संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२४४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५४
Here is the complete transcribed text from the image, preserving the original Devanagari text, verses, and column layout:
२४४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५४
असंश्रुतोक्तिवक्तारो द्विजद्वेषरतास्तथा।
स्वधर्मत्यागिनः सर्वे कृतघ्ना भिन्नवृत्तयः ॥ ४०
याचकाः पिशुनाश्चैव भविष्यन्ति कलौ युगे।
पDefaultापवादनिरता आत्मस्तुतिपरायणाः ॥ ४१
परस्वहरणोपायचिन्तकाः सर्वदा जनाः।
अत्याह्लादपरास्तत्र भुञ्जानाः परवेश्मनि ॥ ४२
तस्मिन्नेव दिने प्रायो देवतार्चनतत्पराः।
तत्रैव निन्दानिरता भुक्त्वा चैकत्र संस्थिताः ॥ ४३
द्विजाश्च क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चान्ये च जातयः।
अत्यन्तकामिनश्चैव संकीर्यन्ते परस्परम् ॥ ४४
न शिष्यो न गुरुः कश्चिन्न पुत्रो न पिता तथा।
न भार्या न पतिश्चैव भविता तत्र संकरे ॥ ४५
शूद्रवृत्त्यैव जीवन्ति द्विजा नरकभोगिनः।
अनावृष्टिभयप्राया गगनासक्तदृष्टयः ॥ ४६
भविष्यन्ति जनाः सर्वे तदा क्षुद्भयकातराः।
अन्नोपाधिनिमित्तेन शिष्यान् गृह्णन्ति भिक्षवः ॥ ४७
उभाभ्यामपि पाणिभ्यां शिरःकण्डूयनं स्त्रियः।
कुर्वन्त्यो गुरुभर्तृणामाज्ञा भेत्स्यन्ति ता हिताः ॥ ४८
यदा यदा न यक्ष्यन्ति न होष्यन्ति द्विजातयः।
तदा तदा कलेर्वृद्धिरनुमेया विचक्षणैः ॥ ४९
सर्वधर्मेषु नष्टेषु याति निःश्रीकतां जगत्।
सूत उवाच
एवं कलेः स्वरूपं तत्कथितं विप्रसत्तमाः ॥ ५०
हरिभक्तिपरानेव न कलिर्बाधते द्विजाः।
तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ध्यानमेव हि ॥ ५१
(Right Column Translation / व्याख्या)
सब लोग वेदविरुद्ध वचन बोलनेवाले और ब्राह्मणोंके द्वेषी होंगे। सभी स्वधर्मके त्यागनेवाले, कृतघ्न और अपने वर्णधर्मके विरुद्ध वृत्तिसे आजीविका चलानेवाले होंगे। कलियुगमें लोग भिखमंगे, चुगलखोर, दूसरोंकी निन्दा करनेवाले और अपनी ही प्रशंसामें तत्पर होंगे। मनुष्य सदा दूसरोंके धनका अपहरण करनेके उपायको ही सोचते रहेंगे। यदि उन्हें दूसरोंके घरमें भोजन करनेका अवसर मिल जाय तो वे बड़े ही आनन्दित होंगे और प्रायः उसी दिन वे दूसरोंको दिखानेके लिये देवताकी पूजामें प्रवृत्त होंगे। दूसरोंकी निन्दामें तत्पर रहनेवाले वे ब्राह्मण वहाँ ही सबके साथ एक आसनपर बैठकर भोजन करेंगे ॥ ४०-४३ ॥
उस समय ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-सभी जातियोंके लोग अत्यन्त कामी होंगे और एक-दूसरेसे सम्पर्क स्थापित करके वर्ण-संकर हो जायँगे। वर्ण-संकरताकी दशामें गुरु-शिष्य, पिता-पुत्र और पति-पत्नीका विचार नहीं रहेगा। नरकभोगी ब्राह्मणादि वर्ण प्रायः शूद्रवृत्तिसे ही जीविका चलायेंगे और नरकभोगी होंगे। लोगोंको प्रायः सदा अनावृष्टिका भय बना रहेगा और वे सदा आकाशकी ओर दृष्टि लगाये वृष्टिकी ही प्रतीक्षा करते रहेंगे। उस समयके सभी लोग सदा भूखकी पीड़ासे कातर रहेंगे। संन्यासी लोग अन्न-प्राप्तिके उद्देश्यसे ही लोगोंको शिष्य बनाते फिरेंगे। स्त्रियाँ दोनों ही हाथोंसे सिर खुजलाती हुई अपने पति तथा गुरुजनोंकी हितभरी आज्ञाओंका तिरस्कार करेंगी। द्विजातिलोग ज्यों-ज्यों यज्ञ और हवन आदि कर्म छोड़ते जायँगे, त्यों-ही-त्यों बुद्धिमानोंको कलियुगकी वृद्धिका अनुमान करना चाहिये। उस समय सम्पूर्ण धर्मोंके नष्ट हो जानेसे यह सारा जगत् श्रीहीन हो जायगा ॥ ४४-४९¹/₂ ॥
सूतजी कहते हैं- विप्रवरो ! इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे कलियुगके स्वरूपका वर्णन किया। द्विजगण! जो लोग भगवान्के भजनमें तत्पर रहेंगे, उन्हींको कलियुग बाधा नहीं दे सकता। सत्ययुगमें तपस्या प्रधान है और त्रेतामें ध्यान।
