संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६६
२९४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६६
सर्वत्र परमात्मानं यः पश्यति स मुच्यते । और सर्वत्र ही परमात्माका जो दर्शन करता है, वह मुक्त
अष्टषष्टिश्च नामानि कथितानि मया तव ॥ २४ हो जाता है ॥ १९-२३१/२ ॥
ब्रह्माजी ! ये अड़सठ नाम हमने तुम्हें बताये तथा
क्षेत्राणि चैव गुह्यानि कथितानि विशेषतः । विशेषतः गुप्त तीर्थोंका भी वर्णन किया। प्रजापते ! जो
एतानि मम नामानि रहस्यानि प्रजापते ॥ २५ पुरुष प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर मेरे इन गुह्यनामोंका
यः पठेत् प्रातरुत्थाय शृणुयाद्वापि नित्यशः । पाठ या श्रवण करेगा, वह नित्य एक लाख गोदानका
गवां शतसहस्रस्य दत्तस्य फलमाप्नुयात् ॥ २६ फल पायेगा। नित्यप्रति पवित्र होकर जो इन नामोंका
दिने दिने शुचिर्भूत्वा नामान्येतानि यः पठेत् । पाठ करता है, उसको मेरी कृपासे कभी दुःस्वप्नका
दुःस्वप्नं न भवेत् तस्य मत्प्रसादान्न संशयः ॥ २७ दर्शन नहीं होता, इसमें संदेह नहीं है। जो पुरुष इन
अड़सठ नामोंका प्रतिदिन तीनों काल, अर्थात् प्रातः,
अष्टषष्टिस्तु नामानि त्रिकालं यः पठेन्नरः । मध्याह्न और सायंकालमें पाठ करता है, वह सब पापोंसे
विमुक्तः सर्वपापेभ्यो मम लोके स मोदते ॥ २८ मुक्त होकर मेरे लोकमें आनन्द भोगता है। सभी मनुष्यों
और विशेषतः वैष्णवोंको चाहिये कि यथाशक्ति पूर्वोक्त
द्रष्टव्यानि यथाशक्त्या क्षेत्राण्येतानि मानवैः । तीर्थोंका दर्शन करें। जो लोग ऐसा करते हैं, उन्हें मैं
वैष्णवैस्तु विशेषेण तेषां मुक्तिं ददाम्यहम् ॥ २९ मुक्ति देता हूँ ॥ २४-२९ ॥
सूत उवाच
सूतजी कहते हैं- जो पुरुष सदा और विशेषतः
हरिं समभ्यर्च्य तदग्रसंस्थितो हरिवासर (एकादशी या द्वादशीको) भगवान् विष्णुकी
हरिं स्मरन् विष्णुदिने विशेषतः । पूजा करके उनके सामने खड़ा हो भगवत्स्मरणपूर्वक इस
इमं स्तवं यः पठते स मानवः स्तोत्रका पाठ करता है, वह विष्णुके अमृतपदको प्राप्त
प्राप्नोति विष्णोरमृतात्मकं पदम् ॥ ३० कर लेता है ॥ ३० ॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे आद्ये धर्मार्थमोक्षदायिनि विष्णुवल्लभे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'आदि धर्मार्थमोक्षदायक विष्णुवल्लभस्तोत्र' विषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥
छाछठवाँ अध्याय
अन्यान्य तीर्थों तथा सह्याद्रि और आमलक ग्रामके तीर्थोंका माहात्म्य
सूत उवाच सूतजी कहते हैं - भगवान् विष्णु पुनः बोले-
उक्तः पुण्यः स्तवो ब्रह्मन् हरेरेभिश्च नामभिः । ब्रह्मन् ! उपर्युक्त अड़सठ नामोंसे भगवान् विष्णुकी पावन
पुनरन्यानि नामानि यानि तानि निबोध मे ॥ १ स्तुतिका वर्णन किया गया। अब जो दूसरे-दूसरे पावन
तीर्थ और नाम हैं, उनका वर्णन मुझसे सुनिये ॥ १ ॥
गङ्गा तु प्रथमं पुण्या यमुना गोमती पुनः । सर्वप्रथम गङ्गा पवित्र है; फिर यमुना, गोमती, सरयू,
सरयूः सरस्वती च चन्द्रभागा चर्मण्वती ॥ २ सरस्वती, चन्द्रभागा और चर्मण्वती- ये नदियाँ पावन हैं।
कुरुक्षेत्रं गया चैव पुष्कराणि तथार्बुदम् । इसी प्रकार कुरुक्षेत्र, गया, तीनों पुष्कर और अर्बुद-क्षेत्र तथा
नर्मदा च महापुण्या तीर्थान्येतानि चोत्तरे ॥ ३ परम पावन नर्मदा नदी-ये उत्तरमें परम पावन तीर्थ हैं।
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अध्याय ६६ ] अन्यान्य तीर्थों तथा सह्याद्रि और आमलक ग्रामके तीर्थोंका माहात्म्य २९५
तापी पयोष्णी पुण्ये द्वे तत्सङ्गात्तीर्थमुत्तमम्। | तापी, पयोष्णी—ये दो पावन नदियाँ हैं। इनके संगमसे
तथा ब्रह्मगिरेश्चापि मेखलाभिः समन्विताः ॥ ४ | एक बहुत उत्तम तीर्थ हो गया है तथा ब्रह्मगिरिकी
| मेखलाओंसे मिले हुए भी बहुत-से उत्तम तीर्थ हैं।
विरजं च तथा तीर्थं सर्वपापक्षयंकरम्। | विरज-तीर्थ भी समस्त पापोंको क्षीण करनेवाला है तथा
गोदावरी महापुण्या सर्वत्र चतुरानन ॥ ५ | चतुरानन! गोदावरी नदी सर्वत्र परमपावन है। कमलोद्भव!
