चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 275, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंपा० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६१
तीसरे दिन बृंहणीय गण से, चौथे दिन बल्य गण से और पांचवें दिन स्तन्य-
वर्धक गण से दूध १ को सिद्ध करे । इससे शुक्र की वृद्धि होती है ॥ ६-७ ॥
मेदां पयस्यां जीवन्ती विदारीं कण्टकारिकाम् ।
श्वदंष्ट्रां क्षीरिकां माषान् गोधूमान् शालिषष्टिकान् ॥ ८ ॥
पयस्यधौदके पक्त्वा कार्षिकानाढकोन्मिते ।
विवर्जयेत्पय शेषं तत्पूतं क्षौद्रसर्पिषा ॥ ६ ॥
युक्तं सशर्करं पीत्वा वृद्धः साप्ततिकोऽपि वा ।
विपुलं लभतेऽपत्यं युवेव च स हृष्यति ॥ १० ॥
इत्यपत्यकरक्षीरयोगः ।
अपत्यकर क्षीर योग—मेदा, जीवन्ती, क्षीरविदारी, विदारी, कटेरी, गोखरू,
उड़द, क्षीरिका (दूधी, खिरनी फल या प्लक्ष), गेहूँ, शालिधान्य, साठी के
चावल प्रत्येक १ कर्ष, पानी मिला दूध दो आढक मिला कर क्वाथ करले ।
चतुर्थांश शेष रहने पर छान ले । मेदा आदि को फेंक दे । इस छने क्वाथ में
खाण्ड, घी और ठण्डा होने पर मधु मिला कर पान करे । इसको पीस कर सत्तर
साल का वृद्ध भी युवा के समान प्रबल शक्ति प्राप्ति करता है और बहुत सन्तान
वाला होता है ॥ ८-१० ॥
मण्डलैर्जातरूपस्य तस्या एव पयः शृतम् ।
अपत्यजननं सिद्ध सघृतक्षौद्रशर्करम् ॥ ११ ॥
इत्यपत्यजननक्षीरयोगः ।
माषपर्ण-भृत वाले वृष्य-क्षीर प्रयोग में वर्णित गाय के दूध में सुवर्ण के वर्क
गला कर पकावे । जब दूध गाढ़ा हो जाये तब इसमें घी, शक्कर तथा ठण्ढा
होने पर शहद मिला कर पीवे । यह दूध सन्तानजनक है ॥ ११ ॥
त्रिंशत्सुपिष्टाः पिप्पल्यः प्रकुञ्चे तैलसर्पिषोः ।
भृष्ट्वा सशर्कराक्षौद्रा क्षीरधारावदोहिता ॥ १२ ॥
पीत्वा यथावल चोर्ध्वं षष्टिकं क्षीरसर्पिषा ।
भुक्त्वा न रात्रिमस्तब्ध लिङ्ग पश्यति ना क्षरत् ॥ १३ ॥
इति वृष्यक्षीरयोग ।
अपत्य-जनन क्षीरयोग—खूब बारीक पिसी तीस पिप्पलियो को एक पल तैल
और घी में भून कर शर्करा और मधु में मिला कर दूध दोहने के पात्र मे डाल
१ दूध पाक करन का नियम-द्रव्य से आठ गुणा दूध और दूध से चौगुना
जल मिला कर पकावे । पकाते २ जब केवल दूध मात्र शेष रह जाय तब उता-
रले, यह दूध पाक की रीति है ।