संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२८२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय-६४
२८२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय-६४
चौंसठवाँ अध्याय
भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान
[मूल संस्कृत श्लोक]
श्रीभरद्वाज उवाच
सत्यं केचित्प्रशंसन्ति तपः शौचं तथापरे।
सांख्यं केचित्प्रशंसन्ति योगमन्ये प्रचक्षते॥ १
ज्ञानं केचित्प्रशंसन्ति समलोष्टाश्मकाञ्चनाः।
क्षमां केचित्प्रशंसन्ति तथैव च दयार्जवम्॥ २
केचिद्दानं प्रशंसन्ति केचिदाहुः परं शुभम्।
सम्यग्ज्ञानं परं केचित्केचिद्वैराग्यमुत्तमम्॥ ३
अग्निष्टोमादिकर्माणि तथा केचित्परं विदुः।
आत्मध्यानं परं केचित्सांख्यतत्त्वार्थवेदिनः॥ ४
धर्मार्थकाममोक्षाणां चतुर्णामिह केवलम्।
उपायः पदभेदेन बहुधैवं प्रचक्ष्यते॥ ५
एवं चावस्थिते लोके कृत्याकृत्यविधौ नराः।
व्यामोहमेव गच्छन्ति विमुक्ताः पापकर्मभिः॥ ६
यदेतेषु परं कृत्यमनुष्ठेयं महात्मभिः।
वक्तुमर्हसि सर्वज्ञ मम सर्वार्थसाधकम्॥ ७
सूत उवाच
श्रूयतामिदमत्यन्तं गूढं संसारमोचनम्।
अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्॥ ८
पुण्डरीकस्य संवादं देवर्षेर्नारदस्य च।
ब्राह्मणः श्रुतसम्पन्नः पुण्डरीको महामतिः॥ ९
आश्रमे प्रथमे तिष्ठन् गुरूणां वशगः सदा।
जितेन्द्रियो जितक्रोधः संध्योपासनधिष्ठितः॥ १०
वेदवेदाङ्गनिपुणः शास्त्रेषु च विचक्षणः।
समिद्भिः साधुयत्नेन सायं प्रातर्हुताशनम्॥ ११
[हिन्दी अनुवाद]
श्रीभरद्वाजजी बोले—सूतजी! कुछ लोग 'सत्य' को ही पुरुषार्थका साधक बताकर उसकी प्रशंसा करते
हैं, दूसरे लोग 'तपस्या' और 'पवित्रता' को उत्तम बताते हैं। कुछ लोग 'सांख्य' और कुछ लोग 'योग' की प्रशंसा
करते हैं। ढेले, पत्थर और सोनेको समान समझनेवाले कुछ अन्य लोग 'ज्ञान' को ही पुरुषार्थ-साधनके लिये
उत्तम मानते हैं। कुछ लोग 'क्षमा' की प्रशंसा करते हैं तो कुछ लोग 'दया' और 'सरलता' की। कुछ लोग ऐसे
हैं, जो 'दान' को उत्तम बताते हैं, कुछ लोग और ही किसी उपायको शुभ कहते हैं। दूसरे लोग 'सम्यग्ज्ञान'
को उत्तम मानते हैं और अन्य जन 'वैराग्य' को श्रेष्ठ बताते हैं। कुछ याज्ञिक लोग 'अग्निष्टोम' आदि यज्ञोंको
ही सबसे बढ़कर मानते हैं। सांख्यतत्त्वका मर्म जाननेवाले कुछ लोग 'आत्माके ध्यान' को श्रेष्ठ मानते हैं। इस प्रकार
यहाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप चारों पुरुषार्थोंका उपाय ही नाम-भेदसे नाना प्रकारका बताया जाता है। ऐसी
स्थितिमें जगत्में पापकर्मसे विमुक्त पुरुष भी कर्तव्याकर्तव्यके विषयमें कुछ निश्चय न हो सकनेके कारण मोहमें ही पड़े
रहते हैं। सर्वज्ञ! इन उपर्युक्त 'सत्य' आदि उपायोंमें जो सबसे उत्तम उपाय हो और महात्माओंद्धारा अवश्यकर्तव्य
हो, सब मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले उस उपायका आप हमसे वर्णन करें॥ १–७॥
सूतजी कहते हैं—संसार-बन्धनसे मुक्त करनेवाले इस अत्यन्त गूढ उपायको लोग सुनें। इस विषयमें
महात्माजन देवर्षि नारद और भक्तवर पुण्डरीकके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका वर्णन किया करते हैं॥ ८१/२॥
महामति पुण्डरीकजी एक विद्वान् ब्राह्मण थे। वे सदा गुरुजनोंके वशमें रहते हुए ब्रह्मचर्य आश्रमके नियमोंका
पालन करते थे। उन्होंने अपनी इन्द्रियों और क्रोधको जीत लिया था तथा वे नियमानुसार संध्योपासन किया
करते थे। वेद और वेदाङ्गोंमें वे निष्णात थे तथा अन्य शास्त्रोंके भी पण्डित थे। वे प्रतिदिन समिधा एकत्रकर
सायं और प्रातःकाल अत्यन्त यत्नपूर्वक अग्निकी उपासना
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अध्याय ६४] भगवद्भजनकी श्रेष्ठता और भक्त पुण्डरीकका उपाख्यान २८३
ध्यात्वा यज्ञपतिं विष्णुं सम्यगाराधयन् विभुम्। | किया करते थे। साक्षात् ब्रह्मपुत्र नारदजीके समान वे सर्वव्यापी
तपःस्वाध्यायनिरतः साक्षाद्ब्रह्मसुतो यथा॥ १२ | यज्ञपति भगवान् विष्णुकी विधिपूर्वक आराधना करते हुए
| उनका ध्यान किया करते थे और सदा तपस्या तथा स्वाध्यायमें
उदकेन्धनपुष्पार्थैरसकृत्तर्पयन् गुरून्। | ही लगे रहते थे। जल, ईंधन और फूल आदि आवश्यक
मातापितृभ्यां शुश्रूषुर्भिक्षाहारी जनप्रियः॥ १३ | सामान लाकर वे सदा ही गुरुजनोंको संतुष्ट रखते और
| उनकी अपने माता-पिताके समान शुश्रूषा किया करते थे।
ब्रह्मविद्यामधीयानः प्राणायामपरायणः। | भिक्षा माँगकर भोजन करते थे और अपने सद्व्यवहारोंके
तस्य सर्वार्थभूतस्य संसारेऽत्यन्तनिःस्पृहा॥ १४ | कारण लोगोंके परम प्रिय हो गये थे। वे सदा ब्रह्मविद्याका
| अध्ययन और प्राणायामका अभ्यास करते रहते थे। महाराज!
