चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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हरितहारिद्रत्वं च नख-नयन-वदन-त्वङ्-मूत्र-वर्चसामपि चोदरं नील-
पीत-हारिद्र-हरित-ताम्र-राजी-सिरावनद्धं दह्यते दूष्यते धूप्यते ऊष्मायते
स्विद्यते क्लिद्यते मृदुस्पर्शं क्षिप्रपाकं च भवत्येतत् पित्तोदर विद्यात्॥२८॥
लक्षण—दाह, ज्वर, प्यास, मूर्च्छा, अतीसार और भ्रम, मुख का स्वाद
कडुवा हो, नख, आख, मुख, त्वचा, मूत्र और मल का हरा या पीला (हल्दी के
समान) वर्ण हो, उदर के ऊपर नीली पीली, हल्दी के समान (गहरी पीली),
ताम्बे के रग की रेखाएँ और सिराएँ दिखाई दे, जलन हो, तपे, सन्तपित हो,
ऊष्मा गरम बाष्प निकलते प्रतीत हा । पसीना आना, क्लिन्नता प्रतीत हो । स्पर्श
मे कोमल और शीघ्र पकने के स्वभाव का हो, ये पित्तोदर के लक्षण हैं ॥२८॥
अव्यायामदिवास्वप्नस्वाद्वतिस्निग्धपिच्छिलैः ।
दधिदुग्धोदकानूपमांसैश्चात्युपसेवितैः ॥ २९ ॥
क्रुद्धेन श्लेष्मणा स्रोतःस्वावृते १ष्वावृत्तोऽनिलः ।
तमेव पीडयन् कुर्यादुदर बहिरन्तरम् ॥ ३० ॥
कफोदर के कारण—परिश्रम न करने से, दिन मे सोने से, मधुर, अति-
स्निग्ध, पिच्छिल भोजनो से, दही, दूध, जलचर तथा आनूप मास के अति सेवन
से कुपित हुई श्लेष्मा स्रोतो को रोक देती है। स्रोतों के रुकने से उनमे घिरा
वायु त्वचा और मास के बीच मे पहुच कर आतो का आश्रय लेकर कफ को ही
पीड़ित करके उदर-रोग को उत्पन्न कर देता है ॥ २९-३० ॥
तस्य रूपाणि—गौरवारोचकाविपाकाङ्गमर्द-सुप्ति-पाणि-पाद-मुष्को-
रु-शोफोत्क्लेश-निद्रा-कास-श्वासाः शुक्लत्वं च नख-नयन-वदन-त्वङ्-
मूत्र-वर्चसामपि चोदरं शुक्लराजीसिरासन्ततं गुरु स्तिमितं स्थिरं
कठिनं च भवत्येतच्छ्लेष्मोदर विद्यात् ॥ ३१ ॥
उसके लक्षण—भारीपन, भोजन मे अरुचि, अविपाक (अजीर्ण), अगो
मे वेदना, स्पर्शज्ञान का अभाव, हाथ पाव और अण्डकोशो पर शोथ, जीमच-
लाना, नीद का अधिक आना, कास और श्वास, नख, आख, मुख, त्वचा,
मूत्र और मल का श्वेत वर्ण होना, उदर का श्वेत रेखाओ तथा सिराओ मे
भरा रहना । पेट भारी, स्तिमित (गीले वस्त्रमे ढपा सा) प्रतीत होना, स्थिर
और कठिन होना ये कफोदर के लक्षण है ॥ ३१ ॥
दुर्बलाग्नेरपथ्यादिविरोधिगुरुभोजनात् ।
स्त्रीदत्तैश्च रजोरोमविण्मूत्रास्थिनखादिभिः ॥ ३२ ॥
१ 'स्वावृतेष्वा' इति पाठान्तरम् ।