संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२७८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३
२७८ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६३
[संस्कृत-मूल]
इत्युक्त्वा सा तदा ताभ्यां जगाद मधुराक्षरम्।
नाडीजङ्घोवाच
देवराजः स्वयं यन्मे पार्श्वं चात्रागमिष्यति॥ ७४
तस्य वाच्यं च कर्तव्यं नान्यथा सर्वथा मया।
तौ तदा वासवं गत्वा ऊचतुर्वचनं शुभम्॥ ७५
वासव उवाच
समादेशय तन्वङ्गि किं कर्तव्यं मयाधुना।
सर्वदा दासभूतस्ते याचसे तद्ददाम्यहम्॥ ७६
तन्वङ्ग्युवाच
याचितं यदि मे नाथ दास्यसीति न संशयः।
ततोऽहं वशगा देव भविष्यामि न संशयः॥ ७७
अद्य त्वं दर्शयास्माकं सर्वः कान्तापरिग्रहः।
मम रूपसमा रामा कान्ता ते चास्ति वा न वा॥ ७८
तया चोक्ते च वचने स भूयो वासवोऽवदत्।
दर्शयिष्यामि सर्वं ते देवि कान्तापरिग्रहम्॥ ७९
स सर्वं दर्शयामास वासवोऽन्तःपुरं तदा।
ततो जगाद भूयः सा किंचिद्गूढं मम स्थितम्॥ ८०
विमुच्यैकां च युवतीं सर्वं ते दर्शितं मया।
इन्द्र उवाच
सा रामा मन्दरे चास्ति अविज्ञाता सुरासुरैः॥ ८१
तां च ते दर्शयिष्यामि नाख्येयं कस्यचित्त्वया।
ततः स देवराजोऽपि तया सार्धं च भूपते॥ ८२
गच्छन्नेवाम्बरे भूप मन्दरं प्रति भूधरम्।
तस्य वै गच्छमानस्य विमानेनार्कवर्चसा॥ ८३
दर्शनं नारदस्यापि तस्य जातं तदाम्बरे।
तं वीक्ष्य नारदं वीरो लज्जमानोऽपि वासवः॥ ८४
नमस्कृत्य जगादोच्चैः क्व यास्यसि महामुने।
ततः कृताशीः स मुनिरवदत्त्रिदिवेश्वरम्॥ ८५
गच्छामि मानसे स्नातुं देवराज सुखी भव।
नाडीजङ्घेऽस्ति कुशलं राक्षसानां महात्मनाम्॥ ८६
[हिन्दी-अनुवाद]
उन दोनोंके द्वारा यों कही जानेपर उस सुन्दरीने मधुर वाणीमें उत्तर दिया॥ ६७—७३१/२॥
नाडीजङ्घा बोली— यदि देवराज इन्द्र स्वयं ही मेरे पास आयेंगे तो मैं उनकी बात मान सकती हूँ; अन्यथा बिलकुल नहीं॥ ७४१/२॥
तब अश्विनीकुमारोंने इन्द्रके पास जाकर उसका शुभ संदेश कहा॥ ७५॥
तब इन्द्र स्वयं आकर बोले— कृशाङ्गि! आज्ञा दो, मैं इस समय तुम्हारा कौन-सा कार्य करूँ? मैं सदाके लिये तुम्हारा दास हो गया हूँ; तुम जो कुछ माँगोगी, वह सब दूँगा॥ ७६॥
कृशाङ्गीने कहा— नाथ! यदि आप मेरी माँगी हुई वस्तु अवश्य दे देंगे, तो निःसंदेह मैं आपकी वशवर्तिनी हो जाऊँगी। आज आप अपनी समस्त भार्याओंको मुझे दिखाइये; देखूँ, आपकी कोई भी स्त्री मेरे रूपके सदृश है या नहीं?॥ ७७-७८॥
