संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१२६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३४
१२६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३४
यो गां पयस्विनीं विष्णोः कपिलां सम्प्रयच्छति । जो विष्णुकी आराधना करके उनके लिये दुधार कपिला
आराध्य तमथाग्रे तु यत्किंचिद्दुग्धमुत्तमम् ॥ ४२ गौ दान करता है और उन भगवान् नृसिंहके समक्ष
तद्दत्त्वा नरसिंहाय विष्णुलोके महीयते । उसका उत्तम दूध थोड़ा-सा भी अर्पण करता है, वह
पितरस्तस्य मोदन्ते श्वेतद्वीपे चिरं नृप ॥ ४३ विष्णुलोकमें सम्मानित होता है तथा राजन्! उसके
एवं यः पूजयेद्राजन् नरसिंहं नरोत्तमः । पितर चिरकालतक श्वेतद्वीपमें आनन्द भोगते हैं। भूपाल!
तस्य स्वर्गापवर्गौ तु भवतो नात्र संशयः ॥ ४४ इस प्रकार जो नरश्रेष्ठ नरसिंहस्वरूप भगवान् विष्णुका
यत्रैवं पूज्यते विष्णुर्नरसिंहो नरैर्नृप । पूजन करता है, उसे स्वर्ग और मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते
न तत्र व्याधिदुर्भिक्षराजचौरादिकं भयम् ॥ ४५ हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ४०-४४ ॥
नरसिंहं समाराध्य विधिनानेन माधवम् । नृप! जहाँ मनुष्योंद्वारा इस प्रकार भगवान् नरसिंहका पूजन
नानास्वर्गसुखं भुक्त्वा न भूयः स्तनपो भवेत् ॥ ४६ होता है, वहाँ रोग, अकाल और राजा तथा चोर आदिका भय
नित्यं सर्पिस्तिलैर्होमो ग्रामे यस्मिन् प्रवर्तते । नहीं होता। इस विधिसे लक्ष्मीपति नरसिंहकी आराधना करके
न भवेत्तस्य ग्रामस्य भयं वा तत्र कुत्रचित् ॥ ४७ मनुष्य नाना प्रकारके स्वर्ग-सुख भोगता है और पुनः उसे
अनावृष्टिर्महामारी दोषा नो दाहका नृप । [संसारमें जन्म लेकर] माताका दूध नहीं पीना पड़ता [वह
नरसिंहं समाराध्य ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ॥ ४८ मुक्त हो जाता है]। जिस गाँवमें [भगवान्के मन्दिरके निकट]
कारयेल्लक्षहोमं तु ग्रामे यत्र पुराधिपः । प्रतिदिन घी और तिलसे होम होता है, उस गाँवमें अनावृष्टि,
कृते तस्मिन्मयोक्ते तु आगच्छति न तद्भयम् ॥ ४९ महामारी आदि दोष तथा अग्निदाह आदि किसी प्रकारका भय
दृष्टोपसर्गमरणं प्रजानामात्मनश्च हि । नहीं होता। जिस गाँवमें गाँवका मालिक वेदवेत्ता ब्राह्मणोंद्वारा
सम्यगाराधनीयं तु नरसिंहस्य मन्दिरे ॥ ५० नरसिंहकी आराधना कराकर एक लक्ष होम कराता है, वहाँ
शङ्करायतने चापि कोटिहोमं नराधिप । मेरे कथनानुसार यह कार्य सम्पन्न होनेपर महामारी
कारयेत् संयतैर्विप्रैः सभोजनसदक्षिणैः ॥ ५१ आदि प्रत्यक्ष उपद्रवसे कर्ताका तथा उस गाँवमें रहनेवाली
कृते तस्मिन्नृपश्रेष्ठ नरसिंहप्रसादतः । प्रजाका अकालमरण नहीं होता। इसलिये भगवान् नरसिंहके
उपसर्गादिमरणं प्रजानामुपशाम्यति ॥ ५२ मन्दिरमें भली प्रकारसे आराधना करनी चाहिये ॥ ४५-५० ॥
दुःस्वप्नदर्शने घोरे ग्रहपीडासु चात्मनः । नरेश! इसी प्रकार शङ्करजीके मन्दिरमें भी संयमशील
होमं च भोजनं चैव तस्य दोषः प्रणश्यति ॥ ५३ ब्राह्मणोंके द्वारा उन्हें भोजन और दक्षिणा देकर एक
अयने विषुवे चैव चन्द्रसूर्यग्रहे तथा । करोड़की संख्यामें हवन कराना चाहिये। नृपश्रेष्ठ ! उसके
नरसिंहं समाराध्य लक्षहोमं तु कारयेत् ॥ ५४ करनेपर भगवान् नरसिंहके प्रसादसे प्रजावर्गका आकस्मिक
शान्तिर्भवति राजेन्द्र तस्य तत्स्थानवासिनाम् । उपद्रव तथा मृत्युभय शान्त हो जाता है। घोर दुःस्वप्न
एवमादिफलोपेतं नरसिंहार्चनं नृप ॥ ५५ देखनेपर और अपने ऊपर ग्रहजन्य कष्ट आनेपर होम
कुरु त्वं भूपतेः पुत्र यदि वाञ्छसि सद्गतिम् । और ब्राह्मणभोजन करानेसे उसका दोष मिट जाता है।
अतः परतरं नास्ति स्वर्गमोक्षफलप्रदम् ॥ ५६ दक्षिणायन या उत्तरायण आरम्भ होनेपर, विषुवकालमें*,
अथवा चन्द्रमा तथा सूर्यका ग्रहण होनेपर भगवान् नरसिंहकी
