चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
५०४ चरकसंहिता [ अ० १२
सोंठ इनके क्वाथ से ओर गोमूत्र से स्नान करे । स्नान करने के पीछे चण्डा
( चोरपुष्पी ), अगरु का लेप करे ॥ ६६ ॥
बिभीतकानां गलमध्यलेपः सर्वेषु दाहार्त्तिहरः प्रलेपः ।
यष्ट्याह्वमुस्तैः सकपित्थपत्रैः सचन्दनैस्तत्पिडकासु लेपः ॥७०॥
रास्नावृषार्कत्रिफलाविडङ्गशिग्रुत्वचो मूषिकपर्णिका च ।
निम्बार्जकौ व्याघ्रनखाः सदूर्वा सुवर्चला तिक्तकरोहिणी च ॥७१॥
सकाकमाची बृहती सकुष्ठा पुनर्नवा चित्रकनागरे च ।
उन्मर्दनं शोफिषु मूत्रपिष्ट शस्तस्तथा मूलकतोयसेकः ॥७२॥
( ६ ) वाताद सब प्रकार के दाहो मे बहेडे के फल की मीगी का लेप
करने से दाह मिटता है । शोथजन्य पिड़काओ पर मुलहठी, मोथा, कैथ के पत्ते
और चन्दन का लेप करे ।
( ७ ) शोफ रोगी को—रास्ना, वासा, आक, त्रिफला, वायविडंग, सहजन
की छाल, मूषिकपर्णी ( पूजीपन्ना ), नीम, अर्जक ( तुलसी भेद ), व्याघ्रनखा
( सुगन्धित द्रव्य ), मूर्वा, सुवर्चला ( हुलहुल ), कुटकी, मकोय, बड़ी कटेरी,
कूठ, पुनर्नवा, चीता, सोठ इनमे से जो भी मिल सके उनको गोमूत्र मे पीस कर
उबटन करे । मूली के जल से सेचन करे ॥ ७०-७२ ॥
शोफास्तु गात्रावयवाश्रिता ये ते स्थानदूष्याकृतिनामभेदात् ।
अनेकसंख्याः कतिचिच्च तेषां निदर्शनार्थं शृणु चोच्यमानान् ॥७३॥
जो शोफ शरीर के भिन्न २ अवयवों मे उत्पन्न होते है, उनका स्थान,
दूष्य, आकृति और नाम भेद से अनेक भेद हो जाते है । उनमें से कुछ एक
उदाहरण के लिये कहे जाते है उनका सुनो१ ॥७३॥
दोषास्त्रयः स्वैः कुपिता निदानैः कुर्वन्ति शोफं शिरसः सुघोरम् ।
अन्तर्गले घुर्घुरिकान्वितं च शालूकमूच्छ्वासनिरोधकारि ॥७४॥
( १ ) जिस समय वातादि तीनो दोष अपने कारणो से कुपित होकर शिर
में भयानक शोथ उत्पन्न करते है ओर गले के अन्दर घुरघर शब्द उत्पन्न कर
देते हैं, तब इसका 'शालूक' कहते है, इस शोथ के कारण श्वास मार्ग रुक
जाता है२ ॥ ७४ ॥
१ देखिये चरक सूत्रस्थान अ०१८ मे-विशिष्टा नामरूपाभ्या निर्द्देश्याः शोथसग्रहे ।
२ सुश्रुत मे—कोलास्थिमात्र. कफसम्भवो यो ग्रन्थिर्गले कण्टकशूकभूतः ।
खर स्थिर शस्त्रनिपातसाध्य. त कण्टशालूकमिति ब्रुवन्ति ॥
कफ-दोष से उत्पन्न जो गाँठ बेर की गुठली के बराबर गले मे कॉटे के
अ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ५०५
गलस्य सन्धौ चिबुके गले वा सदाहरागः श्वसनासु चोग्रः ।
शोफो भृशार्तिस्तु बिडालिका स्याद्धन्याद् गले चेद्गलयीकृता सा ॥७५॥
( २ ) बिडालिका—गले और मुख की सन्धि मे, गले या चिबुक मे जो
दाह और रक्तिमा से युक्त शोथ उत्पन्न होता है, जिससे श्वास-प्रश्वास मे भी
कठिनाई और अत्यन्त पीड़ा होती है, उसको 'बिडालिका' कहते है। यदि यह शोथ
गले मे कडे के समान सम्पूर्ण गले मे फैल जाय तो रोगी को मार डालती है १ ॥७५॥
जिह्वोपरिष्टादुपजिह्निका स्यात् कफादधस्तादधिजिह्विका च ।
( ३ ) तीनो दोषो के कारण तालु मे 'तालु विद्रवि' हो जाती है, इसमे
जलन, रक्तिमा और पाक हो जाता है। जिह्वा के ऊपर कफ के कारण 'उप-
जिह्निका' हो जाती है, जिह्वा के नीचे 'अविजिह्विका' हो जाती है२ ।
यो दन्तमासेषु तु रक्तपित्तात् पाको भवेत् सोपकुशः प्रदिष्टः ॥ ७६ ॥
स्याद्दन्तविद्रध्यपि दन्तमासे शोफः कफाच्छोणितसंचयोत्थः ।
( ४ ) रक्त पित्त के कारण दांतो के मासो अर्थात् मसूड़ों मे जो पाक हो
जाता है उसका नाम 'उपकुश' है। मसूडो मे भी कफ के कारण रक्त का
संचय होने से उत्पन्न शोथ ( सूजन ) को दन्तविद्रधि' कहते है ॥ ७६ ॥
गलस्य पार्श्वे गलगण्ड एकः स्याद् गण्डमाला बहुभिस्तु गण्डैः ॥ ७७ ॥
साध्याः स्मृताः पीनसपार्श्वशूलकासज्वरच्छर्दियुतास्त्वसाध्याः ।
( ५ ) गले के बाहर की ओर मे एक सूजन हो तो उसे 'गलगण्ड' कहते
हैं, यदि एक से अधिक कई सूजन हो तो उसे 'गण्डमाला' कहते है। यदि
इस गण्डमाला मे पीनस, पार्श्वशूल, कास, ज्वर, छर्दि ये उपद्रव हो तो असाध्य
है, अन्यथा साध्य है३ ॥ ७७ ॥
तेषा सिराकायशिरोविरेका ४ धूमः पुराणस्य घृतस्य पानम् ॥ ७८ ॥
सल्लङ्घनं वक्त्रभवेषु चापि प्रघर्षणं ५ स्यात् कवलग्रहश्च ।
समान चुभती है, वह कड़ी और स्थिर हा तो शस्त्रद्वारा चीर कर ठीक होती
है उसे 'कण्ठ-शालूक' कहते है।
१ बलास एवायतमुन्नतं च शोफ करोत्यन्नगति निवार्य ।
त सर्वथैवाप्रतिवार्यवीर्य विवर्जनीय वलय वदन्ति ॥ सुश्रुत ॥
२ यस्य श्लेष्मा प्रकुपिता जिह्वामूलेऽवतिष्ठते ।
आशु सजनयेच्छोफ जायतेऽस्योपजिह्विका ॥
३ गले के अन्दर शोथ होने से गलग्रह होता है । विस्तार के लिये देखिये
चरक सूत्रस्थान अ० १८ । ४. 'येषा सिराकायशिरोविरेको' इति वा पाठः ।
५. 'प्रहर्षण' इति च ।
चिकित्सा—गात्र के एक भाग मे स्थित शोथो के लिये ( १ ) सिराविरेक
( नाडी से रक्त का निकाल देना ), ( २ ) काय विरेक ( वमन और विरेचन ),
( ३ ) शिरो-विरेक ( शिरोविरेचन ), ( ४ ) धूम का प्रयोग, ( ५ ) ओषधि-
सावित पुरातन घृत का पान ( शोधन से पूर्व ), ( ६ ) लङ्घन, ( ७ ) औष-
धियो के कल्क मे प्रघर्षण और मुख जन्य शोथो मे कवलग्रह ( गरारे )
कराने चाहिये ॥ ७८ ॥
अङ्गैकदेशेष्वनिलान्निसिः स्यात् स्वरूपधारी स्फुरण स्सिराभिः ॥ ७९ ॥
ग्रन्थिर्महान्मांसभवस्त्वनार्तिर्मेदोभवः स्निग्धतमश्चलश्च ।
( ६ ) ग्रन्थि—शरीर के किसी एक भाग मे वायु आदि दोष मासादि
को दूषित करके गोलाकार शोथ उत्पन्न कर देते है, इसको ग्रन्थि कहते हैं ।
इसके ग्रथित होने से उसका ग्रन्थि कहते है । इसमे वातादि दोषो के समान
दोष के अपने लक्षण रहते है । सिराजन्य-ग्रन्थि से स्फुरण ( भडकन ) रहती
