संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२५६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८
२५६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५८
ब्रह्मचर्यमधःशय्या तथा वह्नेरुपासनम्।
उदकुम्भं गुरोर्दद्यात्तथा चेन्धनमाहरेत् ॥ १८
कुर्यादध्ययनं पूर्वं ब्रह्मचारी यथाविधि।
विधिं हित्वा प्रकुर्वाणो न स्वाध्यायफलं लभेत् ॥ १९
यत्किंचित् कुरुते कर्म विधिं हित्वा निरात्मकः।
न तत्फलमवाप्नोति कुर्वाणो विधिविच्युतः ॥ २०
तस्मादेवं व्रतानीह चरेत् स्वाध्यायसिद्धये ।
शौचाचारमशेषं तु शिक्षयेद्गुरुसंनिधौ ॥ २१
अजिनं दण्डकाष्ठं च मेखलां चोपवीतकम्।
धारयेदप्रमत्तस्तु ब्रह्मचारी समाहितः ॥ २२
सायं प्रातश्चरेद्भैक्षं भोजनं संयतेन्द्रियः।
गुरोः कुले न भिक्षेत न ज्ञातिकुलबन्धुषु ॥ २३
अलाभे त्वन्यगेहानां पूर्वपूर्वं च वर्जयेत्।
आचम्य प्रयतो नित्यमश्नीयाद्गुर्वनुज्ञया ॥ २४
शयनात् पूर्वमुत्थाय दर्भमृद्दन्तशोधनम्।
वस्त्रादिकमथान्यच्च गुरवे प्रतिपादयेत् ॥ २५
स्नाने कृते गुरौ पश्चात् स्नानं कुर्वीत यत्नवान्।
ब्रह्मचारी व्रती नित्यं न कुर्याद्दन्तशोधनम् ॥ २६
छत्रोपानहमभ्यङ्गं गन्धमाल्यानि वर्जयेत्।
नृत्यगीतकथालापं मैथुनं च विशेषतः ॥ २७
वर्जयेन्मधु मांसं च रसास्वादं तथा स्त्रियः ।
कामं क्रोधं च लोभं च परिवादं तथा नृणाम् ॥ २८
स्त्रीणां च प्रेक्षणालम्भमुपघातं परस्य च।
एकः शयीत सर्वत्र न रेतः स्कन्दयेत् क्वचित् ॥ २९
स्वप्ने सिक्त्वा ब्रह्मचारी द्विजः शुक्रमकामतः ।
स्नात्वार्कमर्चयित्वाग्निं पुनर्मामित्यृचं जपेत् ॥ ३०
--- [हिन्दी अनुवाद] ---
करे। वह ब्रह्मचर्यका पालन, भूमिपर शयन और अग्निकी
उपासना करे। गुरुके लिये जलका घड़ा भरकर लाये
और हवनके निमित्त समिधा ले आये। इस प्रकार सर्वप्रथम
ब्रह्मचर्य-आश्रममें रहकर विधिपूर्वक अध्ययन करना चाहिये।
जो विधिको त्याग करके अध्ययन करता है, उसे उस
अध्ययनका फल नहीं प्राप्त होता (उसकी विद्या सफल
नहीं होती)। विधिकी अवहेलना करके वह जो कुछ भी
कर्म करता है, विधिभ्रष्ट एवं नास्तिक होनेके कारण उसे
उसका फल नहीं मिलता। इसलिये गुरुकुलमें रहकर अपने
अध्ययनकी सफलताके लिये उपर्युक्त व्रतोंका आचरण
करना चाहिये और गुरुके निकट समस्त शौचाचारोंको
सीखना चाहिये। ब्रह्मचारी सावधान और एकाग्रचित्त रहकर
मृगचर्म, पलाशदण्ड, मेखला और उपवीत (जनेऊ) धारण
करे। अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखकर सायंकाल और
प्रातःकाल भिक्षासे मिला हुआ अन्न भोजन करे। गुरुके
कुलमें और उनके कुटुम्बी बन्धु-बान्धवोंके घरमें भिक्षा
