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सर्वकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 616 में से

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पृष्ठ 244

२३० चरकसंहिता [ अ० १
अनम्लं च कषायं च कटु पाके शिलाजतु ।
नात्युष्णशीतं धातुभ्यश्चतुर्भ्यस्तस्य संभवः ॥ ४८ ॥
हेम्नश्च रजतात्ताम्राद्वर कृष्णायसादपि ।
रसायनं तद्विधिभिस्तद्वृष्यं तच्च रोगनुत् ॥ ४६ ॥
वातपित्तकफघ्नैस्तु निर्यूहैस्तत्सुभावितम् ।
वीर्योत्कर्षं परं याति सर्वैरेकैकशोऽपि वा ॥ ५० ॥
प्रक्षिप्योद्धृनमप्येवं पुनस्तत्प्रक्षिपेद्रसे ।
कोष्णे सप्ताहमेतेन विधिना तस्य भावना ॥ ५१ ॥
शिलाजतु—शिलाजतु में अम्ल रस नहीं, कषाय रस है । ( कोई आचार्य
उसमें ईषद् अम्ल रस मानते हैं ) । विपाक मे कटु, वीर्य में समान, न तो
अत्यन्त उष्ण और न अत्यन्त शीत, चारों धातुओं (स्वर्ण, लोह, ताम्र और
रजत से, कई २ आचार्यों के मत में त्रपु और सीसक ) से यह उत्पन्न होता
है । स्वर्ण, चांदी, ताम्र और उत्तम कृष्ण लोह से निकले शिलाजीत को विधि-
पूर्वक प्रयोग करने पर यह उत्तम रसायन, वृष्य तथा रोगनाशक होता है ।
विशुद्ध शिलाजीत को वात, पित्त और कफनाशक औषधियों के क्वाथ से अथवा
एक एक औषधि से भावना देने पर अधिक गुण बढ़ता है । [ रोगी के दोष
आदि के अनुसार ओषधियों से भावना देनी चाहिये ]
भावनार्थ—स्वच्छ पानी से शोधित शिलाजतु में वातघ्न औषधियों का
क्वाथ डालकर धूप में सुखा दे । जब सब पानी शुष्क हो जाये तब पुनः कोष्ण
क्वाथ डालना चाहिये । इस प्रकार से एक सप्ताह तक करना चाहिये ।
[ (१) भावना देने के लिये शिलाजतु के बराबर क्वाथ द्रव्य लेकर आठ गुने
जल में क्वाथ करना चाहिये । और जब अष्टमांश रह जाये तब छान कर कोष्ण
शिलाजतु में डालना चाहिये । यह तो अष्टांग संग्रह का मत है । (२) चक्रपाणि
के अनुसार शिलाजतु के समान क्वाथ द्रव्य लेकर इसमें चौगुना पानी डालकर
क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थांश रहने पर छान लेना चाहिये इसकी भावना देनी
चाहिये । (३) क्षारपाणि के नियम से शिलाजतु के समान क्वाथ द्रव्य लेकर
इसमें अठगुणा पानी मिलाकर क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थांश रहने पर छान
लेना चाहिये ] ॥४८-५१॥
पूर्वोक्तेन विधानेन लोहैश्चूर्णीकृतैः सह ।
तत्पीतं पयसां दद्याद्दीर्घमायुः सुखान्वितम् ॥ ५२ ॥