उसके यों कहनेपर इन्द्रने पुनः कहा—‘देवि! चलो, मैं तुम्हें अपनी समस्त भार्याओंको दिखाऊँगा।’ यह कहकर इन्द्रने उसी समय उसे अपना सारा अन्तःपुर दिखाया। तब उस सुन्दरीने पुनः कहा—‘अभी मुझसे कुछ छिपाया गया है। केवल एक युवतीको छोड़कर और सब कुछ आपने दिखा दिया'॥ ७९-८०१/२॥
इन्द्रने कहा— ‘वह रमणी मन्दराचलपर है। देवता और असुर—किसीको भी उसका पता नहीं है। मैं उसे भी तुम्हें दिखा दूँगा, परंतु यह रहस्य किसीपर प्रकट न करना।’ भूपाल! यह कहकर देवराज इन्द्र उसके साथ आकाशमार्गसे मन्दराचलकी ओर चले। जिस समय वे सूर्यके समान कान्तिमान् विमानसे चले जा रहे थे, उसी समय उन्हें आकाशमें देवर्षि नारदका दर्शन हुआ। नारदजीको देखकर वीरवर इन्द्र यद्यपि लज्जित हुए, तथापि उन्हें नमस्कार करके पूछा—‘महामुने! आप कहाँ जायेंगे?'॥ ८१—८४१/२॥
तब मुनिवर नारदजीने आशीर्वाद देते हुए स्वर्गाधिपति इन्द्रसे कहा—‘देवराज! आप सुखी हों, मैं इस समय मानसरोवरपर स्नान करने जा रहा हूँ।' [फिर उन्होंने नाडीजङ्घाको पहचानकर कहा—] 'नाडीजङ्घे! कहो तो महात्मा राक्षसोंका कुशल तो है न?
अध्याय ६३ ] अष्टाक्षर-मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रका स्त्रीयोनिसे उद्धार २७९
विभीषणोऽपि ते भ्राता सुखी तिष्ठति सर्वदा । | तुम्हारे भाई विभीषण तो सुखपूर्वक हैं न ?' नारदजीकी
एवमुक्ता च मुनिना सा कृष्णावदनाभवत् ॥ ८७ | यह बात सुनते ही उसका मुख भयसे काला पड़ गया।
विस्मितो देवराजोऽपि छलितो दुष्टयानया । | देवराज इन्द्र भी बहुत आश्चर्यमें पड़े और मन-ही-
नारदोऽपि गतः स्नातुं कैलासे मानसं सरः ॥ ८८ | मन कहने लगे—'इस दुष्टाने मुझे छल लिया।' नारदजी
| भी वहाँसे कैलास पर्वतके निकट मानससरोवरमें स्नान
इन्द्रस्तां हन्तुकामोऽपि आगच्छन्मन्दराचलम् । | करनेके लिये चले गये। तब इन्द्र भी उस राक्षसीका
यत्राश्रमोऽस्ति वै नूनं तृणबिन्दोर्महात्मनः ॥ ८९ | वध करनेके लिये मन्दराचलपर, जहाँ महात्मा तृणबिन्दु का
| आश्रम था, आये और वहाँ थोड़ी देरतक विश्राम करके
क्षणं विश्रम्य तत्रैव धृत्वा केशेषु राक्षसीम् । | वे उस नाडीजङ्घा राक्षसीके केश पकड़कर उसे मारना
हन्तुमिच्छति देवेशो नाडीजङ्घां निशाचरीम् ॥ ९० | ही चाहते थे कि इतनेमें महात्मा तृणबिन्दु अपने आश्रमसे
तावत्तत्र समायातस्तृणबिन्दुन्निजाश्रमात् । | निकलकर वहाँ आ गये ॥ ८५—९०१/२ ॥
धृता क्रन्दति सा राजन्निन्द्रेणापि निशाचरी ॥ ९१ | राजन् ! इधर इन्द्रके द्वारा पकड़ी जानेपर वह राक्षसी
