सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

२८८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

२८८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६४
[मूल संस्कृत श्लोक]
शास्त्रेषु कथिता विष्णोर्लोकव्यामोहकारकाः।
एकं यदि भवेच्छास्त्रं ज्ञानं निस्संशयं भवेत् ॥ ७७
बहुत्वादिह शास्त्राणां ज्ञानतत्त्वं सुदुर्लभम्।
आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ॥ ७८
इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा।
त्यक्त्वा व्यामोहकान् सर्वान् तस्माच्छास्त्रार्थविस्तरान् ॥ ७९
अनन्यचेता ध्यायस्व नारायणमतन्द्रितः।
एवं ज्ञात्वा तु सततं देवदेवं तमव्ययम् ॥ ८०
क्षिप्रं यास्यसि तत्रैव सायुज्यं नात्र संशयः।
श्रुत्वेदं ब्रह्मणा प्रोक्तं ज्ञानयोगं सुदुर्लभम् ॥ ८१
ततोऽहमासं विप्रेन्द्र नारायणपरायणः।
नमो नारायणायेति ये विदुर्ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ८२
अन्तकाले जपन्तस्ते यान्ति विष्णोः परं पदम्।
तस्मान्नारायणस्तात परमात्मा सनातनः ॥ ८३
अनन्यमनसा नित्यं ध्येयस्तत्त्वविचिन्तकैः।
नारायणो जगद्व्यापी परमात्मा सनातनः ॥ ८४
जगतां सृष्टिसंहारपरिपालनतत्परः।
श्रवणात्पठनाच्चैव निदिध्यासनतत्परैः ॥ ८५
आराध्यः सर्वथा ब्रह्मन् पुरुषेण हितैषिणा।
निःस्पृहा नित्यसंतुष्टा ज्ञानिनः संयतेन्द्रियाः ॥ ८६
निर्ममा निरहंकारा रागद्वेषविवर्जिताः।
अपक्षपतिताः शान्ताः सर्वसंकल्पवर्जिताः ॥ ८७
ध्यानयोगपरा ब्रह्मन् ते पश्यन्ति जगत्पतिम्।
त्यक्तत्रया महात्मानो वासुदेवं हरिं गुरुम् ॥ ८८
कीर्तयन्ति जगन्नाथं ते पश्यन्ति जगत्पतिम्।
तस्मात्त्वमपि विप्रेन्द्र नारायणपरो भव ॥ ८९
[हिन्दी अनुवाद]
कणके बराबर 'अणु' मानते हैं। ऊपर भगवान् विष्णुके
जिन नामोंका उल्लेख किया गया है, ये तथा अन्य भी
बहुत-से भिन्न-भिन्न नाम मुनियोंद्वारा शास्त्रोंमें कहे गये
हैं, जो साधारण लोगोंमें भेद-भ्रमका उत्पादन कर उन्हें
मोहमें डालनेवाले हैं। यदि एक ही शास्त्र होता तो
सबको संदेहरहित निश्चयात्मक ज्ञान होता। किंतु यहाँ
तो बहुतेरे शास्त्र हैं और सबका अलग-अलग सिद्धान्त
है; अतः ज्ञानका तत्त्व बड़ा ही दुर्ज्ञेय हो गया है।
परंतु मैंने सम्पूर्ण शास्त्रोंका मथन करके विचार किया
तो एक यही बात सब सिद्धान्तोंके साररूपसे ज्ञात हुई
कि सदा 'भगवान् नारायणका ध्यान करना चाहिये।'
इसलिये मोहमें डालनेवाले सम्पूर्ण शास्त्र-विस्तारोंका
त्याग करके एकचित्त होकर उत्साहपूर्वक भगवान्
नारायणका ध्यान करो। इस प्रकार सतत चिन्तनके
द्वारा उन अविनाशी देवदेव नारायणका तत्त्व जानकर
तुम शीघ्र ही उनमें सायुज्य-मुक्ति प्राप्त कर लोगे,
