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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पा० २ ] चिकित्सितस्थानम् २१६

पा० २ ] चिकित्सितस्थानम् २१६
~ ~ ~ ~ ~ ~
निखातस्य स्नेहभावितस्य दृढस्योपरि कुम्भस्याऽऽश्लेषोडुपेनापिधाय
कृष्णमृत्तिकावलिप्त गोमयाग्निभिरुपस्वेदयेत्, तेषा यः स्वरसः कुम्भ
प्रपद्येत तमष्टभाग-मधु संप्रयुक्तं द्विगुणघृतमद्यात् । तत्प्रयोगाद्वर्षशतम-
जरं वयस्तिष्ठतीति समानं पूर्वेण ॥ १४ ॥ इति भल्लातकक्षौद्रम् ।
भल्लातक क्षौद्र—भिलावो को कुचल कर पिष्ट स्वेद विधि से (पेदी में छिद्र
किये हुए ) घड़े में रखे । एक दूसरे घड़े में घी का लेप करके इस घड़े को गले
तक मिट्टी मे गाड़ दे । इस बड़े के मुख पर भिलावेवाला घड़ा रख कर इसका
मुख ढक्कन से बन्द कर दे । इनकी सन्धियों को काली मिट्टी से बन्द कर दे ।
अब ऊपर के घड़े के चारों ओर उपले बिन कर आग लगावे । आग की आच
से तैल निचले घड़े मे आयेगा । इस तेल में आठवा भाग मधु और दुगना घी
मिलाकर खावे । [ मात्रा आधा बूंद से २ बूंद तक ] । इसके प्रयोग से एक
सौ बरस की बुढ़ापे से रहित परम आयु होती है । शेष गुण पूर्वोक्त रसायनों
के समान है ॥ १४ ॥
भल्लातकतैलपात्र सपयस्कं मधुकेन कल्केनाक्षमात्रेण शतपाकं
कुर्यात् । समानं पूर्वेण । १५ ॥ इति भल्लातकतैलम् ।
भल्लातक तैल—पूर्वोक्त विधि से तैयार किया भल्लातक तैल दो आढक,
दूध आठ आढक और मुलहठी का कल्क १ अक्ष ( २ तोला ) इनसे यथा-
विधि पाक करे । इस प्रकार मे एक सौ बार पाक करके तैल सिद्ध करे । उसका
सेवन पूर्व के तुल्य ही करे । इसके गुण भी पूर्व की भाति ही समझें ॥१५॥
भल्लातकक्षीर भल्लातकक्षोद्र भल्लातकतैलमेव गुडभल्लातकं भल्लातक-
यूषो भल्लातक-सर्पि-र्भल्लातक-पललं भल्लातकसक्तवो भल्लातकळवणं भल्ला-
तकतर्पणमिति भल्लातकविधानमुक्तम् ॥१६॥ इति भल्लातकविधिः ।
भल्लातक विधान—भल्लातक क्षीर, भल्लातक क्षोद्र, भल्लातक तैल के समान
भल्लातक घी, भल्लातक गुड़ ( भिलावे का गुड़ के साथ ), भल्लातक यूष (भल्ला-
तक क्षीर के समान ), भल्लातक तेल, भल्लातक पलल ( भिलावे का तिल कल्क
के साथ ), भल्लातकसक्तु ( भिलावे का जौ के सत्तु के साथ ), भल्लातक लवण
( भिलावे का सेन्धा नमक के साथ ), भल्लातक तर्पण (भिलावे का लाजा के
सत्तूओं के साथ सेवन ) होता है, ये भल्लातक विधान भी पूर्व के तुल्य
ही जानने चाहिये ॥ १६ ॥
[ अष्टाग-सग्रह में भल्लातकप्राश घृत का भी प्रयोग लिखा है—पुष्ट, परि-
पक्क आढक भर भल्लातक लेकर उनको ईंट के चूर्ण से रगड़ कर जल से धोकर

२२० चरकसंहिता [ अ० १
वायु से सुखा कर कूट कर, एक जल के घड़े में पकावे, एक चौथाई बचे तो
उसे छान कर ठण्डा करले, फिर उसको दूध के घड़े में पकावे, एक चतुर्थांश
बचे तो बराबर मात्रा घी की लेकर उसमें मिला कर धान्य के ढेर में सात दिन
तक रखे। इस प्रकार 'अमृतरसपाक' बनता है, उसका सेवन करे और पचने
के उपरान्त यथेष्ट जल, दूध या रस का सेवन करे। इससे स्मृति, मति, बल,
मेधा, सत्त्व और सार इनसे सम्पन्न होकर सोने के समान उज्ज्वल गौर शरीर
होकर दीर्घ आयु का भोग करता है । ]
भवन्ति चात्र—भल्लातकानि तीक्ष्णानि पाकीून्यग्निसमानि च ।
भवन्त्यमृतकल्पानि प्रयुक्तानि यथाविधि ॥ १७ ॥
एते दशविधास्तेषां प्रयोगा. परिकीर्तिताः ।
रोगप्रकृतिसात्म्यज्ञास्तान् प्रयोगान् प्रकल्पयेत् ॥१८॥
कफजो न स रोगोऽस्ति न विबन्धोऽस्ति कश्चन ।
यं न भल्लातकं हन्याच्छीघ्रं मेधाग्निवर्धनम् ॥ १६ ॥
प्राणकामाः पुरा जीर्णाश्च्यवनाद्या महर्षयः ।
रसायनैः शिवैरेतैर्बभूवुरमितायुषः ॥ २० ॥
ज्ञानं १ तपो ब्रह्मचर्यमध्यात्मध्यानमेव च ।
दीर्घायुषो यथाकामं संभृत्य त्रिदिवं गताः ॥ २१ ॥
तस्मादायुःप्रकर्षार्थं प्राणकामैः सुखार्थिभिः ।
रसायनविधिः सेव्यो विधिवत्सुसमाहितैः ॥ २२॥
भिलावे अग्नि के समान तीक्ष्ण और पकानेवाले ( पाक रोग उत्पन्न करने
वाले) होते हैं। परन्तु यदि इनका विधिपूर्वक प्रयोग किया जाये तो अमृत के
समान होते हैं। यहाँ पर भिलावे के दस प्रयोगों का वर्णन कर दिया है।
रोग और प्रकृति की और सात्म्य की विवेचना करके इनका प्रयोग करे। ऐसा
कोई भी कफजन्य रोग नहीं है और नाहीं कोई ऐसी स्रोतो की रुकावट है,
जिसको कि भिलावा दूर न कर सके। यह शीघ्र ही मेधा तथा अग्नि को बढ़ाता
है। [भल्लातक के प्रयोग में अपथ्य कुल्थी, दधि, शुक्त (आचार आदि ),
तैल का देह मे लगाना, अग्नि का सेवन और गरम पानी इनका त्याग
करना चाहिये।]
पुरातन काल मे प्राणों की कामना करनेवाले वृद्ध च्यवन आदि महर्षियों
ने इन्हीं कल्याणकारी रसायनों के सेवन से अपरिमित आयु प्राप्त की थी ।
१ 'ब्राह्म' इति च पाठ ।

