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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

२९६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६६

२९६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६६
परेषां ब्राह्मणानां तु परेण ब्रह्मणा पुरा।
स दृष्टस्तु महावृक्षो महाफलसमन्वितः ॥ १५
किमेतदिति विप्रेन्द्र ध्यानदृष्टिपरोऽभवत् ।
ध्यानेन दृष्टवांस्तत्र पुनरामलकं तरुम् ॥ १६
तस्योपरि तु देवेशं शङ्खचक्रगदाधरम् ।
उत्थाय च पुनः पश्येत्प्रतिमामेव केवलाम् ॥ १७
तत्पादं भूतले देवः प्रविवेश महातरुः ।
ततस्त्वाराधयामास देवदेवेशमव्ययम् ॥ १८
गन्धपुष्पादिभिर्नित्यं ब्रह्मा लोकपितामहः।
द्वादशभिः सप्तभिस्तु संख्याभिः पूजितो हरिः ॥ १९
तस्मिन् क्षेत्रे मुनिश्रेष्ठ माहात्म्यं तस्य को वदेत् ।
श्रीसह्यामलग्रामे देवदेवेशमव्ययम् ॥ २०
आराध्य तीर्थे सम्प्राप्ता द्वादश प्रति चतुर्मुखम् ।
तस्य पादतले तीर्थं निस्सृतं पश्चिमामुखम् ॥ २१
तच्चक्रतीर्थमभवत्पुण्यं पापप्रणाशनम् ।
चक्रतीर्थे नरः स्नात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २२
बहुवर्षसहस्त्राणि ब्रह्मलोके महीयते ।
शङ्खतीर्थे नरः स्नात्वा वाजपेयफलं लभेत् ॥ २३
पौषे मासे तु पुष्यार्के तद्यात्रादिवसं मुने।
ब्रह्मणः कुण्डिका पूर्वं गङ्गातोयप्रपूरिता ॥ २४
तस्याद्रौ पतिता ब्रह्मंस्तत्र तीर्थेऽशुभं हरेत् ।
नाम्ना तत्कुण्डिकातीर्थं शिलागृहसमन्वितम् ॥ २५
तत्तीर्थे मनुजः स्नात्वा तदानीं सिद्धिमाप्नुयात् ।
त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा यस्तत्र स्नाति मानवः ॥ २६
सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते।
कुण्डिकातीर्थादुत्तरे पिण्डस्थानाच्च दक्षिणे ॥ २७
समस्त उत्तम ब्राह्मणोंमें उत्कृष्ट श्रीब्रह्माजीने पूर्वकालमें महान् फलोंसे युक्त उस महावृक्षको देखा था। विप्रेन्द्र! उसे देखकर, यह क्या है—यह जाननेके लिये ब्रह्माजी ध्यानमग्न हो गये। उन्होंने ध्यानमें उस स्थानपर महान् आँवलेके वृक्षको देखा और उसके ऊपर शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण करनेवाले देवेश्वर भगवान् विष्णुको विराजमान देखा। फिर उन्होंने जब ध्यानसे निवृत्त हो खड़े होकर दृष्टिपात किया, तब वहाँ वृक्षके स्थानमें केवल भगवान् विष्णुकी एक प्रतिमा दिखायी दी। उसका आधारभूत वह दिव्य महावृक्ष भूतलमें धँस गया! तब लोकपितामह भगवान् ब्रह्माजी गन्ध-पुष्प आदिसे नित्य ही उन अविनाशी देवदेवेश्वरकी आराधना करने लगे। उस समय उनके द्वारा बारह और सात बार भगवान्की पूजा सम्पन्न हुई ॥ १३-१९ ॥
मुनिश्रेष्ठ! उस आमलकक्षेत्रमें विराजमान भगवान्के माहात्म्यका कौन वर्णन कर सकता है। श्रीसह्यपर्वतस्थ आमलक ग्राममें इस प्रकार अविनाशी देवेश्वर भगवान्की आराधना करनेके पश्चात् ब्रह्माजीको वहाँ बारह तीर्थ और प्राप्त हुए। भगवान्के चरणके नीचे पश्चिमाभिमुख एक तीर्थ प्रकट हुआ। वह 'चक्रतीर्थ' के नामसे विख्यात हुआ। वह पावन तीर्थ पापोंको नष्ट करनेवाला है। मनुष्य चक्रतीर्थमें स्नान करके सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और हजारों वर्षोंतक ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। इसके बाद 'शङ्खतीर्थ' है। उसमें स्नान करनेसे मनुष्यको वाजपेय यज्ञका फल मिलता है। मुने! पौष मासमें जब सूर्य पुष्य नक्षत्रपर स्थित हों, उसी समय वहाँकी यात्राका पर्व है। पूर्वकालमें एक समय सह्यपर्वतपर गङ्गाजलसे भरा हुआ ब्रह्माजीका कमण्डलु गिर पड़ा था, तबसे वह स्थान 'कुण्डिका' तीर्थके नामसे विख्यात हुआ। वह तीर्थ सारे अशुभोंको हर लेता है। वहाँ एक शिलामय गृह भी है। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य तत्काल सिद्धि प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य उस तीर्थमें तीन राततक उपवास करके स्नान करता है, वह सब पापोंसे सर्वथा मुक्त हो ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। कुण्डिका-तीर्थसे उत्तर और 'पिण्डस्थान' नामक तीर्थसे
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अध्याय ६६ ] अन्यान्य तीर्थों तथा सह्याद्रि और आमलक ग्रामके तीर्थोंका माहात्म्य २९७