है । मासजन्य-ग्रन्थि बहुत बडी तथा अल्प वेदनाशील होती है । मेदोजन्य
ग्रन्थि अति स्निग्ध ( चिकनी ) और चल (हिलने-जुलने वाली होती है¹) ॥७९॥
संशोधिते² स्वेदितमश्मकाष्ठैः साङ्गुष्ठदण्डैर्विलयेद³पक्वम् ॥ ८० ॥
१ सुश्रुत मे ग्रन्थि के लक्षण और निदान विस्तार से दिये हैं—
आयम्यते व्यथत एति तोदं प्रत्यस्यते कृत्यत एति भेदम् ।
कृष्णोऽमृदुर्बस्तिरिवाततश्च भिन्न. स्रवेच्चानिलजोऽस्रमच्छम् ॥
दन्दह्यते धूप्यति चोषममास पापच्यते प्रज्वलतीव चापि ।
रक्तः स पीतोऽप्यथ वापि पित्ताद् भिन्न स्रवेदुष्णमतीव चास्रम् ॥
शीतो विवर्णोऽल्परुजोऽतिकण्डू पाषाणवत् संहननोपपन्नः ।
चिराभिवृद्धिश्च कफप्रकोपात् भिन्न स्रवेच्छुक्लगहन च पूयम् ॥
( क ) दोषैर्दुष्टेऽसृजि ग्रन्थिर्भवेन्मूर्च्छत्सु जन्तुषु ।
सिरामास च संश्रित्य सस्वाप. पैत्तलक्षणः ॥
मासैलैर्दूषित मासमाहारैर्ग्रन्थिमावहेत् ।
स्निग्ध महान्त कठिन सिरानद्ध कफाकृतिम् ॥
प्रवृद्ध मेदुरैर्मेदो नीत माङ्गेऽथवा त्वचि ।
वायुना कुरुते ग्रन्थि भृंश स्निग्ध मृदु चलम् ॥
श्लेष्मतुल्याकृति देहक्षयवृद्धिक्षयोदयम् ।
स विभिन्नो घन मेदस्ताम्रासितसित स्रवेत् ॥ अष्टागसग्रह ३-३४ ।
२ 'त शोधित' इति । ३. 'विनयेद्' इति ।
अ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ५०७
अ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ५०७
विपाट्य चोद्धृत्य भिषक् सकोपं१ शस्त्रेण दग्ध्वा व्रणवच्चिकित्सेत् ।
अदग्ध ईषत् परिशोषितश्च प्रयाति भूयोऽपि शनैर्विवृद्धिम् ॥ ८१ ॥
तस्मादशेषः कुशलैः समन्ताच्छेद्यो भवेद्वीक्ष्य शरीरदेशान् ।
चिकित्सा—ग्रन्थि रोगी पुरुष को वमनादि से शोधन करके अपक्व ग्रन्थि
को स्वेदन द्वारा ढीला करके पत्थर, लकडी, अगूठा, दण्डे आदि से विलीन
करना चाहिये और यदि इस प्रकार से शान्त न हो तो शस्त्र से चीरकर सम्पूर्ण
कोष (वास्तु ग्रन्थि) को निकाल कर अग्नि से जलावे और फिर मधु, घृतादि से
व्रण के समान चिकित्सा करे। यदि ग्रन्थि को जलाया न जाये अथवा इसका
कुछ भाग शेष रह जाये तो फिर से यह ग्रन्थि धीरे धीरे बढ़ जाती है। इसलिये
कुशल वैद्यों को चाहिये कि चारों ओर से शरीर भागों को भली प्रकार से देख
कर इसका सम्पूर्ण रूप में छेदन करे जिससे कहीं पर कोई भाग शेष न रह
जाये२ ॥ ८०-८१- ॥
शेषे कृते पाकवशेन शीर्येत्ततः क्षतोत्थः प्रसरेद्विसर्पः ॥ ८२ ॥
उपद्रवं तं प्रविचार्य तज्ज्ञः स्वैर्भेषजैः पूर्वतरैर्यथोक्तैः ।
ततः क्रमेणास्य यथाविधानं व्रणं व्रणज्ञस्त्वरया चिकित्सेत् ॥८३॥
ग्रन्थि के सम्पूर्ण बाहर न निकलने पर यदि कुछ भाग शेष रह जाये और
भाग्य से वह पक जावे तब क्षतजन्य विसर्प ( रोग ) फैलने लगता है । उस
समय व्रण के उपद्रव तथा इसकी चिकित्सा को समझने वाला वैद्य भिन्न २
रोग की अपनी २ चिकित्सा अर्थात् विसर्प रोग की विसर्प-चिकित्सा और व्रण
की व्रण-चिकित्सा प्रारम्भ मे करे३। व्रण-चिकित्सा-विधि को जानने वाला वैद्य
१ 'सकोप' इति च पाठ । २ सुश्रुत में भी कहा है—
अमर्मजात शममप्रयातमपक्वमवापहरेद् विदार्य ।
दहेत् स्थिते वासृजि सिद्धकर्मा सद्य क्षतोक्त च विधि विदध्यात् ॥
सम्प्राप्ति—
व्यायामजातैरबलस्य तैस्तैराक्षिप्य वायुर्हि सिराप्रतानम् ।
संपीड्य संकोच्य विशोष्य चापि ग्रन्थिं करात्युन्नतमाशु वृत्तम् ॥
सु० नि० ११ ॥
३ व्रण के सोलह उपद्रव—विसर्प पक्षघातश्च सिरास्तम्भोऽपतानकः ।
मोहोन्मादव्रणरुजो ज्वरस्तृष्णा हनुग्रह ॥
कासश्छर्दिरतीसारो हिक्का श्वासः सवेपथु. ।
षोडशोपद्रवाः प्रोक्ता व्रणाना व्रणचिन्तकै. ॥
५०८ चरकसंहिता [ अ० १२
इस व्रणभूत क्षत की शीघ्रता से चिकित्सा करे और औषध द्वारा उपद्रवों से
व्रण को बचावे ॥ ८२-८३ ॥
विवर्जयेत्कुक्ष्युदराश्रितं च तथा गले मर्मणि संश्रितं च ।
स्थूलः खरश्चापि भवेद्विवर्ज्यो यश्चापि बालस्थविराबलानाम् ॥ ८४ ॥
ग्रन्ध्यर्बुदानां च यतोऽविशेषः प्रदेशहेत्वाकृतिदोषदूष्यैः ।
ततश्चिकित्सेद्भिषगर्बुदानि विधानविद् ग्रन्थिचिकित्सितेन ॥ ८५ ॥
असाध्य ग्रन्थि—कुक्षि, उदर, गले ओर हृदय आदि मर्म स्थानो मे
आश्रित ग्रन्थि की चिकित्सा न करे। जो ग्रन्थि स्थूल और खर हो वह भी
त्याज्य है। बालक, वृद्ध, नारी अथवा निर्बल मे उत्पन्न ग्रन्थि भी असाध्य है।
क्योकि ग्रन्थि और अर्बुद मे प्रदेश (स्थान), हेतु (निदान), आकृति (लक्षण),
दोष (वातादि), दूष्य (रक्त, मास और मेद) की समानता है, इसलिये
चिकित्सा विधि को जानने वाले वैद्य को चाहिये कि ग्रन्थि की विधि मे ही
अर्बुद रोग की चिकित्सा करे¹ ॥८४-८५॥
ताम्रा सशूला पिडका भवेद्या सा² चालजी नाम परिस्रुतास्रा ।
रोगे³ऽक्षतश्चर्मनखान्तरे स्यान्मासास्रदूषी भृशशीघ्रपाकः ॥ ८६ ॥
जिस पिडका का रंग ताम्र के समान हो, जिसमे बहुत वेदना होती हो तथा
जिसमे से लसीका (लस) का स्राव होता हो उसको 'अलजी' पिडका कहते
है। त्वचा और नख की सन्धि मे मास और रक्त को दूषित करने वाला ओर
अति शीघ्र पकने वाला 'अक्षत' नाम का शोथ होता है। [सुश्रुत मे भी इसी
को 'चिप्य' नाम से कहा है⁴ ॥८६॥
ज्वरान्विता वङ्क्षणकक्षगा या वर्तिर्निरातिः कठिनाऽऽयता च ।
विदारिका सा कफमारुताभ्या तेषा यथादोषमुपक्रमः स्यात् ॥ ८७ ॥
१ सुश्रुत ने भी कहा—
वातेन पित्तेन कफेन चापि रक्तेन मांसेन च मेदसा च।
तज्जायते तस्य च लक्षणानि ग्रन्थेः समानानि सदा भवन्ति ॥
२ 'सात्वालजी' इति । ३ 'शोफेऽक्षत' इति च पाठः ।
४ अलजी—ददती त्वचमुत्थाने तृष्णामोहज्वरप्रदा ।
विसर्पत्यनिशं दुःखा दहत्यग्निरिवाल्जी ॥
चिप्य—नखमासमधिष्ठाय पित्तं वातश्च वेदनाम् ।
करोति दाहपाकौ च तं व्याधिं चिप्यमादिशेत् ॥
अक्षत—तदेवाक्षतरोजाख्यं तथोपनखमित्यपि ॥
अ० १२] चिकित्सितस्थानम् ५०९
अ० १२] चिकित्सितस्थानम् ५०९
~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~
(७) विदारिका—जो शोथ बत्ती के समान वङ्क्षण या कक्षा प्रदेश मे
उत्पन्न होता है, जिसके कारण रोगी को ज्वर रहता है, शोथ कठिन और फैला
रहता है, उसको 'विदारिका' कहते है। यह कफ और वायु की प्रधानता तथा
निर्बल पित्त के कारण उत्पन्न होती है १ ॥८७॥
विस्रावणं पिण्डिकयोपनाहः पक्वेषु चैव व्रणवच्चिकित्सा।
इन अलजी आदि पिडकाओ की दोषानुसार शोधनरूप, विस्रावण, रक्त-
मोक्षण आदि तथा उपनाह, पिण्ड-स्वेद, या पकने पर व्रण के समान चिकित्सा
करनी चाहिये।
विस्फोटकाः सर्वशरीरगास्तु स्फोटाः सदाहज्वरतर्षयुक्ताः ॥८८॥
विस्फोटक—सम्पूर्ण शरीर मे या एक भाग मे दाह, ज्वर और प्यास से
युक्त छाले उत्पन्न हो जाते है, उनको 'विस्फोटक' कहते है ॥ ८८ ॥
यज्ञोपवीतप्रतिमाः प्रभूताः पित्तानिलाभ्या जनितास्तु २ कक्षाः ।
यश्चापराः स्युः पिडकाः प्रकीर्णाः स्थूलाणुमध्या अपि पित्तजास्ताः॥ ८९ ॥
(८) कक्षा—पित्त और वायु के कारण उत्पन्न बहुत से स्फोट मिल कर
जब यज्ञोपवीत के समान हो जाते है, तब इसको 'कक्षा' कहते है और जो
पिड़काये इधर-उधर बिखरी रहती है, तथा कोई स्थूल, कोई सूक्ष्म और कोई
मध्यम आकार की होती हैं, वे सब पित्त-प्रकोप से उत्पन्न समझनी चाहिये ३ ॥८६॥
सर्वत्र गात्रेषु मसूरमात्र्यो मसूरिकाः पित्तकफात्प्रदिष्टाः ।
विसर्पशान्त्यै विहिताः क्रिया या ता तासु कुष्ठे च हिता विदध्यात् ॥६०॥
(६) रोमान्तिका—सम्पूर्ण शरीर पर छोटी छोटी पिड़काये हो जाये जिन
से रोगी को ज्वर, दाह और प्यास रहे, इन पिड़काओं मे खाज होती हो, रोगी
को अरुचि तथा मुख से पानी आता हो तो इनको 'रोमान्तिका' कहते है ये पित्त
और कफ से होती है ।
(१०) मसूरिका—सम्पूर्ण शरीर मे मसूर के दाने के समान उत्पन्न पिड-
काओ को 'मसूरिका' कहते है, ये पित्त और कफ से होती है ।
मसूरिका और रोमान्तिका के लिये विसर्प तथा कुष्ठ रोग मे कथित चि-
कित्सा-विधि बरतनी चाहिये ॥ ६० ॥
१. विदारीकन्दवद् वृत्ता कक्षावङ्क्षणसन्धिषु ।
रक्ता विदारिका विद्यात् सर्वजा सर्वलक्षणाम् ॥
२ 'पत्तानिवाङ्गाजनिभास्तु' इति च पाठः ।
३ विस्फोटक और कक्षा के लिये सुश्रुतनिदान अ० १३ देखिये ।
५१० चरकसंहिता [अ० १२
अन्त्रोऽनिलाद्यैर्वृषणे स्वलिङ्गैस्तन्त्रं निरेति प्रविशेन्मुहुश्च ।
मूत्रेण पूर्णं मृदु मेदसा तु स्निग्धं च विद्यात्कठिनं च शोथम् ॥६१॥
(११) वृद्धिरोग—वृद्धिरोग सात प्रकार का है । जैसे—वातजन्य, पित्त-
जन्य, कफजन्य, रक्तजन्य, मूत्रजन्य, मेदोजन्य और आमजन्य । इनमे दोष-
जन्य वृद्धि मे दानो के अपने-अपने लक्ष होते हैं १ । अत्रवृद्धि मे आंत वृषणो
मे उतर आती हे आर दबाने उ फिर चढ जाती है। मूत्रजन्य वृद्धि मे कोम-
लता रहता है। मेदजन्यवृद्धि मे वृषण ( अण्डकोश ) का शोथ स्निग्ध और
कठिन रहता है ॥ ६१ ॥
विरेचनाभ्यङ्गनिरूहलेपाः पक्वेषु चैव व्रणवच्चिकित्सा ।
स्यान्मूत्रसेकः कफजं विपाट्य विशोध्य सीव्यं व्रणवच्च पक्वम् ॥६२॥
वृद्धिजन्य शोथ में यदि आमावस्था (कच्चाई ) हो ता पित्तजन्य वृद्धि में
विरेचन, वातजन्य मे अभ्यग, निरूह, लेप करना चाहिये और पकने पर व्रण
के समान चिकित्सा करनी चाहिये । मूत्रजन्य, मदजन्य और कफजन्य वृद्धि की
आमावस्था मे शस्त्र से चोर कर, दोपो का स्रावन कर पुन. सी देना चाहिये ।
पकने पर व्रण के समान चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ६२ ॥
क्रिमेस्तृणादिः क्षपणन्ववायप्रवाहणाल्युत्कटकाश्वपृष्ठैः ।
गुदस्य पार्श्वे पिडका भृशार्त्तिः पक्वप्रभिन्ना तु भगन्दरः स्यात् ॥६३॥
(१२) भगन्दर—कृमि ( चिउटी ) आदि के काटने से, तृणादि के
क्षण (खरेचने ) से, गुदा-मैथुन से, वेगपूर्वक प्रवाहन (कुन्थन ) से, उत्कट
आसन से, घोडे की पीठ पर बैठने से गुदा के एक दो अगुल की दूरी पर जा
अति वेदनायुक्त पिडका उत्पन्न होती है और जिसके पकने पर स्राव बहता है,
उसको 'भगन्दर' कहते हैं४ ।
१ दाषानुसार लक्षण—
वातपूर्णो दृतिस्पशो राजा वातादिहेतुरुक् ।
पक्कोडुम्बरसकाशः पित्ताद्दाहोष्मपाकवान् ॥
कफाच्छीतो गुरुः स्निग्धः कण्डूमान् कठिनोऽल्परुक् ।
सुश्रुत में अत्रवृद्धि का असाध्य बतलाया है ।
२ 'क्रिम्यस्थिसूक्ष्म' इति । ३ 'प्रवाहनान्यु' इति च पाठः ।
४ 'अपक्वा पिडकापक्कास्तु भगदराः । भग दारयतीति भगन्दरः । ते तु
भगगुदबस्तिप्रदेशदारणात् भगन्दरा उच्यन्ते' ।
सुश्रुत मे पाच प्रकार के 'भगन्दर' कहे है । अष्टाग-सग्रह मे द्वन्द्वज अधिक
मानकर आठ प्रकार के भगन्दर माने गये हैं।
अ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ५११
विरेचन चैषणपाटनं च विशुद्धमार्गस्य च तैलदाहः ।
स्यात्क्षारसूत्रेण सुपाचितस्य भिन्नस्य चास्य व्रणवच्चिकित्सा ॥६४॥
चिकित्सा—विरेचन, ऐषणी से मार्ग पता लगा करके शस्त्र-द्वारा विपाटन
कर मार्ग शोधन करना चाहिये, फिर गरम तैल से दाह ( सेक ) करना
चाहिये । अथवा क्षारसूत्र द्वारा भली प्रकार विदीर्ण करके व्रण की भांति इसकी
चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ६४ ॥
जङ्घासु पिण्डीप्रपदोपरिष्टात्स्यात् श्लीपदं मासकफास्रदोषान् ।
शिराकफघ्नश्च विधिः समग्रस्तत्रेष्यते सर्षपलेपनं च ॥ ६५ ॥
( १३ ) श्लीपद—जघा और पिण्डलियो मे आश्रित्य मास और रक्त मे
स्थित तीव्र कफ दोष, पाव से आकर श्लीपद नामक शोथ को उत्पन्न करता हे ।
यह शोथ मास रक्त और कफजन्य है१। इसके लिये शिरामोक्षण और कफनाशक
