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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पा० १ । चिकित्सितस्थानम् २५३
शिखितित्तिरिहंसानामेवं पिण्डरसो मतः ।
इति बीजीकरणपिण्डरसाः ।
वाजीकरण पिण्डरस—खाड, उड़द की दाल, वंशलोचन, दूध, घी ओर
गेहू का आटा इनको उचित परिणाम में लेकर उत्कारिका बना कर घी में तल
लेवे । इसको बहुत न पकाये । पीछे हाथों में मल कर मुर्गे के गरम मासरस में
डाल देवे । इसमें शर्करा, इलायची, केशर आदि सुगन्ध भी डाल देवे, इससे
रस गाढ़ा हो जायेगा । यह पिण्डरस शुक्रवधक, पौष्टिक और बलवर्धक है ।
इसके प्रयोग से पुरुष में घोड़े के समान मैथुन शक्ति आती है । इसी प्रकार से
मोर, तीतर और हंसों के मास रस से भी पिण्ड रस बनते हैं । इनके गुण भी
इसी प्रकार से हैं ॥ ३६-४१ ॥
घृतं माषान् सबस्ताण्डान् साधयेन्माहिषे रसे ।
भर्जयेत्त रस पूतं फलाम्लं नवसर्पिषि । ४२ ॥
ईषत्सलवण युक्त धान्यजीरकनागरैः ।
एष वृष्यश्च बल्यश्च बृंहणश्च रसोत्तमः ॥ ४३ ॥
इति वृष्यमाहिषरसः ।
घी, माष ( उड़द ) और बस्ताण्ड ( बकरे के अण्डकोषों ) को भैंस के
मांस रस मे सिद्ध करना चाहिये । इस रस को छान कर नये घी में भूनना
चाहिये । इसको अनार, आंवला आदि फलों के रस से खट्टा करना चाहिये ।
इसमें थोड़ा सा नमक, धनिया, जीरा और सोंठ भी मिला देनी चाहिये । यह
रस वृष्यकारक, बलवर्धक और बृंहण है ॥ ४२-४३ ॥
चटकांस्तित्तिरिरसे तित्तिरीन् कौक्कुटे रसे ।
कुक्कुटान् बार्हिणरसे हांसे बार्हिणमेव च । ४४ ॥
नवसर्पिषि संतप्तान् फलाम्लान् कारयेद्रसान् ।
मधुरान्वा यथासात्म्यं गन्धाढ्यान् बलवर्धनान् ॥ ४५ ॥
इति वृष्यरसाः ।
वृष्य रस--चिड़ियों को तित्तिर के रस में, तीतरों को मुर्गे के रस में, मुर्गों
को मोर के रस में, मोरों को हंसों के मास रस में सिद्ध करना चाहिये । इन चारों
रसों को ताजे घी में भून कर अनार के रस से खट्टा करके अथवा मधुर रूप में
सेवन करना चाहिये । सेवन करने के पूर्व इलायची, केशर आदि से सुगन्धित
कर लेना आवश्यक है । यह रस बलवर्धक है ॥ ४४-४५ ॥
चटकमांसानां गत्वा योऽनुपिबेत्पयः ।

२५४ चरकसंहिता [ अ० २
न तस्य लिङ्गशैथिल्यं स्यान्न शुक्रक्षयो निशि ॥ ४६ ॥
इति वृष्यमांसम् ।
(१) जो पुरुष चटक के मास को भर पेट खाकर ऊपर से दूध पी लेता
है, उसका बल (लिंग) शिथिल नहीं होता और रात भर वीर्य का क्षय नहीं
होता, यह वीर्यस्तम्भक है ॥ ४६ ॥
माषयूषेण यो भुक्त्वा घृताढ्य षष्टिकौदनम् ।
पयः पिबति रात्रि स कृत्स्नां जागर्ति वेगवान् ॥ ४७ ॥
इति वृष्यमाषयोगः ।
(२) खूब घी वाले साठी के चावलों को उड़द के यूष के साथ खाकर
जो ऊपर से दूध पी लेता है, वह काम-वेग से आतुर होकर सारी रात जागता
रहता है ॥ ४७ ॥
न रात्रिषु स्वपिति ना निस्तब्धेन च शेफसा ।
तृप्तः कुक्कुटमांसाना भृष्टानां नक्ररेतसि ॥ ४८ ॥
इति वृष्यं भृष्टमासम् ।
(३) मुर्गे के मास को नक्र के रेत में भून कर खाने से पुरुष स्तब्धलिंग
होकर सारी रात नहीं सोता । उसके सारी गत ध्वज-हर्ष करता है ॥ ४८ ॥
निःस्राव्य मत्स्याण्डरस भृष्टं सर्पिषि भक्षयेत् ।
हंसबर्हिणदक्षाणा चैवमण्डानि भक्षयेत् ॥ ४९ ॥
इति वृष्या अण्डरसाः ।
(४) मछली के अण्डों के रस को निकाल कर इसको घी में भून कर
खावे । इसी प्रकार से हंस, मोर और मुर्गी के अण्डे का भी रस भून
कर खावे ॥ ४९ ॥
भवतश्चात्र—स्रोतःसु शुद्धेष्वमले शरीरे वृष्य यदा ना मितमत्ति काले ।
वृषायते तेन परं मनुष्यस्तद् बृंहणं चैव बलप्रदं च ॥ ५० ॥
तस्मात्पुरा शोधनमेव कार्यं बलानुरूपं न हि वृष्ययोगाः ।
सिध्यन्ति देहे मलिने प्रयुक्ताः क्लिष्टे यथा वाससि रागयोगाः ॥५१॥
शुक्रवह आदि स्रोतों के शुद्ध होने पर, शरीर के निर्मल (धुला) होने
पर, उचित समय पर उचित मात्रा में जो वृष्य वस्तुओं का सेवन करता है
उसका वीर्य और पुंस्त्वशक्ति बढ़ जाती है । उसको यह बृंहण और बलवर्धक
होता है । इसलिये वृष्य प्रयोग सेवन करने से पूर्व बलानुसार शरीर का वमन,
विरेचन आदि से शोधन कर लेना चाहिये । जिस प्रकार मलिन वस्त्र पर रंग

नहीं चढ़ता उसी प्रकार मलिन शरीर में प्रयोग किये वृष्य योग अपना
फल नहीं देते ॥५०-५१॥
तत्र श्लोकौ—वाजीकरणसामर्थ्यं क्षेत्रं स्त्री यस्य चैव या ।
ये दोषा निरपत्यानां गुणाः पुत्रवतां च ये ॥ ५२ ॥
दश पञ्च च संयोगा वीर्यापत्यविवर्धनाः ।
उक्तास्ते शरमूलीये पादे पुष्टिबलप्रदाः ॥५३॥ इति ।
वाजीकरण का सामर्थ्य, क्षेत्ररूप स्त्री, और किस पुरुष के लिये कैसी
स्त्री उचित है, और अपत्यरहित पुरुषों के दोष, पुत्रवान् पिताओं के गुण,
वीर्य और सन्तानवर्धक १५ प्रयोग इस शरमूलीय पादमें कह दिये हैं ॥५२-५३॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने सप्रयोग-
शरमूलीयो नाम वाजीकरणपादः प्रथमः ।
(द्वितीयः पादः )
अथात आसिक्तक्षीरीयं वाजीकरणपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम 'आसिक्तक्षीरीय' नामक वाजीकरण पाद की व्याख्या करते हैं,
ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥१-२॥
आसिक्तक्षीरमापूर्णमशुष्कं शुद्धषष्टिकम् ।
उदूखले समापोथ्य पीडयेत्क्षीरमर्द्दितम् ॥ ३ ॥
क्षुण्णं विमृदितं क्षीरे पीडयेत्सुसमाहितः ।
गृहीत्वा तं रसं पूतं गव्येन पयसा सह ॥ ४ ॥
बीजानामात्मगुप्ताया धान्यमाषरसेन च ।
बलाया शूर्पपर्ण्योश्च जीवन्त्या जीवकस्य च ॥ ५ ॥
ऋद्धयर्षभककाकोलीश्वदंष्ट्रामधुकस्य च ।
शतावर्या विदार्याश्च द्राक्षाखर्जूरयोरपि ॥ ६ ॥
संयुक्त मात्रया वैद्यः साधयेत्तत्र चावपेत् ।
तुगाक्षीर्याः समाषाणा शालीनां षष्टिकस्य च ॥ ७ ॥
गोधूमानां च चूर्णानि यैः स सान्द्रीभवेद्रसः ।
सान्द्रीभूतं च तं कुर्यात्प्रभूतमधुशर्करम् ॥ ८ ॥
गुडिका बदरैस्तुल्यास्ताश्च सर्पिषि भर्जयेत् ।
ता यथाग्नि प्रयुञ्जानः क्षीरमांसरसाशनः ।

