संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२६० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८
२६० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८
स्नानाच्छरीरं संशोध्य कुर्यादाचमनं बुधः।
शुभे जले प्रविश्याथ नमेद्वरुणामप्पतिम् ॥ ६६
हरिमेव स्मरंश्चित्ते निमज्जेच्च बहूदके ।
ततः स्नानं समासाद्य अप आचम्य मन्त्रतः ॥ ६७
प्रोक्षयेद्वरुणं देवं तैर्मन्त्रैः पावमानिभिः ।
कुशाग्रस्थेन तोयेन प्रोक्ष्यात्मानं प्रयत्नतः ॥ ६८
आलभेन्मृत्तिकां गात्रे इदं विष्णुरिति त्रिधा ।
ततो नारायणं देवं संस्मरन् प्रविशेज्जलम् ॥ ६९
निमज्यान्तर्जले सम्यक्त्रिः पठेद्घमर्षणम्।
स्नात्वा कुशतलैस्तद्वद्देवर्षीन् पितृभिः सह ॥ ७०
तर्पयित्वा जलात्तस्मान्निष्क्रम्य च समाहितः ।
जलतीरं समासाद्य धौते शुक्ले च वाससी ॥ ७१
परिधायोत्तरीयं च न कुर्यात्केशधूननम् ।
न रक्तमुल्बणं वासो न नीलं तत्प्रशस्यते ॥ ७२
मलाक्तं तु दशाहीनं वर्जयेदम्बरं बुधः ।
ततः प्रक्षालयेत्पादौ मृत्तोयेन विचक्षणः ॥ ७३
त्रिः पिबेद्वीक्षितं तोयमास्यं द्विः परिमार्जयेत् ।
पादौ शिरसि चाभ्युक्ष्येत्रिराचम्य तु संस्पृशेत् ॥ ७४
अङ्गुष्ठेन प्रदेशिन्या नासिकां समुपस्पृशेत् ।
अङ्गुष्ठकनिष्ठिकाभ्यां नाभौ हृदि तलेन च ॥ ७५
शिरश्चाङ्गुलिभिः सर्वैर्बाहुं चैव ततः स्पृशेत् ।
अनेन विधिनाऽऽचम्य ब्राह्मणः शुद्धमानसः ॥ ७६
दर्भे तु दर्भपाणिः स्यात् प्राङ्मुखः सुसमाहितः ।
प्राणायामांस्तु कुर्वीत यथाशास्त्रमतन्द्रितः ॥ ७७
अपने शरीरको यत्नपूर्वक लिप्त करके, शुद्ध स्नानके द्वारा उसे धोकर पुनः आचमन करे। तदनन्तर स्वच्छ जलमें प्रवेश करके जलेश वरुणको नमस्कार करे। फिर मन-ही-मन भगवान् विष्णुका स्मरण करते हुए जहाँ कुछ अधिक जल हो, वहाँ डुबकी लगाये। इसके बाद स्नान समाप्तकर, मन्त्रपाठपूर्वक आचमन करके, वरुणसम्बन्धी पवमान-मन्त्रोंद्वारा वरुणदेवका अभिषेक करे। फिर कुशके अग्रभागपर स्थित जलसे अपना यत्नपूर्वक मार्जन करे और 'इदं विष्णुर्विचक्रमे' इस मन्त्रका पाठ करते हुए अपने शरीरके तीन भागोंमें क्रमशः मृत्तिकाका लेप करे। तत्पश्चात् भगवान् नारायणका स्मरण करते हुए जलमें प्रवेश करे। जलके भीतर भली प्रकार डुबकी लगाकर तीन बार अघमर्षण पाठ करे। इस प्रकार स्नान करके कुश और तिलोंद्वारा देवताओं, ऋषियों और पितरोंका तर्पण करे। इसके बाद समाहितचित्त हो, जलसे बाहर निकल, तटपर आकर धुले हुए दो श्वेत वस्त्रोंको धारण करे। इस प्रकार धोती और उत्तरीय धारणकर अपने केशोंको न फटकारे। अत्यधिक लाल और नील वस्त्र धारण करना भी उत्तम नहीं माना गया है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि जिस वस्त्रमें मल या दाग लगा हो, अथवा जिसमें किनारी न हो, उसका भी त्याग करे॥ ६२-७२१/२॥