सम्पूर्ण विधि बरतनी चाहिये और सरसो का लेप करना चाहिये ॥ ६५ ॥
मन्दास्तु पित्तप्रबलाः प्रदुष्टा२ दोषाः सुतीव्रं तनुरक्तपाकम् ।
कुर्वन्ति शोथ ज्वरतर्षयुक्तं विसर्पिणं जालगर्दभाख्यम् ॥ ६६ ॥
( १४ ) जालगर्दभ—अपने कारणो से कुपित वातादि दोष, पित्तोल्बण
और मन्द वात कफ की अवस्था मे अति दाहकारक, अल्प, लालरग के शोथ
को उत्पन्न करते हे, यह शोथ थोडा पकता है । इसके कारण रोगी को ज्वर और
प्यास रहता है, यह शोथ विसर्प के समान फैलता है इसको 'जालगर्दभ' कहते है॥६६॥
विलंघनं३ रक्तविमोक्षणं च विरूक्षणं कायविशोधनं४ च ।
धात्रीप्रयोगाञ्छिशिरान् प्रदेहान् कुर्यात्सदा जालगर्दभस्य ॥६७॥
चिकित्सा—वैद्य को चाहिये कि जालगर्दभ-रोग मे लघन, रक्तमोक्षण, रूक्ष-
क्रिया, वमन-विरेचन, तथा आवले का स्वरस, कल्कादि रूप मे प्रयोग करे,
तथा शीतवीर्य द्रव्यो को बारीक पीसकर उनका लेप करे ॥ ६७ ॥
एवंविधाश्चाप्यपरान् परीक्ष्य५ शोथप्रकाराननिलादिलिङ्गैः ।
शान्ति नयेद्दोषहरैर्यथास्वमालेपनच्छेदनभेददाहैः ॥ ६८ ॥
उपसहार—इसी प्रकार यहा पर न कहे शोथ के अन्य भेदों की वायु आदि
१ कुपितास्तु दोषा वातपित्तश्लेष्माणोऽध प्रपन्नवङ्क्षणोरुजानुजङ्घास्ववतिष्ठ-
माना० कालान्तरेण पादमाश्रित्य शनै शोफभ्रम जनयन्ति । तत् श्लीपदमाचक्षते
सु० नि० १२ ॥
२ 'प्रदिष्टा' इति । ३ 'विलेपन' इति वा पाठः ।
४. 'कायविरेचन च' इति वा पाठः । ५. 'निशम्य' इति वा पाठः ।
५१२ चरकसंहिता [अ० १३
दोषो के लक्षणो से पहिचान करके दोषनाशक वमनादि कार्यो द्वारा तथा
आलेपन (आपधियो के लेप), छेदन (शस्त्र-द्वारा), भेदन (पकने पर चीरना ),
और दाह-कर्म (अग्नि और क्षार से जलाना) से चिकित्सा करनी चाहिये ॥६८॥
प्रायोऽभिघातादनिलः सरक्तः शोथ सराग प्रकरोति तत्र ।
विसर्पनुन्मारुतरक्तनुच्च कार्य विषघ्नं विषजे च कर्म ॥ ६६ ॥
आगन्तुज शाथ—प्रायः अभिघात के कारण कुपित वायु रक्त के साथ
मिलकर लाल वर्ण का गाथ उत्पन्न करती है । इसके लिये विसर्पनाशक तथा
वातरक्तनाशक चिकित्सा करनी चाहिये । विषयुक्त प्राणियो के परिसर्पण, नख,
मूत्रादि से जा शाथ उत्पन्न हो, उसमे विषनाशक कार्य करना चाहिये ॥६६॥
भवति चात्र—त्रिविधस्य दोषभेदात्सर्वार्धावयवगात्रभेदाच्च ।
श्वयथोर्द्विविधस्य तथा लिङ्गानि चिकित्सितं चोक्तम् ॥१००॥
उपसहार—वातादि दाष भेद से, सम्पूर्ण आधे और एकदेशीय भेद से
तीन प्रकार के तथा शालूक आदि भेद के कारण नाना प्रकार के शोथ के
लक्षण, चिकित्सा को इस 'श्वयथु चिकित्सित' अव्याय मे भगवान् आत्रेय ने कह
दिया है ॥ १०० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने
श्वयथुचिकित्सित नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
त्रयोदशोऽध्यायः।
अथात उदरचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे उदर-चिकित्सा रोग की व्याख्या करते हैं, ऐसा भगवान्
आत्रेय ने उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
सिद्धविद्याधराकीर्णे कैलासे नन्दनोपमे ।
तप्यमानं तपस्तीव्रं साक्षाद्धर्ममिव स्थितम् ॥ ३ ॥
आयुर्वेदविदां श्रेष्ठं भिषग्विद्याप्रवर्तकम् ।
पुनर्वसुं जितात्मानमग्निवेशोऽब्रवीद्वचः ॥ ४ ॥
सिद्ध और विद्याधर (देवयोनि) गण से व्याप्त, नन्दन वन के समान
कैलास पर्वत पर कठोर तप करते हुए, साक्षात् धर्म के समान स्थित, आयुर्वेद
को जानने वालों मे श्रेष्ठ, मर्त्यलोक मे भिषग्-विद्या के प्रवर्त्तक, जितात्मा
भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने निवेदन किया ॥ ३-४ ॥
अ० १३ ] ३३ चिकित्सितस्थानम् ५१३
अ० १३ ] ३३ चिकित्सितस्थानम् ५१३
भगवन्नुदरैर्दुःखैर्दृश्यन्ते ह्यर्दिता नराः ।
शुष्कवक्त्राः कृशाङ्गाश्चाध्मातोदरकुक्षयः ॥ ५ ॥
प्रनष्टाग्निबलाहाराः सर्वचेष्टास्वनीश्वराः ।
दीनाः प्रतिक्रियाभावाज्जहतोऽसूननाथवत् ॥ ६ ॥
भगवन् ! बहुत से लोग दुखदायी उदर रोगो से पीड़ित होते हैं, उनके
सूखे हुए मुख, शरीर निर्बल, पेट और कोख फूले हुए दीखते है । इन उदर
रोगियो की अग्नि, बल और आहार ( भूख ) नष्ट हो जाते हैं । वे किसी काम
को करने मे भी समर्थ नही होते, ये दीन हुए, उचित चिकित्सा न करने पर
अनाथों के समान प्राणो को त्याग देते है ॥ ५-६ ॥
तेषामायतनं संख्या प्राग्रूपाकृतिभेषजम् ।
यथावज्ज्ञातुमिच्छामि गुरुणा सम्यगीरितम् ॥ ७ ॥
सर्वभूतहितार्थिः शिष्येणैवं प्रचोदितः ।
सर्वभूतहितं वाक्यं व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ ८ ॥
इन उदर रोगो के कारण, सख्या, प्राग्रूप ( पूर्वरूप ), आकृति ( रूप )
और भेषज ( औषध ) के विषय मे आपका भली प्रकार उपदेश सुनना
चाहता हूँ । अग्निवेश के इस प्रकार पूछने पर सब प्राणियो के लिये आत्रेय
ऋषि ने सब प्राणियो को हितकारी वाक्य कहना आरम्भ किया ॥ ७-८ ॥
अग्निदोषान्मनुष्याणां रोगसङ्घाः पृथग्विधाः ।
मलवृद्ध्या प्रवर्तन्ते विशेषेणोदराणि तु ॥ ६ ॥
मन्देऽग्नौ मलिनैर्भुक्तैरपाकाद्दोषसंचयः ।
प्राणाग्न्यपानान्संदूष्य मार्गान् रुद्ध्वाऽधरोत्तरान् ॥ १० ॥
त्वङ्मांसान्तरमागत्य कुक्षिमाध्मापयन्भृशम् ।
जनयत्युदरं, तस्य हेतुं शृणु सलक्षणम् ॥ ११ ॥
अग्नि के मन्द होने से, मल की वृद्धि होने पर मनुष्यों मे नाना प्रकार के
रोग समूह उत्पन्न होते है, और उदर राग विशेष रूप से उत्पन्न होते है ।
अग्नि के मन्द होने पर, अन्न के पचन न होने पर, मलिन, मलकारक अपथ्य
आहार के सेवन से दोष संचित होने पर प्राण, अग्नि ( जाठराग्नि ), और
अपान वायु को दूषित करके अधर और उत्तर ( ऊपर और नीचे के ) दोनो
मार्गों को रोक देते है । यह दोष-समूह त्वचा और मास के बीच मे आकर कुक्षि
