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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 276, कुल 616 में से

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पृष्ठ 276

२६२ चरकसंहिता [ अ० २
दे । इसमें पीने योग्य दूध दोह कर पीवे । पीछे से साठी का भात दूध और घी
के साथ खावे । इसके सेवन से रात्रि में पुरुष की इन्द्रिय शिथिल नहीं होती
और वीर्य का क्षय भी नहीं होता ॥ १२-१३ ॥
श्वदंष्ट्राया विदार्याश्च रसे क्षीरचतुर्गुणे ।
घृताढ्यः साधितो वृष्यो माषषष्टिकपायसः ॥ १४ ॥
इति वृष्यपायसप्रयोगः ।
वृष्य-पायस योग—गाय के दूध से चार गुणा गोखरू और विदारीकन्द
का रस पृथक् २ लेकर दूध पाक करे । इस दूध में घी में भुने हुए उड़द तथा
साठी के चावलों को मिलाकर खीर पकावे । यह अतिशय वृष्य है ॥ १४ ॥
फलाना जीवनीयाना स्निग्धाना रुचिकारिणाम् ।
कुडवश्चूर्णिताना स्यात्स्वयंगुप्ताफलस्य च ॥ १५ ॥
कुडवश्चैव माषाणा द्वौ द्वौ च तिलमुद्गयोः ।
गोधूमशालिचूर्णाना कुडवः कुडवो भवेत् ॥ १६ ॥
सर्पिष. कुडवश्चैकस्तत्सर्वं क्षीरसंयुतम् ।
पक्त्वा पूपलिकाः खादेद्बह्वयः स्युर्यस्य योषितः ॥ १७ ॥
इति वृष्यपूपलिकाः ।
वृष्य पूपलिका—जीवनदायक, स्निग्ध एव रुचिकर फलों का चूर्ण १
कुडव, कौंच के बीज १ कुडव, माष १ कुडव, तिल २ कुडव, मूंग दो कुडव,
गेहूँ का आटा १ कुडव, शालिधान्य का आटा १ कुडव, घी एक कुडव,
इनको घी में गूंथकर, घी में भूनकर पूपलिकायें बना लेवे । जिसके घर में बहुत
सी स्त्रिया हों वह इनका सेवन करे । [ फलों में द्राक्षा, खजूर, बादाम, नारियल,
पिस्ता, आम, मीठा अनार लेने चाहिये ] ॥ १५-१७ ॥
घृतं शतावरीगर्भ क्षीर दशगुणे पचेत् ।
शर्करापिप्पलीक्षौद्रयुक्त तद्वृष्यमुत्तमम् ॥ १८ ॥
इति वृष्य शतावरीघृतम् ।
शतावरी घृत—शतावरो के कल्क ( ८ पल ) से दूध ( २० प्रस्थ ) में घी
( २ प्रस्थ ) सिद्ध करे । इसको शर्करा पिप्पली और मधु के साथ प्रयोग करे ।
यह अत्यन्त वृष्य है । [ अष्टाग संग्रह में शतावरी कल्क के साथ २ शतावरी
रस का प्रयोग लिखा है ] ॥ १८ ॥
कर्षं मधुकचूर्णस्य घृतक्षौद्रसमाक्षिकम् ।
प्रयुङ्क्ते यः पयश्चानु नित्यवेगः स ना भवेत् ॥ १९ ॥
इति वृष्यमधुकयोगः ।