चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपा० ३ ] १५ चिकित्सितस्थानम् २२५
नष्ट करता है । लौह रसायन के एक साल तक प्रयोग करने पर पुरुष चोट,
रोग, जरा, मृत्यु इनसे पराभूत नहीं होता । हाथी के समान शक्तिशाली हो
जाता है, इन्द्रियां अति बलवान् हो जाती हैं। मेधावी, यशस्वी, वाक्सिद्ध
( जो कहेगा सो होगा ), श्रुतधारी ( सुनते ही धारण करनेवाला ), महाधन-
शाली ( रसायन के प्रभाव से ही ) हो जाता है ॥ १५-२३ ॥
ऐन्द्री मत्स्याक्षको ब्राह्मी वचा ब्रह्मसुवर्चला ।
पिप्पल्यो लवण हेम शङ्खपुष्पी विषं घृतम् ॥ २४ ॥
एषा त्रियवकान् भागान् हेयसर्पिर्विषैर्विना ।
द्वौ यवौ तत्र हेम्नस्तु तिलं दद्याद्विषस्य च ॥ २५ ॥
सर्पिषश्च पलं दद्यात्तदैकध्यं प्रयोजयेत् ।
घृतप्रभूत सक्षौद्रं जीर्णे चान्नं प्रशस्यते ॥ २६ ॥
जराव्याधिप्रशमनं स्मृतिमेधाकरं परम् ।
आयुष्यं पौष्टिकं बल्यं स्वरवर्णप्रसादनम् ॥ २७ ॥
परमोजस्करं चैतत्सिद्धमेतद्रसायनम् ।
नैनं प्रसहते कृत्या नालक्ष्मीर्न विषं न रुक् ॥ २८ ॥
श्वित्रं सकुष्ठं जठराणि गुल्माः प्लीहा पुराणो विषमज्वरश्च ।
मेधास्मृतिज्ञानहराश्च रोगाः शाम्यन्त्यनेनातिबलाश्च वाताः ॥ २९ ॥
इत्यैन्द्रीरसायनम् ।
ऐन्द्री रसायन—ऐन्द्री ( इन्द्रवारुणी या दिव्य औषध ), मत्स्याक्षक
( मच्छीछी ), ब्राह्म, वचा, ब्रह्मसुवर्चला ( मण्डूकपर्णी ), १पिप्पली, सैन्धव
लवण, स्वर्ण, शखाहुली, विष, घी इनमें स्वर्ण, विष और घी को छोड़कर
प्रत्येक तीन २ जौ भर लेना चाहिये । स्वर्ण दो जौ, विष एक तिल भर और
घी एक पल मिलाना चाहिये । इसको खाकर प्रभूत घी तथा शहद मिश्रित अन्न
जीर्ण होने पर खाना चाहिये । इसके खाने से जरा और रोग शान्त होते हैं,
स्मृति और मेधा बढ़ती है। आयुवर्धक, पौष्टिक, बलकारक, स्वर, वर्ण को
शुद्ध करता है। यह सिद्ध रसायन अत्यन्त ओज-वर्धक है। इसके प्रयोग से
कृत्या ( पाप या आभिचारिक कर्म ), अलक्ष्मी ( दरिद्रता ), विष और रोग भी
प्रभाव नहीं करते । श्वित्र, कुष्ठ, उदर रोग, गुल्म, प्लीहा, पुराना विषम ज्वर,
मेधा, स्मृति और ज्ञान को नष्ट करनेवाले रोग तथा अत्यन्त बलवान् वायु रोग
भी इसके सेवन से नष्ट हो जाते हैं ॥ २४-२९ ॥
१ ब्रह्मसुवर्चला दिव्य औषधी है- 'हिरण्यक्षीरा पुष्करसदृशपत्रा।'