अध्याय ५५ ] शुक्राचार्यको भगवान्की स्तुतिसे पुनः नेत्रकी प्राप्ति २४५
द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे।
यतते दशभिर्वर्षैस्त्रेतायां हायनेन तत्॥ ५२
द्वापरे तच्च मासेन अहोरात्रेण तत्कलौ।
ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन् ॥ ५३
यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम्।
समस्तजगदाधारं परमार्थस्वरूपिणम् ॥ ५४
घोरे कलियुगे प्राप्ते विष्णुं ध्यायन् न सीदति।
अहोऽतीव महाभाग्याः सकृच्चे केशवार्चकाः ॥ ५५
घोरे कलियुगे प्राप्ते सर्वकर्मबहिष्कृते।
न्यूनातिरिक्कता न स्यात्कलौ वेदोक्तकर्मणाम् ॥ ५६
हरिस्मरणमेवात्र सम्पूर्णफलदायकम्।
हरे केशव गोविन्द वासुदेव जगन्मय ॥ ५७
जनार्दन जगद्धाम पीताम्बरधराच्युत।
इतीरयन्ति ये नित्यं न हि तान् बाधते कलिः ॥ ५८
अहो हरिपरा ये तु कलौ सर्वभयंकरे।
ते सभा्ग्या महात्मानस्तत्सङ्गतिरता अपि ॥ ५९
हरिनामपरा ये च हरिकीर्तनतत्पराः।
हरिपूजारता ये च ते कृतार्था न संशयः ॥ ६०
इत्येतद्वः समाख्यातं सर्वदुःखनिवारणम्।
समस्तपुण्यफलदं कलौ विष्णोः प्रकीर्तनम् ॥ ६१
द्वापरमें यज्ञको महान् बताया गया है और कलियुगमें एकमात्र दानको। सत्ययुगमें दस वर्षोंतक तप आदिके लिये प्रयत्न करनेसे जो फल मिलता है, वही त्रेतायुगमें एक ही वर्षके प्रयत्नसे सिद्ध होता है, द्वापरमें एक ही मासकी साधनासे सुलभ होता है और कलियुगमें केवल एक दिन-रात यत्न करनेसे प्राप्त हो जाता है। सत्ययुगमें ध्यान, त्रेतामें यज्ञोंद्वारा यजन और द्वापरमें पूजन करनेसे, जो फल मिलता है, उसे ही कलियुगमें केवल भगवान्का कीर्तन करनेसे मनुष्य प्राप्त कर लेता है। घोर कलियुग प्राप्त होनेपर समस्त जगत्के आधारभूत परमार्थस्वरूप भगवान् विष्णुका ध्यान करनेवाले मनुष्यको कलिसे बाधा नहीं पहुँचती। अहो! जिन्होंने एक बार भी भगवान् विष्णुका पूजन किया है, वे बड़े सौभाग्यशाली हैं॥ ५०–५५॥
सम्पूर्ण कर्मोंका बहिष्कार करनेवाले कलियुगके प्राप्त होनेपर किये जानेवाले वेदोक्त कर्मोंमें न्यूनता या अधिकताका दोष नहीं होता। उसमें भगवान्का स्मरण ही पूर्ण फलदायक होता है। जो लोग हरे, केशव, गोविन्द, वासुदेव, जगन्मय, जनार्दन, जगद्धाम, पीताम्बरधर, अच्युत इत्यादि नामोंका उच्चारण करते रहते हैं, उन्हें कलियुग कभी बाधा नहीं पहुँचाता। अहो! सबको भय देनेवाले इस कलिकालमें जो लोग भगवान् विष्णुकी आराधनामें लगे रहते हैं, अथवा जो उनके आराधकोंका संग ही करते हैं, वे महात्माजन बड़े ही भाग्यशाली हैं। जो हरिनामका जप करते हैं, हरिकीर्तनमें लगे रहते हैं और सदा हरिकी पूजा ही किया करते हैं, वे मनुष्य कृतकृत्य हो गये हैं—इसमें संदेह नहीं है। इस प्रकार यह कलिका वृत्तान्त मैंने तुमसे कहा। कलियुगमें भगवान् विष्णुका नामकीर्तन समस्त दुःखोंको दूर करनेवाला और सम्पूर्ण पुण्यफलोंको देनेवाला है॥ ५६–६१॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे कलिलक्षणकीर्तनं नाम चतुःपञ्चाशोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'कलियुगके लक्षणोंका वर्णन' नामक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५४ ॥
पचपनवाँ अध्याय
शुक्राचार्यको भगवान्की स्तुतिसे पुनः नेत्रकी प्राप्ति
राजोवाच
मार्कण्डेय कथं शुक्रः पुरा बलिमखे गुरुः।
वामनेन स विद्धाक्षः स्तुत्वा तल्लब्धवान् कथम् ॥ १
राजा बोले—मार्कण्डेयजी ! पूर्वकालमें राजा बलिके यज्ञमें भगवान् वामनने जो दैत्यगुरु शुक्राचार्यकी आँख छेद डाली थी, उसे उन्होंने पुनः भगवान्की स्तुतिद्वारा किस प्रकार प्राप्त किया ? ॥ १ ॥
In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth