चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
४७८ चरकसंहिता [ अ० ८
को लेकर ज्वर एक ही रोग उत्पन्न होता है और रूक्ष आदि बहुत से कारणों
से ज्वर आदि अनेक रोग भी उत्पन्न होते हैं ॥ २६-२८ ॥
लिङ्गं चैकमनेकस्य तथैवैकस्य लक्ष्यते ।
बहून्येकस्य च व्याधेर्बहूनां स्युर्बहूनि च ॥ २९ ॥
विषमारम्भमूलानां लिङ्गमेकं ज्वरो मतः ।
ज्वरस्यैकस्य चाप्येकः संतापो लिङ्गमुच्यते ॥ ३० ॥
विषमारम्भमूलैश्च ज्वर एको निरुच्यते ।
लिङ्गैरैतैर्ज्वरश्वासहिक्काद्याः सन्ति चाऽऽमयाः ॥ ३१ ॥
लक्षण भेद—अनेक रोगों का एक लक्षण, एक रोग का एक ही लक्षण, एक
रोग के बहुत से लक्षण और अनेक रोगों के बहुत से लक्षण होते हैं । जैसे—उष्मा
की विषमता से उत्पन्न होने वाले रोगों का ज्वर रूप एक लक्षण होता है । ज्वर
रोग का एक ही लक्षण सन्ताप है । विषमारम्भ मूलक अनेक लक्षणों से युक्त
अकेला ज्वर होता है । इसी प्रकार विषमारम्भ मूलक लक्षणों से ज्वर, श्वास,
हिचकी आदि अनेक रोग होते हैं ॥ २६-३१ ॥
एका शान्तिरनेकस्य तथैवैकस्य लक्ष्यते ।
व्याधेरेकस्य चानेका बहूनां बह्व्य एव च ॥ ३२ ॥
शान्तिरामाशयोत्थानां व्याधीनां लङ्घनक्रिया ।
ज्वरस्यैकस्य चाप्येका शान्तिर्लङ्घनमुच्यते ॥ ३३ ॥
तथा लघ्वशनाद्याश्च ज्वरस्यैकस्य शान्तयः ।
एताश्चैव ज्वरश्वासहिक्कादीनां प्रशान्तयः ॥ ३४ ॥
चिकित्सा विधान—अनेक रोग एक ही चिकित्सा से शान्त होजाते हैं,
एक रोग की शान्ति एक ही प्रकार से, एक रोग की शान्ति अनेक प्रकार से
और अनेक रोगों की शान्ति अनेक प्रकार से भी होती है । जैसे आमाशय से
उत्पन्न होने वाले अनेक रोगों की शान्ति उपवास क्रिया से, ज्वर अकेले की
शान्ति उपवास से हो जाती है । इसी प्रकार अकेले ज्वर को शान्त करने के
लिये लघु भोजन आदि अनेक उपाय हैं । लघु भोजन आदि अनेक उपाय ज्वर,
श्वास, हिचकी आदि अनेक रोगों को शान्त करते हैं ॥ ३२-३४ ॥
सुखसाध्यः सुखोपायः कालेनाल्पेन साध्यते ।
साध्यते कृच्छ्रसाध्यस्तु यत्नेन महता चिरात् ॥ ३५ ॥
सुखसाध्य और कृच्छ्रसाध्य—सुखसाध्य रोग, सुखपूर्वक चिकित्सा
पर थोड़े समय में अच्छा हो जाता है । कष्टसाध्य रोग बहुत प्रयत्न
देर में अच्छा होता है ॥ ३५ ॥
अ० ८] निदानस्थानम् ४७६
अ० ८] निदानस्थानम् ४७६
याति नाशेषतां व्याधिरसाध्यो याप्यसंज्ञितः ।
परोऽसाध्यः क्रियाः सर्वाः प्रत्याख्येयोऽतिवर्तते ॥ ३६ ॥
नासाध्यः साध्यतां याति, साध्यो याति त्वसाध्यताम् ।
पादापचाराद्दैवाद्व। यान्ति भावान्तरं गदाः ॥ ३७ ॥
वृद्धिस्यानक्षयावस्थां रोगाणामुपलक्षयेत् ।
सुसूक्ष्ममपि च प्राज्ञो देहाग्निबलचेतसाम् ॥ ३८ ॥
व्याध्यवस्थाविशेषान् हि ज्ञात्वा ज्ञात्वा विचक्षणः ।
तस्यां तस्यामवस्थायां तत्तच्छ्रेयः प्रपद्यते ॥ ३६ ॥
याप्य और असाध्य—याप्य-संज्ञक असाध्य रोग कभी भी जड़-मूल से नष्ट
नहीं होते ( वे पथ्य और औषध द्वारा कुछ काल तक दबे रहते हैं ) और
असाध्य रोग सब प्रकार की चिकित्सा करने पर भी शान्त नहीं होते। असाध्य
रोग साध्य नहीं हो सकते, परन्तु साध्य रोग असाध्य बन जाते हैं। सब रोगों
