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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

कण्डिका २२ ॥

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । कं० २२ ४०५
भावार्थः-मनुष्यों को गुणों के अनुसार ही स्तुति करनी चाहिये ॥ २१ ॥
विशेषः १-इस कण्डिका को ऐतरेय ब्राह्मण ३ । २३ के अन्तिम भाग से
मिलाओ ॥
विशेषः २-(ग्रहाः) शब्द के स्थान पर (गृहाः) पद ऐतरेय ब्राह्मण और
गोपथब्राह्मण की अगली कण्डिका २२ से शुद्ध किया है ॥
कण्डिका २२ ॥
स्तोत्रियं शंसति । आत्मा वै स्तोत्रियः, स मध्यमया वाचा शंस्तव्य
आत्मानमेवास्य तत् कल्पयति । अनुरूपं शंसति, प्रजा वा अनुरूपः, तस्मात्
प्रतिरूपमनुरूपं कुर्वन्ति । प्रतिरूपो हैवास्य प्रजायामाजायते नाप्रतिरूपः । तस्मात्
प्रतिरूपमनुरूपं कुर्वन्ति । स उच्चैस्तरामिव शंस्तव्यः, प्रजामेवास्य तच्छ्रेयसीं
करोति । धाय्यां शंसति, पत्नी वै धाय्या, सा नीचैस्तरामिव शंस्तव्याप्रति-
वादिनी हैवास्य गृहेषु पत्नी भवति, यत्रैवं विद्वान् नीचैस्तराम् धाय्यां शंसति ।
प्रगाथं शंसति, पशवो वै प्रगाथः, स स्वरवत्या वाचा शंस्तव्यः । पशवो वै प्रगाथः,
पशवः स्वरः, पशूनामाप्त्यै । सूक्तं शंसति । गृहा वै सूक्तं, प्रतिवीतं तत्,
प्रतिवीततमया वाचा शंस्तव्यम् । स यद्यपि ह दूरात् पशूल्लभते गृहानेवैनाना-
जिगमिषति । गृहा हि पशूनां प्रतिष्ठा । निविदं शंसति यदन्तरात्मन्, तन्निवित्,
तदेवास्य तत् कल्पयति । परिधानीयां शंसति, प्रतिष्ठा वै परिधानीया, प्रतिष्ठाया
एवैनमन्तः प्रतिष्ठापयति । याज्यया यजति, अन्नं वै याज्या, अन्नाद्यमेवास्य
तत् कल्पयति । मूलं वा एतद्यज्ञस्य, यद्धाय्याश्च याज्याश्च । तद्यदन्नाः अन्नाद्धाय्याश्च
याज्याश्च कुर्युः, उन्मूलमेव तद्यज्ञं कुर्युः । तस्मात्ताः सामान्या एव स्युः ॥ २२ ॥
कण्डिका २२ ॥ स्तोत्र इत्यादि यज्ञाङ्गों की आत्मा आदि से
सदृशता का अधिक विवरण ॥
( स्तोत्रियं शंसति ) वह [ ऋत्विज् ] स्तोत्रिय [ स्तोत्र ] बोलता है।
( आत्मा वै स्तोत्रियः, सः मध्यमया वाचा शंस्तव्यः ) आत्मा [ जीव के तुल्य ]
ही स्तोत्रिय है, वह मध्यम [ न ऊंची न नीची ] वाणी से बोलना चाहिये, ( अस्य
आत्मानम् एव तत् कल्पयति ) इस [ यजमान ] के आत्मा को ही वह समर्थ करता है।
( अनुरूपं शंसति ) वह अनुरूप [ विषय सदृश स्तोत्र ] बोलता है। ( प्रजा वै अनुरूपः,
तस्मात् प्रतिरूपम् अनुरूपं कुर्वन्ति ) प्रजा [ के तुल्य ] ही अनुरूप है, इसलिये प्रतिरूप
[ समान विषय वाले स्तोत्र ] को अनुरूप [ अनुकूल वा योग्य स्तोत्र ] वे करते हैं। ( अस्य
प्रजायाम् प्रतिरूपः ह एव आजायते, न अप्रतिरूपः ) इस [ यजमान ] की प्रजा में
[ कुल आदि के ] सदृश ही [ सन्तान ] उत्पन्न होता है, असदृश नहीं। ( तस्मात् प्रतिरूपम्
अनुरूपं कुर्वन्ति ) इसलिये प्रतिरूप [ समान विषय वाले स्तोत्र ] को अनुरूप [ अनुकूल
२२-( शंसति ) पठति ( अस्य ) यजमानस्य ( कल्पयति ) समर्थं करोति
( प्रतिरूपम् ) सदृशम् । विषयसदृशतुल्यगुणम् ( श्रेयसीम् ) प्रशस्य-ईयसुन्,