२५६ चरकसंहिता [ अ० २
पश्यत्यपत्यं विपुलं वृद्धोऽप्यात्मजमक्षयम् ॥ ६ ॥
इत्यपत्यकरा षष्टिकादिगुडिका ।
षष्टिकादिगुटिका—शुद्ध साठी के कच्चे चावलों को दूध के अन्दर भिगोवे।
जब ये फूल जायें और गीले हों तब इनको ऊखल में कूटे । जब दरकच हो
जायें तब निचोड़ कर रस निकाल ले । बचे भाग को दूध के साथ फिर कूटे
और फिर रस निकाल लेवे । इस प्रकार से सारा रस निकाल कर इसके रस के
बराबर गाय का दूध तथा कौंच के बीजों का क्वाथ मिलाकर मन्द मन्द आच
पर पकावे । अनन्तर जब यह क्वाथ शुष्क हो जाये तब उड़द के क्वाथ के साथ ,
पकावे । इसके खुश्क होने पर बला क्वाथ, मुद्गपर्णी और माषपर्णी क्वाथ,
जीवन्ती क्वाथ, जीवक क्वाथ, ऋद्धि क्वाथ, काकोली क्वाथ, गान्धुर क्वाथ, मुल-
हठी क्वाथ, शतावरी रस, विदारी रस, द्राक्षा रस, खजूर रस से पाक करे।
अन्तिम पाक के समय वंशलोचन, उड़द का आटा, शालि चावलों का आटा
और गेहूँ का आटा मिलावे जिससे वह कठोर हो जाये। इसमें मधु और शर्करा
पर्याप्त मिलाकर मीठा कर लेवे। इसकी बेर के बराबर गोलिया बनाकर घी में
तल लेवे । इनको अग्नि बल के समान खाकर पीछे से दूध और मास रस का
भोजन करे । इससे वृद्ध भी पुरुष सन्तान और अक्षय वीर्य को पाता है ॥३-६॥
चटकानां सहंसाना दक्षाणां शिखिनां तथा ।
शिशुमारस्य नक्रस्य भिषक् शुक्राणि संहरेत् ॥ १० ॥
गव्यं सर्पिर्वराहस्य कुलिङ्गस्य वसामपि ।
षष्टिकाना च चूर्णानि चूर्णं गोधूमकस्य च ॥ ११ ॥
एभिः पूपलिकाः कार्याः शष्कुल्यो वर्तिकास्तथा ।
पूपा धानाश्च विविधा भक्ष्याश्चान्ये पृथग्विधाः१ ॥ १२ ॥
एषा प्रयोगाद्वृक्ष्याणां स्तब्धेनापूर्णरेतसा ।
शेफसा वाजिवायाति यावदिच्छेदृतु स्त्रियो नरः ॥ १३ ॥
इति वृष्यभक्ष्याः ।
वृष्यभक्ष्य—वैद्य को चाहिये कि चिड़िया, हंस, मुर्गे, मोर, शिशुमार, नक्र
इनके वीर्य को, गाय का घी, सुअर और कुलिंग की वसा (चर्बी) को, साठी
के चावलों का आटा, गेहूँ का आटा एकत्रित करके यथाविधि पूपलिकायें,
१ श्री गगाधर कविराज ने ‘धान्य’ शब्द से धनिया लिया है, परन्तु लोक
में प्रसिद्ध है कि धनिया शुक्र शक्ति को घटा कर नपुंसक बना देता है । इस-
लिये वह नहीं लिया जाता।

पा० २ ] १७ चिकित्सितस्थानम् २५७

पा० २ ] १७ चिकित्सितस्थानम् २५७
शष्कुली, वर्तिका, पूप ( पूप ), धाना तथा अन्य नाना प्रकार क भक्ष्य बनाने
चाहियें १ । इनके प्रयोग से, वीर्य से पूर्ण होकर अत्यन्त ध्वज हर्ष के साथ घोड़े
के समान यथेच्छ स्त्रियों से मैथुन कर सकता है ॥१०-१३॥
आत्मगुप्ताफलं माषान् खर्जूराणि शतावरीम् ।
शृङ्गाटकानि मृद्वीकां साधयेत्प्रसृतोन्मिताम् ॥ १४ ॥
क्षीरप्रस्थ जलप्रस्थमेतत्प्रस्थावशेषितम् ।
शुद्धेन वाससा पूतं योजयेत्प्रसृतैस्त्रिभिः ॥ १५ ॥
शर्करायास्तुगाक्षीर्याः सर्पिषाऽभिनवस्य च ।
तत्पाययेत सक्षौद्रं षष्टिकात्रं च भोजयेत् ॥ १६ ॥
जरापरीतोऽप्यबलो योगेनानेन विन्दति ।
नरोऽपत्यं सुविपुलं युवेव च स हृष्यति ॥ १७ ॥
इत्यपत्यकरः स्वरसः ।
अपत्यकर स्वरस—कौंच के बीज, उड़द, खजूर, शतावर, सिंघाड़े, मुनक्का,
इनमें से प्रत्येक एक २ प्रसृत ( २ पल ), दूध २ प्रस्थ, जल २ प्रस्थ, इनको
धीरे धीरे पका कर दूध मात्र शेष रहने देना चाहिये। जल उड़ जाने पर इनको
वस्त्र में छान लेवे । इसमें खांड, वंशलोचन और ताजा घी मिलित तीन प्रसृत
( ६ पल ) मिला देव । पीछे से मधु मिलाकर इसको पिलावे । पीछे
साठी का चावल खिलावे । इस प्रयोग से बुढ़ापे से पीड़ित निर्बल व्यक्ति
भी अनेक सन्तानों को प्राप्त करता है और युवाओं के समान ध्वज-हर्ष
प्राप्त करता है ॥ १४-१७ ॥
खर्जूरीमस्तकं माषान् पयस्यां सशतावरीम् ।
खर्जूराणि मधूकानि मृद्वीकामजडाफलम् ॥ १८ ॥
पलान्मितानि मतिमान् साधयेत्सलिळाढके।
तेन पादावशेषेण क्षीरप्रस्थं विपाचयेत् ॥ १६ ॥
क्षीरशेषेण तेनाद्याद् घृताढ्यं षष्टिकौदनम् ।
सशर्करेण संयोग एष वृष्यः पर स्मृतः ॥ २० ॥
इति वृष्यक्षीरम् ।
वृष्यक्षीर योग—खजूर वृक्ष का मस्तक, उड़द, पयस्या ( क्षीर विदारी ),
शतावर, खजूर, महुवा, मुनक्का और कौंच के बीज इनमें प्रत्येक एक एक पल
१ शुक्र के अभाव में अण्डों का प्रयोग करना चाहिये । अण्डे न मिलें
तो मास का प्रयोग हो सकता है ।