इसके पश्चात् विज्ञ पुरुष मिट्टी और जलसे अपने चरणोंको धोये। फिर खूब देख-भालकर शुद्ध जलसे तीन बार आचमन करे। दो बार जल लेकर मुँह धोये। पैर और सिरपर जल छिड़के। फिर तीन बार आचमन करके क्रमशः अङ्गोंका स्पर्श करे। अँगूठे और तर्जनीसे नासिकाका स्पर्श करे। अङ्गुष्ठ और कनिष्ठिकासे नाभिका स्पर्श करे। हृदयका करतलसे स्पर्श करे। तदनन्तर समस्त अँगुलियोंसे पहले सिरका, फिर बाहुओंका स्पर्श करे। इस प्रकार आचमन करके ब्राह्मण शुद्धहृदय हो, हाथमें कुश ले, पूर्वकी ओर मुख करके एकाग्रतापूर्वक कुशासनपर बैठ जाय और आलस्यको त्यागकर शास्त्रोक्त विधिसे तीन बार प्राणायाम करे॥ ७३-७७॥
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अध्याय ५८ ] क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन २६१
जपयज्ञं ततः कुर्याद्गायत्रीं वेदमातरम्।
त्रिविधो जपयज्ञः स्यात्तस्य भेदं निबोधत ॥ ७८
वाचिकश्च उपांशुश्च मानसस्त्रिविधः स्मृतः।
त्रयाणां जपयज्ञानां श्रेयः स्यादुत्तरोत्तरम् ॥ ७९
यदुच्चनीचस्वरितैः स्पष्टशब्दवदक्षरैः।
शब्दमुच्चारयेद्वाचा जपयज्ञः स वाचिकः ॥ ८०
शनैरुच्चारयेन्मन्त्रमीषदोष्ठौ प्रचालयेत्।
किंचिन्मन्त्रं स्वयं विन्द्यादुपांशुः स जपः स्मृतः ॥ ८१
धिया यदक्षरश्रेण्या वर्णाद्वर्णं पदात्पदम्।
शब्दार्थचिन्तनं ध्यानं तदुक्तं मानसं जपः ॥ ८२
जपेन देवता नित्यं स्तूयमाना प्रसीदति।
प्रसन्ना विपुलान् भोगान्दद्यान्मुक्तिं च शाश्वतीम् ॥ ८३
यक्षरक्षःपिशाचाश्च ग्रहाः सूर्यादिदूषणाः।
जापिनं नोपसर्पन्ति दूरादेवापयान्ति ते ॥ ८४
ऋक्षादिकं परिज्ञाय जपयज्ञमतन्द्रितः।
जपेदहरहः स्नात्वा सावित्रीं तन्मना द्विजः ॥ ८५
सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां दशावराम्।
गायत्रीं यो जपेन्नित्यं न स पापैर्हि लिप्यते ॥ ८६
अथ पुष्पाञ्जलिं दत्त्वा भानवे चोर्ध्वबाहुकः।
उदुत्यं च जपेन्मन्त्रं चित्रं तच्चक्षुरित्यपि ॥ ८७
प्रदक्षिणमुपावृत्य नमस्कुर्याद्दिवाकरम्।
स्वेन तीर्थेन देवाद्दीनद्भिः संतर्पयेद्बुधः ॥ ८८
देवान् देवगणांश्चैव ऋषीन्ऋषिगणांस्तथा।
पितॄन् पितृगणांश्चैव नित्यं संतर्पयेद्बुधः ॥ ८९
स्नानवस्त्रं ततः पीड्य पुनराचमनं चरेत्।
दर्भेषु दर्भपाणिः स्याद्ब्रह्मयज्ञविधानतः ॥ ९०
प्राङ्मुखो ब्रह्मयज्ञं तु कुर्याद्बुद्धिसमन्वितः।
