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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 503, कुल 616 में से

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पृष्ठ 503

अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५१६
स चोपेक्षितः क्रमेण कुक्षि जठरमग्न्यधिष्ठानं च परिक्षिपन्नुदरमभि-
निर्वर्तयति ॥ ३७ ॥
रोगी की प्लीहा ( तिल्ली ) प्रथम कठिन और अष्ठीला ( लोहे का गोला
या छोटा पत्थर ) के समान होती है, पीछे से बढ़ कर कछुए के बराबर हो
जाती है । इसकी भी उपेक्षा करने पर प्लीहा धीरे-धीरे बढ़ कर कुक्षि ( पार्श्व ),
उदर, अग्नि के स्थान ( ग्रहणी ) के चारो ओर बढ़ कर उदर रोग को
उत्पन्न करती है ॥ ३७ ॥
तस्य रूपाणि—दौर्बल्यारोचकाविपाक-वर्चो-मूत्र-ग्रह-तमःप्रवेश-पिपा-
साङ्ग-मर्द-च्छर्दि-मूर्च्छाङ्गसाद-कास-श्वास-मृदु-ज्वरानाहाग्नि-नाशका-
र्श्यास्यवैरस्य-पर्व-भेदाः कोष्ठे वातशूलं चापि चोदरमरुणवर्ण विवर्ण वा
नीलहरितहारिद्रराजिमद्भवति । एवमेव यकृदपि दक्षिणपार्श्वस्थं कुर्यात्
तुल्य-हेतु-लिङ्गाैषधत्वात्तस्य प्लीहजठर एवावरोध इत्येतद्यकृत्प्लीहोदरं
विद्यात् ॥ ३८ ॥
उसके लक्षण—दुर्बलता, अरुचि, अविपाक, मल और मूत्र का अवरोध,
तमःप्रवेश ( ज्ञान का अभाव ), पिपासा ( प्यास ), अगो मे वेदना, वमन,
मूर्च्छा, अगो का टूटना, कास, श्वास, थोड़ा ज्वर रहना, आनाह ( अफारा ),
अग्निनाश, कृशता, मुख की विरसता ( फीकापन ), पर्वों का टूटना ( वेदना ),
कोष्ठ मे वायु और शूल होता है । उदर का रग लाल या विवर्ण ( प्रकृतिस्थ
वर्ण से रहित ) होता है । उदर लाल वा फीके रग का, उस पर नीली, पीली,
हरी रेखाये दीखती है ।
प्लीहोदर की भाति यकृत् भी दक्षिण पार्श्व मे बढ कर उपरोक्त लक्षणो को
उत्पन्न कर सकता है । इसके कारण और लक्षण तथा औषध प्लीहोदर के समान
हाने से इसका प्लीहोदर मे ही अन्तर्भाव हाता है । इसको यकृतोदर जाने, इस
प्रकार यकृत्-उदर, प्लीहोदर कह दिये ॥३८॥
पक्ष्मबालैः सहान्नेन भुक्तैर्बद्धायने गुदे ।
उदावर्त्तैस्तथाऽर्शोभिरन्त्रसंमूर्च्छनेन वा ॥ ३६ ॥
अपानो मार्गसंरोधाद्धत्वाऽग्निं कुपितोऽनिलः ।
वर्चःपित्तकफान् रुद्ध्वा जनयत्युदरं ततः॥ ४० ॥
बद्धगुदोदर—पलको के बालो को भोजन के साथ खाने से, उदावर्त्त या
अर्श-रोग के कारण, पिच्छिलादि अन्न से आतों के मूर्छित होने ( परस्पर
चिपक जाने ) के कारण, गुदमार्ग के रुक जाने से अपान वायु मार्ग के न