तुङ्गभद्रा महापुण्या यत्राहं कमलोद्भव। | तुङ्गभद्रा नदी भी अत्यन्त पवित्र करनेवाली है, जिसके
हरेण सार्धं प्रीत्या तु वसामि मुनिपूजितः ॥ ६ | तटपर मैं मुनियोंद्वारा पूजित हो भगवान् शङ्करके साथ
| स्वयं निवास करता हूँ। दक्षिण गङ्गा, कृष्णा और विशेषतः
दक्षिणगङ्गा कृष्णा तु कावेरी च विशेषतः । | कावेरी—ये पुण्य नदियाँ हैं। इनके अतिरिक्त, कमलोद्भव !
सह्ये त्वामलकग्रामे स्थितोऽहं कमलोद्भव ॥ ७ | मैं सह्यपर्वतपर आमलक ग्राममें स्वयं निवास करता हूँ।
| वहाँ 'देवदेव' नामसे प्रसिद्ध मेरे श्रीविग्रहका तुम स्वयं
देवदेवस्य नाम्ना तु त्वया ब्रह्मन् सदार्चितः । | ही सदा पूजन करते हो। वहाँ समस्त पापोंको हर लेनेवाले
तत्र तीर्थान्यनेकानि सर्वपापहराणि वै॥ | अनेक तीर्थ हैं, जिनमें स्नान और आचमन करके मनुष्य
येषु स्नात्वा च पीत्वा च पापान्मुच्यति मानवः ॥ ८ | पापसे मुक्त हो जाता है ॥ २–८ ॥
सूत उवाच |
इत्येवं कथयित्वा तु तीर्थानि मधुसूदनः । | सूतजी कहते हैं—भरद्वाज ! ब्रह्माजीसे इन तीर्थोंका
ब्रह्मणो गतवान् ब्रह्मन् ब्रह्मापि स्वपुरं गतः ॥ ९ | वर्णन करके भगवान् मधुसूदन अपने धामको चले गये
| और ब्रह्मा भी ब्रह्मलोक सिधारे ॥ ९ ॥
भरद्वाज उवाच |
| भरद्वाजजी बोले—धर्मज्ञ ! उस आमलक ग्राममें
तस्मिन्नामलकग्रामे पुण्यतीर्थानि यानि वै। | जो-जो पुण्यतीर्थ हैं, उनका आप विस्तारके साथ यथार्थ-
तानि मे वद धर्मज्ञ विस्तरेण यथार्थतः ॥ १० | रूपमें वर्णन करें। जहाँ देवदेवेश्वर भगवान् विष्णु स्वयं
क्षेत्रोत्पत्तिं च माहात्म्यं यात्रापर्व च यत्र तत् । | ब्रह्माजीके द्वारा पूजित होते हैं, उस क्षेत्रकी उत्पत्ति-
तत्रासौ देवदेवेशः पूज्यते ब्रह्मणा स्वयम् ॥ ११ | कथा, माहात्म्य और यात्रापर्वका विस्तृत विवरण प्रस्तुत
| कीजिये ॥ १०-११ ॥
सूत उवाच |
शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि पुण्यं पापप्रणाशनम्। | सूतजी कहते हैं—विप्र ! महामुने ! सह्यपर्वतपर स्थित
सह्यामलाकतीर्थस्य उत्पत्त्यादि महामुने ॥ १२ | 'आमलक' तीर्थके आविर्भाव आदिकी पवित्र एवं पापनाशक
| कथा मैं आपसे कह रहा हूँ, सुनें ॥ १२ ॥
पुरा सह्यावनोद्देशे तरुरामलको महान्। | ब्रह्मन् ! पूर्वकालमें सह्यपर्वतके वनमें एक बहुत
आसीद्ब्रह्मन् महोग्रोऽयं नाम्नायं चोच्यते बुधैः ॥ १३ | बड़ा आँवलेका वृक्ष था। उसे बुद्धिमान् लोगोंने
फलानि तस्य वृक्षस्य महान्ति सुरसानि च । | 'महोग्र' नाम दे रखा था। महामुने ! उस वृक्षके फल
दर्शनीयानि दिव्यानि दुर्लभाानि महामुने ॥ १४ | बड़े रसीले, दर्शनीय, दिव्य एवं दुर्लभ होते थे।
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