पा० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २२१
ये दीर्घ आयुवाले महर्षि यथेच्छ ज्ञान, तप, ब्रह्मचर्य, अध्यात्म ध्यान
( ब्रह्मध्यान ) का सञ्चय करके स्वर्ग मे गये । इसलिये प्राणों की कामना
रखनेवाले सुख, आरोग्य के इच्छुक पुरुषों को चाहिये कि दीर्घायु प्राप्त
करने के लिये विधिपूर्वक बड़ी सावधानी से रसायन-विधि का सेवन करें ॥२२॥
तत्र श्लोकः—रसायनानां संयोगाः सिद्धा भूतहितेषिणा ।
निर्दिष्टाः प्राणकामीये सप्तत्रिंशन्महर्षिणा ॥ २३ ॥
प्राणियों के हित को चाहनेवाले महर्षि आत्रेय ने प्राणकामीय अध्याय में
रसायनों के ये ३७ प्रयोग बतलाये हैं ॥ २३ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने प्राणकामीयो
नाम रसायनपादो द्वितीयः ।
( तृतीयः पादः )
अथातः करप्रचितीयं रसायनपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम ‘करप्रचितीय’ नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं । भगवान्
आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है—॥ १-२ ॥
करप्रचितानां यथोक्तगुणानामामलकानामुद्धृतास्थीनां शुष्कचूर्णि-
तानां पुनर्माघे फाल्गुने वा मासे त्रिःसप्तकृत्वः स्वरसपरिपीतानां पुनः
शुष्कचूर्णीकृतानामाढकमेकं ग्राहयेत्, अथ जीवनीयानां बृंहणीयानां
स्तन्यजननानां वयःस्थापनानां षड्विरेचनशताश्रितीयोक्तानामौषधग-
णानां चन्दनागुरु-धव-तिनिश-खदिर-शिंशपासन-साराणां चाणुशः
क्षिप्तानामभया-बिभीतक-पिप्पली-वचा-चव्य-चित्रक-विडङ्गानां च सम-
स्तानामाढकमेकं दशगुणाम्भसा साधयेत्, तस्मिन्नाढकावशेषे रसे
सुपूते तान्यामलकचूर्णानि दत्त्वा गोमयाग्निभिर्वंश विदल-शर-तैजना-
ग्निभिर्वा साधयेद्यावदपनयाद्रसस्य, तमनुपदग्धमुपहृत्यायसीषु पात्री-
ष्वास्तीर्य शोषयेत्, सुशुष्कं कृष्णाजिनस्योपरि तद्-दृषदि श्लक्ष्णपिष्ट-
मयःस्थाल्यां निधापयेत्सम्यक्, तच्चूर्णमयश्चूर्णाष्टभागसं प्रयुक्तं मधुस-
र्पिभ्यामग्निबलमभिसमीक्ष्य प्रयोजयेदिति ॥ ३ ॥
आमलकायस ब्रह्म रसायन—माघ या फाल्गुन मास में पूर्वोक्त गुणोंवाले
आवलों को वृक्ष पर से हाथों द्वारा तोड़ कर एकत्र करे ( भूमि पर गिरे आवकों

२२२ चरकसंहिता [ अ० १
को ग्रहण नहीं करे) । इनकी गुठली निकाल कर छाया में शुष्क करे। इनको
इक्कीस बार आंवलों का स्वरस पिलावे। इस चूर्ण की एक आढक मात्रा ले लेवे ।
'षड्विरेचन शताश्रितीय' अध्याय में वर्णित जीवनीय, बृहणीय, स्तन्यजनक,
वय स्थापक ओषधि समूह और चन्दन, अगरु, धव तिनिश (साधने), खैर, शीशम
और असन इन वृक्षों के सार (मध्य काष्ठ) को टुकड़े २ करके तथा हरड़, बहेड़ा,
पिप्पली, वचा, चव्य, चित्रक, वायविडंग इन सब मिलित द्रव्यों का एक आढक
लेकर दस गुणे जल मे पकावे और जब रस एक आढक रह जाये तब इसको छान-
कर पूर्व तयार किया आंवले का चूर्ण मिला दे। फिर उपले और बास की खप्पच
सरकण्डा, तेजबल की लकड़ियो से आग को तेज करके इस को पकाता जाये।
जब सब रस शुष्क हो जाये (चूर्ण जले नही) तब उतार ले। बिना जले हुए
अवलेह को उतार कर लोहे की थालियों में फैलाकर शुष्क करे। शुष्क हो
जाने पर काले मृग की खाल पर रक्खी शिला पर खूब बारीक पीसकर लोहे
की थाली में रख दे। इस चूर्ण में लोह भस्म आठवा भाग मिलाकर घी और
मधु के साथ अग्निबल को देख कर सेवन करे ॥ ३ ॥
तत्र श्लोकाः-एतद्रसायनं पूर्वं वसिष्ठः कश्यपोऽङ्गिराः ।
जमदग्निर्भरद्वाजो भृगुरन्ये च तद्विधाः ॥ ४ ॥
प्रयुज्य प्रयता मुक्ताः श्रमव्याधिजराभयात् ।
यावदच्छस्तपेपुस्तत्प्रभावान्महाबलाः ॥ ५ ॥
तपसा ब्रह्मचर्येण ध्यानेन प्रशमेन च ।
रसायनविधानेन कालयुक्तेन चाऽऽयुषा ॥ ६ ॥
स्थिता महर्षयः पूर्वेम्,
प्रथम वसिष्ठ, कश्यप, अंगिरा, जमदग्नि, भरद्वाज, भृगु, तथा अन्य इसी
प्रकार के ऋषियों ने इसका प्रयोग किया था । इसके प्रयोग करने पर वे श्रम,
रोग और बुढ़ापे से मुक्त हो गये थे । इसके प्रभाव से उन्होंने यथेच्छ तप किया
था। पूर्व काल में महर्षि रसायन विधि के द्वारा तप, ब्रह्मचर्य, ध्यान, प्रशम
तथा अनियत काल तक आयु का उपभोग करते रहे हैं ॥ ४-६ ॥
न हि किंचिद्रसायनम् ।
ग्राम्याणामन्यकार्याणां सिद्ध्यत्यप्रयतात्मनाम् ॥ ७ ॥
इदं रसायनं चक्रे ब्रह्मा वर्षसहस्रिकम् ।
जराव्याधिप्रशमनं बुद्धीन्द्रियबलप्रदम् ॥ ८ ॥
इत्यामलकायसब्रह्मरसायनम् ।

पा० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २२३
कोई भी रसायन ग्राम्य ( नगर में रहने वाले ) पुरुषों तथा काम-धन्धे में
फंसे हुए तथा ब्रह्मचर्य आदि सयम का पालन न करनेवाले पुरुषों में फलवती
नहीं होती । इसलिये इनसे पृथक् होकर एकाग्र चित्त से रसायन-विधि करनी
चाहिये। सहस्र वर्ष की आयु प्रदान करने वाले और जरा तथा रोग को दूर
,करनेवाले तथा बुद्धि और इन्द्रिय बल को देनेवाले इस आमलक रसायन का
ब्रह्मा ने आविष्कार किया था ॥ ७-८ ॥
संवत्सरं पयोवृत्तिर्गवां मध्ये वसेत्सदा ।
सावित्रीं मनसा ध्यायन् ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ॥ ९ ॥
संवत्सरान्ते पौषीं वा माघीं वा फाल्गुनीं तिथिम् ।
त्र्यहोपवासी शुद्धश्च प्रविश्यामलकीवनम् ॥ १० ॥
बृहत्फलाढ्यमारुह्य द्रुमं शाखागतं फलम् ।
गृहीत्वा पाणिना तिष्ठेज्जपन् ब्रह्मामृतागमात् ॥ ११ ॥
तदा ह्यवश्यममृतं वसत्यामलके क्षणम् ।
शर्करामधुकल्पानि स्नेहवन्ति मृदूनि च ॥ १२ ॥
भवन्त्यमृतसंयोगात्तानि यावन्ति भक्षयेत् ।
जीवेद्वर्षसहस्राणि तावन्त्यागतयौवनः ॥ १३ ॥
सौहित्यमेषां गत्वा तु भवत्यमरसन्निभः ।
स्वयं चास्योपतिष्ठन्ते श्रीर्वेदा वाक् च रूपिणी ॥ १४ ॥
इति केवलामलकं रसायनम् ।
केवलामलक रसायन—एक वर्ष तक केवल दूध पर निर्वाह रखकर
गायों के बीच में वास करे । वहां पर ब्रह्मचर्य्य का पालन करते हुए मन
में सावित्री का ध्यान करे । एक साल के पीछे पौष या माघ अथवा
फाल्गुन की किसी शुभ तिथि में आंवले के जंगल में पहुंचे । वहां पर
जाने से पूर्व तीन दिन उपवास करे । फिर शुद्ध होकर वन में घुसे ।
वहां पर आंवले से लदे बड़े वृक्ष पर चढ़कर हाथ से फल को पकड़ कर अमृत
के आने तक ब्रह्म, 'ओङ्कार' का जप करता रहे । इस प्रकार जप करने से क्षण
भर के लिये आंवले में अमृतत्व आ जाता है । अमृत के आने से आंवले
शर्करा और मधु के समान मीठे, स्नेहवाले, कोमल हो जाते हैं, इनको खावे।
वह जितने भी आंवले खायेगा उतने हजार वर्षों तक युवारहकर जीवंत रहेगा ।
यदि भरपेट तृप्त होकर खाये तो अमर हो जाये, बहुत दीर्घायु हो । कान्ति
वेदवाणी, लक्ष्मी, सरस्वती स्वयं इसके आगे आकर उपस्थित हो जाती है।९-१४।

