संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
६० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १६
६० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय १६
यः कामक्रोधलोभैस्तु विषयैः परिपीडितः । | समुद्रमें गिरा हुआ है तथा काम, क्रोध, लोभ और
बद्धः स्वकर्मभिर्गौणैः पुत्रदारैषणादिभिः ॥ २ | विषयोंसे पीड़ित होकर अपने कर्ममय मुख्य बन्धनों
| तथा पुत्रैषणा और दारैषणा आदि गौण बन्धनोंसे आबद्ध
स केन निस्तरत्याशु दुस्तरं भवसागरम् । | है, वह मनुष्य इस दुस्तर भवसागरको कैसे शीघ्र पार
पृच्छामाख्याहि मे तात तस्य मुक्तिः कथं भवेत् ॥ ३ | कर सकता है ? उसकी मुक्ति कैसे हो सकती है ?
| हमारे इस प्रश्नका समाधान कीजिये ॥ १-३ ॥
श्रीव्यास उवाच |
| श्रीव्यासजी बोले- महाप्राज्ञ पुत्र ! मैंने पूर्वकालमें
शृणु वत्स महाप्राज्ञ यज्ज्ञात्वा मुक्तिमाप्नुयात् । | नारदजीके मुखसे जिसका श्रवण किया था और जिसे
तच्च वक्ष्यामि ते दिव्यं नारदेन श्रुतं पुरा ॥ ४ | जान लेनेपर मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर लेता है, उस दिव्य
| ज्ञानका मैं तुमसे वर्णन करता हूँ। यमराजके भवनमें
नरके रौरवे घोरे धर्मज्ञानविवर्जिताः । | जहाँ घोर रौरव नरकके भीतर धर्म और ज्ञानसे रहित
स्वकर्मभिर्महादुःखं प्राप्ता यत्र यमालये ॥ ५ | प्राणी अपने पापकर्मोंके कारण महान् कष्ट पाते हैं,
| वहाँ एक बार नारदजी गये। उन्होंने देखा, पापी जीव
महापापकृतं घोरं सम्प्राप्ताः पापकृज्जनाः । | अपने महान् पापोंके फलस्वरूप घोर संकटमें पड़े हैं।
आलोक्य नारदः शीघ्रं गत्वा यत्र त्रिलोचनः ॥ ६ | यह देखकर नारदजी शीघ्र ही उस स्थानपर गये, जहाँ
| त्रिलोचन महादेवजी थे। वहाँ पहुँचकर सिरपर गङ्गाजीको
गङ्गाधरं महादेवं शंकरं शूलपाणिनम् । | धारण करनेवाले महान् देवता शूलपाणि भगवान्
प्रणम्य विधिवद्देवं नारदः परिपृच्छति ॥ ७ | शंकरको उन्होंने विधिवत् प्रणाम किया और इस
| प्रकार पूछा ॥ ४-७ ॥
नारद उवाच |
| नारदजी बोले- 'भगवन् ! जो संसारमें महान् द्वन्द्वों,
यः संसारे महाद्वन्द्वैः कामभोगैः शुभाशुभैः । | शुभाशुभ कामभोगों और शब्दादि विषयोंसे बँधकर