( उदर, कोख ) को बहुत अधिक फुला करके उदर रोग को उत्पन्न करते हैं
उसके कारण और लक्षणों को सुनो ॥ ६-११ ॥
५१४ चरकसंहिता [ अ० १३
अत्युष्ण१-लवणक्षारविदाह्यम्लगराशनात्२ ।
मिथ्यासंसर्जनाद्रूक्षविरुद्धाशुचिभोजनात् ॥ १२ ॥
प्लीहार्शोग्रहणीदोषकर्षणात्कर्मविभ्रमात् ।
क्लिष्टानाम्प्रतीकाराद्रौक्ष्याद्वेगविधारणात् ॥ १३ ॥
स्रोतसां दूषणादामात्सङ्क्षोभादतिपूरणात् ।
अर्शोबलिशकृद्रोधादन्त्रस्फुटनभेदनात् ॥ १४ ॥
अतिसंचितदोषाणा पाप कर्म च कुर्वताम् ।
उदराण्युपजायन्ते मन्दाग्नीना विशेषतः ॥ १५ ॥
सामान्य कारण—अति उष्ण, लवण, क्षार, विदाही, अम्ल और सयोगजन्य
विष के सेवन से, पेयादि अन्न कर्म के मिथ्या आचरण से, रूक्ष, विरुद्ध और
अपवित्र भोजन के करने से, प्लीहा, अर्ग ( बवासीर ) ग्रहणी रोग तथा यात्रा
और भार आदि से कृश होने पर, वमन आदि कार्यों के मिथ्या आचरण
से, रोगों से पीडित होने पर, चिकित्सा न करने पर, रूक्षता से, मल-मूत्र आदि
के उपस्थित वेगों के रोकने से, मल और मूत्र के वाहक स्रोतसो के दूषित होने
से, आम ( अपक्व आहार ) रस से, यान, वाहन ( सवारी ), आदि के सक्षोभ
से, कुक्षि ( पेट ) के बहुत भर लेने ( अति भोजन ) से, अर्श ( बवासीर )
रोग से, बाल आदि को अन्न के साथ खाने से, मार्ग के अवरुद्ध होने पर,
शर्करा, तृण आदि द्वारा आतो के फटने या चिर जाने पर, दोषों के बहुत
अधिक सञ्चित होने से, ओर पाप कर्म के करने से, विशेष रूप से मन्दाग्नि वाले
पुरुषों मे उदर रोग उत्पन्न होते हैं ॥१२-१५॥
क्षुन्नाशः स्वाद्वतिस्निग्धगुर्वन्नं पच्यते चिरात् ।
भुक्तं विदह्यते सर्वं जीर्णाजीर्णं न वेत्ति च ॥ १६ ॥
सहते नातिसौहित्यमीषच्छोफश्च पादयोः ।
शश्वद् बलक्षयोऽल्पेऽपि व्यायामे श्वासमृच्छति ॥ १७ ॥
पुरीषनिचयो वृद्धिरुदावर्तकृता च रुक् ।
बस्तिसन्धौ रुगाध्मानं वर्धते पाट्यतेऽपि च ॥ १८ ॥
आतन्यते च जठरमपि लघ्वल्पभोजनैः ।
राजीजन्म वलीनाश इति लिङ्गं भविष्यताम् ॥ १९ ॥
उदररोग के पूर्वरूप—भूख का नाश, स्वादु ( मधुर ), अतिस्निग्ध और
गुरु ( भारी ) अन्न खा लेने पर देर से पचता है । सब प्रकार का अन्न विदाह
१. 'अत्यम्ल' इति । २ 'अम्लरसा' इति च पाठः ॥
अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५१५
उत्पन्न करता है, रोगी को जीर्ण ( पचा ) या अजीर्ण ( अनपचा ) का ज्ञान
नहीं होता । अति तृप्तिपूर्वक खाये अन्न को सहन नही करता, पाव पर थोड़ी
सूजन हो जाती है । निरन्तर बल का ह्रास होता रहता है, थोडी सी भी मेहनत
से श्वास चढ जाता है । मल बढ जाता है और सञ्चित हो जाता है । बस्ति-
सन्धि मे उदावर्त्त के कारण वेदना, पेट मे आध्मान ( अफारा ), थोडे से भी
भाजन से पेट ऊपर को बढता है, तन जाता है, फटता हुआ प्रतीत होता है,
पेट पर नाड़ियो की रेखाये उत्पन्न हो जाती है और पेट की वलिया का नाश
हा जाता है, ये उदर रोग के पूर्वरूप है १ ॥१६-१६॥
रुद्ध्वा स्वेदाम्बुवाहीनि दोषाः स्रोतांसि संचिताः ।
प्राणाग्न्यपानान् २ संदूष्य जनयन्त्युदरं नृणाम् ॥ २० ॥
सचित दोष प्राण वायु अग्नि और अपान वायु को दूषित करके स्वेद और
अम्बु ( लसीका ) का ले जाने वाले ( त्वचा और मास के मध्य मे आश्रित )
स्रोतो को रोक कर उदर-राग उत्पन्न करते है ॥२०॥
कुक्षेराध्मानमाटोपः शोफः पादकरस्य च ।
मन्दोऽग्निः श्लक्ष्णगण्डत्वं कार्श्य चोदरलक्षणम् ॥ २१ ॥
रूप—पेट मे अफारा और गुडगुडाहट, हाथ और पाव पर सूजन, अग्नि
का मन्द होना, गालो पर चिकनापन ( तेल के से पदार्थ का चमकना ), शरीर
मे कृशता य उदर राग के लक्षण है ॥२१॥
पृथग्दोषैः समस्तैश्च प्लीहबद्धक्षतोदकैः ।
संभवन्त्युदराण्यष्टौ तेषां लिङ्गं पृथक् शृणु ॥ २२ ॥
उदर रोग आठ प्रकार का होता है । पृथक् पृथक् दोषों से तीन प्रकार
का (१) वातिक, (२) पैत्तिक, (३) श्लैष्मिक, (४) सन्निपातजन्य, (५) प्लीहोदर,
(६) बद्धोदर, (७) क्षतोदर और (८) उदकादर । [ इनमे से क्षतोदर को हो
अन्य ग्रन्थों मे 'परिस्रावी उदर' कहा है ] अब इनके पृथक् लक्षण सुनो ॥२२॥
रूक्षाल्पभोजनायासवेगोदावर्त्तकर्शनैः ।
वायुः प्रकुपितः कुक्षिहृद्व स्तिगुदमार्गगः ॥ २३ ॥
हत्वाऽग्नि कफमुद्धूय तेन रुद्धगतिस्तथा ।
आचिनोत्युदर जन्तोस्त्वङ्मांसान्तरमाश्रितः ॥ २४ ॥
१ पूर्वरूप—बलवर्णाकाङ्क्षा बलीविनाशो जठरे च राज्यः ।
जीर्णापरिज्ञानविदाहवत्यो बस्तौ रुज पादगतश्च शोफ. ॥
सु० नि० ७ ॥
२ 'प्राणापानान् हि' इति पाठान्तरम् ।
कर अग्नि का नाश करके और कफ को उसके स्थान (आमाशय) से लेकर,
५१६ चरकसंहिता [अ० १३
वातादर के कारण—रूक्ष, अल्प (हीन मात्रा) मे भोजन करने से, परि-
श्रम से, उपस्थित वेगो का रोकने से, उदावर्त्त से, मुसाफिरी, भार आदि द्वारा
कृशता से, वायु कुपित होकर कुक्षि, हृदय बस्ति और गुदा के मार्ग मे पहुँच
कर अग्नि का नाश करके और कफ को उसके स्थान (आमाशय) से लेकर,
कफ के कारण माग के रुक जाने से, त्वचा और मास के मध्य मे आश्रित
होकर प्राणियो मे उदर रोग वा उत्पन्न करती है ॥ २३-२४ ॥
तस्य रूपाणि—कुक्षि-पाणि-पाद-वृषण-श्वयथूदर-विपाटनमनियतौ च
वृद्धिह्रासौ कुक्षि-पार्श्व-शूलोदावर्त्ताङ्गमर्द-पर्वभेद-शुष्क-कास-कार्श्य-दौ-
र्बल्यारोचकाविपाका अधोगुरुत्वं वातवचामूत्रसङ्गः श्यावारुणत्वं च
नख-नयन-वदन-त्वङ्-मूत्र-वर्चसामपि चोदरं तन्वसित-राजीसिरा-
सन्ततमाहतमाध्मातद्दतिशब्दवद्भवति, वायुश्चोर्ध्वमधस्तिर्यक् च सशू-
लशब्दश्चरत्येतद्वातोदरं विद्यात्॥ २५ ॥
वातोदर के लक्षण—कुक्षि (कोख) पाव और अण्डकोशो मे शाथ होना,
