चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 270, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें२५६ चरकसंहिता [ अ० २
पश्यत्यपत्यं विपुलं वृद्धोऽप्यात्मजमक्षयम् ॥ ६ ॥
इत्यपत्यकरा षष्टिकादिगुडिका ।
षष्टिकादिगुटिका—शुद्ध साठी के कच्चे चावलों को दूध के अन्दर भिगोवे।
जब ये फूल जायें और गीले हों तब इनको ऊखल में कूटे । जब दरकच हो
जायें तब निचोड़ कर रस निकाल ले । बचे भाग को दूध के साथ फिर कूटे
और फिर रस निकाल लेवे । इस प्रकार से सारा रस निकाल कर इसके रस के
बराबर गाय का दूध तथा कौंच के बीजों का क्वाथ मिलाकर मन्द मन्द आच
पर पकावे । अनन्तर जब यह क्वाथ शुष्क हो जाये तब उड़द के क्वाथ के साथ ,
पकावे । इसके खुश्क होने पर बला क्वाथ, मुद्गपर्णी और माषपर्णी क्वाथ,
जीवन्ती क्वाथ, जीवक क्वाथ, ऋद्धि क्वाथ, काकोली क्वाथ, गान्धुर क्वाथ, मुल-
हठी क्वाथ, शतावरी रस, विदारी रस, द्राक्षा रस, खजूर रस से पाक करे।
अन्तिम पाक के समय वंशलोचन, उड़द का आटा, शालि चावलों का आटा
और गेहूँ का आटा मिलावे जिससे वह कठोर हो जाये। इसमें मधु और शर्करा
पर्याप्त मिलाकर मीठा कर लेवे। इसकी बेर के बराबर गोलिया बनाकर घी में
तल लेवे । इनको अग्नि बल के समान खाकर पीछे से दूध और मास रस का
भोजन करे । इससे वृद्ध भी पुरुष सन्तान और अक्षय वीर्य को पाता है ॥३-६॥
चटकानां सहंसाना दक्षाणां शिखिनां तथा ।
शिशुमारस्य नक्रस्य भिषक् शुक्राणि संहरेत् ॥ १० ॥
गव्यं सर्पिर्वराहस्य कुलिङ्गस्य वसामपि ।
षष्टिकाना च चूर्णानि चूर्णं गोधूमकस्य च ॥ ११ ॥
एभिः पूपलिकाः कार्याः शष्कुल्यो वर्तिकास्तथा ।
पूपा धानाश्च विविधा भक्ष्याश्चान्ये पृथग्विधाः१ ॥ १२ ॥
एषा प्रयोगाद्वृक्ष्याणां स्तब्धेनापूर्णरेतसा ।
शेफसा वाजिवायाति यावदिच्छेदृतु स्त्रियो नरः ॥ १३ ॥
इति वृष्यभक्ष्याः ।
वृष्यभक्ष्य—वैद्य को चाहिये कि चिड़िया, हंस, मुर्गे, मोर, शिशुमार, नक्र
इनके वीर्य को, गाय का घी, सुअर और कुलिंग की वसा (चर्बी) को, साठी
के चावलों का आटा, गेहूँ का आटा एकत्रित करके यथाविधि पूपलिकायें,
१ श्री गगाधर कविराज ने ‘धान्य’ शब्द से धनिया लिया है, परन्तु लोक
में प्रसिद्ध है कि धनिया शुक्र शक्ति को घटा कर नपुंसक बना देता है । इस-
लिये वह नहीं लिया जाता।