इसमें संदेह नहीं है॥ ६९-८०१/२॥
विप्रेन्द्र! इस प्रकार ब्रह्माजीके कहे हुए इस परम
दुर्लभ ज्ञानयोगको सुनकर मैं तभीसे भगवान् नारायणकी
परिचर्यामें लग गया। जो लोग 'ॐ नमो नारायणाय'-
इस सनातन ब्रह्मस्वरूप मन्त्रको जानते हैं, वे अन्तकालमें
इसका जप करते हुए विष्णुके परमधामको प्राप्त कर
लेते हैं। अतः तात! तत्त्व-विचार करनेवाले पुरुषोंको
सदा ही सनातन परमात्मा नारायणका अनन्यचित्तसे ध्यान
करना चाहिये। भगवान् नारायण जगद्व्यापी सनातन परमेश्वर
हैं। ये भिन्न-भिन्न रूपसे सम्पूर्ण लोकोंके सृष्टि, पालन
तथा संहार-कार्यमें लगे रहते हैं। इनके नाम, गुण एवं
लीलाओंका श्रवण और कीर्तन करते हुए उनके ध्यानमें
संलग्न हो उनकी आराधना करनी चाहिये। ब्रह्मन्! अपना
हित चाहनेवाले पुरुषके लिये सर्वथा भगवान् नारायणकी
आराधना ही कर्तव्य है। विप्रवर! जो लोग निःस्पृह, नित्य-
संतुष्ट, ज्ञानी, जितेन्द्रिय और ममता-अहंता, राग-द्वेष आदि
विकारोंसे रहित हैं तथा जो पक्षपातशून्य, शान्त एवं सब
प्रकारके संकल्पोंसे वर्जित हैं, वे भगवान्के ध्यानयोगमें
तत्पर हो उन जगदीश्वरका साक्षात्कार कर लेते हैं। जो
महात्मा त्रिभुवनसे नाता तोड़कर जगद्गुरु जगन्नाथ भगवान्
वासुदेवका कीर्तन करते हैं, वे उन जगत्पत्तिका दर्शन पा
जाते हैं। इसलिये विप्रवर! तुम भी भगवान् नारायणकी
समाराधनामें तत्पर हो जाओ ॥ ८१-८९॥
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth

अध्याय ६४ ] भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान २८९
तदन्यः को महोदारः प्रार्थितं दातुमीश्वरः ।
हेलया कीर्तितो यो वै स्वं पदं दिशति द्विज ॥ ९०
अपि कार्यस्त्वया चैव जपः स्वाध्याय एव च।
तमेवोद्दिश्य देवेशं कुरु नित्यमतन्द्रितः ॥ ९१
किं तत्र बहुभिर्मन्त्रैः किं तत्र बहुभिर्व्रतैः।
नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः ॥ ९२
चीरवासा जटाधारी त्रिदण्डी मुण्ड एव वा।
भूषितो वा द्विजश्रेष्ठ न लिङ्गं धर्मकारणम् ॥ ९३
ये नृशंसा दुरात्मानः पापाचाररताः सदा।
तेऽपि यान्ति परं स्थानं नरा नारायणाश्रयाः ॥ ९४
जन्मान्तरसहस्रेषु यस्य स्याद्बुद्धिरीदृशी।
दासोऽहं वासुदेवस्य देवदेवस्य शार्ङ्गिणः ॥ ९५
प्रयाति विष्णुसालोक्यं पुरुषो नात्र संशयः।
किं पुनस्तद्गतप्राणः पुरुषः संयतेन्द्रियः ॥ ९६