उदर फटता प्रतीत होना, बिना कारण के ही उदर का बढना और घटना, कुक्षि
मे शूल, पार्श्वशूल, उदावर्त्त, अगो मे वेदना, पर्व-सन्धियो का टूटना, सूखी
खासी, शरीर मे कृशता, निबलता, भोजन मे अरुचि, अविपाक, उदर के निचले
भाग पेडू मे भारीपन, वायु, मल और मूत्र का अवरोध, नख, आख, मुख,
त्वचा, मल और मूत्र का श्याव (काला) या अरुण (लाल) रग होना, पेट
पर पतली काली रेखाये और सिराये दीखना, टकोरने पर वायु से भरे, मशक के
समान शब्द होना, पेट मे जब वायु ऊपर, नीचे या तिरछी चले तो दर्द और
शब्द होना, ये वातोदर के लक्षण हे ॥ २५ ॥
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णाग्न्यातपसेवनैः।
विदाह्यध्यशनाजीर्णैश्चाशु पित्तं समाचितम् ॥ २६ ॥
प्राप्यानिलकफौ रुद्ध्वा मार्गोन्मार्गमास्थितम् ।
निहन्त्यामाशये वह्निं जनयत्युदरं ततः ॥ २७ ॥
पित्तोदर के कारण—कटु, अम्ल, लवण, अति उष्ण, अति तीक्ष्ण पदार्थों
के सेवन से, अग्नि और धूप के सेवन से, विदाहकारक भोजनो से, अजीर्ण से
तथा अध्यशन से (भोजन के ऊपर भोजन करने से) पित्त शीघ्र सचित हो
जाता है। यह सचित पित्त वायु और कफ को साथ मे लेकर इनके द्वारा मार्ग
को रोक कर, उन्मार्ग में गमन करके आमाशय मे अग्नि का नाश करता है,
इससे उदर रोग उत्पन्न होते हैं ॥ २६-२७ ॥
तस्य रूपाणि—दाह-ज्वर-तृष्णा-मूर्च्छातीसार-भ्रमाः कटुकास्यत्वं
अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५१७
अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५१७
हरितहारिद्रत्वं च नख-नयन-वदन-त्वङ्-मूत्र-वर्चसामपि चोदरं नील-
पीत-हारिद्र-हरित-ताम्र-राजी-सिरावनद्धं दह्यते दूष्यते धूप्यते ऊष्मायते
स्विद्यते क्लिद्यते मृदुस्पर्शं क्षिप्रपाकं च भवत्येतत् पित्तोदर विद्यात्॥२८॥
लक्षण—दाह, ज्वर, प्यास, मूर्च्छा, अतीसार और भ्रम, मुख का स्वाद
कडुवा हो, नख, आख, मुख, त्वचा, मूत्र और मल का हरा या पीला (हल्दी के
समान) वर्ण हो, उदर के ऊपर नीली पीली, हल्दी के समान (गहरी पीली),
ताम्बे के रग की रेखाएँ और सिराएँ दिखाई दे, जलन हो, तपे, सन्तपित हो,
ऊष्मा गरम बाष्प निकलते प्रतीत हा । पसीना आना, क्लिन्नता प्रतीत हो । स्पर्श
मे कोमल और शीघ्र पकने के स्वभाव का हो, ये पित्तोदर के लक्षण हैं ॥२८॥
अव्यायामदिवास्वप्नस्वाद्वतिस्निग्धपिच्छिलैः ।
दधिदुग्धोदकानूपमांसैश्चात्युपसेवितैः ॥ २९ ॥
क्रुद्धेन श्लेष्मणा स्रोतःस्वावृते १ष्वावृत्तोऽनिलः ।
तमेव पीडयन् कुर्यादुदर बहिरन्तरम् ॥ ३० ॥
कफोदर के कारण—परिश्रम न करने से, दिन मे सोने से, मधुर, अति-
स्निग्ध, पिच्छिल भोजनो से, दही, दूध, जलचर तथा आनूप मास के अति सेवन
से कुपित हुई श्लेष्मा स्रोतो को रोक देती है। स्रोतों के रुकने से उनमे घिरा
वायु त्वचा और मास के बीच मे पहुच कर आतो का आश्रय लेकर कफ को ही
पीड़ित करके उदर-रोग को उत्पन्न कर देता है ॥ २९-३० ॥
तस्य रूपाणि—गौरवारोचकाविपाकाङ्गमर्द-सुप्ति-पाणि-पाद-मुष्को-
रु-शोफोत्क्लेश-निद्रा-कास-श्वासाः शुक्लत्वं च नख-नयन-वदन-त्वङ्-
मूत्र-वर्चसामपि चोदरं शुक्लराजीसिरासन्ततं गुरु स्तिमितं स्थिरं
कठिनं च भवत्येतच्छ्लेष्मोदर विद्यात् ॥ ३१ ॥
उसके लक्षण—भारीपन, भोजन मे अरुचि, अविपाक (अजीर्ण), अगो
मे वेदना, स्पर्शज्ञान का अभाव, हाथ पाव और अण्डकोशो पर शोथ, जीमच-
लाना, नीद का अधिक आना, कास और श्वास, नख, आख, मुख, त्वचा,
मूत्र और मल का श्वेत वर्ण होना, उदर का श्वेत रेखाओ तथा सिराओ मे
भरा रहना । पेट भारी, स्तिमित (गीले वस्त्रमे ढपा सा) प्रतीत होना, स्थिर
और कठिन होना ये कफोदर के लक्षण है ॥ ३१ ॥
दुर्बलाग्नेरपथ्यादिविरोधिगुरुभोजनात् ।
स्त्रीदत्तैश्च रजोरोमविण्मूत्रास्थिनखादिभिः ॥ ३२ ॥
१ 'स्वावृतेष्वा' इति पाठान्तरम् ।
५१८ चरकसंहिता [ अ० १३
विषैश्च मन्दैर्वाताद्याः कुपिताः संचितास्त्रयः ।
शनैः कोष्ठे प्रकुर्वन्तो जनयन्त्युदरं नृणाम् ॥ ३३ ॥
सन्निपातोदर के कारण—दुर्बल अग्नि वाला पुरुष जब अपथ्य ( अहित,
अध्यशन या विषमाशन ) आदि सेवन करे या आम ( अपक्व आहार रस )
अथवा विरोधी अन्न या गुरु भोजन का सेवन करे वा दुष्ट स्त्रियो द्वारा दिये
रज, रोम, मल, मूत्र, अस्थि, नख आदि से मिले, अन्न को खावे, वा मन्द
विषो ( दूषीविष आदि ) से, वातादि तीनो दोष कुपित होकर धीरे-धीरे कोष्ठ मे
संचित होकर उदर रोग को उत्पन्न करते हैं १॥ ३२-३३ ॥
तस्य रूपाणि—सर्वेषामेव दोषाणा समस्तानि लिङ्गान्युपल-
भ्यन्ते वर्णांश्च नखादिषु, उदरमपि नानावर्णराजीसिरासन्ततं भव-
त्येतत्सन्निपातोदरं विद्यात् ॥ ३४ ॥
सन्निपातोदर के लक्षण—इस सन्निपातोदर मे सब दोषा के मिलेत लक्षण
मिलते हे । नख, आख, त्वचा आदि मे सब रंग दिखाई देते हैं । पेट पर भी
नाना प्रकार की रेखाये आर सिराये फैली होती हैं । इसको सन्निपातोदर कहते
है । [ सुश्रुत मे इसको दूष्योदर कहा है, यह असाध्य हैं ] ॥ ३४ ॥
अशितस्यातिसङ्क्षोभाद्यानयानातिचेष्टितैः ।
अतिव्यवायभाराध्ववमनव्याधिकर्शनैः ॥ ३५ ॥
वामपार्श्वाश्रितः प्लीहा च्युतः स्थानात्प्रवर्धते ।
शोणितं वा रसादिभ्यो विवृद्धं तं विवर्धयेत् ॥ ३६ ॥ इति ॥
प्लीहोदर—अति भोजन करने वाले पुरुष मे घोड़ा, गाड़ी की सवारी अथवा
अति घूमने के कारण सङ्क्षोभ उत्पन्न होने से, अति मैथुन से, भार उठाने से,
अधिक मुसाफिरी से, वमन से, रोगजन्य कृशता से, बाये पार्श्व मे स्थित प्लीहा
अपने स्थान से खिसक कर बढ़ने लगती है । इनकी वृद्धि मे कारण बढे हुए
रक्त ओर रस आदि है, जो कि अपने आश्रय को बढ़ाते है ॥ ३५-३६ ॥
तस्य प्लीहा कठिनोऽष्ठीलेवादौ वर्धमानः कच्छपसंस्थान उपलभ्यते,