२२४ चरकसंहिता [ अ० १
त्रिफलाया रसे मूत्रे गवां क्षारे च लावणे।
क्रमेण चेङ्गुदीक्षारे किंशुकक्षार एव च ॥ १५ ॥
तीक्ष्णायसस्य पत्राणि वह्निवर्णानि वापयेत्।
चतुरङ्गुलदीर्घाणि तिलोत्सेधसमानि च ॥ १६ ॥
ज्ञात्वा तान्यञ्जनाभानि सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत्।
तानि चूर्णानि मधुना रसेनामलकस्य च ॥ १७ ॥
युक्तानि लेहवत्कुम्भे स्थितानि घृतभाविते।
संवत्सरं निधेयानि यवपल्ले तदेव च ॥ १८ ॥
दद्यादालोडनं मासे सर्वत्रालोडयन् बुधः।
संवत्सरात्यये तस्य प्रयोगो मधुसर्पिषा ॥ १९ ॥
प्रातः प्रातर्बलापेक्षी सात्म्यं जीर्णे च भोजनम्।
एष एव च लोहानां प्रयोगः संप्रकीर्तितः ॥ २० ॥
अनेनैव विधानेन हेम्नश्च रजतस्य च।
आयुःप्रकर्षकृत्सिद्धः प्रयोगः सर्वरोगनुत् ॥ २१ ॥
नाभिघातैर्न चातङ्कूर्जरया न च मृत्युना।
स धृष्य स्याद् गजप्राणः सदा चातिबलेन्द्रियः ॥ २२ ॥
धीमान् यशस्वी वाक्सिद्धः श्रुतधारी महाधनः।
भवेत्समा प्रयुञ्जानो नरो लौहरसायनम् ॥ २३ ॥
इति लौहादिरसायनम्।
लौहादिरसायन—तीक्ष्ण लौह (फौलाद) के चार अगुल लम्बे और तिल
भर मोटे पत्रों को आग में लाल करके क्रमशः त्रिफला के क्वाथ में, गोमूत्र मे
मालकंगनी के क्षारोदक में, तथा इगुदी (हिंगौट) के क्षार मे, और पलाश
(ढाक) के क्षारोदक मे बुझा ले । बुझाने से पूर्व फिर २ तपा कर लाल कर
लिया करे । बुझाने पर जब पत्र अजन के समान काले और टूटनेवाले हो
जायें, तब इनका बारीक चूर्ण बना लेवे । इस चूर्ण को मधु तथा आंवले के रस
मे मिला कर अवलेह को भांति कर ल । इस अवलेह को घी से भावित घड़े मे
रख कर एक साल तक जौ के ढेर में दबा दे । प्रत्येक मास लकड़ी क डण्डे से
इसको चला देवे । एक साल के पीछे इसको घी और शहद के साथ प्रतिदिन
प्रातः अग्निबल के अनुसार प्रयोग करे । जीर्ण होने पर प्रकृति के अनुकूल भोजन
करे । इसी प्रकार से अन्य लोहों (धातुओं) का प्रयोग करना चाहिये । इस
भांति स्वर्ण, चांदी का प्रयोग आयु को लम्बा करता है और सम्पूर्ण रोगों को

पा० ३ ] १५ चिकित्सितस्थानम् २२५

पा० ३ ] १५ चिकित्सितस्थानम् २२५
नष्ट करता है । लौह रसायन के एक साल तक प्रयोग करने पर पुरुष चोट,
रोग, जरा, मृत्यु इनसे पराभूत नहीं होता । हाथी के समान शक्तिशाली हो
जाता है, इन्द्रियां अति बलवान् हो जाती हैं। मेधावी, यशस्वी, वाक्सिद्ध
( जो कहेगा सो होगा ), श्रुतधारी ( सुनते ही धारण करनेवाला ), महाधन-
शाली ( रसायन के प्रभाव से ही ) हो जाता है ॥ १५-२३ ॥
ऐन्द्री मत्स्याक्षको ब्राह्मी वचा ब्रह्मसुवर्चला ।
पिप्पल्यो लवण हेम शङ्खपुष्पी विषं घृतम् ॥ २४ ॥
एषा त्रियवकान् भागान् हेयसर्पिर्विषैर्विना ।
द्वौ यवौ तत्र हेम्नस्तु तिलं दद्याद्विषस्य च ॥ २५ ॥
सर्पिषश्च पलं दद्यात्तदैकध्यं प्रयोजयेत् ।
घृतप्रभूत सक्षौद्रं जीर्णे चान्नं प्रशस्यते ॥ २६ ॥
जराव्याधिप्रशमनं स्मृतिमेधाकरं परम् ।
आयुष्यं पौष्टिकं बल्यं स्वरवर्णप्रसादनम् ॥ २७ ॥
परमोजस्करं चैतत्सिद्धमेतद्रसायनम् ।
नैनं प्रसहते कृत्या नालक्ष्मीर्न विषं न रुक् ॥ २८ ॥
श्वित्रं सकुष्ठं जठराणि गुल्माः प्लीहा पुराणो विषमज्वरश्च ।
मेधास्मृतिज्ञानहराश्च रोगाः शाम्यन्त्यनेनातिबलाश्च वाताः ॥ २९ ॥
इत्यैन्द्रीरसायनम् ।
ऐन्द्री रसायन—ऐन्द्री ( इन्द्रवारुणी या दिव्य औषध ), मत्स्याक्षक
( मच्छीछी ), ब्राह्म, वचा, ब्रह्मसुवर्चला ( मण्डूकपर्णी ), १पिप्पली, सैन्धव
लवण, स्वर्ण, शखाहुली, विष, घी इनमें स्वर्ण, विष और घी को छोड़कर
प्रत्येक तीन २ जौ भर लेना चाहिये । स्वर्ण दो जौ, विष एक तिल भर और
घी एक पल मिलाना चाहिये । इसको खाकर प्रभूत घी तथा शहद मिश्रित अन्न
जीर्ण होने पर खाना चाहिये । इसके खाने से जरा और रोग शान्त होते हैं,
स्मृति और मेधा बढ़ती है। आयुवर्धक, पौष्टिक, बलकारक, स्वर, वर्ण को
शुद्ध करता है। यह सिद्ध रसायन अत्यन्त ओज-वर्धक है। इसके प्रयोग से
कृत्या ( पाप या आभिचारिक कर्म ), अलक्ष्मी ( दरिद्रता ), विष और रोग भी
प्रभाव नहीं करते । श्वित्र, कुष्ठ, उदर रोग, गुल्म, प्लीहा, पुराना विषम ज्वर,
मेधा, स्मृति और ज्ञान को नष्ट करनेवाले रोग तथा अत्यन्त बलवान् वायु रोग
भी इसके सेवन से नष्ट हो जाते हैं ॥ २४-२९ ॥
१ ब्रह्मसुवर्चला दिव्य औषधी है- 'हिरण्यक्षीरा पुष्करसदृशपत्रा।'

२२६ चरकसंहिता [ अ० १
मण्डूकपर्ण्याः स्वरसः प्रयोज्यः क्षीरेण यष्टीमधुकस्य चूर्णम् ।
रसो गुडूच्यास्तु समूलपुष्प्याः कल्कः प्रयोज्यः खलु शङ्खपुष्प्याः ॥ ३०॥
आयुःप्रदान्यामयनाशनानि बलाग्निवर्णस्वरवर्धनानि ।
मेध्यानि चैतानि रसायनानि मेध्या विशेषेण च शङ्खपुष्पी ॥ ३१ ॥
इति मेध्यरसायनानि ।
मेधाकर रसायन चार हैं। जैसे—( १ ) मण्डूकपर्णी का स्वरस प्रयोग
करना चाहिये । ( २ ) गाय के दूध के साथ मुलहठी का चूर्ण खाना चाहिये ।
( ३ ) गिलोय का रस प्रयोग करना चाहिये । ( ४ ) मूल और पुष्प के साथ
शंखाहुली का कल्क बरतना चाहिये । * ये चारों रसायन आयुवर्धक, रोग
नाशक बल, अग्नि, वर्ण ( कान्ति ) और स्वर को बढ़ाते हैं । ये रसायन
मेधावर्धक हैं । इन में भी शंखपुष्पी खास कर बुद्धि को बढ़ाती है ॥३०-३१॥
पञ्च षट् १ सप्त दश वा पिप्पलीर्मधुसर्पिषा ।
रसायनगुणान्वेषी समामेकां प्रयोजयेत् ॥ ३२ ॥
तिस्रस्तिस्रस्तु पूर्वाह्ने भुक्त्वाऽग्रे भोजनस्य च ।
पिप्पल्यः किंशुकक्षारभाविता घृतभर्जिताः ॥ ३३ ॥
प्रयोज्या मधुसर्पिर्भ्यां २ रसायनगुणैषिणा ।
जेतुं कासं क्षयं शोषं श्वासं हिक्का गलामयान् ॥ ३४ ॥
अर्शांसि ग्रहणीदोषं पाण्डुतां विषमज्वरम् ।
वैस्वर्यं पीनस शोफं गुल्मं वातबलासकम् ॥ ३५ ॥
इति पिप्पलीरसायनम् ।
पिप्पली रसायन—रसायन गुण को चाहने वाले व्यक्ति को चाहिये कि पांच,
छः, सात या दस पिप्पली को ( चूर्ण, फाण्ट, कल्क ) मधु और घी के साथ
एक साल तक भक्षण करे । पिप्पली को पलाश के क्षारोदक से भावना देकर
गाय के घृत में भून लेवे । इनमें से तीन तीन पिप्पली को घी में

