संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८
१९० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४८
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा किं कर्तव्यमिति स्थितः।
महता तपसाऽऽनीता गुरुणा या हि वः पुरा॥ ९१
भगीरथेन या भूमिं सर्वपापहरा शुभा।
नानामुनिजनैर्जुष्टा कूर्ममत्स्यसमाकुला॥ ९२
गङ्गा तुङ्गोर्मिमालाढ्या स्फटिकाभजलावहा।
गुहोपनीतनावा तु तां गङ्गां स महाद्युतिः॥ ९३
उत्तीर्य भगवान् रामो भरद्वाजाश्रमं शुभम्।
प्रयागे तु ततस्तस्मिन् स्नात्वा तीर्थे यथाविधि॥ ९४
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा राघवः सीतया सह।
भरद्वाजाश्रमे तत्र विश्रान्तस्तेन पूजितः॥ ९५
ततः प्रभाते विमले तमनुज्ञाप्य राघवः।
भरद्वाजोक्तमार्गेण चित्रकूटं शनैर्ययौ॥ ९६
नानाद्रुमलताकीर्णं पुण्यतीर्थमनुत्तमम्।
तापसं वेषमास्थाय जह्नुकन्यामतीत्य वै॥ ९७
गते रामे सभार्थे तु सह भ्रात्रा ससारथौ।
अयोध्यामवसन् भूप नष्टशोभां सुदुःखिताः॥ ९८
नष्टसंज्ञो दशरथः श्रुत्वा वचनमप्रियम्।
रामप्रवासजननं कैकेय्या मुखनिस्सृतम्॥ ९९
लब्धसंज्ञः क्षणाद्राजा रामरामेति चुक्रुशे।
कैकेय्युवाच भूपालं भरतं चाभिषेचय॥ १००
सीतालक्ष्मणसंयुक्तो रामचन्द्रो वनं गतः।
पुत्रशोकाभिसंतप्तो राजा दशरथस्तदा॥ १०१
विहाय देहं दुःखेन देवलोकं गतस्तदा।
ततस्तस्य महापुर्यामयोध्यायामरिंदम॥ १०२
रुरुदुःखशोकार्त्ता जनाः सर्वे च योषितः।
कौशल्या च सुमित्रा च कैकेयी कष्टकारिणी॥ १०३
भगवान् रामको देखते ही वह उनके सामने हाथ जोड़कर
खड़ा हो गया और बोला—'भगवान्! मैं क्या सेवा
करूँ'॥ ९० १/२॥
[यों कहकर गुहने सीता और लक्ष्मणसहित श्रीरामका
सादर पूजन एवं सत्कार किया। इसके बाद सबेरे सारथि
और रथको लौटाकर वे गङ्गाजीके तटपर गये और पुनः
कहने लगे—] राजन्! जिन्हें आपके पूर्वज महाराज भगीरथ
पूर्वकालमें बड़ी तपस्या करके पृथ्वीपर ले आये थे, जो
समस्त पापहारिणी और कल्याणकारिणी हैं, अनेकानेक
मुनिजन जिनका सेवन करते हैं, जिनमें कूर्म और मत्स्य
आदि जल-जन्तु भरे रहते हैं, जो ऊँची-ऊँची लहरोंसे
सम्पन्न एवं स्फटिकमणिके समान स्वच्छ जल बहानेवाली
हैं, उन पुण्यसलिला गङ्गाजीको गुहके द्वारा लायी हुई
नावसे पार करके महान् कान्तिमान् भगवान् श्रीराम भरद्वाज
मुनिके शुभ आश्रमपर गये॥ ९१-९३ १/२॥
वह आश्रम प्रयागमें था। श्रीरामचन्द्रजीने सीता तथा
भाई लक्ष्मणके साथ उस प्रयागतीर्थमें विधिवत् स्नान
करके, वहीं भरद्वाज ऋषिके आश्रममें उनसे सम्मान
प्राप्तकर रात्रिमें विश्राम किया। फिर निर्मल प्रभातकाल
होनेपर श्रीराम तपस्वीवेष धारणकर, भरद्वाज मुनिसे
आज्ञा ले, उन्हींके बताये हुए मार्गसे गङ्गाके पार हो,
धीरे-धीरे नाना प्रकारके वृक्ष और लताओंसे आच्छन्न
परम उत्तम पावन तीर्थ चित्रकूटको गये॥ ९४-९७॥
राजन्! इधर सीता-लक्ष्मण और सारथिके सहित
रामचन्द्रजीके चले जानेपर अयोध्यावासीजन बहुत दुःखी
होकर शोभाशून्य अयोध्यानगरीमें रहने लगे। राजा दशरथ
तो कैकेयीके मुखसे निर्गत श्रीरामको वनवास देनेवाले
अप्रिय वचनको सुनते ही मूर्च्छित हो गये थे। कुछ देर
बाद जब राजाको होश हुआ, तब वे उच्चस्वरसे 'राम!