२५८ चरकसंहिता [ अ० २
लेकर दो आढक जल में पकावे । जब चतुर्थांश शेष रह जाय तब छानकर
इसके द्वारा एक प्रस्थ दूध का पाक करे । जब सब रस उड़ जाये केवल मात्र
दूध शेष रह जाये, तब इस दूध के साथ घी मिश्रित साठी के भात, शक्कर मिल-
कर खावे यह योग अति वृष्य है ॥ १८-२० ॥
जीवकर्षभकौ मेदा जीवन्ती श्रावणीद्वयम् ।
खर्जूरं मधुकं द्राक्षा पिप्पली विश्वभेषजम् ॥ २१ ॥
शृङ्गाटकं विदारी च नवं सर्पिः पयो जलम् ।
सिद्धं घृतावशेषं तच्छर्कराक्षौद्रपादिकम् ॥ २२ ॥
षष्टिकान्नेन संयुक्तमुपयोज्यं यथाबलम् ।
वृष्यं बल्यं च वर्ण्यं च कण्ठ्यं बृहणमुत्तमम् ॥ २३ ॥
इति वृष्यघृतम् ।
वृष्यघृत—जीवक, ऋषभक, मेदा, जीवन्ती, श्रावणी और महाश्रावणी,
खर्जूर, मुलहठी, द्राक्षा, पिप्पली, सोंठ सिंघाड़ा, विदारीकन्द मिलित ८ पल,
ताजा घी २ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ, जल ६ प्रस्थ । यथाविधि घृतपाक करके छान
लेना चाहिये । इसमें शर्करा और शहद ४-४ पल मिलाना चाहिये । इसका
सांठी के चावलों के साथ मिलाकर बलानुसार खाना चाहिये । यह प्रयोग वृष्य,
बलवर्धक, वर्ण्य कण्ठ के लिये हितकारी बृहण ( पुष्टिदायक ) है ॥ २१-२३ ॥
दध्नः शरं शरच्चन्द्रसंनिभं दोषवर्जितम् ।
शर्कराक्षौद्रमरिचैस्त्वगाक्षीर्या च बुद्धिमान् ॥ २४ ॥
युक्त्या युक्तं ससूक्ष्मैलं नवे कुम्भे शुचौ पटे ।
मार्जितं प्रक्षिपेच्छीते घृताढ्ये षष्टिकौदने ॥ २५ ॥
पिबेन्मात्रां रसालायास्त भुक्त्वा षष्टिकौदनम् ।
वर्णस्वरबलोपेतः पुमांस्तेन वृषायते ॥ २६ ॥
इति वृष्यो दधिशरप्रयोगः ।
दधिशर प्रयोग—शरद् ऋतु के चन्द्रमा के समान निर्मल और दोषरहित
दही की मलाई में खाण्ड मधु, मरिच वंशलोचन और छोटी इलायची डाल
कर बुद्धिमान् वैद्य इनको मिट्टी के पात्र में मिला लेवे । फिर इनको शुद्ध बारीक
वस्त्र पर डालकर धीरे २ मथ लेवे । इस प्रकार से छनी दही को घी-बहुल ठण्डे
हुए साठी भात के साथ खाये । पीछे से मात्रा में रसाला पीनी चाहिये । इससे
मनुष्य का वर्ण, स्वर और बल बढाता है तथा शुक्रकी वृद्धि होती है ॥२४-२६॥
चन्द्रांशुकल्पं पयसा घृताढ्यं षष्टिकौदनम् ।

पा० २ ] चिकित्सितस्थानम् २५६

पा० २ ] चिकित्सितस्थानम् २५६
शर्करामधुसंयुक्तं प्रयुञ्जानो वृषायते ॥ २७ ॥
इति वृष्यषष्टिकौदनप्रयोगः ।
षष्टिकौदन प्रयोग—चन्द्रमा की किरणों के समान निर्मल साठी के चावलों
को प्रचुर घी, दूध, शर्करा और मधु के साथ मिलाकर खाने से अत्यधिक
वृषता प्राप्त होती ॥ २७ ॥
तप्ते सर्पिषि नक्राण्डं ताम्रचूडाण्डमिश्रितम् ।
युक्तं षष्टिकचूर्णेन सर्पिषाऽभिनवेन च ॥ २८ ॥
पक्त्वा पूपलिकाः खाद्देद्वारुणीमण्डपो नरः ।
य इच्छेद्दश्ववद्रन्तुं प्रसेक्तुं गजवच्च यः ॥ २९ ॥
इति वृष्यपूपलिकाः ।
वृष्य-पूपलिका—नक्र का अण्डा, मुर्गी का अण्डा, साठी के चावलों का
आटा, ताजा घी इनको मिला कर पूपलिकायें बनानी चाहिये । इनको खाकर
ऊपर से वारुणी का मण्ड ( ऊपर का स्वच्छ भाग ) पीना चाहिये । इससे
अश्व के समान रमण करने की शक्ति और हाथी के समान शुक्र क्षरण का
सामर्थ्य होता है ॥ २९ ॥
भवन्ति चात्र—आसिक्तक्षीरिके पादे ये योगाः परिकीर्तिताः ।
अष्टावपत्यकामैस्ते प्रयोक्तव्याः पौरुषार्थिभिः ॥ ३० ॥
एतैः प्रयोगैर्विविधैर्वृषः पुमान् स्नेहोपपन्नो बलवर्णयुक्तः ।
हर्षान्वितो वाजिवदष्टवर्षो भवेत्समर्थश्च वराङ्गनासु ॥ ३१ ॥
यद्यच्च किञ्चिन्मनसः प्रियं स्याद्रम्या वनान्ताः पुलिनानि शैलाः ।
इष्टाः स्त्रियो भूषणगन्धमाल्य प्रिया वयस्याश्च तदत्र योग्यम् ॥३२॥
इस आसिक्त-क्षीरीय नामक पाद में आठ योग कहते हैं । ये सन्तान के
इच्छुक तथा पौरुष की कामना करने वालों को सेवन करना चाहिये । इन
योगों के प्रयोग करने से मनुष्य सुन्दर शरीर, स्निग्ध वदन, बल, वर्ण से युक्त,
अश्व के समान हर्षयुक्त तथा स्त्रियों में अतिसमर्थ होता है । इन प्रयोगों के
साथ साथ जो भी मन को प्रिय लगे, रम्य वन, नदियों के सुन्दर किनारे,
सुन्दर पर्वत, सुन्दर स्त्रियों, आभूषणों की झकार, मनमोहक सुगन्ध इत्रों की
महक, भीनी महक वाली मालाये, प्रिय मित्र ये सब वस्तुए वाजीकरण में
सहायक होती हैं ॥३०-३२॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने आसिक्तक्षीरीयो
नाम वाजीकरणपादो द्वितीयः ।

२६० चरकसंहिता [ अ० २
( तृतीयः पादः )
अथातो माषपर्णभृतीय वाजीकरणपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'माषपर्णभृतीय' नामक वाजीकरण पाद की व्याख्या करते हैं,
भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
माषपर्णभृतां धेनुं गृष्टिं पुष्टां चतुःस्तनीम् ।
समानवर्णवत्सां च जीवद्वत्सां च बुद्धिमान् ॥ ३ ॥
रोहिणीमथवा कृष्णामूर्ध्वशृङ्गीमदारुणाम् ।
इक्ष्वादामर्जुनादां वा सान्द्रक्षीरा च धारयेत् ॥ ४ ॥
केवलं तु पयस्तस्याः शृतं वाऽशृतमेव वा ।
शर्कराक्षौद्रसर्पिर्भिर्युक्तं तद् वृष्यमुत्तमम् ॥ ५ ॥
जो गाय उड़द के पत्तों पर पाली गई हो, प्रथम बार ही ब्याई हो, चार
चार स्तनों वाली हो, जिसका कि बछड़ा जीता हो, बछड़े का रंग माता के
समान हो, लाल या काले रग क हो, उन्नत ( खड़े ) सींग वाली हो, भयंकर
या मारने वाला न हो, गन्ने के पत्ते या अर्जुन के पत्ते खाती हो, दूध गाढ़ा हो,
बुद्धिमान् व्यक्ति को ऐसी गाय रखनी चाहिये । इस गाय का दूध ही अकेला
चाहे धारोष्ण अवस्था में कच्चा ही अथवा गरम करके शर्करा, मधु तथा घी के
साथ लेने से उत्तम वाजीकरण होता है। [ ये तीन योग हैं--उबला हुआ
दूध, कच्चा दूध और घी आदि से मिला । गाय का भोजन भी तीन प्रकार का है ।
उड़द के पत्ते, गन्ने के पत्ते और अर्जुन के पत्त ] ॥३-५॥
शुक्रलैर्जीवनीयैश्च बृहणैर्बलवर्धनैः ।
क्षीरसर्जननैश्चैव पयः सिद्ध पृथक् पृथक् ॥ ६ ॥
युक्तं गोधूमचूर्णेन सघृतक्षौद्रशर्करम् ।
पर्यायेण प्रयोक्तव्यमिच्छता शुक्रमक्षयम् ॥ ७ ॥
इति वृष्यक्षीरप्रयोगः।
वृष्य क्षीर प्रयोग—सूत्रस्थान के चतुर्थ अध्याय में वर्णित शुक्रवर्धक, जीव-
नीय, बृंहणीय, बल्य और स्तन्यवर्धक इन पाच गणों से पृथक् पृथक् दूध सिद्ध
करे । जब दूध सिद्ध हो जाये तब इसमें गेहूँ का आटा मिला कर घी में भून
ले । इसमें शर्करा भी मिला दे । ठण्डा होने पर शहद मिला कर पृथक् पृथक
प्रयोग करे । प्रथम दिन शुक्रवर्धक गण से सिद्ध, दूसरे दिन जीवनीय गण से,