  • मण्डूकपर्णी की प्रयोगविधि—दोषों से रहित होकर उक्त प्रकार के
    आगार में रह कर मण्डूकपर्णी का स्वरस लेकर सहस्र सम्पात आहुति शेष कर
    बल से जल को आलोड़न करके उसका पान करे । इसका दूध अनुपान है ।
    इसके जीर्ण होने पर यवान्न को दूध के साथ खावे । तीन मास दूध ही
    अन्नपान है ।
    १. 'पञ्चाष्टौ' इति च पाठ. । २. 'मधुमिश्रा' इति च पाठः ।

पा० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २५७
मिलाकर प्रातःकाल भोजन से पूर्व तथा पीछे तीन समय खाना चाहिये।
इस प्रकार करने से कास, क्षय, श्वास, शोष, जिसकी, गले की बिमारिया,
अर्श, ग्रहणी रोग, पाण्डु, विषम ज्वर, स्वरभंग, पीनस, शोफ, गुल्म और वात,
कफजन्य रोग नष्ट होते हैं।
[ पिप्पली प्रयोग में पाच से कम पिप्पली का भी प्रयोग कर सकते हैं।
इसी प्रकार कफ की मात्रा अत्यधिक बढ़े होने पर प्रातः, मध्यावस्था में होने पर
भोजन से पूर्व और कम होने पर भोजन के अन्त में देनी चाहिये । पिप्पली के
अति सेवन से उत्पन्न दोष अन्य वस्तुओं के साथ सम्मिलित होने से उत्पन्न नहीं
होते । भावना १ देते समय कम से कम सात भावना देनी चाहियें ।]॥३३-३५॥
क्रमवृद्ध्या दशाहानि दशपैप्पलिकं दिनम् ।
वर्धयेत्पयसा सार्धं तथा चापनयेत्पुनः ॥ ३६ ॥
जीर्णे जीर्णे च भुञ्जीत षष्टिकं क्षीरसर्पिषा ।
पिप्पलीनां सहस्रस्य प्रयोगोऽयं रसायनम् ॥ ३७ ॥
पिष्टास्ता बलिभिः सेव्याः शृता मध्यबलैर्नरैः ।
शीतकृता ह्रस्वबलैर्योज्या दोषामयान् प्रति ॥ ३८ ॥
दशपैप्पलिकः श्रेष्ठो मध्यमः षट् प्रकीर्तितः ।
प्रयोगो यस्त्रिपर्यन्तः स कनीयान् स चाबलैः ॥ ३६ ॥
बृंहणं स्वर्यमायुष्यं प्लीहोदरविनाशनम् ।
वयसः स्थापनं मेध्यं पिप्पलीना रसायनम् ॥ ४० ॥
इति पिप्पलीवर्धमानं रसायनम् ।
पिप्पली वर्धमान—एक दिन में दस पिप्पलियो का दूध के साथ सेवन
करे । दूसरे दिन बीस का, और तीसरे दिन तीस का । इस प्रकार से प्रत्येक दिन
दस दिनों तक दस दस पिपलिया बढ़ाता जावे । साथ में दूध की मात्रा भी
बढ़ाता जाय [ पिप्पली-वर्धमान के प्रयोग में दूध की मात्रा एक प्रकुञ्च (पल)
से आरम्भ करके प्रतिदिन एक एक प्रकुञ्च बढानी चाहिये, फिर घटाने के साथ
घटा देना चाहिये । ] दस दिन के पीछे ग्यारहवें दिन दस पिप्पली कम करे
इस प्रकार से बीसवें दिन फिर दस पर ही आजावे । दूध की मात्रा भी कम
१ भावना विधि—दिवा दिवाऽऽतपे शुष्कं रात्रौ रात्रौ निवासयेत् ।
श्लक्ष्णचूर्णं कृत द्रव्य सप्ताह भावनाविधिः ॥
दिन में धूप में सूखे रात्रि में खुले आकाश के नीचे रहे ।

२२८ चरकसंहिता [ अ० १
करे। पिप्पली के जीर्ण होने पर साठी भात दूध और घी के साथ खावे। दोष
और रोगों को देख कर बलवान् पुरुष पीसकर, मध्यम बलवाला क्वाथ बना
कर और ह्रस्व बलवाला शीत कषाय करके प्रयोग करे। दस पिप्पली के प्रयोग
को श्रेष्ठ, छः पिप्पली के प्रयोग को मध्यम और तीन पिप्पली के प्रयोग को अवर
कहते हैं। पिप्पली-रसायन पुष्टिकारक, स्वरवर्धक, आयुष्य, प्लीहा, उदर रोग
का नाशक, आयु को स्थिर रखने वाली और बुद्धिवर्धक है ॥ ३६-४० ॥
[ गंगाधर कविराज ने छः पिप्पली तथा तीन पिप्पली का प्रयोग भी एक
हजार तक लेजाने को कहा है। यथा- प्रथम दिन दस पिप्पली लेवे। दूसरे
दिन बारह, इस प्रकार से तेरह दिन तक बढ़ाता जाये और फिर चौदहवें दिन
से छः छः कम करना आरम्भ करे। इस प्रकार से १०२४ पिप्पली का प्रयोग
करे। तीन पिप्पली के प्रयोग में अठारह दिन तक क्रमशः तीन तीन बढ़ाते
जावें। उन्नीसवें दिन तीन घटा देवें। इस प्रकार से १०२८ पिप्पली का प्रयोग
करें। दस पिप्पली का प्रयोग श्लैष्मिक रोगी के लिये, छः का वातिक और तीन
का पैत्तिक रोगी के लिये है। सुश्रुत के मत से पिप्पलियो को दूध में पीस कर
पांच, सात वा दस की वृद्धि से पान करे। दस दिन तक दूध भात खावे। दस
दिन के बाद फिर घटावे और घटाते २ पाच, सात और दस तक आजावे।]॥३६-४०॥
जरणान्तेऽभयामेकां प्राग्भुक्ते द्वे बिभीतके।
भुक्त्वा तु मधुसर्पिर्भ्यांश्चत्वार्यामलकानि च ॥ ४१ ॥
प्रयोजयेत्समामेकां त्रिफलाया रसायनम् ।
जीवेद्वर्षशतं पूर्णमजरोऽव्याधिरेव च ॥ ४२ ॥
इति त्रिफलानां रसायनम्।
त्रिफला रसायन-पूर्व किये भोजन के जीर्ण होने पर एक हरड़ प्रातःकाल,
भोजन से पूर्व दो बहेड़ा और भोजन के पश्चात् चार आँवले मधु और घी के
साथ खावे [इन द्रव्यों को कूटकर मधु और घी के साथ खाना चाहिये]। इस
रसायन का एक वर्ष तक प्रयोग करने से सौ बरस तक बुढ़ापा और रोगों से
मुक्त होकर जीता है ॥ ४१-४२ ॥
त्रैफलेनायसीं पात्रीं कल्केनालेपयेन्नवाम् ।
तमहोरात्रिकं लेपं पिबेत्क्षौद्रोदकाप्लुतम् ॥ ४३ ॥
प्रभूतस्नेहमशनं जीर्णे तत्र प्रशस्यते ।
अजरोऽरुक् समाभ्यासाज्जीवेच्चैव समाः शतम् ॥ ४४ ॥
इति त्रिफलारसायनमपरम् ।