राम!' पुकारने लगे। तब कैकेयीने भूपालसे कहा—
'राम तो सीता और लक्ष्मणके साथ वनमें चले गये;
अब आप भरतका राज्याभिषेक कीजिये।' यह सुनते ही
राजा दशरथ पुत्रशोकसे संतप्त हो, दुःखके मारे शरीर
त्यागकर देवलोकको चले गये॥ ९८-१०१ १/२॥
शत्रुदमन! तब उनकी महानगरी अयोध्यामें
रहनेवाले सभी स्त्री-पुरुष दुःख और शोकसे पीड़ित
हो विलाप करने लगे। कौशल्या, सुमित्रा तथा कष्टकारिणी
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अध्याय ४८ ] श्रीराम-वनवास; राजा दशरथका निधन तथा वनमें राम-भरतकी भेंट १९१
[संस्कृत श्लोक]
परिवार्य मृतं तत्र रुरुदुस्ताः पतिं ततः ।
ततः पुरोहितस्तत्र वसिष्ठः सर्वधर्मवित् ॥ १०४
तैलद्रोण्यां विनिक्षिप्य मृतं राजकलेवरम् ।
दूतं वै प्रेषयामास सहमन्त्रिगणैः स्थितः ॥ १०५
स गत्वा यत्र भरतः शत्रुघ्नेन सह स्थितः ।
तत्र प्राप्य तथा वार्तां संनिवर्त्य नृपात्मजौ ॥ १०६
तावानीय ततः शीघ्रमयोध्यां पुनरागतः ।
क्रूराणि दृष्ट्वा भरतो निमित्तानि च वै पथि ॥ १०७
विपरीतं त्वयोध्यायामिति मेने स पार्थिवः ।
निश्शोभां निर्गतश्रीकां दुःखशोकान्वितां पुरीम् ॥ १०८
कैकेय्याग्निविनिर्दग्धामयोध्यां प्रविवेश सः ।
दुःखान्विता जनाः सर्वे तौ दृष्ट्वा रुरुदुर्भृशम् ॥ १०९
हा तात राम हा सीते लक्ष्मणेति पुनः पुनः ।
रुरोद भरतस्तत्र शत्रुघ्नश्च सुदुःखितः ॥ ११०
कैकेय्यास्तत्क्षणाच्छ्रुत्वा चुक्रोध भरतस्तदा ।
दुष्टा त्वं दुष्टचित्ता च यया रामः प्रवासितः ॥ १११
लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा राघवः सीतया वनम् ।
साहसं किं कृतं दुष्टे त्वया सद्योऽल्पभाग्यया ॥ ११२
उद्वास्य सीतया रामं लक्ष्मणेन महात्मना ।
ममैव पुत्रं राजानं करोत्विति मतिस्तव ॥ ११३
दुष्टाया नष्टभाग्यायाः पुत्रोऽहं भाग्यवर्जितः ।
भ्रात्रा रामेण रहितो नाहं राज्यं करोमि वै ॥ ११४
यत्र रामो नरव्याघ्रः पद्मपत्रायतेक्षणः ।
धर्मज्ञः सर्वशास्त्रज्ञो मतिमान् बन्धुवत्सलः ॥ ११५
सीता च यत्र वैदेही नियमव्रतचारिणी ।
पतिव्रता महाभागा सर्वलक्षणसंयुता ॥ ११६
[हिन्दी अनुवाद]
कैकेयी भी अपने मृत पतिको चारों ओरसे घेरकर रोने लगीं ॥ १०२-१०३ १/२ ॥