पा० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६१
तीसरे दिन बृंहणीय गण से, चौथे दिन बल्य गण से और पांचवें दिन स्तन्य-
वर्धक गण से दूध १ को सिद्ध करे । इससे शुक्र की वृद्धि होती है ॥ ६-७ ॥
मेदां पयस्यां जीवन्ती विदारीं कण्टकारिकाम् ।
श्वदंष्ट्रां क्षीरिकां माषान् गोधूमान् शालिषष्टिकान् ॥ ८ ॥
पयस्यधौदके पक्त्वा कार्षिकानाढकोन्मिते ।
विवर्जयेत्पय शेषं तत्पूतं क्षौद्रसर्पिषा ॥ ६ ॥
युक्तं सशर्करं पीत्वा वृद्धः साप्ततिकोऽपि वा ।
विपुलं लभतेऽपत्यं युवेव च स हृष्यति ॥ १० ॥
इत्यपत्यकरक्षीरयोगः ।
अपत्यकर क्षीर योग—मेदा, जीवन्ती, क्षीरविदारी, विदारी, कटेरी, गोखरू,
उड़द, क्षीरिका (दूधी, खिरनी फल या प्लक्ष), गेहूँ, शालिधान्य, साठी के
चावल प्रत्येक १ कर्ष, पानी मिला दूध दो आढक मिला कर क्वाथ करले ।
चतुर्थांश शेष रहने पर छान ले । मेदा आदि को फेंक दे । इस छने क्वाथ में
खाण्ड, घी और ठण्डा होने पर मधु मिला कर पान करे । इसको पीस कर सत्तर
साल का वृद्ध भी युवा के समान प्रबल शक्ति प्राप्ति करता है और बहुत सन्तान
वाला होता है ॥ ८-१० ॥
मण्डलैर्जातरूपस्य तस्या एव पयः शृतम् ।
अपत्यजननं सिद्ध सघृतक्षौद्रशर्करम् ॥ ११ ॥
इत्यपत्यजननक्षीरयोगः ।
माषपर्ण-भृत वाले वृष्य-क्षीर प्रयोग में वर्णित गाय के दूध में सुवर्ण के वर्क
गला कर पकावे । जब दूध गाढ़ा हो जाये तब इसमें घी, शक्कर तथा ठण्ढा
होने पर शहद मिला कर पीवे । यह दूध सन्तानजनक है ॥ ११ ॥
त्रिंशत्सुपिष्टाः पिप्पल्यः प्रकुञ्चे तैलसर्पिषोः ।
भृष्ट्वा सशर्कराक्षौद्रा क्षीरधारावदोहिता ॥ १२ ॥
पीत्वा यथावल चोर्ध्वं षष्टिकं क्षीरसर्पिषा ।
भुक्त्वा न रात्रिमस्तब्ध लिङ्ग पश्यति ना क्षरत् ॥ १३ ॥
इति वृष्यक्षीरयोग ।
अपत्य-जनन क्षीरयोग—खूब बारीक पिसी तीस पिप्पलियो को एक पल तैल
और घी में भून कर शर्करा और मधु में मिला कर दूध दोहने के पात्र मे डाल
१ दूध पाक करन का नियम-द्रव्य से आठ गुणा दूध और दूध से चौगुना
जल मिला कर पकावे । पकाते २ जब केवल दूध मात्र शेष रह जाय तब उता-
रले, यह दूध पाक की रीति है ।

२६२ चरकसंहिता [ अ० २
दे । इसमें पीने योग्य दूध दोह कर पीवे । पीछे से साठी का भात दूध और घी
के साथ खावे । इसके सेवन से रात्रि में पुरुष की इन्द्रिय शिथिल नहीं होती
और वीर्य का क्षय भी नहीं होता ॥ १२-१३ ॥
श्वदंष्ट्राया विदार्याश्च रसे क्षीरचतुर्गुणे ।
घृताढ्यः साधितो वृष्यो माषषष्टिकपायसः ॥ १४ ॥
इति वृष्यपायसप्रयोगः ।
वृष्य-पायस योग—गाय के दूध से चार गुणा गोखरू और विदारीकन्द
का रस पृथक् २ लेकर दूध पाक करे । इस दूध में घी में भुने हुए उड़द तथा
साठी के चावलों को मिलाकर खीर पकावे । यह अतिशय वृष्य है ॥ १४ ॥
फलाना जीवनीयाना स्निग्धाना रुचिकारिणाम् ।
कुडवश्चूर्णिताना स्यात्स्वयंगुप्ताफलस्य च ॥ १५ ॥
कुडवश्चैव माषाणा द्वौ द्वौ च तिलमुद्गयोः ।
गोधूमशालिचूर्णाना कुडवः कुडवो भवेत् ॥ १६ ॥
सर्पिष. कुडवश्चैकस्तत्सर्वं क्षीरसंयुतम् ।
पक्त्वा पूपलिकाः खादेद्बह्वयः स्युर्यस्य योषितः ॥ १७ ॥
इति वृष्यपूपलिकाः ।
वृष्य पूपलिका—जीवनदायक, स्निग्ध एव रुचिकर फलों का चूर्ण १
कुडव, कौंच के बीज १ कुडव, माष १ कुडव, तिल २ कुडव, मूंग दो कुडव,
गेहूँ का आटा १ कुडव, शालिधान्य का आटा १ कुडव, घी एक कुडव,
इनको घी में गूंथकर, घी में भूनकर पूपलिकायें बना लेवे । जिसके घर में बहुत
सी स्त्रिया हों वह इनका सेवन करे । [ फलों में द्राक्षा, खजूर, बादाम, नारियल,
पिस्ता, आम, मीठा अनार लेने चाहिये ] ॥ १५-१७ ॥
घृतं शतावरीगर्भ क्षीर दशगुणे पचेत् ।
शर्करापिप्पलीक्षौद्रयुक्त तद्वृष्यमुत्तमम् ॥ १८ ॥
इति वृष्य शतावरीघृतम् ।
शतावरी घृत—शतावरो के कल्क ( ८ पल ) से दूध ( २० प्रस्थ ) में घी
( २ प्रस्थ ) सिद्ध करे । इसको शर्करा पिप्पली और मधु के साथ प्रयोग करे ।
यह अत्यन्त वृष्य है । [ अष्टाग संग्रह में शतावरी कल्क के साथ २ शतावरी
रस का प्रयोग लिखा है ] ॥ १८ ॥
कर्षं मधुकचूर्णस्य घृतक्षौद्रसमाक्षिकम् ।
प्रयुङ्क्ते यः पयश्चानु नित्यवेगः स ना भवेत् ॥ १९ ॥
इति वृष्यमधुकयोगः ।

