चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 238, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें२२४ चरकसंहिता [ अ० १
त्रिफलाया रसे मूत्रे गवां क्षारे च लावणे।
क्रमेण चेङ्गुदीक्षारे किंशुकक्षार एव च ॥ १५ ॥
तीक्ष्णायसस्य पत्राणि वह्निवर्णानि वापयेत्।
चतुरङ्गुलदीर्घाणि तिलोत्सेधसमानि च ॥ १६ ॥
ज्ञात्वा तान्यञ्जनाभानि सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत्।
तानि चूर्णानि मधुना रसेनामलकस्य च ॥ १७ ॥
युक्तानि लेहवत्कुम्भे स्थितानि घृतभाविते।
संवत्सरं निधेयानि यवपल्ले तदेव च ॥ १८ ॥
दद्यादालोडनं मासे सर्वत्रालोडयन् बुधः।
संवत्सरात्यये तस्य प्रयोगो मधुसर्पिषा ॥ १९ ॥
प्रातः प्रातर्बलापेक्षी सात्म्यं जीर्णे च भोजनम्।
एष एव च लोहानां प्रयोगः संप्रकीर्तितः ॥ २० ॥
अनेनैव विधानेन हेम्नश्च रजतस्य च।
आयुःप्रकर्षकृत्सिद्धः प्रयोगः सर्वरोगनुत् ॥ २१ ॥
नाभिघातैर्न चातङ्कूर्जरया न च मृत्युना।
स धृष्य स्याद् गजप्राणः सदा चातिबलेन्द्रियः ॥ २२ ॥
धीमान् यशस्वी वाक्सिद्धः श्रुतधारी महाधनः।
भवेत्समा प्रयुञ्जानो नरो लौहरसायनम् ॥ २३ ॥
इति लौहादिरसायनम्।
लौहादिरसायन—तीक्ष्ण लौह (फौलाद) के चार अगुल लम्बे और तिल
भर मोटे पत्रों को आग में लाल करके क्रमशः त्रिफला के क्वाथ में, गोमूत्र मे
मालकंगनी के क्षारोदक में, तथा इगुदी (हिंगौट) के क्षार मे, और पलाश
(ढाक) के क्षारोदक मे बुझा ले । बुझाने से पूर्व फिर २ तपा कर लाल कर
लिया करे । बुझाने पर जब पत्र अजन के समान काले और टूटनेवाले हो
जायें, तब इनका बारीक चूर्ण बना लेवे । इस चूर्ण को मधु तथा आंवले के रस
मे मिला कर अवलेह को भांति कर ल । इस अवलेह को घी से भावित घड़े मे
रख कर एक साल तक जौ के ढेर में दबा दे । प्रत्येक मास लकड़ी क डण्डे से
इसको चला देवे । एक साल के पीछे इसको घी और शहद के साथ प्रतिदिन
प्रातः अग्निबल के अनुसार प्रयोग करे । जीर्ण होने पर प्रकृति के अनुकूल भोजन
करे । इसी प्रकार से अन्य लोहों (धातुओं) का प्रयोग करना चाहिये । इस
भांति स्वर्ण, चांदी का प्रयोग आयु को लम्बा करता है और सम्पूर्ण रोगों को