तब सब धर्मोंको जाननेवाले पुरोहित वसिष्ठजीने वहाँ आकर सबको शान्त किया और राजाके मृत शरीरको तेलसे भरी हुई नौकामें रखवाकर, मन्त्रिगणोंके साथ विचार करके, भरत-शत्रुघ्नको बुलानेके लिये दूत भेजा। वह दूत जहाँ शत्रुघ्नके साथ भरतजी थे, वहाँ गया और जितना उसे बताया गया था, उतना ही संदेश सुनाकर, उन दोनों राजकुमारोंको वहाँसे लौटाकर, उन्हें साथ ले, शीघ्र ही अयोध्यामें लौट आया। राजा भरत मार्गमें घोर अपशकुन देख मन-ही-मन यह जान गये कि 'अयोध्यामें कोई विपरीत घटना घटित हुई है।' फिर जो कैकेयीरूपी अग्निसे दग्ध होकर शोभाहीन, निस्तेज और दुःख-शोकसे परिपूर्ण हो गयी थी, उस अयोध्यापुरीमें भरतजीने प्रवेश किया। उस समय भरत और शत्रुघ्नको देख सभी लोग दुःखी हो 'हा तात! हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण!' इस प्रकार बारम्बार पुकारते हुए बहुत विलाप करने लगे। यह देख भरत और शत्रुघ्न भी दुःखी होकर रोने लगे ॥ १०४-११० ॥
उस समय कैकेयीके मुखसे तत्काल सारा वृत्तान्त सुनकर भरतजी उसके ऊपर बहुत ही कुपित हुए और बोले—'अरी! तू तो बड़ी दुष्टा है। तेरे चित्तमें दुष्टतापूर्ण विचार भरा हुआ है। हाय! जिसने श्रीरामको वनवास दे दिया, जिसके कारण भाई लक्ष्मण और देवी सीताके साथ श्रीरघुनाथजीको वनमें जानेको विवश होना पड़ा, उससे बढ़कर दुष्टा कौन स्त्री होगी? अरी दुष्टे! ओ मन्दभागिनी! तूने तत्काल ऐसा दुस्साहस कैसे किया? तूने सोचा होगा कि महात्मा लक्ष्मण और साध्वी सीताके साथ रामको घरसे निकालकर महाराजा दशरथ मेरे ही पुत्रको राजा बना देंगे। (धिक्कार है तेरी इस कुबुद्धिको!) आह! मैं कितना भाग्यहीन हूँ, जो तुझ-जैसी अभागिनी दुष्टा स्त्रीका पुत्र हुआ। किंतु तू निश्चय जान, मैं अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामसे अलग रहकर राज्य नहीं करूँगा। जहाँ मनुष्योंमें श्रेष्ठ, धर्मज्ञ, सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञाता, बुद्धिमान् तथा भाइयोंपर स्नेह रखनेवाले पूज्य भ्राता कमलदललोचन श्रीरामचन्द्रजी गये हैं, जहाँ नियम और व्रतका आचरण करनेवाली, समस्त शुभलक्षणोंसे युक्त, अत्यन्त सौभाग्य-शालिनी पतिव्रता विदेहराजकुमारी सीताजी विद्यमान हैं