पा० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६३

वृष्य मधुक योग—मुलहठी का चूर्ण १ कर्ष, घी और शहद पृथक् २ एक
कर्ष मिलाकर चाटे, पीछे से दूध पी ले । इस प्रयोग से पुरुष का नित्य वेग
रहता है ॥ १६ ॥
घृतक्षीराशनो निर्भीर्निर्व्याधिर्नित्यगो युवा ।
सङ्कल्पप्रवणो नित्यं नरः स्त्रीषु वृषायते ॥ २० ॥
जो व्यक्ति प्रतिदिन घी और दूध का पर्याप्त मात्रा में सेवन करता है, भय
और रोग रहित, नित्य प्रति व्यवाय करनेवाला, सदा रमण की इच्छा रखता
हुआ युवा पुरुष सदा मैथुन करने में समर्थ रहता है ॥ २० ॥
कृतैककृत्याः सिद्धार्था ये चान्योन्यानुवर्तिनः ।
कलासु कुशलास्तुल्याः सत्त्वेन वयसा च ये ॥ २१ ॥
कुलमाहात्म्यदाक्षिण्यशीलशौचसमन्विताः ।
ये कामनित्या ये हृष्टा ये विशोका गतव्यथाः ॥ २२ ॥
ये तुल्यशीला ये भक्ता ये प्रिया ये प्रियंवदाः ।
तैर्नरः सह विश्रब्ध सुवयस्यैर्वृषायते ॥ २३ ॥
एक ही काम करनेवाले, सिद्ध साध्य ( अथवा जिनके मतलब परस्पर
निकलते हैं ), जो एक दूसरे के पीछे चलते हैं एक दूसरे का कहा मानते हैं,
गीत, वादित्र आदि कलाओं मे कुशल, मन और आयु में समान, उत्तम कुल,
बड़प्पन, दाक्षिण्य ( चतुराई ), शील, पवित्रता से युक्त, सदा कामुक, प्रसन्न
चित्त, शोक और पीड़ा से रहित, समान स्वभाव के, परस्पर विश्वासी, प्रिय
( इच्छुक ), मधुर भाषी हों, ऐसे विश्वासपात्र मित्रों के साथ रहने से पुरुष
वीर्य सम्पन्न होता है ॥ २१-२३ ॥
अभ्यङ्गोत्सादनस्नानगन्धमाल्यविभूषणैः ।
गृहशय्यासनसुखैर्वासोभिरहतः प्रियैः ॥ २४ ॥
विहङ्गानां रुतैरिष्टैः स्त्रीणा चाभरणस्वनैः ।
संवाहनवरस्त्रीणामिष्टाना च वृषायते ॥ २५ ॥
अभ्यंग ( मालिश ), उबटन, स्नान, गन्ध, माला, आभूषण, आराम-
वाला घर, कोमल शय्या, सुन्दर आसन, प्रिय नवीन वस्त्र, पक्षियों का कलरव
और वाञ्छित स्त्रियों से, आभूषणों की झकार से, सुन्दर स्त्रियों द्वारा संवाहन
अर्थात् मुठिया भर कर दबाने से पुरुष में वृषता आती है ॥ २४-२५ ॥
मत्तद्विरेफाचरिताः सपद्माः सलिलाशयाः ।
जात्युत्पलसुगन्धीनि शीतगर्भंगृहाणि च ॥ २६ ॥

२६४ चरकसंहिता [ अ० २
नद्यः फेनोत्तरीयाश्च गिरयो नीलसानवः।
उन्नतिर्नीलमेघानां रम्यचन्द्रोदया निशाः ॥ २७ ॥
वायवः सुखसंस्पर्शाः कुमुदाकरगन्धिनः।
रतिभोगक्षमा रात्र्यः संकोचागुरुवल्लभाः ॥ २८ ॥
सुखाः सहायाः परपुष्टघुष्टाः फुल्ला वनान्ता विशदान्नपानाः।
गान्धर्वशब्दाश्च सुगन्धयोगाः सत्त्वं विशालं निरुपद्रवं च ॥ २९ ॥
सिद्धार्थता चाभिनयाश्च कामः स्त्री चायुधं सर्वमिहात्मजस्य।
वयो नवं जातमदश्च कालो हर्षस्य योनिः परमा नराणाम् ॥ ३० ॥
मत्त भ्रमरों से गुञ्जित और कमलों से भरा तालाब, चमेली और कमल
की महक से सुगन्धित शीतल गर्भगृह, तरंगों की टक्करों से उत्पन्न झाग से भरी
नदिया, हरी-भरी चोटी वाले पर्वत, नीलवर्ण के मेघों का आकाश मे मडराना,
सुन्दर चादनी रातें, कुमुदों की महक से तर, स्पर्श में सुखदायक वायु, रतिभोग
के लायक रात्रियों ( बादलों का घिरा होना ), [ यहा पर सब ऋतुओं की दृष्टि
से वर्णन किया है। ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर और वसन्त सबका ही
वर्णन है । ] सकोच ( केशर ) और अगर का लेप लगाये कामिनिया, सुख-
दायक, सहायक, खिले हुए और कोयल की कुहू से गुजित वन, विशद (निर्मल)
अन्नपान, गाना-बजाना ( राग-रागिणिया ), भीनी-भीनी सुगन्ध, शोक चिन्ता
से रहित उदार और उपद्रव रहित मन, कार्य की सफलता, नूतन उठा हुआ
काम और स्त्रियाँ ये कामदेव के अस्त्र हैं । नई उठती हुई जवानी, मस्त करने
वाला वसन्त का समय जिसमें मद उत्पन्न होता है, ये सब वस्तुएँ पुरुषों मे
हर्ष को उत्पन्न करने वाली हैं । इन भावों से काम उद्दीप्त होता है ॥२६-३०॥
तत्र श्लोकः-प्रहर्षयोनयो योगा व्याख्याता दश पञ्च च।
माषपर्णभृतीयेऽस्मिन् पादे शुक्रबलप्रदाः ॥ ३१ ॥
उपसंहार—इस माषपर्णीय वाजीकरण तृतीय पाद में प्रहर्ष के कारण तथा
शुक्र और बल को बढ़ाने वाले पन्द्रह प्रयोग कहे हैं ॥३१॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सितस्थाने माषपर्णभृतीयो
नाम वाजीकरणपादस्तृतीयः ।
( चतुर्थः पादः )
अथातः पुमाञ्जातबलादिकं चतुर्थं वाजीकरणपादं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥

पा० ४ ] चिकित्सितस्थानम् २६५
इसके आगे 'पुमान्-जात-बलादिक' नामक चतुर्थ वाजीकरण पाद की
व्याख्या करते हैं । भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥१-२॥
पुमान् यथा जातबलो यावदिच्छं स्त्रियो व्रजेत् ।
यथा चापत्यवान् सद्यो भवेत्तदुपदेक्ष्यते ॥ ३ ॥
न हि जातबलाः सर्वे नराश्चापत्यभागिनः ।
बृहच्छरीरा बलिनः सन्ति नारीषु दुर्बलाः ॥ ४ ॥
सन्ति चाल्पबलाः स्त्रीषु बलवन्तो बहुप्रजाः ।
प्रकृत्या चाबलाः सन्ति सन्ति चामयदुर्बलाः ॥ ५ ॥
नराश्चटकवत्केचिद् व्रजन्ति बहुशः स्त्रियम् ।
गजवच्च प्रसिञ्चन्ति केचिच्च बहुगामिन ॥ ६ ॥
कालयोगबलाः केचित्केचिदभ्यसनध्रुवाः ।
केचित्प्रयत्नैर्वाह्यन्ते वृषाः केचित्स्वभावतः ॥ ७ ॥
तस्मात्प्रयोगान्वक्ष्यामो दुर्बलानां बलप्रदान् ।
सुखोपभोगान् बलिना भूयश्च बलवर्धनान् ॥ ८ ॥
पुरुष जिस प्रकार से यथेष्ट स्त्रियों मे रमण कर सकता है और जिस प्रकार
से सन्तानवान् हो सकता है, उसका विस्तार से वर्णन करते हैं—संसार में
यह आवश्यक नहीं कि जितने भी बलवान् व्यक्ति हैं, वे सब सन्तान वाले
हों । ऐसे भी बहुत से पुरुष हैं जो बलवान् और पूरे डीलडौल के हैं,
परन्तु स्त्रियों के विषय में कमजोर होते हैं। दूसरे पुरुष शरीर रचना में निर्बल
हैं, परन्तु स्त्रियों में बलवान् हैं। इनमें कुछ तो प्रकृति से ही निर्बल होते हैं
और कुछ रोग आदि से कमजोर हो जाते हैं। कई व्यक्ति तो चिड़ों के समान
बहुत बार (लगातार जल्दी जल्दी) स्त्रियों से मैथुन करते हैं और कई
व्यक्ति गज के तुल्य कभी कभी मैथुन करते हैं, वे बहुत बार मैथुन नही
करते । जब कभी सहवास करते हैं तो हाथी के समान वे बड़ी मात्रा मे, अधिक
शुक्र बहाते हैं। कई व्यक्ति विशेष समय में ही बलवान् होते हैं, और कई बार
बार अभ्यास (मैथुन करने) से समर्थ हो जाते है। कई व्यक्ति चुम्बन,
आलिंगन आदि प्रयत्नों से बल प्राप्त करते हैं और कई स्वभाव से ही बलशाली,
वीर्यसेचन में समर्थ होते हैं१ । इसलिये दुर्बलों के लिये बलप्रद और बली पुरुषों
के बल को बढानेवाले ओर उपभोग मे सुखकर वृष्य प्रयोगोका वर्णन करते हैं ।
१ शुक्र के प्रवाह को नियमित करनेवाले दो केन्द्र हैं। एक मस्तिष्क मे
और दूसरा मेरुदण्ड में । प्रथम केन्द्र का सम्बन्ध प्रायः विचारों के साथ और