पा० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २२६

त्रिफला रसायन—लोहे के नये घड़े में त्रिफला को पीसकर लेप कर देना
चाहिये । चौबीस घण्टे तक इसको लगा रहने देना चाहिये । फिर शहद के
पानी में बने घोल में मिलाकर पीना चाहिये । इसके जीर्ण होने पर बहुत सा
स्नेह ( घी ) पान करना चाहिये । इसके एक साल तक प्रयोग करने पर जरा
और रोगों से मुक्त होकर सौ बरस तक जाता है ॥ ४३-४४ ॥
मधुकेन तुगाक्षीर्या पिप्पल्या क्षौद्रसर्पिषा ।
त्रिफला सितया चापि युक्ता सिद्धं रसायनम् ॥ ४५ ॥
इति त्रिफलारसायनमरम् ।
त्रिफला रसायन --त्रिफला के साथ तुगाक्षीरी ( वंशलोचन ) मुलहठी,
पिप्पली, घी, मधु और शर्करा इन सबको एकत्र करके सेवन करे । यह एक
सिद्ध रसायन है १ ॥ ४५ ॥
सर्वलोहैः सुवर्णेन वचया मधुसर्पिषा ।
विडङ्गपिप्पलीभ्यां च त्रिफला लवणेन च ॥ ४६ ॥
संवत्सरप्रयोगेण मेधास्मृतिबलप्रदा ।
भवत्यायुष्प्रदा धन्या जरारोगनिबर्हणी ॥ ४७ ॥
इति त्रिफलारसायनमपरम् ।
त्रिफला रसायन—त्रिफला को सब धातुओं की भस्म ( स्वर्ण, रजत, ताम्र,
वंग, सीसक, लोह, यशद ), स्वर्ण, वच, घी, शहद, वायविडंग, पिप्पली और
सैन्धा नमक के साथ प्रयोग करे । इसके एक साल तक प्रयोग करने पर मेधा,
स्मृति, बल, आयु बढ़ती है, यह रसायन धन्य है तथा जरा और रोग को नष्ट
करती है । [ यद्यपि सब धातुओं में स्वर्ण आ जाता है, तथापि पृथक् ग्रहण
करने से पृथक् एक अंश और डालना चाहिये २ ] ॥ ४७ ॥
---------------------------------------------------------------------------------------------------
१ कोई कोई आचार्य इनको छः योग मानते हैं । परन्तु यह मानने से
संख्या बढ़ जाती है ।
२ सप्त धातु—स्वर्णतारारताम्राणि नागवंगौ च तीक्ष्णकम् ।
धातवः सप्त विज्ञया अष्टमः क्वापि पारदः ॥
स्वर्णे तार च ताम्र च वङ्गो नागस्तु पञ्चमः ।
रीतिका च तथा घोषो लोहं चेत्यष्टधातवः ॥
कविराज श्री गंगाधर सेन ने इनको भी पृथक् पृथक योग माना है । ऐसा
मानने से संख्या बढ़ जाती है ।

२३० चरकसंहिता [ अ० १
अनम्लं च कषायं च कटु पाके शिलाजतु ।
नात्युष्णशीतं धातुभ्यश्चतुर्भ्यस्तस्य संभवः ॥ ४८ ॥
हेम्नश्च रजतात्ताम्राद्वर कृष्णायसादपि ।
रसायनं तद्विधिभिस्तद्वृष्यं तच्च रोगनुत् ॥ ४६ ॥
वातपित्तकफघ्नैस्तु निर्यूहैस्तत्सुभावितम् ।
वीर्योत्कर्षं परं याति सर्वैरेकैकशोऽपि वा ॥ ५० ॥
प्रक्षिप्योद्धृनमप्येवं पुनस्तत्प्रक्षिपेद्रसे ।
कोष्णे सप्ताहमेतेन विधिना तस्य भावना ॥ ५१ ॥
शिलाजतु—शिलाजतु में अम्ल रस नहीं, कषाय रस है । ( कोई आचार्य
उसमें ईषद् अम्ल रस मानते हैं ) । विपाक मे कटु, वीर्य में समान, न तो
अत्यन्त उष्ण और न अत्यन्त शीत, चारों धातुओं (स्वर्ण, लोह, ताम्र और
रजत से, कई २ आचार्यों के मत में त्रपु और सीसक ) से यह उत्पन्न होता
है । स्वर्ण, चांदी, ताम्र और उत्तम कृष्ण लोह से निकले शिलाजीत को विधि-
पूर्वक प्रयोग करने पर यह उत्तम रसायन, वृष्य तथा रोगनाशक होता है ।
विशुद्ध शिलाजीत को वात, पित्त और कफनाशक औषधियों के क्वाथ से अथवा
एक एक औषधि से भावना देने पर अधिक गुण बढ़ता है । [ रोगी के दोष
आदि के अनुसार ओषधियों से भावना देनी चाहिये ]
भावनार्थ—स्वच्छ पानी से शोधित शिलाजतु में वातघ्न औषधियों का
क्वाथ डालकर धूप में सुखा दे । जब सब पानी शुष्क हो जाये तब पुनः कोष्ण
क्वाथ डालना चाहिये । इस प्रकार से एक सप्ताह तक करना चाहिये ।
[ (१) भावना देने के लिये शिलाजतु के बराबर क्वाथ द्रव्य लेकर आठ गुने
जल में क्वाथ करना चाहिये । और जब अष्टमांश रह जाये तब छान कर कोष्ण
शिलाजतु में डालना चाहिये । यह तो अष्टांग संग्रह का मत है । (२) चक्रपाणि
के अनुसार शिलाजतु के समान क्वाथ द्रव्य लेकर इसमें चौगुना पानी डालकर
क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थांश रहने पर छान लेना चाहिये इसकी भावना देनी
चाहिये । (३) क्षारपाणि के नियम से शिलाजतु के समान क्वाथ द्रव्य लेकर
इसमें अठगुणा पानी मिलाकर क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थांश रहने पर छान
लेना चाहिये ] ॥४८-५१॥
पूर्वोक्तेन विधानेन लोहैश्चूर्णीकृतैः सह ।
तत्पीतं पयसां दद्याद्दीर्घमायुः सुखान्वितम् ॥ ५२ ॥

पा० ३ ] चिकित्सास्थानम् २३१

पा० ३ ] चिकित्सास्थानम् २३१

जराव्याधिप्रशमनं देहदाढर्यकरं परम् ।
मेधास्मृतिकरं बल्यं क्षीराशो तत्प्रयोजयेत् ॥ ५३ ॥
पूर्वोक्त विधि से लौह आदि धातुओं के बनाये चूर्ण के साथ शिलाजीत
मिलाकर दूध के साथ पीने से आरोग्ययुक्त दीर्घ आयु मिलती है । लोह आदि
जितने धातु आवश्यक हों उन सबों को मिलाकर या पृथक् २ रूप में शिलाजीत१
के साथ उपयोग करे । [ धातुओं की भस्म त्रिफला क्वाथ के साथ बनाने का
अष्टाङ्ग-सङ्ग्रह में उपदेश है ।। परन्तु रस शास्त्र के आधार से बनी भस्में अधिक
उपयोगी होंगी यह हमारी मान्यता है । ] शिलाजीत के प्रयोग के समय दूध का
ही सेवन करना चाहिये । इसके सेवन से बुढ़ापा और रोग मिटते हैं, शरीर
अतिशय दृढ़ होता है । मेधा और स्मृति बढ़ता है, बल भी बढ़ता है ॥५२-५३॥
प्रयोगः सप्त सप्ताहाद्य्रहश्चैकश्च सप्तकः ।
निर्दिष्टस्त्रिविधस्तस्य परो मध्योऽवरस्तथा ॥ ५४ ॥
पलमर्धपलं कर्षो मात्रा तस्य त्रिधा मता ।
शिलाजीत का प्रयोग तीन प्रकार का है । यथा—पर, मध्य और अवर ।
इनमें सात सप्ताह तक प्रयोग करना ‘पर’ प्रयोग, तीन सप्ताह तक प्रयोग करना
‘मध्यम’, और एक सप्ताह तक प्रयोग करना अवर प्रयोग है । इसी प्रकार
शिलाजतु की मात्रा भी तीन प्रकार की है । जैसे—उत्तम मात्रा एक पल,
मध्यम मात्रा आधा पल और अवर मात्रा एक कर्ष है । आजकल तो २ से ५
रत्ती की मात्रा उचित रहेगा ॥५४॥
जातेर्विशेषं सविधं तस्य वक्ष्याम्यतः परम् ॥ ५५ ॥
हेमाद्याः सूर्यसन्तप्ताः स्रवन्ति गिरिधातवः ।
जत्वाभं मृदु मृत्स्नाच्छं यन्मलं तच्छिलाजतु ॥ ५६ ॥
इसके आगे हम इस शिलाजतु का भिन्न २ जातिया कहते हैं—
ग्रीष्म काल में स्वर्ण आदि धातुओं वाली शिलाओं में से सूर्य की गरमी से
एक प्रकार का रस जो कि स्पर्श में लाख के समान होता है, (रंग में नहीं),
चूने लग जाता है, इसी काले से रंग को ‘शिलाजतु’ (शिलाजीत) कहते हैं ।
इसका रंग मिट्टी के समान होता है ॥५५-५६॥
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१ जैसा ‘संग्रह’ में कहा है—संस्कृत संस्कृत देहे प्रयुक्तं गिरिजाह्वयम् ।
युक्तं व्यस्तैः समस्तैर्वा ताम्रायोरूप्यहेमभिः ।
क्षारेणालोडितं शीघ्रं फलं कुर्याद् रसायनम् ॥