ऋणमोचनतीर्थं हि तीर्थानां गुह्यमुत्तमम्। | दक्षिण 'ऋणमोचन' नामक तीर्थ है, जो सब तीर्थोंमें
त्रिरात्रमुषितो यस्तु तत्र स्नानं समाचरेत्॥ २८ | उत्तम और गुह्य है। ब्रह्मन्! वहाँ तीन राततक निवास
| करके जो स्नान करता है, वह निस्संदेह तीनों ऋणोंसे
ऋणैस्त्रिभिरसौ ब्रह्मन् मुच्यते नात्र संशयः। | मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य पिण्डस्थानमें श्राद्ध करके
श्राद्धं कृत्वा पितृभ्यश्च पिण्डस्थानेषु यो नरः॥ २९ | वहाँ पितरोंके उद्देश्यसे विधिपूर्वक पिण्डदान करेगा,
| उसके पितर पूर्ण तृप्त होकर अवश्य ही पितृलोकको
पितॄनुद्दिश्य विधिवत्पिण्डान्निर्व्वापयिष्यति। | प्राप्त होंगे॥ २८-३०॥
सुतृप्ताः पितरो यान्ति पितृलोकं न संशयः॥ ३० |
| इसके बाद 'पाप-मोचन' तीर्थ है। उस तीर्थमें पाँच
पञ्चरात्रोषितस्नायी तीर्थे वै पापमोचने। | राततक निवास करते हुए जो नित्य स्नान करता है, वह
सर्वपापक्षयं प्राप्य विष्णुलोके स मोदते॥ ३१ | अपने सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करके विष्णुलोकमें आनन्दका
| भागी होता है। वहीं एक बहुत बड़ी धारा बहती है।
तत्रैव महतीं धारां शिरसा यस्तु धारयेत्। | उसके जलको जो अपने सिरपर धारण करता है, वह
सर्वक्रतुफलं प्राप्य नाकपृष्ठे महीयते॥ ३२ | समस्त यज्ञोंके फलको प्राप्त करके स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित
| होता है॥ ३१-३२॥
धनुःपाते महातीर्थे भक्त्या यः स्नानमाचरेत्। | इसके बाद 'धनुःपात' नामक एक महान् तीर्थ है।
आयुर्भोगफलं प्राप्य स्वर्गलोके महीयते॥ ३३ | उसमें जो भक्तिपूर्वक स्नान करता है, वह पूर्ण आयुका
| भोग करके अन्तमें स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है। 'शरबिन्दु'
शरबिन्दौ नरः स्नात्वा शतक्रतुपुरं व्रजेत्। | तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य मृत्युके बाद इन्द्रपुरीमें जाता
वाराहतीर्थे विप्रेन्द्र सह्ये यः स्नानमाचरेत्॥ ३४ | है तथा जो सह्यपर्वतपर 'वाराहतीर्थ' में स्नान करता
| और वहाँ एक दिन-रात निवास करता है, वह विष्णुलोकमें
अहोरात्रोषितो भूत्वा विष्णुलोके महीयते। | पूजित होता है। इसके बाद सह्यके शिखरपर 'आकाशगङ्गा'
आकाशगङ्गानाम्ना च सह्याग्रे तीर्थमुत्तमम्॥ ३५ | नामक एक उत्तम तीर्थ है। वहाँकी शिलाओंके नीचेसे
| सफेद मिट्टी निकलती है। विप्रवर! उसमें जो भक्तिपूर्वक
शिलातलात्ततो ब्रह्मन्निर्गता श्वेतमृत्तिका। | स्नान करता है, वह सम्पूर्ण यज्ञोंका फल प्राप्तकर
तस्यां भक्त्या तु यः स्नाति नरो द्विजवरोत्तम॥ ३६ | विष्णुलोकमें पूजित होता है॥ ३३-३६१/२॥
|
सर्वक्रतुफलं प्राप्य विष्णुलोके महीयते। | ब्रह्मन्! उस निर्मल सह्यगिरिसे जहाँ-जहाँ जलके
ब्रह्मन्नमलसह्याद्रेर्यद्यत्तोयविनिर्गमः ॥ ३७ | झरने गिरते हैं, वहाँ-वहाँ सब जगह तीर्थ समझना
| चाहिये। उसमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त
तत्र तीर्थं विजानीहि स्नात्वा पापात्प्रमुच्यते। | हो जाता है। जो नित्य ही सह्यपर्वतकी यात्रा करके
सह्याद्रिं गत्वान्नित्यं स्नात्वा पापात्प्रमुच्यते॥ ३८ | वहाँ स्नान करता है, वह निष्पाप हो जाता है। द्विजेन्द्र!
| जो मनुष्य सह्यपर्वतके इन पावन तीर्थोंमें स्नान करके
एतेषु तीर्थेषु नरो द्विजेन्द्र | भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुको पुष्प चढ़ाता है, वह
पुण्येषु सह्याद्रिसमुद्भवेषु। | पापोंसे रहित हो भगवान् विष्णुमें ही लीन हो जाता
दत्त्वा सुपुष्पाणि हरिं स भक्त्या |
विहाय पापं प्रविशेत्स विष्णुम्॥ ३९ |