गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 28, कुल 600 में से
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६-धन्यवाद ॥
उस सर्वशक्तिमान् परमपिता जगदीश्वर को अत्यन्त धन्यवाद है जिसकी
महती कृपा से अथर्व वेद भाष्य के पीछे यह गोपथब्राह्मण का भाष्य मेरे हाथ से पूरा
होकर सर्वसाधारण के सामने प्रस्तुत है । वृद्धावस्था के कारण शरीर तो कुछ ढीला
पड़ गया है, और मृत्युदेव कान में यह कहता रहता है ।
काल करे सो आज कर आज करे सो अब ।
पल में परलय होइगी फेर करेगा कब ॥
इस प्रेरणा से परमेश्वर पर भरोसा करके अन्य आवश्यकताओं से बचे समय
को लगातार लगाये रहने से धीरे-धीरे यह भाष्य पूरा हो गया ॥
मैं यहाँ पर बदायूं निवासी श्रीमान् स्वामी रामभिक्षु जी महाराज को हार्दिक
धन्यवाद देता हूं । उनकी प्रेरणा और विचारशीलता आदि सहायता से मेरे चित्त
में उत्साह बढ़ता रहा । उक्त स्वामी जी मेरे पास वेदों का स्वाध्याय करने आये
थे । जब तक वे रहे, इस भाष्य के और वेद मन्त्रों के देखने, विचारने, लिखने और
मुद्रणपत्र ( Proof sheet ) शोधने तथा सूचीपत्र और अनुक्रमणिका आदि बनाने में
प्रेम से मेरे सहायक हुये ॥
७-उपसंहार
प्रियं मा कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा कृणु । प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र
उतार्ये—अथ० १६ । ६२ । १ ॥ [ हे सर्वशक्तिमान् परमात्मन् ! ] ( मा ) मुझे
( देवेषु ) विद्वानों में ( प्रियम् ) प्रिय ( कृणु ) बना, ( मा ) मुझे ( राजसु ) राजाओं
में ( प्रियम् ) प्रिय ( कृणु ) बना, ( उत ) और ( अर्ये ) वैश्यों में ( उत ) और
( शूद्रे ) शूद्रों में, और ( सर्वस्य ) प्रत्येक ( पश्यतः ) दृष्टि वाले का ( प्रियम् ) प्रिय
[ बना ] ॥
हे परम पिता ! हमें पुरुषार्थ दीजिये जिससे हम वेदों के पठन-पाठन, विचार
और अभ्यास से सब संसार के उपकार करने में उद्यत रहें ॥
ओ३म् । शान्तिश्शान्तिश्शान्तिः ॥
हे जगदीश्वर ! हमें एक आत्मिक शान्ति, दूसरी शारीरिक शान्ति और
तीसरी सामाजिक शान्ति दीजिये ॥
क्षेमकरणदास त्रिवेदी ।
५२ लूकरगंज, प्रयाग, जन्म, कार्त्तिक शुक्ला ७ संवत् १६०५
[ इलाहाबाद ] विक्रमीय [ता० ३ नवम्बर १८४८ ईस्वी]
कार्त्तिकशुक्ला ७ संवत् १९८१ वि०, जन्मस्थान, ग्राम शाहपुर–मडराक,
ता० ३ नवम्बर १९२४ ई०। जिला अलीगढ़ ॥