२३२ चरकसंहिता [ अ० १

मधुरश्च सतिक्तश्च जपापुष्पनिभश्च यः ।
कटुर्विपाके शीतश्च स सुवर्णस्य निस्स्रवः ॥ ५७ ॥
रूप्यस्य कटुकः श्वेतः शीतः स्वादु विपच्यते ।
ताम्रस्य बर्हिकण्ठाभस्तिक्तोष्णः पच्यते कटु ॥ ५८ ॥
यस्तु गुग्गुलुकाभासस्तिक्तको लवणान्वितः ।
कटुर्विपाके शीतश्च सर्वश्रेष्ठः स चायसः ॥ ५९ ॥
गोमूत्रगन्धयः सर्वे सर्वकर्मसु यौगिकाः ।
रसायनप्रयोगेषु पश्चिमस्तु विशिष्यते ॥ ६० ॥
इनमें से स्वर्ण-शिलाजीत—तिक्तरसयुक्त मधुर, जपा ( जासुदी ) फूल के
समान लाल, विपाक में कटु, शीतवीर्य होता है ।
रौप्य ( चांदी की शिला से निकला ) शिलाजीत—कटु रस, रंग में श्वेत,
शीतवीर्य, विपाक में मधुर होता है ।
ताम्र ( ताँबे से निःसृत ) शिलाजीत—मोर की ग्रीवा के समान नीली
झाँई लिये, तिक्त रस, उष्णवीर्य और विपाक में कटु होता है ।
आयस ( लोह से निस्सृत ) शिलाजीत—गुग्गुल के समान काला, भूरा,
तिक्त रस, लवण अनुरस, विपाक में कटु, शीतवीर्य होता है । यह शिलाजतु
सब में श्रेष्ठ है ।
[ कहीं कहीं पर छः प्रकार के शिलाजतुओं का वर्णन है । वहाँ पर त्रपु
और सीसक भी गिना है । ]
इन सब शिलाजतु में गोमूत्र की गन्ध आती है, ये सब कार्यों में प्रयुक्त होते
हैं । परन्तु रसायन कार्य में अन्तिम, आयस शिलाजीत ही अधिक श्रेष्ठ है ॥५७-६०॥
यथाक्रमं वातपित्ते श्लेष्मपित्ते कफे त्रिषु ।
विशेषतः प्रशस्यन्ते मला हेमादिधातुजाः ॥ ६१ ॥
खास कर वात पित्त रोग में स्वर्ण शिलाजतु का, कफ-पित्त में रजत शिला-
जतु का, कफ में ताम्र शिलाजतु का और वात-पित्त-कफ में आयस शिलाजतु
का प्रयोग करना चाहिये ॥ ६१ ॥
शिलाजतुप्रयोगेषु विदाहीनि गुरूणि च ।
वर्जयेत्सर्वकालं तु कुलत्थान् १ परिवर्जयेत् ॥ ६२ ॥
ते ह्यत्यन्तविरुद्धत्वादश्मनो भेदनाः परम् ।
लोके दृष्टास्ततस्तेषां प्रयोगः प्रतिषिध्यते ॥ ६३ ॥
१ 'कुनत्थान्' इति च पाठः ।

पा० ३ ] चिकित्सास्थानम् २३३

पा० ३ ] चिकित्सास्थानम् २३३

शिलाजीत के प्रयोग के समय विदाही और गुरु पदार्थों का तथा कुलत्थी
का एक साल तक ( अथवा जब तक शिलाजतु के गुण शरीर में हों तब तक )
सेवन नहीं करना चाहिये । क्योकि लोक में हम यह स्पष्ट देखते हैं कि पत्थरों
से अत्यन्त विरोध रखने के कारण कुलत्थ पत्थरों तक को फोड़ कर निकलते
हैं। बंजर भूमि में, रोहाड़ों में ही कुलत्थी होती है। [ व्यायाम, धूप, वायु,
ताप, काकमाची और कपोता ये भी वर्जनीय हैं और वर्षा का, कुएं का या
झरने का जल पथ्य है। अष्टागसंग्रह ] ॥ ६२-६३ ॥
पयांसि शुक्तानि¹ रसाः सयूषा-
स्तोयं समूत्रं विविधाः कषायाः ।
आलोडनार्थं गिरिजस्य शस्ता-
स्ते ते प्रयोज्याः प्रसमीक्ष्य कार्यम् ॥ ६४ ॥
शिलाजतु के आलोडन द्रव्य - दूध शुक्त, (सिरका), मास रस, यूष,
जल, गोमूत्र आदि मूत्र, नाना प्रकार के क्वाथ, दोष आदि की विवेचना करके,
शिलाजतु के आलोडन में इनका प्रयोग करना चाहिये ॥ ६४ ॥
न सोऽस्ति रोगो भुवि साध्यरूपः
शिलाह्वयं य न जयेत् प्रसह्य ।
तत्कालयौगैविधिभिः प्रयुक्त
स्वस्थस्य चोर्जां विपुलां ददाति ॥ ६५ ॥
इति शिलाजतुरसायनम् ।
इस पृथ्वी पर ऐसा कोई भी साध्य रोग नहीं है जिसको शिलाजतु उन
उन अवस्थाओं के योग्य यागों के साथ विधिपूर्वक प्रयुक्त होने से बलपूर्वक नष्ट
नहीं कर देता । वह स्वस्थ पुरुषों को भी पर्याप्त बल देता है ॥ ६५ ॥
तत्र श्लोकः - करप्रचितिके पादे दश षट् च महर्षिणा ।
रसायनानां सिद्धानां संयोगाः समुदाहृताः ॥ ६६ ॥
इस करप्रचितीय रसायन पाद में महर्षि ने सोलह सिद्ध रसायनों के प्रयोग
कहे हैं ॥ ६६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सास्थाने
करप्रचितीयो नाम रसायनपादस्तृतीयः ।
________________________________________
१ 'तक्राणि' इति च पाठः ।