१ सुश्रुत मे कहा है—
स्त्रियोऽन्नपान नखरोममूत्रविङार्त्तवैर्युक्तमसाधुवृत्ताः ।
यस्मै प्रयच्छन्त्यरयो गराश्च दुष्टाम्बुदूषीविषसेवनाद् वा ॥
तेनाशु रक्तं कुपिताश्च दोषा कुर्वन्ति घोर जठरं त्रिलिङ्गम् ।
प्रकीर्त्तित दूष्योदरम् ॥ सु० नि० ७ वा ॥
अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५१६
अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५१६
स चोपेक्षितः क्रमेण कुक्षि जठरमग्न्यधिष्ठानं च परिक्षिपन्नुदरमभि-
निर्वर्तयति ॥ ३७ ॥
रोगी की प्लीहा ( तिल्ली ) प्रथम कठिन और अष्ठीला ( लोहे का गोला
या छोटा पत्थर ) के समान होती है, पीछे से बढ़ कर कछुए के बराबर हो
जाती है । इसकी भी उपेक्षा करने पर प्लीहा धीरे-धीरे बढ़ कर कुक्षि ( पार्श्व ),
उदर, अग्नि के स्थान ( ग्रहणी ) के चारो ओर बढ़ कर उदर रोग को
उत्पन्न करती है ॥ ३७ ॥
तस्य रूपाणि—दौर्बल्यारोचकाविपाक-वर्चो-मूत्र-ग्रह-तमःप्रवेश-पिपा-
साङ्ग-मर्द-च्छर्दि-मूर्च्छाङ्गसाद-कास-श्वास-मृदु-ज्वरानाहाग्नि-नाशका-
र्श्यास्यवैरस्य-पर्व-भेदाः कोष्ठे वातशूलं चापि चोदरमरुणवर्ण विवर्ण वा
नीलहरितहारिद्रराजिमद्भवति । एवमेव यकृदपि दक्षिणपार्श्वस्थं कुर्यात्
तुल्य-हेतु-लिङ्गाैषधत्वात्तस्य प्लीहजठर एवावरोध इत्येतद्यकृत्प्लीहोदरं
विद्यात् ॥ ३८ ॥
उसके लक्षण—दुर्बलता, अरुचि, अविपाक, मल और मूत्र का अवरोध,
तमःप्रवेश ( ज्ञान का अभाव ), पिपासा ( प्यास ), अगो मे वेदना, वमन,
मूर्च्छा, अगो का टूटना, कास, श्वास, थोड़ा ज्वर रहना, आनाह ( अफारा ),
अग्निनाश, कृशता, मुख की विरसता ( फीकापन ), पर्वों का टूटना ( वेदना ),
कोष्ठ मे वायु और शूल होता है । उदर का रग लाल या विवर्ण ( प्रकृतिस्थ
वर्ण से रहित ) होता है । उदर लाल वा फीके रग का, उस पर नीली, पीली,
हरी रेखाये दीखती है ।
प्लीहोदर की भाति यकृत् भी दक्षिण पार्श्व मे बढ कर उपरोक्त लक्षणो को
उत्पन्न कर सकता है । इसके कारण और लक्षण तथा औषध प्लीहोदर के समान
हाने से इसका प्लीहोदर मे ही अन्तर्भाव हाता है । इसको यकृतोदर जाने, इस
प्रकार यकृत्-उदर, प्लीहोदर कह दिये ॥३८॥
पक्ष्मबालैः सहान्नेन भुक्तैर्बद्धायने गुदे ।
उदावर्त्तैस्तथाऽर्शोभिरन्त्रसंमूर्च्छनेन वा ॥ ३६ ॥
अपानो मार्गसंरोधाद्धत्वाऽग्निं कुपितोऽनिलः ।
वर्चःपित्तकफान् रुद्ध्वा जनयत्युदरं ततः॥ ४० ॥
बद्धगुदोदर—पलको के बालो को भोजन के साथ खाने से, उदावर्त्त या
अर्श-रोग के कारण, पिच्छिलादि अन्न से आतों के मूर्छित होने ( परस्पर
चिपक जाने ) के कारण, गुदमार्ग के रुक जाने से अपान वायु मार्ग के न
५२० चरकसंहिता [ अ० १३
मिलने के कारण अग्नि का नाश कर देता है, इससे उदर रोग उत्पन्न
होता है१ ॥ ३६-४०॥
तस्य रूपाणि-तृष्णा-दाह-ज्वर-मुख-तालु-शोषोरुसाद-कास-श्वास-दौर्ब-
ल्यारोचकाविपाक-वर्चो-मूत्र-सङ्गाध्मान-च्छर्दि-क्षवथु-शिरो-हृन्नाभिगुद-
शूलान्यपि चोदरं मूढवातं स्थिरमरुण-नील-राजि-सिरावनद्धमराजिकं वा
प्रायो नाभ्युपरि गोपुच्छवदभिनिर्वर्तत इत्येतद् बद्धगुदोदरं विद्यात् ॥४१॥
बद्धगुदोदर के लक्षण—तृष्णा, जलन, ज्वर, मुख और तालु मे शुष्कता,
जंघाओ मे पीड़ा, कास, श्वास, दुर्बलता, भोजन मे अरुचि, अविपाक, मल और
मूत्र का अवरोध आध्मान, वमन, छींक का आना, शिरःशूल, हृदयशूल,
नाभिशूल, और गुदा मे वेदना रहती है। पेट मे वायु मूर्च्छित रहता है, बाहर
नही निकलता । पेट कठोर ( कड़ा ), लाल रग का, नीली रेखाओं और
सिराओं से ढका होता है। अथवा उस पर राजि (रेखाये ) बिलकुल नही
होती । यह प्राय. नाभि से ऊपर गोपुच्छाकार होता है इसको 'बद्धगुदादर'
जाने ॥ ४१ ॥
शर्करातृणकाष्ठास्थिकण्टकैरन्नसंयुतैः ।
भिद्येतान्त्रं यदा भुक्तैर्जृम्भयाऽत्यशनेन वा ॥ ४२ ॥
इयात्पाकं रसस्तेभ्यश्छिद्रेभ्यः प्रस्रवेद्बहिः ।
पूरयन् गुदमन्त्रं च जनयत्युदरं ततः ॥ ४३ ॥
छिद्रोदर—शर्करा ( बालुका ), तिनके, काष्ठ, अस्थि और काटे इनको
अन्न के साथ खाने से, जृम्भा ( जभाई ) से अथवा अति भोजन से भीतर
आतें चिर जाती है और अन्दर-अन्दर पक जाती है। इन पकी आतों से जो
रस बाहर निकलता है, वह गुदा, आत्र और उदर मे एकत्र होकर उदर
रोग को उत्पन्न कर देता है ॥ ४२-४३ ॥
तस्य रूपाणि—तदधो नाभ्याः प्रायोऽभिनिर्वर्तमानमुदकोदरस्य च
यथाबलं च दोषाणा रूपाणि दर्शयत्यपि चाऽऽतुरः स लोहित-नील-पीत-
१ सुश्रुत मे—'यस्यान्त्रमन्नमुपलेपिभिर्वा बालाश्मभिर्वा सहितैः पृथग् वा ।
सचीयते तत्र मल. स दोष क्रमेण नाड्यामिव सकरो हि ॥
निरुध्यते तस्य गुदे पुरीषं निरेचि कृच्छ्रादपि चाल्पमल्पम् ।
हृन्नाभिमध्ये परिवृद्धिमेति यच्चोदर विट्समगन्धिक च ।
प्रच्छर्दयन् बद्धगुदो विभाव्यः॥ सु० नि० ७ ॥
पिच्छिल-कुणप-गन्ध्यामवर्च उपवेशते । हिक्का-श्वास-कास-तृष्णा-प्रमेहारो-
चकाविपाक-दौर्बल्य-परीतश्च भवति । एतच्छिद्रोदरं विद्यात् ॥ ४४ ॥
छिद्रोदर के लक्षण—यह छिद्रोदर प्राय नाभि के नीचे बढ कर शीघ्र ही
जलोदर के लक्षणों को प्रकट करता है। छिद्रोदर में दोषो के अनुसार ही
लक्षण होते हैं । रोगी का मल लाल, नीला, पीला, पिच्छिल, मुर्दे की गन्ध के
समान कच्चा होता है । रोगी को हिचकी, श्वास, कास, प्यास, प्रमेह, अरुचि,
अविपाक और दुर्बलता रहती है इसको 'छिद्रोदर' जाने ॥ ४४ ॥
स्नेहपीतस्य मन्दाग्नेः क्षीणस्यातिकृशस्य वा ।
अत्यम्बुपानान्नष्टेऽग्नौ मारुतः क्लोम्नि संस्थितः ॥ ४५ ॥
स्रोतःसु रुद्धमार्गेषु कफश्चोदकमूच्छितः ।
वर्धयेता तदेवाम्बु स्वस्थानादुदराय तौ ॥ ४६ ॥
उदकोदर—मन्दाग्नि वाला व्यक्ति स्नेहपान करले वा क्षीण और अति कृश