बुद्धिरासीन्महाराज संसारार्णवतारणी। | समस्त पदार्थोंको वे अपना स्वरूप ही समझते थे; अतः
पितरं मातरं चैव भ्रातॄनथ पितामहान्॥ १५ | संसारके विषयोंमें उनकी बुद्धि अत्यन्त निःस्पृह हो भवसागरसे
| पार उतारनेवाली हो गयी थी॥ ९-१४ १/२॥
पितृव्यान्मातुलांश्चैव सखीन् सम्बन्धिबान्धवान्। | भरद्वाजजी! उनका वैराग्य यहाँतक बढ़ गया कि वे महान्
परित्यज्य महोदारस्तृणानीव यथासुखम्॥ १६ | उदार पुण्डरीकजी पिता, माता, भाई, पितामह, चाचा, मामा,
| मित्र, सम्बन्धी तथा बान्धवजनोंको तृणके समान त्यागकर,
विचचार महीमेतां शाकमूलफलाशनः। | शाक और मूल-फलादिका आहार करते हुए इस पृथ्वीपर
अनित्यं यौवनं रूपमायुष्यं द्रव्यसंचयम्॥ १७ | आनन्दपूर्वक विचरने लगे। उन्होंने यौवन, रूप, आयु और
| धन-संग्रहकी अनित्यताका विचार करके समस्त त्रिभुवनको
इति संचिन्तयानेन त्रैलोक्यं लोष्ठवत् स्मृतम्। | मिट्टीके ढेलेके समान तुच्छ समझ लिया था और अपने
पुराणोदितमार्गेण सर्वतीर्थानि वै मुने॥ १८ | मनमें यह निश्चय करके कि 'मैं पुराणोक्त मार्गसे यथासमय
| सभी तीर्थोंकी यात्रा करूँगा', वे महाबाहु, महातेजस्वी और
गमिष्यामि यथाकालमिति निश्चितमानसः। | महाव्रती पुण्डरीकजी गङ्गा, यमुना, गोमती, गण्डकी, शतद्रू,
गङ्गां च यमुनां चैव गोमतीमथ गण्डकीम्॥ १९ | पयोष्णी, सरयू और सरस्वतीके तटपर, प्रयागमें, नर्मदा
| आदि महानदियों तथा नदोंके तटपर, गयामें तथा विन्ध्याचल
शतद्रूं च पयोष्णीं च सरयूं च सरस्वतीम्। | और हिमालयके तीर्थोंमें एवं इनके अतिरिक्त अन्यान्य
प्रयागं नर्मदां चैव महानद्यो नदानपि॥ २० | तीर्थोंमें भी यथासमय विधिपूर्वक भ्रमण करते रहे। इसी
| तरह घूमते हुए, पुण्यकर्मोंके अधीन हो वे तपस्वी वीर महाभाग
गयां च विन्ध्यतीर्थानि हिमवत् प्रभवाणि च। | पुण्डरीक शालग्रामक्षेत्रमें जा पहुँचे॥ १५-२२ १/२॥
अन्यानि च महातेजास्तीर्थानि स महाव्रतः॥ २१ | वह तीर्थ तत्त्वज्ञानी तपस्वी ऋषियोंद्वारा सेवित था।
| वहाँ मुनियोंके सुरम्य आश्रम थे, जो पुराणोंमें प्रसिद्ध
संचचार महाबाहुर्यथाकालं यथाविधि। | हैं। वह तीर्थ चक्रनदीसे भूषित है और वहाँके
कदाचित् प्राप्तवान् वीरः शालग्रामं तपोधनः॥ २२ | शिलाखण्ड भगवान्के चक्रसे चिह्नित हैं। वह तीर्थ
| जितना ही सुरम्य था, उतना ही एकान्त। उसका विस्तार
पुण्डरीको महाभागः पुण्यकर्मवशानुगः। | बड़ा था और वहाँ चित्त स्वतः प्रसन्न रहता था। वहाँपर
आसेव्यमानमृषिभिस्तत्त्वविद्भिस्तपोधनैः ॥ २३ | कुछ चक्रसे चिह्नित प्राणी रहते थे, जिनका दर्शन
| बहुत ही पावन था। वहाँ पुण्यतीर्थके यात्री यथेष्ट
मुनीनामा श्रमं रम्यं पुराणेषु च विश्रुतम्। | विचरते रहते थे। उस महापवित्र शालग्रामक्षेत्रमें महामति
भूषितं चक्रनद्या च चक्राङ्कितशिलातलम्॥ २४ | पुण्डरीकजी प्रसन्नचित्त हो तीर्थ-सेवन करने लगे।
रम्यं विविक्तं विस्तीर्णं सदा चित्तप्रसादकम्।
केचिच्चक्राङ्कितास्तस्मिन् प्राणिनः पुण्यदर्शनाः॥ २५
विचरन्ति यथाकामं पुण्यतीर्थप्रसङ्गिनः।
तस्मिन् क्षेत्रे महापुण्ये शालग्रामे महामतिः॥ २६
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