४०६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० २२
वा योग्य स्तोत्र ] वे करते हैं । ( सः उच्चैस्तराम् इव शंस्तव्यः ) वह [ अनुरूप ]
ऊंची ध्वनि से ही बोलना चाहिये । ( अस्य प्रजाम् एव तत् श्रेयसीं करोति ) इस
[ यजमान ] की प्रजा को ही उसके द्वारा [ यजमान से ] अधिक श्रेष्ठ वह करता है ।
( धाय्यां शंसति ) धाय्या [ धारण योग्य स्तुति ] को वह बोलता है । ( पत्नी वै धाय्या )
पत्नी [ के समान ] ही धाय्या है । ( सा नोच्चैस्तराम् इव शंस्तव्या, गृहेषु अस्य पत्नी
अप्रतिवादिनी ह एव भवति, यत्र एवं विद्वान् नीचैस्तरां धाय्यां शंसति ) वह नीची
ध्वनि से बोलनी चाहिये, घरों में इसकी पत्नी अकटुभाषिणी [ प्रियवादिनी ] ही होती है,
जहां ऐसा विद्वान् नीची ध्वनि से धाय्या बोलता है । ( प्रगाथं शंसति ) वह प्रगाथ [ गाने
योग्य स्तोत्र ] को बोलता है । ( पशवः वै प्रगाथः ) पशुओं [ के तुल्य ] ही प्रगाथ है ।
( सः स्वरवत्या'वाचा शंस्तव्यः ) वह [ प्रगाथ ] अच्छे स्वर वाली वाणी से बोलना
चाहिये । ( पशवः वै प्रगाथः पशवः स्वरः, पशूनाम् आप्त्यै ) पशुओं [ के तुल्य ]
ही प्रगाथ है, पशुओं [ के तुल्य ] ही स्वर है [ पशु चार पांव वाले होते हैं और अनुदात्त,
अनुदात्ततर, उदात्त और स्वरित, चार स्वर हैं ], पशुओं की प्राप्ति के लिये [ वह बोला
जाता है ] । ( सूक्तं शंसति ) वह सूक्त [ अच्छा कहा हुआ स्तोत्र ] बोलता है । ( गृहाः
वै प्रतिवीतं सूक्तं, तत् प्रतिवीततमया वाचा शंस्तव्यम् ) घरों के समान ही अभीष्ट
सूक्त है, वह अत्यन्त अभीष्ट वाणी से बोलना चाहिये । ( सः यद्यपि ह दूरात् पशून्
लभते, गृहान् एव एनान् आजिगमिषति ) वह [ कोई पुरुष ] जब ही दूर से पशुओं
को [ चरते हुये ] पाता है, घरों को ही उन्हें लाना चाहता है । ( गृहाः हि पशूनां
प्रतिष्ठा ) क्योंकि घर ही पशुओं की प्रतिष्ठा [ ठहरने का स्थान ] हैं । ( निविदं शंसति )
निवित् [ निश्चित विद्या वाली स्तुति ] वह बोलता है । ( यत् अन्तरात्मन्, तत् निवित्,
तत् एव अस्य तत् कल्पयति ) जो अन्तरात्मा [ अन्तःकरण में वर्तमान पराक्रम ] है, वह
निवित् है, उससे ही इस [ यजमान ] के उस [ अन्तरात्मा ] को समर्थ करता है ।
( परिधानीयां शंसति ) वह परिधानीया [ स्तुति ] बोलता है । ( प्रतिष्ठा वै
परिधानीया, प्रतिष्ठायै एव एनम् अन्ततः प्रतिष्ठापयति ) प्रतिष्ठा [ ठहरने के स्थान
के समान अथवा गौरव के समान ] परिधानीया है, प्रतिष्ठा के लिये ही इस [ यजमान ]
को अन्त में वह स्थापित करता है । ( याज्यया यजति ) याज्या [ यज्ञ योग्य स्तुति ] से
वह यज्ञ करता है । ( अन्नं वै याज्या अस्य अन्नाद्यम् एव तत् कल्पयति ) अन्न ही
याज्या [ स्तुति ] है, इस [ यजमान ] के खाने योग्य अन्न को ही उससे वह समर्थ करता
है । ( यज्ञस्य एतत् वै मूलम्, यत् धाय्याः च याज्याः च ) यज्ञ का यह ही मूल है,
जो धाय्यायैं और याज्यायैं हैं । ( तत् यत् अन्नाः, अन्नात् धाय्याः च याज्याः च
कुर्युः ) जो वे अन्न वाली हैं, अन्न के लिये धाय्याओं और याज्याओं को वे [ याजक ]
ङीप् । उत्तमतराम् ( शंस्तव्या ) पठितव्या ( अप्रतिवादिनी ) पत्युः प्रतिकूलं
वदतीति प्रतिवादिनी तद्विपर्ययेण । अकटुभाषिणी । प्रियभाषिणी ( प्रतिवी-
तम् ) प्रति + वी गतिव्याप्तिकान्त्यादिषु-क्तः । अभीष्टम् । अतिप्रियम् ( प्रतिवीत-
तमया ) अभीष्टतमया ( लभते ) प्राप्नोति ( आजिगमिषति ) आ + गमेः-सनि
रूपम् । आनेतुमिच्छति ( यद्यपि ) यदा हि ( प्रतिष्ठा ) स्थितिस्थानम् ( अन्नाः )