शब्दादिविषयैर्बद्धः पीड्यमानः षडूर्द्मिभिः ॥ ८ | छहों ऊर्मियोंद्वारा * पीड़ित हो रहा है, वह मृत्युमय
कथं नु मुच्यते क्षिप्रं मृत्युसंसारसागरात् । | संसार-सागरसे किस प्रकार शीघ्र ही मुक्त हो सकता
भगवन् ब्रूहि मे तत्त्वं श्रोतुमिच्छामि शंकर ॥ ९ | है ? कल्याणस्वरूप भगवान् शिव ! यह बात मुझे बताइये।
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा नारदस्य त्रिलोचनः । | मैं यही सुनना चाहता हूँ।' नारदजीका वह वचन सुनकर
उवाच तमृषिं शम्भुः प्रसन्नवदनो हरः ॥ १० | त्रिनेत्रधारी भगवान् हरका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिल
| उठा। वे उन महर्षिसे बोले ॥ ८-१० ॥
महेश्वर उवाच |
| श्रीमहेश्वरने कहा - मुनिश्रेष्ठ ! सुनो; मैं सब प्रकारके
ज्ञानामृतं च गुह्यं च रहस्यमृषिसत्तम । | बन्धनोंका भय और दुःख दूर करनेवाले गोपनीय
वक्ष्यामि शृणु दुःखघ्नं सर्वबन्धभयापहम् ॥ ११ | रहस्यभूत ज्ञानामृतका वर्णन करता हूँ। तृणसे लेकर
तृणादि चतुरास्यान्तं भूतग्रामं चतुर्विधम् । | चतुरानन ब्रह्माजीतक, जो चार प्रकारका प्राणिसमुदाय
चराचरं जगत्सर्वं प्रसुप्तं यस्य मायया ॥ १२ | है, वह अथवा समस्त चराचर जगत् जिनकी मायासे
तस्य विष्णोः प्रसादेन यदि कश्चित् प्रबुध्यते । | सुप्त हो रहा है, उन भगवान् विष्णुकी कृपासे यदि
स निस्तरति संसारं देवानापि दुस्तरम् ॥ १३ | कोई जाग उठता है - ज्ञानवान् हो जाता है तो वही
| देवताओंके लिये भी दुस्तर इस संसार-सागरको पार
भोगैश्वर्यमदोन्मत्तस्तत्त्वज्ञानपराङ्मुखः । | कर जाता है। जो मनुष्य भोग और ऐश्वर्यके मदसे
संसारसुमहापङ्के जीर्णा गौरिव मज्जति ॥ १४ | उन्मत्त और तत्त्वज्ञानसे विमुख है, वह संसाररूपी
- भूख, प्यास, जरा, मृत्यु, शोक और मोह-ये छः दुःख 'ऊर्मि' कहे गये हैं।
अध्याय १६ ] भगवान् विष्णुके ध्यानसे मोक्षकी प्राप्तिका प्रतिपादन ६१
यस्त्वात्मानं निबध्नाति कर्मभिः कोशकारवत्। महान् पङ्कमें उस तरह डूब जाता है, जैसे कीचड़में
तस्य मुक्तिं न पश्यामि जन्मकोटिशतैरपि॥ १५ फँसी हुई बूढ़ी गाय। जो रेशमके कीड़ेकी भाँति अपनेको
कर्मोंके बन्धनसे बाँध लेता है, उसके लिये करोड़ों जन्मोंमें
तस्मान्नारद सर्वेशं देवानां देवमव्ययम्। भी मैं मुक्तिकी सम्भावना नहीं देखता। इसलिये नारद!