| भी करुण विलाप करने लगी—'हा! मैं मारी जा रही
मा मां रक्षति पुण्यात्मा हन्यमानां च साम्प्रतम् । | हूँ; इस समय कोई भी पुण्यात्मा पुरुष मुझ दीनाको
तदाऽऽगत्य मुनिश्रेष्ठस्तृणबिन्दुर्महातपाः ॥ ९२ | नहीं बचा रहा है' ॥ ९११/२ ॥
जगाद पुरतः स्थित्वा मुञ्चेमां महिलां वने । | उसी समय महातपस्वी तृणबिन्दु मुनि वहाँ आ
जल्पत्येवं मुनौ तस्मिन् महेन्द्रेण निशाचरी ॥ ९३ | पहुँचे और इन्द्रके सामने खड़े हो बोले—'हमारे तपोवनमें
| इस महिलाको न मारो, छोड़ दो' ॥ ९२१/२ ॥
वज्रेण निहता भूयः कोपयुक्तेन चेतसा । | भूप ! तृणबिन्दु मुनि यों कह ही रहे थे कि महेन्द्रने
स चुकोप मुनिश्रेष्ठः प्रेक्षमाणो मुहुर्मुहुः ॥ ९४ | क्रुद्ध होकर वज्रसे उस राक्षसीको मार ही तो डाला।
यदेषा युवती दुष्टा निहता मे तपोवने । | तब वे मुनिवर इन्द्रकी ओर बार-बार देखते हुए बहुत
ततस्त्वं मम शापेन निश्चयात् स्त्री भविष्यसि ॥ ९५ | ही कुपित हुए और बोले—'रे दुष्ट ! तूने मेरे तपोवनमें
| इस युवतीका वध किया है, इसलिये तू मेरे शापसे
इन्द्र उवाच | निश्चय ही स्त्री हो जायगा' ॥ ९३—९५ ॥
एषा नाथ महादुष्टा राक्षसी निहता मया । | इन्द्र बोले—नाथ! मैं देवताओंका स्वामी इन्द्र हूँ
अहं स्वामी सुराणां च शापं मा देहि मेऽधुना ॥ ९६ | और यह स्त्री महादुष्टा राक्षसी थी; इसलिये मैंने इसका
| वध किया है। आप इस समय मुझे शाप न दें ॥ ९६ ॥
मुनिरुवाच | मुनि बोले—अवश्य ही मेरे तपोवनमें भी दुष्ट और
नूनं तपोवनेऽस्माकं दुष्टास्तिष्ठन्ति साधवः । | साधु पुरुष भी रहते हैं, परंतु वे मेरी तपस्याके प्रभावसे
ममात्र तपसो भावान्न निघ्नन्ति परस्परम् ॥ ९७ | परस्पर किसीका वध नहीं करते। (तूने मेरे तपोवनकी
| मर्यादा भङ्ग की है, अतः तू शापके ही योग्य है।) ॥ ९७ ॥
इत्युक्तो हि तदा चेन्द्रः प्राप्तः स्त्रीत्वं न संशयः । | भूप ! मुनिके यों कहनेपर इन्द्र निःसंदेह स्त्रीयोनिको प्राप्त
जगाम त्रिदिवं भूप हतशक्तिपराक्रमः ॥ ९८ | हो गये और पराक्रम तथा शक्ति खोकर स्वर्गको लौट आये।
| उन्होंने सदा ही लज्जा और दुःखसे खिन्न रहनेके कारण
नासीनो हि भवत्येव सर्वदा देवसंसदि । | देवताओंकी सभामें बैठना ही छोड़ दिया। इधर देवता भी
देवा दुःखं समापन्ना दृष्ट्वा स्त्रीत्वं गतं हरिम् ॥ ९९ | इन्द्रको स्त्रीके रूपमें परिवर्तित हुआ देखकर बहुत दुःखी
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