व्यक्ति की अग्नि बहुत अधिक पानी पीने से नष्ट हो जाये तो स्रोतो के मार्गो के
बन्द हो जाने पर, कफ और जल से मिश्रित क्लोम मे स्थित वायु वहीं पर पानी
को बढा कर अपने स्वाभाविक स्थान से उदर मे लाकर उदर-रोग को उत्पन्न
करते है ॥ ४५-४६ ॥
तस्य रूपाणि—अनन्नकाङ्क्षा-पिपासा-गुदस्राव-शूल-श्वास-कास-
दौर्बल्यान्यपि चोदरं नानावर्णराजिसिरासन्ततमुदकपूर्णहृतिक्षोभसंस्पर्शं
भवति, एतदुदकोदरं विद्यात् ॥ ४७ ॥
दकोदर के लक्षण--भोजन की इच्छा न होना, प्यास, गुदा से स्राव
बहना, शूल, श्वास, कास और निर्बलता रहती है। उदर पर नाना प्रकार की
रेखाये दिखाई देती है । पानी से भरी मशक के समान उदर का स्पर्श होता
है । [ एक तरफ टकोरने से तरग दूसरे पार्श्व मे आती है ] इसको
'दकोदर' जाने ॥ ४७ ॥
तत्र, अचिरोत्पन्नमनुपद्रवमनुदकमुदर त्वरमाणश्चिकित्सेत् । उपे-
क्षितानाह्येषा दोषाः स्वस्थानादपावृत्ता अपरिपाकाद् द्रवीभूताः सन्धीन्
स्रोतांसि चोपक्लेदयन्ति, स्वेदश्च बाह्येषु स्रोतःसु प्रतिहतगतिस्तिर्यगव-
तिष्ठमानस्तदेवोदकमाप्याययति ॥ ४८ ॥
दकोदर के उत्पन्न होने के साथ ही, छर्दि (वमन) अतिसार आदि उप-
द्रव उत्पन्न होने और जल भरने से पूर्व ही जल्दी से चिकित्सा करनी चाहिये ।
चूंकि इन रोगियों की उपेक्षा करने से वातादि दोष अपने स्थान से च्युत
५२२ चरकसंहिता [अ० १३
होकर परिपाक के कारण द्रव बनकर सन्धि ओर स्रोतो को क्लिन्न (आर्द्र) कर
देते है। पसीना भी बाह्य स्रोतो के बन्द होने से बाहर न निकल कर तिरछा
अन्दर ही जाकर इस जलको बढाता है। जिससे पिच्छा (सिम्बल की गोंद के
समान लेस) उत्पन्न हो जाती है।
पिच्छा उत्पन्न होने पर पेट गोल, भारी, स्तिमित, तथा टकराने पर कोमल
शब्द वाला, कोमल स्पर्शयुक्त होता है। रेखाये सब नष्ट हो जाती है, नाभि पर
छूने से ही फैलने लगता है (तरंग चल जाती है) ॥ ४८ ॥
तत्र पिच्छोत्पत्तौ मण्डलमुदरं गुरु स्तिमितमाकोठितमशब्दं मृदु-
स्पर्शमपगतराजीकमाक्रान्तं नाभ्यामेवोपसर्पतीति। ततोऽनन्तरमुदकप्रा-
दुर्भावः। तस्य रूपाणि-कुक्षेरतिमात्रवृद्धिः सिरान्तर्धानगमनमुदक-पूर्ण-
दृतिसंक्षोभम्पर्शश्च, तदातुरमुपद्रवाः स्पृशन्ति छर्द्यतीसार-तमक-तृष्णा-
श्वास-कास-हिक्का-दौर्बल्य-पार्श्व-शूलारुचि-स्वरभेद-मूत्रसङ्गादयः, तथा-
विधमचिकित्स्यं विद्यादिति ॥ ४६ ॥
पिच्छा के उत्पन्न होने के पीछे उदक (पानी) पैदा होता है। लक्षण—
पार्श्वो मे बहुत वृद्धि हो जाती है। सिराये नही दीखती। पानी से भरी मशक के
समान स्पर्श और संक्षोभ (गति) होता है। इसके आगे रोगी का वमन,
अतिसार, तमक श्वास, प्यास, कास, हिचकी, दुर्बलता, पार्श्वशूल, अरुचि, स्वर-
भेद, मूत्रावरोध आदि अनेक उपद्रव होने प्रारम्भ हो जाते है, इन उपद्रवो के
होने पर रोगी असाध्य हो जाता है । ४६ ॥
इस प्रसङ्ग मे—
भवति चात्र—वातात्पित्तात्कफात्प्लीह्नः सन्निपातात्तथोदकात् ।
परं परं कृच्छ्रतरमुदरं भिषगादिशेत् ॥ ५० ॥
वैद्य वायु से पित्तजन्य, पित्त से कफजन्य, कफ से प्लीहोदर, प्लीहोदर से
सन्निपातोदर, सन्निपातोदर से दकोदर को कष्टसाध्य समझे ॥ ५० ॥
१ अष्टाङ्गसग्रह मे कहा भी है—
उपेक्षया च सर्वेषु दोषा. स्वस्थानतश्च्युता.।
पाकाद् द्रवा द्रवीकुर्युः सन्धीन् स्रोतोमुखान्यपि ॥
स्वेदस्तु बाह्यस्रोतःसु विहतस्तिर्यगास्थित.।
तदेवोदकमाप्याय पिच्छा कुर्यात्तदा भवेत् ।
गुरुदर स्थिर वृत्तमाहत च सशब्दवत् ॥
अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५२३
पक्षाद् बद्धगुदं तूर्ध्वं सर्वं जातोदकं तथा ।
प्रायो भवत्यभावाय छिद्रान्त्रं चोदरं नृणाम् ॥ ५१ ॥
बद्धगुदोदर और छिद्रान्त्रोदर दोनो पन्द्रह दिन के पीछे और दकोदर
उत्पन्न होने के साथ ही प्राय नाश का कारण होता है। [ दकोदर, छिद्रोदर
और बद्धगुदोदर ये अनुकूल चिकित्सा से कभी अच्छे भी हो जाते है। चक्र०] ५१
शूनाक्षं कुटिलोपस्थमुपक्लिन्नतनुत्वचम् ।
बलशोणितमासाग्निपरिक्षीणं च सत्यजेत् ॥ ५२ ॥
श्वयथुः सर्वमर्मोत्थः श्वासो हिक्काऽरुचिः सतृट् ।
मूर्च्छा च्छर्दिरतीसारो च निहन्त्युदरिणं नरम् ॥ ५३ ॥
असाध्य रोगी—जिस रोगी की आखें सूज जाये इन्द्रिय (लिङ्ग) कुटिल
(टेड़ा) हो जाये, रागी की त्वचा क्लिन्न (विक्लेदयुक्त) और पतली हा, बल,
रक्त, मास और अग्नि क्षीण हो जाये, ऐसे रोगी की चिकित्सा न करे। यदि
हृदय आदि सब मर्म स्थानो पर शोथ हो जाये, रोगी को श्वास, हिचकी और
मूर्च्छा, अरुचि, वमन तथा अतिसार हो उस रोगी को उदर रोग मार ही देता
है। वैद्य उसको असाध्य समझे और छोड दे ॥ ५२-५३ ॥
जन्मनैवोदरं सर्वं प्रायः कृच्छ्रतमं मतम् ।
बलिनस्तदजाताम्बु यत्नसाध्यं नवोत्थितम् ॥ ५४ ॥
प्राय सब उदर-राग उत्पन्न होने के साथ ही कष्टसाध्य होते है। यदि रोगी
बलवान् हो तो पानी उत्पन्न हाने के पूर्व ही तथा राग नया हो तो यत्नपूर्वक
चिकित्सा करने मे साध्य है ॥ ५४ ॥
अशोथमरुणाभासं सशब्दं नातिभारिकम् ।
सदा गुडगुडायन्तं सिराजालगवाक्षितम् ॥ ५५ ॥
नाभिं विष्टभ्य पायौ तु वेगं कृत्वा प्रणश्यति ।
हृन्नाभिवंक्षणकटीगुदप्रत्येकशूलिनः ॥ ५६ ॥
कर्कशं सृजतो वातं नातिमन्दे च पावके।
लाल्या विरसे चास्ये मूत्रेऽल्पे संहते विषि ॥ ५७ ॥
अजातोदकमित्येतैर्लिङ्गैर्विज्ञाय तत्त्वतः ।
उपक्रमेद्भिषग्दोषबलकालविशेषवित् ॥ ५८ ॥
अजातोदक के लक्षण—उदर मे शोथ न हो, लाल वर्ण हलका सा
दीखे, शब्द युक्त हो, बहुत अधिक भारीपन न हो, सदा गुडगुड शब्द आता
हो, सिरा जाल दिखाई देता हो, वायु नाभि और आतो मे वेग करके छिप
जाती हो, हृदय, नाभि, वक्षण, कटि, गुदा मे शूल रहता हो, कर्कश वायु बाहर