न माँगे। दूसरेके घर न मिले तो पूर्वोक्त घरोंमेंसे भी
भिक्षा ले सकता है; किंतु यथासाध्य पूर्व-पूर्व गृहोंका
त्याग करे। अर्थात् पहले कहे हुए गुरुगृह या गुरुकुलका
त्यागकर अन्यत्र भिक्षा ले। नित्य आचमन करके शुद्धचित्त
होकर गुरुकी आज्ञासे भोजन करे। रात्रि बीतनेपर गुरुसे
पहले ही अपने आसनसे उठ जाय और गुरुके लिये
कुश, मिट्टी, दाँतुन और वस्त्र आदि अन्य सामान एकत्र
करके उनको दे। गुरुजीके स्नान कर लेनेपर स्वयं यत्नपूर्वक
स्नान करे। ब्रह्मचारी सदा व्रत रखे और काठ आदिसे
दन्तधावन न करे॥ १७-२६॥
छाता, जूता, उबटन, गन्धयुक्त इत्र आदि और
फूल-माला आदिको त्याग दे। विशेषतः नाच, गान और
ग्राम्य कथा-वार्ता एवं मैथुनका सर्वथा त्याग करे। मधु,
मांस और रसास्वाद (जिह्वाके स्वाद)-को त्याग दे।
स्त्रियोंसे अलग रहे। काम, क्रोध, लोभ तथा दूसरे
मनुष्योंके अपवाद (निन्दा)-का परित्याग करे। स्त्रियोंकी
ओर देखने, उनका स्पर्श करने और दूसरे जीवोंकी
हिंसा करने आदिसे बचकर रहे। सब जगह अकेले ही
शयन करे, कभी कहीं भी वीर्यपात न करे। यदि
कामभाव न होनेपर भी स्वप्नमें वीर्य-स्खलन हो जाय
तो ब्रह्मचारी द्विजको चाहिये, वह स्नान करके सूर्य और
अग्निकी आराधना करे तथा 'पुनर्मामेत्विन्द्रियम्' इस
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अध्याय ५८ ] क्षत्रियादि वर्णोंके धर्म और ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रमके धर्मोंका वर्णन २५७
आस्तिकोऽहरहः संध्यां त्रिकालं संयतेन्द्रियः ।
उपासीत यथान्यायं ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ॥ ३१
अभिवाद्य गुरोः पादौ संध्याकर्मावसानतः ।
यथायोग्यं प्रकुर्वीत मातापित्रोस्तु भक्तितः ॥ ३२
एतेषु त्रिषु तुष्टेषु तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ।
तदेषां शासने तिष्ठेद्ब्रह्मचारी विमत्सरः ॥ ३३
अधीत्य चतुरो वेदान् वेदौ वेदमथापि वा।
गुरवे दक्षिणां दत्त्वा तदा स्वस्वेच्छया वसेत् ॥ ३४
विरक्तः प्रव्रजेद्विद्वान् संरक्तस्तु गृही भवेत् ।
सरागो नरकं याति प्रव्रजन् हि ध्रुवं द्विजः ॥ ३५
यस्यैतानि सुशुद्धानि जिह्वोपस्थोदरं गिरः ।
संन्यसेदकृतोद्वाहो ब्राह्मणो ब्रह्मचर्यवान् ॥ ३६
एवं यो विधिमास्थाय नयेत् कालमतन्द्रितः ।
तेन भूयः प्रजायेत ब्रह्मचारी दृढव्रतः ॥ ३७
यो ब्रह्मचारी विधिमेतमास्थित-
श्ररेत् पृथिव्यां गुरुसेवने रतः ।
सम्प्राप्य विद्यामपि दुर्लभां तां
फलं हि तस्याः सकलं हि विन्दति ॥ ३८
ऋचाका जप करे। ईश्वर और परलोकके अस्तित्वपर
विश्वास करता हुआ, ब्रह्मचारियोंके लिये उचित व्रतके