की चिकित्सा के जो चार पाद हैं, इन के अपचार से अथवा दैवबल के कारण
रोग दूसरी स्थिति ( असाध्य अवस्था ) में पहुंच जाते हैं। बुद्धिमान् वैद्य को
उचित है कि दोष की वृद्धि, स्थान और क्षय की परीक्षा भली प्रकार करे ।
रोगी के शरीर, जाठराग्नि, बल और चित्तवृत्ति का सूक्ष्मता से ज्ञान प्राप्त करे ।
रोग की विशेष अवस्थाओं को भली प्रकार पूर्ण रूप से समझ कर उस प्रकार
से शान्तिकारक चिकित्सा करने पर सुख ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी
चारों पुरुषार्थ ) प्राप्त होते हैं ॥ ३६-३९ ॥
प्रायस्तिर्यग्गता दोषाः क्लेशयन्त्यातुराँश्चिरम् ।
तेषु न त्वरया कुर्याद्देहाग्नि-बल-विक्रियाम् ॥ ४० ॥
प्रयोगैः क्षपयेद्वा तान् सुखं वा कोष्ठमानयेत् ।
ज्ञात्वा कोष्ठप्रपन्नांस्तान् यथास्वं तं हरेद् बुधः ॥ ४१ ॥
ज्ञानार्थं यानि चोक्तानि व्याधिलिङ्गानि संग्रहे ।
व्याधयस्ते तदात्वे तु लिङ्गानीष्टानि नाऽऽमयाः ॥ ४२ ॥
प्रायः वात आदि दोष कुमार्ग में जाकर रोगियों को बहुत समय तक पीड़ित
करते हैं। ऐसे स्थानो में शीघ्रता से काम नहीं लेना चाहिये । अपितु रोगी के
शरीर और अग्नि-बल को जानकर औषध-प्रयोग द्वारा दोषों को धीरे धीरे कम
करना चाहिये। अथवा दोषों को कोष्ठ-स्थान में लाना चाहिये । और जब दोष
जाय तब योग्य रीति से बाहर निकाल देने चाहिये । रोगो के
। के लिये जो लक्षण संक्षेप में कहे हैं, उन को एक स्वतन्त्र रोग
४८० चरकसंहिता [ अ० ८
समझना चाहिये । परन्तु जिस स्थान पर दूसरे रोगों का ज्ञान कराया गया है
वहां पर इन लक्षणों को लक्षण ही समझना चाहिये ॥ ४०-४२ ॥
विकाराः प्रकृतिश्चैव द्वयं सर्वं समासतः ।
तद्धेतुवशगं हेतोरभावान्न प्रवर्तते ॥ ४३ ॥
विकार और प्रकृति इन दो अवस्थाओं का जो वर्णन किया है ये दोनों ही
कारण के अधीन है । कारण के अभाव से इन दोनों में से एक भी नहीं
रह सकता ॥ ४३ ॥
तत्र श्लोकाः—हेतवः पूर्वरूपाणि रूपाण्युपशयस्तथा ।
संप्राप्तिः पूर्वमुत्पत्तिः सूत्रमात्रं चिकित्सितम् ॥ ४४ ॥
ज्वरादीनां विकाराणामष्टानां साध्यता न च ।
पृथगेकैकशश्चोक्ता हेतुलिङ्गोपशान्तयः ॥ ४५ ॥
हेतुपर्यायनामानि व्याधीनां लक्षणस्य च ।
निदानस्थानमेतावत्संग्रहेणोपदिश्यते ॥ ४६ ॥ इति ।
इस निदान स्थान में ज्वर आदि आठ रोगों के हेतु, पूर्वरूप, रूप, उपशय,
सम्प्राप्ति, पूर्वोत्पत्ति, चिकित्सा सूत्र, साध्यता और असाध्यता, इन का वर्णन
किया है । हेतु, लिंग, उपशय, व्याधि, लक्षण और हेतु के पर्य्यायवाची शब्द ये
सब विषय संक्षेप में कह दिये हैं ॥ ४४-४६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थानेऽ-
पस्मारनिदानं नामाष्टमोऽध्यायः ।
इति निदानस्थानं संपूर्णम् ।
۞निदानस्थान में प्रधानभूत ज्वर आदि का ज्ञान कराने के लिये अवि-
पाक, अरुचि आदि जो रोग कहे गये हैं, उनको स्वतंत्र अवस्था में उत्पन्न होने
पर रोग ही जानने चाहिये और जब ज्वरादि के कारण ये उत्पन्न होते हैं तब
लक्षण ही हैं । क्योंकि आयुर्वेद में स्वतन्त्र अपनी चिकित्सा से शान्त
