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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 498, कुल 616 में से

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पृष्ठ 498

५१४ चरकसंहिता [ अ० १३
अत्युष्ण१-लवणक्षारविदाह्यम्लगराशनात्२ ।
मिथ्यासंसर्जनाद्रूक्षविरुद्धाशुचिभोजनात् ॥ १२ ॥
प्लीहार्शोग्रहणीदोषकर्षणात्कर्मविभ्रमात् ।
क्लिष्टानाम्प्रतीकाराद्रौक्ष्याद्वेगविधारणात् ॥ १३ ॥
स्रोतसां दूषणादामात्सङ्क्षोभादतिपूरणात् ।
अर्शोबलिशकृद्रोधादन्त्रस्फुटनभेदनात् ॥ १४ ॥
अतिसंचितदोषाणा पाप कर्म च कुर्वताम् ।
उदराण्युपजायन्ते मन्दाग्नीना विशेषतः ॥ १५ ॥
सामान्य कारण—अति उष्ण, लवण, क्षार, विदाही, अम्ल और सयोगजन्य
विष के सेवन से, पेयादि अन्न कर्म के मिथ्या आचरण से, रूक्ष, विरुद्ध और
अपवित्र भोजन के करने से, प्लीहा, अर्ग ( बवासीर ) ग्रहणी रोग तथा यात्रा
और भार आदि से कृश होने पर, वमन आदि कार्यों के मिथ्या आचरण
से, रोगों से पीडित होने पर, चिकित्सा न करने पर, रूक्षता से, मल-मूत्र आदि
के उपस्थित वेगों के रोकने से, मल और मूत्र के वाहक स्रोतसो के दूषित होने
से, आम ( अपक्व आहार ) रस से, यान, वाहन ( सवारी ), आदि के सक्षोभ
से, कुक्षि ( पेट ) के बहुत भर लेने ( अति भोजन ) से, अर्श ( बवासीर )
रोग से, बाल आदि को अन्न के साथ खाने से, मार्ग के अवरुद्ध होने पर,
शर्करा, तृण आदि द्वारा आतो के फटने या चिर जाने पर, दोषों के बहुत
अधिक सञ्चित होने से, ओर पाप कर्म के करने से, विशेष रूप से मन्दाग्नि वाले
पुरुषों मे उदर रोग उत्पन्न होते हैं ॥१२-१५॥
क्षुन्नाशः स्वाद्वतिस्निग्धगुर्वन्नं पच्यते चिरात् ।
भुक्तं विदह्यते सर्वं जीर्णाजीर्णं न वेत्ति च ॥ १६ ॥
सहते नातिसौहित्यमीषच्छोफश्च पादयोः ।
शश्वद् बलक्षयोऽल्पेऽपि व्यायामे श्वासमृच्छति ॥ १७ ॥
पुरीषनिचयो वृद्धिरुदावर्तकृता च रुक् ।
बस्तिसन्धौ रुगाध्मानं वर्धते पाट्यतेऽपि च ॥ १८ ॥
आतन्यते च जठरमपि लघ्वल्पभोजनैः ।
राजीजन्म वलीनाश इति लिङ्गं भविष्यताम् ॥ १९ ॥
उदररोग के पूर्वरूप—भूख का नाश, स्वादु ( मधुर ), अतिस्निग्ध और
गुरु ( भारी ) अन्न खा लेने पर देर से पचता है । सब प्रकार का अन्न विदाह
१. 'अत्यम्ल' इति । २ 'अम्लरसा' इति च पाठः ॥