संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३
१४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३
अष्टौ शतसहस्राणि दिव्याया संख्यया स्मृतः। काल है। इस प्रकार दिव्य वर्ष-गणनाके अनुसार
द्विपञ्चाशत्तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि तु ॥ १९ यह मन्वन्तर आठ लाख बावन हजार वर्षोंका समय
त्रिंशत्कोट्यस्तु सम्पूर्णाः संख्याताः संख्यया द्विज। कहा गया है। महामुने! द्विजवर! मानवीय वर्ष-गणनाके
सप्तषष्टिश्च तथान्यानि नियुतानि महामुने ॥ २० अनुसार पूरे तीस करोड़, सरसठ लाख, बीस हजार
विंशतिश्च सहस्राणि कालोऽयमधिकं विना। वर्षोंका काल एक मन्वन्तरका परिमाण है, इससे अधिक
मन्वन्तरस्य संख्येयं मानुषैर्वत्सरैर्द्विज ॥ २१ नहीं ॥ १२–२१ ॥
चतुर्दशगुणो ह्येष कालो ब्राह्मामहः स्मृतम्। इस कालका चौदह गुना ब्रह्माका एक दिन होता
विश्वस्यादौ सुमनसा सृष्ट्वा देवांस्तथा पितॄन् ॥ २२ है। ब्रह्माजीने विश्व-सृष्टिके आदिकालमें प्रसन्न मनसे देवताओं
गन्धर्वान् राक्षसान् यक्षान् पिशाचान् गुह्यकांस्तथा। तथा पितरोंकी सृष्टि करके गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, पिशाच,
ऋषीन् विद्याधराँश्चैव मनुष्यांश्च पशूंस्तथा ॥ २३ गुह्यक, ऋषि, विद्याधर, मनुष्य, पशु, पक्षी, स्थावर (वृक्ष,
पक्षिणः स्थावरांश्चैव पिपीलिकभुजंगमान् । पर्वत आदि), पिपीलिका (चींटी) और साँपोंकी रचना
चातुर्वर्ण्यं तथा सृष्ट्वा नियुज्याध्वरकर्मणि ॥ २४ की है। फिर चारों वर्णोंकी सृष्टि करके वे उन्हें यज्ञकर्ममें
पुनर्दिनान्ते त्रैलोक्यमुपसंहृत्य स प्रभुः । नियुक्त करते हैं। तत्पश्चात् दिन बीतनेपर वे अविनाशी
शेते चानन्तशयने तावतीं रात्रिमव्ययः ॥ २५ प्रभु त्रिभुवनका उपसंहार करके दिनके ही बराबर
तस्यान्तेऽभून्महाकल्पो ब्राह्म इत्यभिविश्रुतः । परिमाणवाली रात्रिमें शेषनागकी शय्यापर सोते हैं। उस
यस्मिन् मत्स्यावतारोऽभून्मथनं च महोदधेः ॥ २६ रात्रिके बीतनेपर 'ब्राह्म' नामक विख्यात महाकल्प हुआ,
तद्वद्वाराहकल्पश्च तृतीयः परिकल्पितः । जिसमें भगवान्का मत्स्यावतार और समुद्र-मन्थन हुआ।
यत्र विष्णुः स्वयं प्रीत्या वाराहं वपुराश्रितः । इस ब्राह्म-कल्पके ही समान तीसरा 'वाराह-कल्प' हुआ,
उद्धर्तुं वसुधां देवीं स्तूयमानो महर्षिभिः ॥ २७ जिसमें कि भगवती वसुंधरा (पृथ्वी)-का उद्धार करनेके
सृष्ट्वा जगद्व्योमचराप्रमेयः लिये साक्षात् भगवान् विष्णुने प्रसन्नतापूर्वक वाराहरूप
प्रजाश्च सृष्ट्वा सकलास्तथेशः । धारण किया। उस समय महर्षिगण उनकी स्तुति करते
नैमित्तिकाख्ये प्रलये समस्तं थे। स्थलचर और आकाशचारी जीवोंके द्वारा जिनकी इयत्ताको
संहृत्य शेते हरिरादिदेवः ॥ २८ जान लेना नितान्त असम्भव है, वे आदिदेव भगवान् विष्णु
समस्त प्रजाओंकी सृष्टि कर 'नैमित्तिक प्रलय' में सबका
संहार करके शयन करते हैं ॥ २२–२८ ॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे सर्गरचनायां द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'सृष्टिरचनाविषयक' दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
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तीसरा अध्याय
ब्रह्माजीद्वारा लोकरचना और नौ प्रकारकी सृष्टियोंका निरूपण
सूत उवाच सूतजी बोले—महाभाग ! नैमित्तिक प्रलयकालमें
तत्र सुप्तस्य देवस्य नाभौ पद्ममभून्महत् । सोये हुए भगवान् नारायणकी नाभिमें एक महान् कमल
तस्मिन् पद्मे महाभाग वेदवेदाङ्गपारगः ॥ १ उत्पन्न हुआ। उसीसे वेद-वेदाङ्गोंके पारगामी ब्रह्माजीका
ब्रह्मोत्पन्नः स तेनोक्तः प्रजां सृज महामते । प्रादुर्भाव हुआ। तब उनसे भगवान् नारायणने कहा—
