चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 267, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंपा० १ । चिकित्सितस्थानम् २५३
शिखितित्तिरिहंसानामेवं पिण्डरसो मतः ।
इति बीजीकरणपिण्डरसाः ।
वाजीकरण पिण्डरस—खाड, उड़द की दाल, वंशलोचन, दूध, घी ओर
गेहू का आटा इनको उचित परिणाम में लेकर उत्कारिका बना कर घी में तल
लेवे । इसको बहुत न पकाये । पीछे हाथों में मल कर मुर्गे के गरम मासरस में
डाल देवे । इसमें शर्करा, इलायची, केशर आदि सुगन्ध भी डाल देवे, इससे
रस गाढ़ा हो जायेगा । यह पिण्डरस शुक्रवधक, पौष्टिक और बलवर्धक है ।
इसके प्रयोग से पुरुष में घोड़े के समान मैथुन शक्ति आती है । इसी प्रकार से
मोर, तीतर और हंसों के मास रस से भी पिण्ड रस बनते हैं । इनके गुण भी
इसी प्रकार से हैं ॥ ३६-४१ ॥
घृतं माषान् सबस्ताण्डान् साधयेन्माहिषे रसे ।
भर्जयेत्त रस पूतं फलाम्लं नवसर्पिषि । ४२ ॥
ईषत्सलवण युक्त धान्यजीरकनागरैः ।
एष वृष्यश्च बल्यश्च बृंहणश्च रसोत्तमः ॥ ४३ ॥
इति वृष्यमाहिषरसः ।
घी, माष ( उड़द ) और बस्ताण्ड ( बकरे के अण्डकोषों ) को भैंस के
मांस रस मे सिद्ध करना चाहिये । इस रस को छान कर नये घी में भूनना
चाहिये । इसको अनार, आंवला आदि फलों के रस से खट्टा करना चाहिये ।
इसमें थोड़ा सा नमक, धनिया, जीरा और सोंठ भी मिला देनी चाहिये । यह
रस वृष्यकारक, बलवर्धक और बृंहण है ॥ ४२-४३ ॥
चटकांस्तित्तिरिरसे तित्तिरीन् कौक्कुटे रसे ।
कुक्कुटान् बार्हिणरसे हांसे बार्हिणमेव च । ४४ ॥
नवसर्पिषि संतप्तान् फलाम्लान् कारयेद्रसान् ।
मधुरान्वा यथासात्म्यं गन्धाढ्यान् बलवर्धनान् ॥ ४५ ॥
इति वृष्यरसाः ।
वृष्य रस--चिड़ियों को तित्तिर के रस में, तीतरों को मुर्गे के रस में, मुर्गों
को मोर के रस में, मोरों को हंसों के मास रस में सिद्ध करना चाहिये । इन चारों
रसों को ताजे घी में भून कर अनार के रस से खट्टा करके अथवा मधुर रूप में
सेवन करना चाहिये । सेवन करने के पूर्व इलायची, केशर आदि से सुगन्धित
कर लेना आवश्यक है । यह रस बलवर्धक है ॥ ४४-४५ ॥
चटकमांसानां गत्वा योऽनुपिबेत्पयः ।