२६६ चरकसंहिता [ अ० २
पूर्वं शुद्धशरीराणां¹ निरूहान् सानुवासनान्।
बलापेक्षां प्रयुञ्जीत शुक्रापत्यविवर्धनान् ॥ ९ ॥
घृततैलरसक्षीरशर्करामधुसंयुताः ।
बस्तयः संविधातव्याः क्षीरमांसरसाशिनाम् ॥ १० ॥
इति वृष्या बस्तयः ।
इसके लिये सब से प्रथम शुद्ध और स्वस्थ पुरुष को बल के अनुसार
शुक्र और सन्तानवर्धक निरूह तथा अनुवासनबस्ति देनी चाहिये । दूध और
मास रस का आहार करनेवाले व्यक्ति के लिये घी, तैल, मास रस, दूध, शर्करा
और शहद इनसे युक्त बस्तिया दोषानुसार देनी चाहियें । [ अष्टाग-संग्रह मे
विस्तार से बस्तिया दी हैं। चरक में सिद्धिकल्प में बस्तियों का वर्णन है] ॥९-१०॥
पिष्ट्वा वराहमांसानि दत्त्वा मरिचसैन्धवे ।
कोलवद् गुडिकाः कृत्वा तप्ते सर्पिषि भर्जयेत्² ॥ ११ ॥
³भर्जेन स्तम्भितातस्ताश्च प्रक्षेप्याः कौक्कुटे रसे ।
घृताढ्ये गन्धपिशुने दधिदाडिमसाधिते ॥ १२ ॥
यथा न भिन्द्याद् गुडिकास्तथा तं साधयेद्रसम् ।
तं पिबन् भक्षयंस्ताश्च लभते शुक्रमक्षयम् ॥ १३ ॥
मासानामेवमन्येषां मेध्यानां कारयेद्भिषक् ।
गुडिकाः सरसास्तासा प्रयोगः शुक्रवर्धनः ॥ १४ ॥
इति वृष्या मांसगुडिकाः ।
मांसगुडिका—सुअर के मास को पीस कर इसमें मरिच और सैन्धा
नमक मिला कर बेर के समान गोलिया बना लेवे । इनको गरम घी में भून ले ।
भूनने पर जब कठोर हो जायें तब इनको मुर्गे के मास रस मे डुबो दे । इसमे
दूसरे का क्रिया के साथ ह । परन्तु एक केन्द्र के उत्तेजित होने पर दूसरा
केन्द्र स्वय उत्तेजित हो जाता है। इसलिये शुक्र क्षरण में वीर्य की मात्रा एक ही
व्यक्ति में समय भेद से भिन्न २ होती है। वैसे तो सब मनुष्यों में मात्रा भेद
रहता है। कोई २४ रत्ती, कोई ६० बूंद, कोई १० से १५ ग्राम मानता है।
देखने में बलवान् पुरुष नपुसक न हो, यह कोई नियम नहीं है। कुश्ती,
बैठक, दण्ड खास कर बचपन से करने वाले व्यक्ति प्रायः नपुसक होते हैं।
स्त्रीसहवास में विशेष रूप से वे जल्दी क्षरित हो जाते हैं ।
१ 'पूर्व सुस्थशरीराणा' इति च पाठः ।
२ 'वर्त्तयेत्' इति च पाठ । ३ 'वर्त्तन' इति च पाठः ।

पा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २६७

पा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २६७
प्रचुर घी, इलायची, केशर, कर्पूर आदि का गन्ध, दही और अनार रस मिला
कर इस प्रकार से पकावे जिसमे कि गुटिकायें टूटे नही । इन गुटिकाओं को
खाने से तथा मास रस को पीने से शुक्र की वृद्धि होती है। इसी प्रकार से
अन्य मेध्य (मेदुर या भक्ष्य) मासों को, गुटिकाओं को मास रस में विद्ध
करके प्रयोग करने से वीर्य की वृद्धि होती है ॥११-१४॥
माषानङ्कुरिताञ्छुद्धांन्निस्तुषान् साञ्जडाफलान् ।
घृताढ्ये माहिषरसे दधिदाडिमसारिके ॥ १५ ॥
प्रक्षिपेन्मात्रया युक्तान् धान्यजीरकनागरैः ।
भुक्त पीतश्च स रसः कुरुते शुक्रमक्षयम् ॥ १६ ॥
इति वृष्यो माहिषरसः ।
माहिष रस-उड़दों को जड़ाकर अंकुरित कर ले। इनको धोकर छिलके
उतार दे। इसी प्रकार से कौंच के फलों का भी छिलका उतार दे। इनको प्रचुर
घी, भैंसे का मांस रस, दही और अनार के रस के साथ पकावे । पकते समय
इसमें परिमाण से धनिया, जीरा और सोंठ मिला दे। इनको खाने तथा पीने
से शुक्र अत्यन्त बढ़ता है ॥ १६ ॥
आर्द्राणि मत्स्यमांसानि भृष्टांश्च शफरींश्च वा ।
तप्ते सर्पिषि यः खादेत्स गच्छेत्स्त्रीषु न क्षयम् ॥ १७ ॥
इति वृष्यघृतभृष्टमत्स्यमांसानि ।
मछलियों (खासकर रोहित) का ताज़ा मास और शफरी मछली को घी
में भून कर खाने से संभोग के समय शुक्र क्षरित नहीं होता ॥१७॥
घृतभृष्टान् रसे छागे रोहितान् फलसारिके ।
अनुपीतरसान् सिद्धानपत्यार्थी प्रयोजयेत् ॥ १८ ॥
इति गर्भाधानकरा योगः ।
सन्तान को चाहने वाले व्यक्ति रोहित (रोहू) मछली को घी में भूनकर
बकरे के मास रस में डालकर अनार के रस के साथ पकाकर इनको खाये तथा
मास रस पीये ॥ १८ ॥
कुट्टकं मत्स्यमांसानां हिङ्गुसैन्धवधान्यकैः ।
युक्तं गोधूमचूर्णेन घृते पूपलिकाः पचेत् ॥ १६ ॥
पूपलिका योग-मछलियों के मास को कूटकर इसमें हींग, सैन्धानमक,
धनिया मिलाकर गेहूँ के आटे में सान घी मे पूपलिकायें (कचौरिया) पकावे ।
अथवा गेहूँ के आटे में मछलियों के मास का कीमा भरकर कचौरी की
तरह पकावे ॥ १६ ॥