२३४ | चरकसंहिता | [ अ० १
( चतुर्थः पादः )
अथात आयुर्वेदसमुत्थानीयं रसायनपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब हम 'आयुर्वेद समुत्थानीय रसायन पाद' की व्याख्या करते हैं, भग-
वान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
ऋषयः खलु कदाचिच्छालीना यायावराश्च ग्राम्यौषध्याहाराः सन्तः
सांपन्निका मन्दचेष्टाश्च नातिकल्याणाः प्रायेण बभूवुः । ते सर्वासामि-
तिकर्तव्यतानामसमर्थाः सन्तो ग्राम्यवासकृतमात्मदोषं मत्वा पूर्वनि-
वास-समपगत-ग्राम्य-दोषं मत्वा शिव पुण्यमुदारं मेध्यमगम्यमसुकृतिभि-
र्गङ्गाप्रभवममर-गन्धर्व यक्ष-किन्नरानु चरितमनेकरत्ननिचयमचिन्त्या-
द्भुतप्रभावं ब्रह्मर्षि-सिद्ध-चारणानुचरित दिव्य-तीर्थौषधि प्रभवमतिश-
रण्यं हिमवन्तममराधिपाभिगुप्तं जग्मुर्भृग्वङ्गिरोऽत्रि-वशिष्ठ-कश्यपा-
गस्त्य-पुलस्त्य-वामदेवासित-गौतम-प्रभृतयो महर्षयः ॥ ३ ॥
पहिले किसी समय में शालीन ( घर बना कर रहनेवाले ) सुसम्पन्न और
यायावर ( यज्ञशील ) ऋषि नागरिक जनों के आहार के सेवन करने से ऐश्वर्य-
शाली पुरुषों के समान मन्द-क्रियाशील हो गये और प्रायः स्वस्थ न रहने लगे ।
उस समय वसिष्ठ, भृगु, अङ्गिरा, अत्रि, कश्यप, अगस्त्य, पुलस्त्य, वामदेव,
असित, गौतम आदि महर्षि तपश्चर्या आदि कर्मों में असमर्थ हो गये। तब उनको
पता चला कि ग्राम्य ( नगर ) निवास के कारण ही यह दोष उत्पन्न हुआ है।
इसलिये वे अपने पुराने स्थान हिमालय में चले गये। यह हिमालय का स्थान
ग्राम्य-सम्बन्धी दोषों से रहित, कल्याणकारी, पवित्र, उदार, पुण्य, पापियों से
अगम्य, गङ्गा का उत्पत्तिस्थान, अमर ( देव ) गन्धव, यक्ष, किन्नर और
चरणों से सेवित, अनेक रत्नों का खज़ाना, अचिन्त्य और आश्चर्यमय प्रभाव
से युक्त, ब्रह्मर्षि, सिद्ध, चारणों की संचार भूमि, दिव्य-तीर्थ और दिव्य औषधियों
का उत्पत्ति स्थान, अतिशरण्य देवराज इन्द्र से सुरक्षित था ॥ ३ ॥
तानिन्र्दः सहस्रदृगम रगुरूवरोऽब्रवीत्—स्वागतं, ब्रह्मविदां ज्ञानत-
पोधनानां ब्रह्मर्षीणामस्ति मनोग्लानिरप्रभावत्व वैस्वर्यं वैवर्ण्यं च ग्राम्य-
वासकृतमसुखमसुखानुबन्धं च। ग्राम्यो हि वासो मूलमशस्तानाम् ।
तत्कृतः पुण्यकृद्भिरनुग्रहः प्रजानां स्वशरीरमरक्षिभिः । कालश्चायमायु-
र्वेदोपदेशस्य । ब्रह्मर्षीणामात्मनः प्रजानां चानुग्रहार्थमायुर्वेदमश्विनौ
मह्यं प्रायच्छतां, प्रजापतिरश्विभ्यां च, प्रजापतये ब्रह्मा, प्रजानामल्प-

पा० ४ ] चिकित्सितस्थानम् २३५

पा० ४ ] चिकित्सितस्थानम् २३५
मायुर्जरा-व्याधि-बहुलमसुखमसुखानुबन्धमल्पत्वादल्प-तपो-दम-नियम-
दानाध्ययन-संचयं मत्वा पुण्यतममायुःप्रकर्षकरं जरा-व्याधि-प्रशमन-
मूर्जस्करममृतं शिवं शरण्यमुदात्तं मत्तः श्रोतुमर्हथोपधारयितुं प्रकाश-
यितुं च प्रजानुग्रहार्थमार्षं ब्रह्मचर्यं प्रति मैत्रीं कारुण्यमात्मनश्चानु-
त्तमं पुण्यमुदारं ब्राह्ममक्षयं कर्मेति ॥ ४॥
इन महर्षियों को सहस्र-चक्षु, श्रेष्ठ, देवगुरु इन्द्र ने कहा-आपका स्वागत
हो । ब्रह्मज्ञानी ज्ञान और तप के धनी आप ब्रह्मर्षियों में मन की बेचैनी, प्रभाव,
कान्ति का न होना, स्वरविकार, विवर्णता, नागरिकनिवास से उत्पन्न रोग, इन
रोगों से सम्बद्ध अन्य रोग भी दिखाई पड़ते हैं। सब अधर्म, पाप और रोग
आदि बुराइयों का मूलकारण नगर निवास ही है। आप पुण्यकर्मा जनों ने
अपने शरीर की परवाह न करके भी अन्य प्रजाओं का बड़ा उपकार किया है
और आयुर्वेद के उपदेश के लिये यही उत्तम समय है। इस आयुर्वेद को
ब्रह्मा ने प्रजापति को, प्रजापति ने दोनों अश्वियों को, दोनों अश्वियों ने ब्रह्म-
र्षियों को, अपने और प्रजाजनों के लाभ के लिये मुझे प्रदान किया था। प्रजा-
जनों की आयु छोटी है, वह भी बुढ़ापा, रोग, अनारोग्य आदि दुःखों से
भरी है। आयु के थोड़ा होने से इनका तप, दम, नियम, दान, अध्ययन
आदि का संचय भी थोड़ा होता है। यह जानकर तुम मुझसे पुण्यतम, आयु को
लम्बा करने वाले, बुढ़ापे और रोग को मिटाने वाले, ओज को बढ़ाने वाले,
अमृत के समान, कल्याणकारी शरण लेने योग्य, उदार आयुर्वेद को सुनो।
[ इन्द्र की सभा में सहस्रों ऋषि इन्द्र के सहस्र चक्षु थे । ]
सुनकर उसे हृदयगम करके प्रजा की भलाई के लिये आर्ष सत्त्व, ब्रह्म-
चर्य के लिये प्राणियों पर मैत्री और करुणाभाव तथा अपने निज श्रेष्ठ पुण्य,
उदार, ब्रह्म ( ज्ञान ) सम्बन्धी अक्षय कर्म को प्रकाशित करने के लिये इस
आयुर्वेद का श्रवण करो ॥ ४ ॥
तच्छ्रुत्वा विबुधपतिवचनमृषयः सर्व एवामरवरमृग्भिस्तुष्टुवुः
प्रहृष्टाश्च तद्वचनमभिननन्दुश्चेति ॥ ॥
देवराज इन्द्र के वचनों को सुन कर सब ऋषियों ने ऋचा से इन्द्र की
स्तुति की और पुलकित होकर इन्द्र के वचनों का अभिनन्दन किया ॥ ५ ॥
अथेन्द्रस्तदायुर्वेदामृतमृषिभ्यः संक्राम्योवाचैतत्सर्वमनुष्ठेयम् ।
अयं च शिवः कालो रसायनानां, दिव्याश्चौषधयो हिमवतः प्रभवाः
प्राप्तवीर्याः, तद्यथा-ऐन्द्री ब्राह्मी पयस्या क्षीरपुष्पी श्रावणी महाश्रावणी

२३६ चरकसंहिता [ अ० १
शतावरी विदारी जीवन्ती पुनर्नवा नागबला स्थिरा वचा छत्राऽति-
च्छत्रा मेदा महामेदा जीवनीयाश्चान्याः पयसा प्रयुक्ताः षण्मासा-
त्परमायुर्वयश्च तरुणमनामयत्वं स्वरवर्णसंपदमुपचयं मेधां स्मृतिमु-
त्तमबलमिष्टांश्चापरान् भावानावहन्ति सिद्धाः ॥ ६ ॥
इतीन्द्रोक्तं रसायनम्।
इन्द्रोक्त रसायन—इसके पीछे इन्द्र ने ऋषियों को आयुर्वेदमृत का
उपदेश किया। इस सम्पूर्ण आयुर्वेद का पालन करना चाहिये। रसायन
सेवन करने का. यह पुण्य, कल्याणकारी समय है। इस समय हिमालय में
उत्पन्न होने वाली सब दिव्य औषधियां वीर्य से परिपूर्ण हैं। जैसे—ऐन्द्री,
ब्राह्मी, पयस्या (क्षीर-विदारी), क्षीरपुष्पी, श्रावणी (गोरखमुण्डी), महाश्रावणी,
शतावरी, विदारीकन्द, जीवन्ती, नागबला, स्थिरा (शालपर्णी), वचा, छत्रा,
अतिछत्रा, मेदा, महामेदा, जीवनीय गुण की अन्य ओषधियां (काकोली, क्षीर-
काकोली, जीवक, ऋषभक, मुलहठी, मुद्गपर्णी, माषपर्णी), इनको दूध के
साथ छः मास तक यथाविधि प्रयोग करने पर दीर्घ आयु, तरुण वय, नीरोगता,
स्वर और वर्ण की शुद्धता, वृद्धि, मेधा, स्मृति, उत्तम बल तथा अभिलषित
बातों की प्राप्ति होती है* ॥ ६ ॥
ब्रह्मसुवर्चलानामौषधिर्या हिरण्यक्षीरा पुष्कर-सदृश-पत्रा, आदि-
त्यपर्णी नामौषधिर्या सूर्यकान्तेति विज्ञायते सुवर्ण-वर्ण क्षीरा सूर्यमण्ड-
लाकारपुष्पा च, नारी नामौषधिरश्वबलेति विज्ञायते या बल्वजसदृश-
पत्रा, काष्ठगोधा नामौषधिर्गोधाकारा, सर्पा नामौषधिः सर्पाकारा,