ततोऽर्धं भानवे दद्यात्तिलपुष्पजलान्वितम् ॥ ९१
तत्पश्चात् वेदमाता गायत्रीका जप करते हुए जपयज्ञ करे। जपयज्ञ तीन प्रकारका होता है; उसका भेद बताते हैं, आप लोग सुनें। वाचिक, उपांशु और मानस—तीन प्रकारका जप कहा गया है। इन तीनों जपयज्ञोंमें उत्तरोत्तर जप श्रेष्ठ है, अर्थात् वाचिक जपकी अपेक्षा उपांशु और उसकी अपेक्षा मानस जप श्रेष्ठ है। अब इनके लक्षण बताते हैं। जप करनेवाला पुरुष आवश्यकतानुसार ऊँचे, नीचे और समान स्वरोंमें बोले जानेवाले स्पष्ट शब्दयुक्त अक्षरोंद्वारा जो वाणीसे सुस्पष्ट शब्दोच्चारण करता है, वह 'वाचिक जप' कहलाता है। इसी प्रकार जो तनिक-सा ओठोंको हिलाकर धीरे-धीरे मन्त्रका उच्चारण करता है और मन्त्रको स्वयं ही कुछ-कुछ सुनता या समझता है, उसका वह जप 'उपांशु' कहलाता है। बुद्धिके द्वारा मन्त्राक्षरसमूहके प्रत्येक वर्ण, प्रत्येक पद और शब्दार्थका जो चिन्तन एवं ध्यान किया जाता है, वह 'मानस जप' कहा गया है। जपके द्वारा प्रतिदिन जिसका स्तवन किया जाता है, वह देवता प्रसन्न होता है और प्रसन्न होनेपर वह विपुल भोग तथा नित्य मोक्ष-सुखको भी देता है। यक्ष-राक्षस-पिशाच आदि और सूर्यादि देवताओंको दूषित करने-वाले अन्य (राहु-केतु आदि) ग्रह भी जप करनेवाले पुरुषके निकट नहीं जाते, दूरसे ही भाग जाते हैं॥ ७८-८४॥
द्विजको चाहिये कि वह आलस्यका त्याग करके प्रतिदिन तारोंको देखकर अर्थात् तारोंके रहते-रहते स्नान करके, गायत्रीके अर्थमें मन लगा गायत्री-मन्त्रका जप करे। जो द्विज अधिक-से-अधिक एक हजार, साधारणतया एक सौ अथवा कम-से-कम दस बार प्रतिदिन गायत्रीका जप करता है, वह पापोंसे लिप्त नहीं होता ॥ ८५-८६ ॥
इसके बाद सूर्यदेवको पुष्पाञ्जलि अर्पित करके अपनी भुजाएँ ऊपर उठाकर 'ॐ उदुत्यं जातवेदसम्....' तथा 'ॐ तच्चक्षुर्देवहितम्....' इन मन्त्रोंका जप करे। फिर प्रदक्षिणा करके सूर्यदेवको प्रणाम करे। तत्पश्चात् विद्वान् पुरुष प्रतिदिन देवतीर्थसे (उँगलियोंद्वारा) देवताओंका तर्पण करे। विज्ञ पुरुषको देवताओं और उनके गणोंका, ऋषियों और उनके गणोंका तथा पितरों और पितृगणोंका प्रतिदिन तर्पण करना चाहिये। तदनन्तर स्नानके बाद उतारे हुए वस्त्रको निचोड़कर पुनः आचमन करे। फिर हाथमें कुश लेकर कुशासनपर बैठ जाय और ब्रह्मयज्ञकी विधिके अनुसार पूर्वाभिमुख हो बुद्धिपूर्वक ब्रह्मयज्ञ (वेदका स्वाध्याय) करे। तदनन्तर खड़ा होकर तिल, फूल और जलसे युक्त अर्घ्यपात्रको अपने मस्तक तक
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