एवमुक्त्वा तिरोभावं गतो नारायणः प्रभुः ॥ २ 'महामते ! तुम प्रजाकी सृष्टि करो' और यह कहकर वे
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अध्याय ३ ] ब्रह्माजीद्वारा लोकरचना और नौ प्रकारकी सृष्टियोंका निरूपण १५
तथेत्युक्त्वा स तं देवं विष्णुं ब्रह्माथ चिन्तयन्। अन्तर्धान हो गये। उन भगवान् विष्णुसे 'तथास्तु'
आस्ते किंचिज्जगद्बीजं नाध्यगच्छत किंचन ॥ ३ कहकर ब्रह्माजी सोचने लगे—'क्या जगत्की सृष्टिका
कोई बीज है?' परंतु बहुत सोचनेपर भी उन्हें किसी
तावत्तस्य महान् रोषो ब्रह्मणोऽभून्महात्मनः। बीजका पता न लगा। तब महात्मा ब्रह्माजीको महान्
ततो बालः समुत्पन्नस्तस्याङ्के रोषसम्भवः ॥ ४ रोष हुआ। रोष होते ही उनकी गोदमें एक बालक
प्रकट हो गया, जो उनके रोषसे ही प्रादुर्भूत हुआ था।
स रुदन्वारितस्तेन ब्रह्मणा व्यक्तमूर्तना। उस बालकको रोते देख स्थूल शरीरधारी ब्रह्माजीने उसे
नाम मे देहि चेत्युक्तस्तस्य रुद्रेत्यसौ ददौ ॥ ५ रोनेसे मना किया। फिर उसके यह कहनेपर कि 'मेरा
नाम रख दीजिये', उन्होंने उसका 'रुद्र' नाम रख
तेनासौ विसृजस्वेति प्रोक्तो लोकमिमं पुनः। दिया॥ १—५॥
अशक्तस्तत्र सलिले ममज्ज तपसाऽऽदृतः ॥ ६ इसके बाद ब्रह्माजीने उससे कहा कि 'तुम इस
लोककी सृष्टि करो'—यह कहनेपर उस कार्यमें असमर्थ
तस्मिन् सलिलमग्ने तु पुनरन्यं प्रजापतिः। होनेके कारण वह सादर तपस्याके लिये जलमें निमग्न
ब्रह्मा ससर्ज भूतेशो दक्षिणाङ्गुष्ठतोऽपरम् ॥ ७ हो गया। उसके जलमें निमग्न हो जानेपर भूतनाथ प्रजापति
ब्रह्माजीने फिर अपने दाहिने अँगूठेसे 'दक्ष' नामक एक
दक्षं वामे ततोऽङ्गुष्ठे तस्य पत्नी व्यजायत। दूसरे पुत्रको उत्पन्न किया, तत्पश्चात् बायें अँगूठेसे उसकी
स तस्यां जनयामास मनुं स्वायम्भुवं प्रभुः ॥ ८ पत्नी प्रकट हुई। प्रभु दक्षने उस स्त्रीसे स्वायम्भुव मनुको
जन्म दिया। तब ब्रह्माजीने उसी मनुसे प्रजाओंकी सृष्टि
तस्मात् सम्भाविता सृष्टिः प्रजानां ब्रह्मणा तदा। बढ़ायी। मुनिवर! वसुधाकी सृष्टि करनेवाले उस विधाताकी
इत्येवं कथिता सृष्टिर्मया ते मुनिसत्तम। सृष्टि-रचनाका यह क्रम मैंने आपसे वर्णन किया। अब
सृजतो जगतीं तस्य किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ ९ आप और क्या सुनना चाहते हैं?॥ ६—९॥
भरद्वाज उवाच
संक्षेपेण तदाऽऽख्यातं त्वया मे लोमहर्षण। भरद्वाजजी बोले—लोमहर्षणजी! आपने यह सब
विस्तरेण पुनर्ब्रूहि आदिसर्गं महामते ॥ १० वृत्तान्त मुझसे पहले संक्षेपसे कहा है। महामते! अब
आप विस्तारके साथ आदिसर्गका वर्णन कीजिये॥ १०॥
सूत उवाच
सूतजी बोले—पिछले कल्पका अन्त होनेपर रात्रिमें
तथैव कल्पावसाने निशासुप्तोत्थितः प्रभुः। सोकर उठनेके बाद सत्त्वगुणके उद्रेकसे युक्त
सत्त्वोद्रिक्तस्तदा ब्रह्मा शून्यं लोकमवैक्षत ॥ ११ (नारायणस्वरूप) भगवान् ब्रह्माजीने उस समय सम्पूर्ण
लोकको शून्यमय देखा। वे ब्रह्मस्वरूपी भगवान् नारायण
नारायणः परोऽचिन्त्यः पूर्वेषामपि पूर्वजः। सबसे परे हैं, अचिन्त्य हैं, पूर्वजोंके भी पूर्वज हैं,
ब्रह्मस्वरूपी भगवानादिः सर्वसम्भवः ॥ १२ अनादि हैं और सबकी उत्पत्तिके कारण हैं। इस जगत्की
उत्पत्तिके कारणभूत उन ब्रह्मस्वरूप नारायणदेवके विषयमें
इमं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति। पुराणवेत्ता विद्वान् यह श्लोक कहते हैं—"जल भगवान्
ब्रह्मस्वरूपिणं देवं जगतः प्रभवात्मकम् ॥ १३ नर—पुरुषोत्तमसे उत्पन्न है, इसलिये 'नार' कहलाता है।
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः। नार (जल) ही उनका प्रथम अयन (आदि शयन-स्थान)
अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ॥ १४ है, इसलिये वे भगवान् 'नारायण' कहे जाते हैं।"
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