  • कविराज श्री गंगाधर सेन ने 'ऐन्द्री' का अर्थ इन्द्रायण किया है।
    छत्रा और अतिछत्रा का अर्थ डल्हण ने 'द्रोणपुष्पी द्वय' किया है। वैसे सोया
    और सौंफ भी होता है।
    श्रावणी—अरत्निमात्रस्तृपका पत्रैर्द्वयंगुलसम्मितैः ।
    पुष्पैर्नीलोत्पलाकारैः फलैश्चाञ्जनसन्निमैः ॥
    श्रावणी महती ज्ञेया कनकाभा पयस्विनी।
    श्रावणी पाण्डुराभासा महाभावानिलक्षणा ॥
    श्रावणी का एक हाथ भर का पौधा और दो दो अंगुल के पत्ते होते हैं।
    नील कमल के से आकार के फूल और अञ्जन के समान काले फल होते हैं।
    महाश्रावणी स्वर्ग के समान पीले रंग के रस की होती है और श्रावणी का
    रस श्वेत होता है।

पा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २३७

पा० ४ ] चिकित्सास्थानम् २३७
सोमो नामौषधिराजः पञ्चदशपर्णः स सोम इव हीयते वर्धते च, पद्मा
नामौषधिः पद्माकारा, पद्मरक्ता, पद्मगन्धा च, अजा नामौषधिस्तु
नीलक्षीरा, नीलपुष्पा लताप्रतानबहुला, इत्यासामष्टानामोषधीनां यां
यामेवोपलभेत तस्यास्तस्याः स्वरसस्य सौहित्यं गत्वा स्नेहभावितायामा-
र्द्रपलाश-द्रोण्यां सपिधानायां दिग्वासाः शयीत, तत्र प्रलीयते षण्मासेन
पुनः पुनः संभवति, तस्याजं पयः प्रत्यवस्थापनं, षण्मासेन देवतानुकारी
भवति वयो-वर्ण स्वराकृति-बल-प्रभाभिः, स्वयं चास्य सर्ववाचोगतानि
प्रादुर्भवन्ति, दिव्यं चास्य चक्षुः श्रोत्रं भवति, गतिर्योजनसहस्रं, दश-
वर्षसहस्राण्यायुरनुपद्रवं चेति ॥ ७ ॥
इति द्रोणीप्रावेशिकरसायनम् ।
द्रोणीप्रावेशिक रसायन—ब्रह्मसुवर्चला नाम की जो ओषधि है, उसका दूध
स्वर्ण के समान पीला, पत्ते पुष्कर (कमल) के समान होते हैं। आदित्यपर्णी
नाम की जो ओषधि सूर्यकान्ता के नाम से प्रसिद्ध है, इसका दूध (रस) पीला
होता है और इसका पुष्प सूर्य मण्डल के समान होता है। नारी नाम की
ओषधि अश्वबला के नाम से जानी जाती है इसके पत्ते बल्वज (तृण विशेष)
के समान होते हैं। काष्ठगोधा नामक ओषधि का आकार गोधा (गोह) के
समान होता है। सर्पा नाम की ओषधि सर्प के समान आकार की है। सोम
नामक ओषधि सब ओषधियों का राजा (श्रेष्ठ) है। इसके पन्द्रह पत्ते होते हैं।
यह ओषधि चन्द्रमा के साथ साथ शुक्ल पक्ष में बढ़ती है और कृष्ण पक्ष में उसी
के साथ साथ ह्रास हो जाती है। पद्मा नाम की ओषधि कमल के आकार की
रक्त कमल के समान लाल वर्ण और कमल के समान गन्ध वाली है। अजा
नाम की ओषधि को 'अजश्रृंगी' कहते है। नीला नाम की ओषधि का दूध
नीला, फूल भी नीले तथा इसका फैलाव बहुत होता है १ ।
१ सुश्रुत में इन दिव्य ओषधियों का कुछ वर्णन आया है जैसे—
कनकाभा जलान्तेषु सर्वतः परि सर्पति ।
सक्षीरा पद्मिनी प्रख्या देवी ब्रह्मसुवर्चला ॥
मूलिनी पञ्चभिः पत्रैः सरक्ताशुककोमलैः ।
आदित्यपर्णी विज्ञेया सदादित्यानुवर्त्तिनी ॥
कान्तैर्द्वादशभिः पत्रैः मयूरागुरूहोपमैः ।
कन्दजा काञ्चनक्षीरा कन्या नाम महौषधिः ॥
काश्मीरेषु सरो दिव्य नाम्ना क्षुद्रकमानसम् ।

२३८ चरकसंहिता [ अ० १

इन आठ (नवीं सोम ) ओषधियों में जो जो भी ओषधि मिल सके उसका
स्वरस पेट भर कर पीना चाहिये । फिर घी, तैल आदि स्नेह से भावित, ताजे
(गीले) ढाक की लकड़ी से बनी, ढक्कन से युक्त द्रोणी (नांद) में नंगा
होकर लेट जाना चाहिये । वहा पर वह छः मास तक अचेत रहता है। [छः
मास के पीछे अ.हार सेवन से सज्ञा-लाभ होता है ]। इस समय बकरी के दूध
से इसे स्वस्थ रखना चाहिये । [छः मास के पीछे वह वय, वर्ण, स्वर,
करेणुस्तत्र कन्या च छत्रातिच्छत्रके तथा ॥
मण्डलैः कपिलैश्चित्रैः सर्पाभा पञ्चपर्णिनी ।
पश्चारत्निप्रमाणा वा विज्ञेयाऽजगरो बुधैः ॥
दृश्यतेऽजगरी नित्य गोनसी चाम्बुदागमे ।
अजास्तनाभकन्दा तु सक्षीरा क्षुपरूपिणी ॥
अजा महौषधिर्ज्ञेया शङ्खकुन्देन्दुपाण्डुरा ।
छत्रातिच्छत्रके विद्याद् रक्षोघ्ने कन्दसम्भवे ॥
जरामृत्यु निवारिण्यौ श्वेतकापोतसंस्थिते ।
सुश्रुत० चि० अ० ३० ।
(१) ब्रह्म सुवर्चला पीले से, स्वर्ण तुल्य रग की, जल के स्थानों के तीर
पर फैला करते हैं । वह दूध वाली पद्मिनी के समान होती है (२) आदित्य
पर्णी—मूलवाली, खूब लाल नाडियों वाले कोमल २ पाच पत्तों वाली, सदा सूर्य
के अनुसार रहती है। (३) कन्या—सुन्दर मोर के पँखों के समान १२ पत्र
होते हैं, मूल में एक छोटा सा गोल कन्द होता है दूध सोने के समान पीला होता
है । काश्मीर में क्षुद्रक मानस ( छोटा मानसरोवर ) नामक एक दिव्य बड़ा
तालाव है। वहा करेणु, कन्या, छत्रा अति छत्रा नाम की ओषधिया उत्पन्न
होती हैं। (४) अजगरी—पीले चितकबरे, गोल २ चकत्तों मे चित्रित, उसका
रूप साप के सामान होता है, उसके पाच पत्ते होते हैं, उसकी लम्बाई भी पाच
बालिश्त होती है, वर्षा काल में वह दीखती है। (५) गोनसी—इसी प्रकार
गोनसी नाम की ओषधि भी वर्षा काल में ही दीखती है। (६) अजा—अजा
ओषधि शख या कुन्द के पुष्प के समान श्वेत रंग की है, उसका छोटा सा
पौधा होता है, जड़ में बकरी के स्तन के समान कन्द होता है। (७-८)
छत्रा और अतिछत्रा ये दोनों कन्द से उत्पन्न होती हैं श्वेत कबूतर के समान
दिखाई देती हैं, वे दोनों दुष्ट आत्माओं के बुरे प्रभाव को नाश करने वाली,
बुढ़ापा और मौत को दूर करती हैं ।