आराधयेत्सदा सम्यग् ध्यायेद्विष्णुं समाहितः॥ १६ सदा समाहितचित्त होकर सर्वेश्वर अविनाशी देवदेव
भगवान् विष्णुका सदा भलीभाँति आराधन और ध्यान
यस्तं विश्वमनाद्यन्तमाद्यं स्वात्मनि संस्थितम्। करना चाहिये॥ ११-१६॥
सर्वज्ञममलं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ १७ जो सदा उन विश्वस्वरूप, आदि-अन्तसे रहित, सबके
आदिकारण, आत्मनिष्ठ, अमल एवं सर्वज्ञ भगवान् विष्णुका
निर्विकल्पं निराकाशं निष्प्रपञ्चं निरामयम्। ध्यान करता है, वह मुक्त हो जाता है। जो विकल्पसे
वासुदेवमजं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ १८ रहित, अवकाशशून्य, प्रपञ्चसे परे, रोग-शोकसे हीन एवं
अजन्मा हैं, उन वासुदेव (सर्वव्यापी भगवान्) विष्णुका
निरञ्जनं परं शान्तमच्युतं भूतभावनम्। सदा ध्यान करनेवाला पुरुष संसार-बन्धनसे मुक्त हो
देवगर्भं विभुं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ १९ जाता है। जो सब दोषोंसे रहित, परम शान्त, अच्युत,
प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले तथा देवताओंके भी उत्पत्ति-
सर्वपापविनिर्मुक्तमप्रमेयमलक्षणम् । स्थान हैं, उन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला
निर्वाणमनघं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २० पुरुष जन्म-मृत्युके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है। जो
सम्पूर्ण पापोंसे शून्य, प्रमाणरहित, लक्षणहीन, शान्त तथा
अमृतं परमानन्दं सर्वपापविवर्जितम्। निष्पाप हैं, उन भगवान् विष्णुका सदा चिन्तन करनेवाला
ब्रह्मण्यं शंकरं विष्णुं सदा संकीर्त्य मुच्यते॥ २१ मनुष्य कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। जो अमृतमय,
परमानन्दस्वरूप, सब पापोंसे रहित, ब्राह्मणप्रिय तथा सबका
योगेश्वरं पुराणाख्यमशरीरं गुहाशयम्। कल्याण करनेवाले हैं, उन भगवान् विष्णुका निरन्तर नाम-
अमात्रमव्ययं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २२ कीर्तन करनेसे मनुष्य संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
जो योगोंके ईश्वर, पुराण, प्राकृत देहहीन, बुद्धिरूप गुहामें
शुभाशुभविनिर्मुक्तमूर्भिष्टकपरं विभुम्। शयन करनेवाले, विषयोंके सम्पर्कसे शून्य और अविनाशी
अचिन्त्यममलं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २३ हैं, उन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला पुरुष
जन्म-मृत्युके बन्धनसे छुटकारा पा जाता है॥ १७-२२॥
सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्तं सर्वदुःखविवर्जितम्। जो शुभ और अशुभके बन्धनसे रहित, छः ऊर्मियोंसे
अप्रतर्क्यमजं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २४ परे, सर्वव्यापी, अचिन्तनीय तथा निर्मल हैं, उन भगवान्
विष्णुका सदा ध्यान करनेवाला मनुष्य संसारसे मुक्त हो
अनामगोत्रमद्वैतं चतुर्थं परमं पदम्। जाता है। जो समस्त द्वन्द्वोंसे मुक्त और सब दुःखोंसे
तं सर्वहृद्गतं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २५ रहित हैं, उन तर्कके अविषय, अजन्मा भगवान् विष्णुका
सदा ध्यान करता हुआ पुरुष मुक्त हो जाता है। जो
अरूपं सत्यसंकल्पं शुद्धमाकाशवत्परम्। नाम-गोत्रसे शून्य, अद्वितीय और जाग्रत् आदि तीनों
एकाग्रमनसा विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २६ अवस्थाओंसे परे तुरीय परमपद हैं, समस्त भूतोंके हृदय-
मन्दिरमें विद्यमान उन भगवान् विष्णुका सदा ध्यान
सर्वात्मकं स्वभावस्थमात्मचैतन्यरूपकम्। करनेवाला पुरुष मुक्त हो जाता है। जो रूपरहित, सत्यसंकल्प
शुभ्रमेकाक्षरं विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २७ और आकाशके समान परम शुद्ध हैं, उन भगवान् विष्णुका
सदा एकाग्रचित्तसे चिन्तन करनेवाला मनुष्य मुक्ति प्राप्त
अनिर्वाच्यमविज्ञेयमक्षरादिमसम्भवम् । कर लेता है। जो सर्वरूप, स्वभावनिष्ठ और आत्मचैतन्यरूप
एकं नूतं सदा विष्णुं सदा ध्यायन् विमुच्यते॥ २८ हैं, उन प्रकाशमान एकाक्षर (प्रणवमय) भगवान् विष्णुका
सदा ध्यान करनेवाला मनुष्य मुक्त हो जाता है।
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