पालनमें तत्पर रहकर, जितेन्द्रिय हो, प्रतिदिन न्यायतः
प्राप्त त्रिकालसंध्याकी उपासना करे। संध्या-कर्म समाप्त
होनेपर गुरुके चरणोंमें प्रणाम करे और यदि सुयोग
प्राप्त हो तो माता-पिताके चरणोंमें भी भक्तिपूर्वक
प्रणाम करे। इन तीनोंके संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण देवता
प्रसन्न रहते हैं; इसलिये ब्रह्मचारीको चाहिये कि डाह
छोड़कर इन तीनोंके शासनमें रहे। यथासम्भव चार, दो
अथवा एक ही वेदका अध्ययन पूर्ण करके गुरुको
दक्षिणा दे। फिर अपने इच्छानुसार कहीं भी निवास
करे। यदि वह विद्वान् ब्रह्मचारी विरक्त हो, तब तो
संन्यासी हो जाय; किंतु यदि उसका विषय-भोगोंके
प्रति अनुराग हो तो गृहस्थाश्रममें प्रवेश करे। द्विजो! रागी
पुरुष यदि संन्यासी हो जाय तो वह निश्चय ही नरकमें
जाता है। जिसकी जिह्वा, उपस्थ (जननेन्द्रिय), उदर और
वाणी शुद्ध हों, अर्थात् जो स्वाद, काम और बुभुक्षाको
जीत चुका हो और सत्यवादी या मौन रहता हो, वह पुरुष
यदि ब्रह्मचर्यवान् ब्राह्मण हो तो वह विवाह न करके
संन्यास ले सकता है॥ २७-३६॥
इस प्रकार जो आलस्य त्यागकर विधिका पालन
करते हुए ही समय-यापन करता है, वह ब्रह्मचारी
अधिकाधिक दृढ़ व्रतवाला होता है। जो ब्रह्मचारी
पूर्वोक्त विधिका सहारा लेकर गुरु-सेवापरायण हो पृथ्वीपर
भ्रमण करता है, वह दुर्लभ विद्याको भी सीखकर
उसके सम्पूर्ण फलोंको प्राप्त कर लेता है* ॥ ३७-३८ ॥
हारीत उवाच
गृहीतवेदाध्ययनः श्रुतिशास्त्रार्थतत्त्ववित् ।
गुरोर्दत्तवरः सम्यक् समावर्तनमारभेत् ॥ ३९
असमाननामगोत्रां कन्यां भ्रातृयुतां शुभाम् ।
सर्वावयवसंयुक्तां सद्वृत्तामुद्वहेत्ततः ॥ ४०
नोद्वहेत्कपिलां कन्यां नाधिकाङ्गीं न रोगिणीम् ।
वाचालामसतिलोमां च न व्यङ्गां भीमदर्शनाम् ॥ ४१
श्रीहारीत मुनि कहते हैं—पूर्वोक्त रीतिसे वेदाध्ययन
समाप्तकर श्रुति तथा अन्यान्य शास्त्रोंके अर्थ एवं तत्त्वका
ज्ञान रखनेवाला ब्रह्मचारी विद्वान् गुरुसे आशीर्वाद प्राप्तकर
विधिपूर्वक समावर्तन-संस्कार आरम्भ करे। फिर, जिसके
नाम और गोत्र अपनेसे भिन्न हों, जिसके भाई भी हो, जो
सुन्दरी एवं शुभ लक्षणोंवाली हो, जिसके शरीरके सभी
अवयव अविकल हों और जिसका आचरण उत्तम हो,
ऐसी कन्याके साथ विवाह करे। जिसके शरीरका रंग
कपिल हो, जो अधिकाङ्गी या रोगिणी हो, बहुत बोलनेवाली
और अधिक रोमवाली हो, जिसका कोई अङ्ग विकृत या
- इससे आगे 'हारीत उवाच' पुनः दिया गया है। इससे जान पड़ता है, यह अध्याय यहाँ पूर्ण हो गया है।
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