द्विज! जो अवहेलनापूर्वक नाम लेनेपर भी भक्तको अपना परमधाम दे देते हैं, उन भगवान् नारायणके सिवा दूसरा कौन ऐसा महान् उदार है, जो माँगी हुई वस्तुको देनेमें समर्थ हो ? तुम्हें जप अथवा स्वाध्याय-जो कुछ भी करना हो, उसे उन देवेश्वर भगवान् नारायणके उद्देश्यसे ही सदा आलस्य त्यागकर करते रहो। बहुत-से मन्त्र और व्रतोंसे क्या काम ? 'ॐ नमो नारायणाय'—यह मन्त्र ही सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है। द्विजश्रेष्ठ ! कोई चीर वस्त्र पहननेवाला, जटा धारण करनेवाला, त्रिदण्डी, सदा माथा मुँड़ाये रहनेवाला अथवा तरह-तरहके उपकरणोंसे विभूषित ही क्यों न हो, उसके ये बाह्य चिह्न धर्मके कारण नहीं हो सकते; किंतु जो मनुष्य भगवान् नारायणकी शरणमें जा चुके हैं, वे पहले निर्दयी, दुष्ट और सदा पापरत रहे हों तो भी भगवान्‌के परमधामको पधारते हैं। हजारों जन्मोंमें भी जिसकी ऐसी बुद्धि हो जाय कि 'मैं देवदेव, शार्ङ्गधनुषधारी भगवान् वासुदेवका दास हूँ', वह मनुष्य निःसंदेह भगवान् विष्णुके सालोक्यको प्राप्त होता है; फिर जो पुरुष जितेन्द्रिय होकर सदा भगवान्‌में ही अपने प्राणोंको लगाये रहता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है ॥ ९०-९६ ॥
सूत उवाच
इत्युक्त्वा देवदेवर्षिस्तत्रैवान्तरधीयत ।
परोपकारनिरतस्त्रैलोक्यस्यैकभूषणः ॥ ९७
पुण्डरीकोऽपि धर्मात्मा नारायणपरायणः ।
नमोऽस्तु केशवायेति पुनः पुनरुदीरयन् ॥ ९८
प्रसीदस्व महायोगिन्नित्यमुच्चार्य सर्वदा।
हृत्पुण्डरीके गोविन्दं प्रतिष्ठाप्य जनार्दनम् ॥ ९९
तपःसिद्धिकरेऽरण्ये शालग्रामे तपोधनः ।
उवास चिरमेकाकी पुरुषार्थविचक्षणः ॥ १००
स्वप्नेऽपि केशवादन्यन्न पश्यति महातपाः ।
निद्रापि तस्य नैवासीत्पुरुषार्थविरोधिनी ॥ १०१
तपसा ब्रह्मचर्येण शौचेन च विशेषतः ।
जन्मजन्मान्तरारूढसंस्कारेण च स द्विजः ॥ १०२
प्रसादाद्देवदेवस्य सर्वलोकैकसाक्षिणः ।
अवाप परमां सिद्धिं वैष्णवीं वीतकल्मषः ॥ १०३
सूतजी कहते हैं—सदा दूसरोंके ही उपकारमें लगे रहनेवाले त्रिभुवनभूषण देवर्षि नारदजी उपर्युक्त बातें बताकर वहींपर अन्तर्धान हो गये। अब धर्मात्मा पुण्डरीक भी एकमात्र भगवान् नारायणके भजनमें तत्पर हो बार-बार इस प्रकार उच्चारण करने लगे—'भगवान् केशवको नमस्कार है; हे महायोगिन् ! आप मुझपर प्रसन्न हों।' निरन्तर यों कहते हुए पुरुषार्थ-साधनमें कुशल वे तपस्वी पुण्डरीकजी अपने हृदय-कमलके आसनपर जनार्दन भगवान् गोविन्दको स्थापितकर तपस्याकी सिद्धि करनेवाले उस 'शालग्राम' नामक तपोवनमें बहुत कालतक अकेले ही रहे। महातपस्वी पुण्डरीक स्वप्नमें भी भगवान् केशवके सिवा दूसरा कुछ नहीं देखते थे। उनकी नींद भी उन्हें पुरुषार्थ-साधनमें बाधा नहीं देती थी। उन पापरहित द्विजवर पुण्डरीकने तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा विशेषतः शौचाचारके पालनसे और जन्म-जन्मान्तरोंकी साधनासे सुदृढ़ हुए भगवद्भक्तिसाधक संस्कारसे सम्पूर्ण लोकोंके एकमात्र साक्षी देवदेव भगवान् विष्णुकी कृपाद्वारा परम उत्तम वैष्णवी सिद्धि प्राप्त कर ली। उनके निकट