्वकर्माणं प्रसन्नो भगवान् रविः ॥ १५
सूर्यका स्तवन किया। इससे भगवान् सूर्यको बड़ी
प्रसन्नता हुई और वे उन विश्वकर्मासे बोले ॥ १५ ॥
प्रजापते! आपकी बुद्धिमें जो बात है — आप जिस
उद्देश्यको लेकर आये हैं, वह मुझे ज्ञात है। अतः आप
भ्रमिमारोप्य मामत्र मण्डलं मम शातय।
मुझे शाणचक्रपर चढ़ाकर मेरे मण्डलको छाँट दें; इससे
त्वद्बुद्धिस्थं मया ज्ञातमेवमौष्ण्यं शमं व्रजेत् ॥ १६
मेरी उष्णता कुछ कम हो जायगी ॥ १६ ॥
- जैसा कि गीतामें कहा है — 'इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान् मनवे प्राह....................॥'
७२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २०
इत्युक्तो विश्वकर्मा च तथा स कृतवान् द्विज। ब्रह्मन् ! भगवान् सूर्यके यों कहनेपर विश्वकर्माने
शान्तोष्णाः सविता तस्य दुहितुर्विश्वकर्मणः ॥ १७ वैसा ही किया। विप्रवर! उस दिनसे प्रकाशस्वरूप
सविता विश्वकर्माकी बेटी संज्ञाके लिये शान्त हो गये
तथा उनकी उष्णता कम हो गयी। इसके बाद वे
त्वष्टासे बोले ॥ १७१/२ ॥
संज्ञायाश्चाभवद्विप्र भानुस्त्वष्टारमब्रवीत्। अनघ! चूँकि आपने एक सौ आठ नामोंके द्वारा
त्वया यस्मात् स्तुतोऽहं वै नाम्नामष्टशतेन च ॥ १८ मेरी स्तुति की है, इसलिये मैं प्रसन्न होकर आपको वर
देनेके लिये उद्यत हूँ। कोई वर माँगिये ॥ १८१/२ ॥
वरं वृणीष्व तस्मात् त्वं वरदोऽहं तवानघ। भगवान् सूर्यके यों कहनेपर विश्वकर्मा बोले-देव!
इत्युक्तो भानुना सोऽथ विश्वकर्माब्रवीदिदम् ॥ १९ यदि आप मुझे वर देनेको उद्यत हैं तो यह मुझे वर
वरदो यदि मे देव वरमेतं प्रयच्छ मे। प्रदान कीजिये- 'देव भास्कर! जो मनुष्य इन नामोंके
एतैस्तु नामभिर्यस्त्वां नरः स्तोष्यति नित्यशः॥ २० द्वारा प्रतिदिन आपकी स्तुति करे, उस भक्तपुरुषके सारे
तस्य पापक्षयं देव कुरु भक्तस्य भास्कर ॥ २१ पापोंका आप नाश कर दें' ॥ १९-२१ ॥
तेनैवमुक्तो दिनकृत् तथेति विश्वकर्माके यों कहनेपर दिन प्रकट करनेवाले
त्वष्टारमुक्त्वा विरराम भास्करः। भगवान् भास्कर उनसे 'बहुत अच्छा' कहकर चुप हो
संज्ञां विशङ्कां रविमण्डलस्थितां गये, तत्पश्चात् सूर्यमण्डलमें निवास करनेवाली संज्ञाको
कृत्वा जगामाथ रविं प्रसाद्य ॥ २२ निर्भय करके, सूर्यदेवको संतुष्टकर विश्वकर्मा अपने
स्थानको चले गये ॥ २२ ॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९ ॥
बीसवाँ अध्याय
मारुतोंकी उत्पत्ति
सूत उवाच श्रीसूतजी बोले- द्विजश्रेष्ठ! अब मैं मारुतोंकी
साम्प्रतं मारुतोत्पत्तिं वक्ष्यामि द्विजसत्तम। पुरा उत्पत्तिका वर्णन करूँगा। पूर्वकालमें देवासुर-संग्राममें
देवासुरे युद्धे देवैरिन्द्रादिभिर्दितैः ॥ १ ॥ पुत्राः पराभूता इन्द्र आदि देवताओंद्वारा दितिके पुत्र दैत्यगण पराजित
दितिश्च विनष्टपुत्रा महेन्द्रदर्पहरं पुत्रमिच्छन्ती हो गये थे। उस समय दिति, जिसके पुत्र नष्ट हो
कश्यपमृषिं स्वपतिमाराधयामास ॥ २ ॥ स च गये थे, महेन्द्रके अभिमानको चूर्ण करनेवाले पुत्रकी
तपसा संतुष्टो गर्भाधानं चकार तस्याम्। इच्छा मनमें लेकर अपने पति कश्यप ऋषिकी
पुनस्तामेवमुक्तवान् ॥ ३ ॥ यदि त्वं शुचिः सती आराधना करने लगी। तपस्यासे संतुष्ट होकर ऋषिने
दितिके भीतर गर्भका आधान किया। फिर वे उससे
इस प्रकार बोले- 'यदि तुम पवित्र रहती हुई
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