माषपूपलिकानां तद् गर्भार्थमुपकल्पयेत् ॥ २१ ॥

२६८ चरकसंहिता [ अ० २
~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~ ~

माहिषे च रसे मत्स्यान् स्निग्धाम्ललवणान् पचेत् ।
रसे चानुगते मांसं पोथयेत्तत्र चावपेत् ॥ २० ॥
मरिचं जीरकं धान्यमल्पं हिङ्गु नवं घृतम् ।
माषपूपलिकानां तद् गर्भार्थमुपकल्पयेत् ॥ २१ ॥
एतौ पूपलिकायोगौ बृंहणौ बलवर्धनौ ।
हर्षसौभाग्यजननौ परं शुक्राभिवर्धनौ ॥ २२ ॥
इति वृष्यौ पूपलिकायोगौ ।
मछलियों के मास को घी, अनार का रस और सैन्धानमक के साथ भैंस
के मास रस में पकाना चाहिये। जब मास रस शुष्क हो जाये तब मास को कूट
कर इसमें मरिच, जीरा, धनिया, थोड़ा सा हींग और ताज़ा घी मिलाना चाहिये ।
अब उड़द के आटे में इसको पिठ्ठी के रूप में भरकर घी में तल लेवे। ये दोनो
प्रकार की पूपलिकायें बृंहण (पुष्टिदायक) बलवर्द्धक, प्रहर्ष और सौभाग्य को
उत्पन्न करनेवाली तथा शुक्रवर्द्धक हैं ॥ २०-२२ ॥
माषात्मगुप्तागोधूमशालिषष्टिकपौष्टिकम् ।
शर्कराया विदार्याश्च चूर्णमिक्षुरकस्य च ॥ २३ ॥
संयोज्य मसृणे क्षीरे घृते पूपलिकाः पचेत् ।
पयोऽनुपानास्ताः शीघ्रं कुर्वन्ति वृषतां परम् ॥ २४ ॥
इति वृष्या माषादिपूपलिकाः ।
माषादि पूपलिका-उड़द, कौंच, गेहूँ, शाली चावल, साठी चावल, इन
सब का आटा, शर्करा, विदारीकन्द का चूर्ण, तालमखाने का चूर्ण, इनको दूध
के साथ गूधकर घी में तल लेवे। इनको खाकर ऊपर से दूध पीले। ये
अत्यन्त शुक्रवर्धक हैं ॥ २३-२४ ॥
शर्करायास्तुलाका स्यादेका गव्यस्य सर्पिषः ।
प्रस्थो विदार्याश्चूर्णस्य पिप्पल्याः प्रस्थ एव च ॥ २५ ॥
अर्घाढकं तुगाक्षीर्याः क्षौद्रस्याभिनवस्य च ।
तत्सर्वं मूच्छितं तिष्ठेन्मृत्तिके घृतभाजने ॥ २६ ॥
मात्रामग्निसमां तस्य प्रातः प्रातः प्रयोजयेत् ।
एष वृष्य. परं योगो बल्यो बृंहण एव च ॥ २७ ॥
इति वृष्ययोगः ।
वृष्य योग-खाण्ड १ तुला (१०० पल), गाय का घी १ तुला, विदारी-
कन्द का चूर्ण १ प्रस्थ, पिप्पली एक प्रस्थ, वंशलोचन आधा आढक, ताजा

पा० ४] चिकित्त्सितस्थानम् २६६

पा० ४] चिकित्त्सितस्थानम् २६६
मधु १ आढक, इन सबको घी से भावित मिट्टी के पात्र में डालकर रखे । इसकी
अग्नि-बल के अनुसार मात्रा प्रतिदिन प्रातःकाल खावे । यह योग अत्यन्त वृष्य
बल्य एव बृहण है ॥ २७ ॥
शतावर्या विदार्याश्च तथा माषात्मगुप्तयोः ।
श्वदंष्ट्रायाश्च निष्क्वाथान् जलेषु च पृथक् पृथक् ॥ २८ ॥
साधयित्वा घृतप्रस्थं पयस्यष्टगुणे पुनः।
शर्करामधुसंयुक्तमपत्यार्थी प्रयोजयेत् ॥ २९ ॥
इत्यपत्यकरं घृतम्।
अपत्यकर घृत—शतावरी, विदारीकन्द, कौंच, उड़द, गोखरू इनका पृथक्
पृथक् क्वाथ बनावे । इन सब क्वाथों से एव आठ प्रस्थ ( परिभाषा के अनुसार
द्विगुण १६ प्रस्थ) दूध के साथ एक प्रस्थ घी पकावे । इस घी को शर्करा और
मधु के साथ मिला कर संतानाथीं पुरुष खावे ॥ २८-२९ ॥
घृतपात्रं शतगुणे विदारीस्वरसे पचेत् ।
सिद्धं पुनः शतगुणे गव्ये पयसि साधयेत् ॥ ३० ॥
शर्करायास्तुगाक्षीर्याः क्षौद्रस्येक्षुरसस्य च ।
पिप्पल्याः साजडायाश्च भागैः पादाशिकैर्युतम् ॥ ३१ ॥
गुडिकाः कारयेद्वैद्यो यथा स्थूलमुदुम्बरम् ।
तासा प्रयोगात्पुरुषः कुलिङ्ग इव हृष्यति ॥ ३२ ॥
इति वृष्यगुटिकाः।
वृष्य गुटिका—गाय के ८ प्रस्थ घी को ८०० प्रस्थ विदारीकन्द के रस में
सिद्ध करे । इस सिद्ध घी को ८०० प्रस्थ गाय के दूध में पकावे । इस प्रकार से
सिद्ध घी में खाड, वंसलोचन, शहद, गन्ने का रस, पिप्पली, कौंच ये घी से चतु-
र्थाश मिलावे । इसकी मोटे गूलर के समान गोलिया बना कर प्रयोग करे ।
इसके प्रयोग से पुरुष कुलिंग की भाति हर्षयुक्त होता है । [ यहा पर यदि प्रक्षेप
द्रव्य प्रत्येक चतुर्थांश लिया जाये तो गोलिया आराम से बन जायेंगी । ] ॥३०-३२॥
सितोपलापलशतं तदर्धं नवसर्पिषः ।
क्षौद्रपादेन संयुक्त साध्येज्जलपादिकम् ॥ ३३ ॥
सान्द्र गोधूमचूर्णाना पाद् स्तीर्णे शिलातले ।
शुचौ श्लक्ष्णे समुत्कीर्य मर्दनेनापपादयेत् ॥ ३४ ॥
शुद्धा उत्कारिका कार्याश्चन्द्रमण्डलसन्निभाः ।
तासां प्रयोगाद् गजबन्नारीः संतर्पयेन्नरः ॥ ३५ ॥
इति वृष्योत्कारिका।

२७० चरकसंहिता । अ० २
॰ वृष्योत्कारिका—मिसरी १०० पल, ताज़ा घी ५० पल, मधु २० पल, जल
२५ पल इनको यथाविधि मिलावे। पहिले पानी और मिश्री से चास पका कर
घी डाले, ठण्डा होने पर मधु मिलावे। इसमें गेहूँ का आटा २५ पल मिला
कर मथे। अब इसको साफ़ चिकनी शिला पर फैला कर उत्कारिकायें बनावे।
ये उत्कारिकायें चन्द्रमा के मण्डल के समान गोल हों। इनके प्रयोग से पुरुष
हाथी के समान स्त्रियों को तृप्त करता है ॥ ३३-३५ ॥
यत्किञ्चिन्मधुरं स्निग्धं जीवनं बृंहणं गुरु।
हर्षणं मनसश्चैव सर्वं तद्वृष्यमुच्यते ॥ ३६ ॥
द्रव्यैरेवंविधैस्तस्माद्भावितः प्रमदा व्रजेत्।
आत्मवेगेन चोदीर्णः स्त्रीगुणैश्च प्रहर्षितः ॥ ३७ ॥
गत्वा स्नात्वा पयः पीत्वा रस चानुशयीत ना।
यथाऽऽप्याय्यते भूयः शुक्रं च बलमेव च ॥ ३८ ॥
यथा मुकुलपुष्पस्य सुगन्धो नोपलभ्यते।
लभ्यते तद्विकाशात्तु तथा शुक्रं हि देहिनाम् ॥ ३६ ॥
नर्ते वै षोडशाद्वर्षात्सप्तत्या परता न च।
आयुष्कामो नरः स्त्रीभिः संयोगं कर्तुमर्हति ॥ ४० ॥
अतिबालो ह्यसम्पूर्णसर्वधातु स्त्रियो व्रजन्।
उपनश्येत सहसा तडागमिव काजलम् ॥ ४१ ॥
शुष्कं रूक्षं यथा काष्ठ जन्तुजग्ध विजर्जरम्।
स्पृष्टमाशु विशीर्येत तथा वृद्धः स्त्रियो व्रजन् ॥ ४२ ॥
वृष्य का लक्षण—जो कोई भी वृष्य मधुर, स्निग्ध, जीवनदायक, पौष्टिक,
गुरु, मन में हर्ष उत्पन्न करता है, वह सब वृष्यगुण वाले हैं। अतः वृष्य द्रव्यों
के सेवन से, अपने बल तथा कामवेग से प्रेरित, स्त्री के रूप, हाव, भाव आदि
गुणों से आकर्षित होकर मैथुन करे। मैथुन के पीछे स्नान करके, दूध या
मांसरस को पीकर सो जाने से ह्रास हुआ शुक्र और बल पुनः प्राप्त हो जाता
है। जिस प्रकार कि फूल के डोडे में गन्ध का पता नहीं चलता, परन्तु फूल के
खिलने पर गन्ध स्पष्ट हो जाती है, इसी प्रकार बाल्यावस्था में शुक्र प्रकट नहीं
होता। परन्तु यौवनावस्था में शुक्र प्रकट हो जाता है१। जो पुरुष दीर्घ आयु


