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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 490, कुल 616 में से

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पृष्ठ 490

चिकित्सा—गात्र के एक भाग मे स्थित शोथो के लिये ( १ ) सिराविरेक
( नाडी से रक्त का निकाल देना ), ( २ ) काय विरेक ( वमन और विरेचन ),
( ३ ) शिरो-विरेक ( शिरोविरेचन ), ( ४ ) धूम का प्रयोग, ( ५ ) ओषधि-
सावित पुरातन घृत का पान ( शोधन से पूर्व ), ( ६ ) लङ्घन, ( ७ ) औष-
धियो के कल्क मे प्रघर्षण और मुख जन्य शोथो मे कवलग्रह ( गरारे )
कराने चाहिये ॥ ७८ ॥
अङ्गैकदेशेष्वनिलान्निसिः स्यात् स्वरूपधारी स्फुरण स्सिराभिः ॥ ७९ ॥
ग्रन्थिर्महान्मांसभवस्त्वनार्तिर्मेदोभवः स्निग्धतमश्चलश्च ।
( ६ ) ग्रन्थि—शरीर के किसी एक भाग मे वायु आदि दोष मासादि
को दूषित करके गोलाकार शोथ उत्पन्न कर देते है, इसको ग्रन्थि कहते हैं ।
इसके ग्रथित होने से उसका ग्रन्थि कहते है । इसमे वातादि दोषो के समान
दोष के अपने लक्षण रहते है । सिराजन्य-ग्रन्थि से स्फुरण ( भडकन ) रहती
है । मासजन्य-ग्रन्थि बहुत बडी तथा अल्प वेदनाशील होती है । मेदोजन्य
ग्रन्थि अति स्निग्ध ( चिकनी ) और चल (हिलने-जुलने वाली होती है¹) ॥७९॥
संशोधिते² स्वेदितमश्मकाष्ठैः साङ्गुष्ठदण्डैर्विलयेद³पक्वम् ॥ ८० ॥

१ सुश्रुत मे ग्रन्थि के लक्षण और निदान विस्तार से दिये हैं—
आयम्यते व्यथत एति तोदं प्रत्यस्यते कृत्यत एति भेदम् ।
कृष्णोऽमृदुर्बस्तिरिवाततश्च भिन्न. स्रवेच्चानिलजोऽस्रमच्छम् ॥
दन्दह्यते धूप्यति चोषममास पापच्यते प्रज्वलतीव चापि ।
रक्तः स पीतोऽप्यथ वापि पित्ताद् भिन्न स्रवेदुष्णमतीव चास्रम् ॥
शीतो विवर्णोऽल्परुजोऽतिकण्डू पाषाणवत् संहननोपपन्नः ।
चिराभिवृद्धिश्च कफप्रकोपात् भिन्न स्रवेच्छुक्लगहन च पूयम् ॥
( क ) दोषैर्दुष्टेऽसृजि ग्रन्थिर्भवेन्मूर्च्छत्सु जन्तुषु ⁠।
सिरामास च संश्रित्य सस्वाप. पैत्तलक्षणः ॥
मासैलैर्दूषित मासमाहारैर्ग्रन्थिमावहेत् ।
स्निग्ध महान्त कठिन सिरानद्ध कफाकृतिम् ॥
प्रवृद्ध मेदुरैर्मेदो नीत माङ्गेऽथवा त्वचि ।
वायुना कुरुते ग्रन्थि भृंश स्निग्ध मृदु चलम् ॥
श्लेष्मतुल्याकृति देहक्षयवृद्धिक्षयोदयम् ।
स विभिन्नो घन मेदस्ताम्रासितसित स्रवेत् ॥ अष्टागसग्रह ३-३४ ।
२ 'त शोधित' इति । ३. 'विनयेद्' इति ।