आराधना करके लक्षहोम कराना चाहिये। राजेन्द्र ! यों
करनेसे उस स्थानके निवासियोंके विघ्नकी शान्ति हो
जाती है। नरेश्वर ! भगवान् नरसिंहकी पूजाके ऐसे अनेकों
फल हैं। भूपालनन्दन ! यदि तुम सद्गति चाहते हो तो
नृसिंहका पूजन करो। इससे बढ़कर कोई भी कार्य ऐसा
नहीं है, जो स्वर्ग और मोक्षरूप फल देनेवाला हो ।
- जिस दिन दिन-रात बराबर हों, वह विषुवकाल कहा गया है। ऐसा समय सालमें दो बार आता है।
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अध्याय ३५ ] लक्षहोम और कोटिहोमकी विधि तथा फल १२७
नरेन्द्रैः सुकरं कर्तुं देवदेवस्य पूजनम्। | देवदेव नृसिंहका पूजन राजाओंके लिये तो बहुत ही
सन्त्यरण्ये ह्यमूल्यानि पत्रपुष्पाणि शाखिनाम्॥ ५७ | सुकर है। परंतु जो अरण्यमें रहते हैं, उन्हें भी
| भगवान्की पूजाके लिये वृक्षोंके पत्र-पुष्प बिना मूल्य
तोयं नदीतडागेषु देवः साधारणः स्थितः। | प्राप्त हो सकते हैं। जल नदी और तडाग आदिमें सुलभ
मनो नियमयेदेकं विद्यासाधनकर्मणि॥ ५८ | है ही और भगवान् नृसिंह भी सबके लिये समान हैं;
| केवल उन उपासनाके साधनभूत कर्ममें मनकी एकाग्रता
मनो नियमितं येन मुक्तिस्तस्य करे स्थिता॥ ५९ | चाहिये। जिसने मनका नियमन कर लिया है, मुक्ति
| उसके हाथमें ही है॥ ५१—५९॥
मार्कण्डेय उवाच |
इत्येवमुक्तं भृगुचोदितेन | मार्कण्डेयजी बोले—इस प्रकार भृगुजीकी आज्ञासे
मया तवेहार्चनमच्युतस्य। | मैंने तुमसे यहाँ भगवान् विष्णुके पूजनका वर्णन किया
दिने दिने त्वं कुरु विष्णुपूजां | है। तुम प्रतिदिन भगवान् विष्णुका पूजन करो और
वदस्व चान्यत्कथयामि किं ते॥ ६० | बोलो, अब मैं तुम्हें और क्या बताऊँ?॥ ६०॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे सहस्रानीकचरिते श्रीविष्णोः पूजाविधिर्नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणके अन्तर्गत सहस्रानीक-चरित्रके प्रसङ्गमें 'श्रीविष्णुके पूजनकी विधि' नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४॥
पैंतीसवाँ अध्याय
लक्षहोम और कोटिहोमकी विधि तथा फल
राजोवाच | राजा बोले—अहो! आपने श्रीविष्णुकी आराधनासे
अहो महत्त्वया प्रोक्तं विष्ण्वाराधनजं फलम्। | होनेवाले बहुत बड़े फलका वर्णन किया। मुनिश्रेष्ठ! जो
सुप्तास्ते मुनिशार्दूल ये विष्णुं नार्चयन्ति वै॥ १ | भगवान् विष्णुकी पूजा नहीं करते, वे अवश्य ही
| [मोहनिद्रामें] सोये हुए हैं। मैंने आपकी कृपासे भगवान्
त्वत्प्रसादाच्च्युतं ह्येतन्नरसिंहार्चनक्रमम्। | नृसिंहके पूजनका यह क्रम सुना; अब मैं भक्तिपूर्वक
भक्त्या तं पूजयिष्यामि कोटिहोमफलं वद॥ २ | उनकी पूजा करूँगा। आप कृपा करके (लक्षहोम तथा)
| कोटिहोमका फल बताइये॥ १-२॥
मार्कण्डेय उवाच |
इममर्थं पुरा पृष्टः शौनको गुरुणा नृप। | मार्कण्डेयजी बोले—नृप! पूर्वकालमें इसी विषयको
यत्तस्मै कथयामास शौनकस्तद्वदामि ते॥ ३ | बृहस्पतिजीने शौनक ऋषिसे पूछा था, इसके उत्तरमें
| उनसे शौनकजीने जो कुछ बताया, वही मैं तुमसे कह
शौनकं तु सुखासीनं पर्यपृच्छद् बृहस्पतिः। | रहा हूँ। सुखपूर्वक बैठे हुए शौनकजीसे बृहस्पतिजीने
| इस प्रकार प्रश्न किया॥ ३½॥
बृहस्पतिरुवाच |
लक्षहोमस्य या भूमिः कोटिहोमस्य या शुभा॥ ४ | बृहस्पतिजी बोले—विप्रेन्द्र! लक्षहोम और कोटिहोम-
तां मे कथय विप्रेन्द्र होमस्य चरिते विधिम्। | के लिये जो भूमि प्रशस्त हो, उसको मुझे बताइये और
| होमकर्मकी विधिका भी वर्णन कीजिये॥ ४½॥
मार्कण्डेय उवाच |
इत्युक्तो गुरुणा सोऽथ लक्षहोमादिकं विधिम्॥ ५ | मार्कण्डेयजी बोले—नृपवर! बृहस्पतिजीके इस
शौनको वक्तुमारेभे यथावन्नृपसत्तम। | प्रकार कहनेपर शौनकजीने लक्षहोम आदिकी विधिका
| यथावत् वर्णन आरम्भ किया॥ ५½॥
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