१ बारह वर्ष तक अष्ठीला ग्रन्थि तथा शिश्न के अन्दर की ग्रन्थियों का
रस आता है जो कि देखने में प्रायः वीर्य से मिलता है। इसमें न तो शुक्राणु
होते ह आर न वह सन्तानोत्पत्ति ही कर सकता है।

पा० ४] चिकित्सितस्थानम् २७१

पा० ४] चिकित्सितस्थानम् २७१
~ ~ ~
चाहता हो वह सोलह वर्ष से पूर्व और सत्तर साल के पीछे स्त्री के साथ सहवास
न करे। क्योंकि सोलह वर्ष से पूर्व छोटी अवस्था में धातुओं के असम्पूर्ण,
कच्ची अवस्था में होने से सम्भोग करने पर थोडे पानी वाले तालाब की भाँति
सूख जाता है, क्षीण हो जाता है। जिस प्रकार से थोड़े पानी वाला तालाब
ज़रा सी गरमी से खुश्क हो जाता है, इसी प्रकार थोड़े से ही शुक्र क्षय से पुरुष
भी क्षीण हो जाता है और यदि सत्तर वर्ष की आयु का वृद्ध पुरुष स्त्री-सहवास
करता है, तो वह सूखा, रूखा (स्नेह रहित), जिस प्रकार कि सूखी, जर्जरित
घूण से खाई लकड़ी छूने से गिर जाती है, इसी प्रकार वह वृद्ध पुरुष भी
सहवास के झटके को सह नहीं सकता, गिर पडता है ॥ ४०-४२ ॥
जरया चिन्तया शुक्र व्याधिभिः कर्मकर्षणात् ।
क्षयं गच्छत्यनशनात्स्त्रीणा चातिनिषेवणात् ॥ ४३ ॥
निम्न कारणों से शुक्र का क्षय होता है—बुढापे से, चिन्ता से, रोगों से,
अति शारीरिक या मानसिक श्रम से, भोजन न करने से और स्त्रियों के अति
सेवन से शुक्र क्षय होता है ॥ ४३ ॥
क्षयाद्भयादविश्रम्भाच्छाकात्स्त्रीदोषदर्शनात् ।
नारीणामरसज्ञत्वादभिचागादसेवनात् ॥ ४४ ॥
तृप्तस्यापि स्त्रियो गन्तु न शक्तुरुपजायते ।
देहसत्त्वबलापेक्षी हर्षः शक्तिश्च हर्षजा ॥ ४५ ॥
रस इक्षौ यथा दध्नि सर्पिस्तैलं तिले यथा ।
सर्वत्रानुगतं देहे शुक्रं संस्पर्शने तथा ॥ ४६ ॥
तत्स्त्रीपुरुषसंयोगे चेष्टासंकल्पपीडनात् ।
शुक्र प्रच्यवते स्थानाज्जलमार्द्रात्पटादिव ॥ ४७ ॥
निम्न अवस्थाओं में शुक्र प्रवृत्त नहीं होता—धातुओं के (विशेष रूप से
शुक्र के) क्षय से, भय से, विश्वास (निश्चिन्तता) न होने से, शोक से, स्त्री
में दोष देखने से, स्त्रियों के फूहड़ (अरसज्ञ) होने से, सकल्प अर्थात् मनोयोग
न होने से, सहवास न करने से, मैथुन से तृप्त होने से, शुक्र उत्पन्न नहीं होता।
हर्ष (उत्तेजना) शरीर और मन तथा बल की अपेक्षा रखती है। शक्ति (मैथुन,
सामर्थ्य) हर्ष से उत्पन्न होती है। जिस प्रकार कि रस सम्पूर्ण गन्ने में रहता
है, घी सम्पूर्ण दही के कण कण में व्याप्त है, तैल तिल के अणु अणु में भरा
होता है, इसी प्रकार से शुक्र भी शरीर की त्वक्-इन्द्रिय में, स्पर्शज्ञान-युक्त
स्थानों में रहता है, वह सर्वत्र व्याप्त है।

२७२ चरकसंहिता [ अ० २
शुक्र नहीं है। परन्तु जब इनकी वृद्धि और ह्रास होता है तो शुक्र का होना
भी निश्चित है। शरीर का कोई भी अङ्ग ऐसा नहीं जहा वीर्य न हो ] । यह
शुक्र स्त्री और पुरुष के सयोग होने पर, चेष्टा, सकल्प तथा परस्पर पीड़न
( सम्मूर्छन, दबाने ) के कारण अपने वास्तविक स्थान से पृथक् होकर झरने
लगता है, जिस प्रकार कि गीले कपड़े से पानी टपकने लगता है ॥४४-४७॥
हर्षात्तर्षात्सरत्वाच्च पैच्छिल्याद् गौरवादपि ।
अणुप्रवणभावाच्च द्रुतत्वान्मारुतस्य च ॥ ४८ ॥
अष्टाभ्य एभ्यो हेतुभ्यः शुक्रं देहात्प्रसिच्यते ।
निम्न आठ कारणों से शुक्र सम्पूर्ण शरीर से मथा जाकर प्रवृत्त होता है ।
हर्ष से, तर्ष ( उपभोग की इच्छा ) से, सर गुण होने से ( बहने का स्वभाव
होने से ), पिच्छिल ( चिकना ) होने से, गौरव ( गुरु ) होने से, अणु (सूक्ष्म)
होने से, प्रवण ( बाहर निकलने का स्वभाव होने से ),१ वायु के शीघ्रगामी होने
से वीर्य बाहर आता है२ ॥ ४८- ॥
१. कावराज गगाधर सन ने 'हृषात्सरत्वासोक्ष्म्याच्च' यह पाठ दिया है।
इसी प्रकार 'अणु-प्रवण-भावाच्च' के स्थान पर 'अनुप्लवनभावाच्च' यह पाठ
पढ़ा है। 'अनुप्लवन' का अर्थ शिश्न को मास पेशियों का रह रह कर संकोच
होना बताया है। इन सकोचों के कारण वीर्य झटकों के साथ बाहर आता है।
वीर्य का क्षरण वात पर निर्भर है। यह केन्द्र मस्तिष्क और मेरुदण्ड में है।
“सुप्रसन्न मनस्तत्र हर्षणे हेतुरुच्यते ।” सुश्रुत
२. साधारणत. जब कामेच्छा उत्पन्न होती है उस समय शरीर के अवयवों
में परिवर्त्तन आरम्भ हो जाता है। यह परिवर्त्तन मुख्य रूप से श्वास का तेज
होना, गालों में लालिमा का दौड़ना, किसी काम में दिल न लगना, शिश्न में
हर्ष, छाती में कम्पन होता है। इस अवस्था में रक्तसचार में भी अन्तर आ
जाता है। रक्तसचार की गति बढ जाती है। इतना ही नही, रक्त के अन्दर
स्वय परिवर्त्तन आ जाता है। इसका प्रभाव माता के दूध पर भी पड़ जाता
है। कामेच्छा के समय पिलाया दूध शिशु को हानि करता है। इन परिवर्त्तनों
के कारण पुरुष के अण्ड अपना अन्तः स्राव को उत्पन्न करने का कार्य बन्द
करके, बहिःस्राव पैदा करने लगते हैं। इस वीर्य के गाढ़ा होने के कारण यह
शिश्न तक पहुँच जाये इसलिये इसमें पौरुष ग्रन्थि तथा शिश्न में मूत्र मार्ग की
दिवारों मे रहने वाली ग्रन्थिया अपना अपना रस मिला देती हैं। यदि यह रस
बहुत मिल जाये तो वीर्य पतला हो जाता है।