ही रोग कहा जाता है ।
विमानस्थानम्
३१
विमानस्थानम्
प्रथमोऽध्यायः ।
अथातो रसविमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इस के बाद 'रस-विमान' का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय
ने कहा था ॥१-२॥
इह खलु व्याधीनां निमित्त-पूर्वरूप-रूपोपशय-संख्या-प्राधान्यविधि-
विकल्प-बल-काल-विशेषाननुप्रविश्यानन्तरं¹ रस-द्रव्य-दोष-विकार-
भेषज-देश-काल-बल-शरीराहार-सार-सात्म्य-सत्त्व-प्रकृति-वयसां मान-
मवहितमनसा यथावज्ज्ञेयं भवति भिषजा, रसादिमानज्ञानायत्तत्वात्
क्रियायाः। न ह्यमानज्ञो रसदोषादीनां भिषक् व्याधिनिग्रहसमर्थो भवति।
तस्मात् रसादिमानज्ञानार्थं विमानस्थानमुपदेक्ष्यामोऽग्निवेश ! ॥ ३ ॥
विमान-स्थान का प्रयोजन—चिकित्सा में सफलता चाहने वाले वैद्य को
चाहिये कि सब से प्रथम रोगों का निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय, संख्या, प्राधान्य,
विधि, विकल्प ( भेद ), बल, काल, विशेष (संख्या आदि पाँच, संप्राप्ति के भेद)
को भली प्रकार जानकर, अनन्तर सावधान मन होकर मधुर आदि रस, द्रव्य
(भेषज द्रव्य), वात आदि दोष, विकार, देश (भूमि और रोगी), काल (नित्य और
आवधिक ), बल, शरीर, सार ( त्वग्, रक्त, ओज आदि ), आहार ( भोजन ),
सात्म्य (ओकसात्म्य), सत्त्व (मन), प्रकृति (वात-आदि), वय ( काल के प्रमाण
की अपेक्षा से बाल्यावस्था आदि ) आदि की रोग में भली प्रकार परीक्षा करे ,
क्योंकि चिकित्सा-क्रिया का आधार रसादि ज्ञान ही है । इस लिये रसादि का
ज्ञान भली प्रकार करना चाहिये । रसादि को न जानने वाला वैद्य रोगों को
रोकने और उन की चिकित्सा में सफल नहीं हो सकता । इसलिये हे अग्निवेश !
रसादि ज्ञान के अधीन चिकित्सा के होने से, रसादि ज्ञान के लिये विमान-
[ ] उपदेश करेंगे ॥३॥
¹उपदेशं' इति च पाठः ।
४८२ चरकसंहिता [ अ० १
तत्राऽऽदौ रस-द्रव्य-दोष-विकार-प्रभावाम् वक्ष्यामः ॥ ४ ॥
इन में सब से प्रथम मधुर आदि रस, भेषज द्रव्य, वात आदि दोष और
विकार और इन के प्रभावों को कहेंगे ॥ ४ ॥
रसास्तावत् षट् मधुराम्ल-लवण-कटु-तिक्त-कषायाः । ते सम्यगुपयुज्य-
मानाः शरीरं यापयन्ति, मिथ्योपयुज्यमानास्तु खलु दोषप्रकोपायो-
पकल्पयन्ति ॥ ५ ॥
रस छः हैं, मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय। इन का यदि
भली प्रकार उपयोग किया जाय तो ये शरीर को स्वस्थ अवस्था में रखते हैं
और यदि अन्यथा अर्थात् अन्यथा रूप में सेवन किये जावे तो वातादि दोषों
को प्रकुपित करके रोगों को उत्पन्न करते हैं ॥ ५ ॥
दोषाः पुनस्त्रयो वात-पित्त-श्लेष्माणः । ते प्रकृतिभूताः शरीरोपकारका
भवन्ति, विकृतिमापन्नास्तु खलु नानाविधैर्विकारैः शरीरमुपता-
पयन्ति ॥ ६ ॥
दोष तीन हैं। वात, पित्त और कफ । ये तीनों दोष अपनी प्रकृति
अर्थात् समान अवस्था में रहकर शरीर के उपकारक होते हैं और ये ही दोष
विषम रूप में विकृत होकर शरीर को नानाप्रकार के रोगों से पीड़ित
करते हैं ॥ ६ ॥
तत्र दोषमेकैकं त्रयस्त्रयो रसा जनयन्ति, त्रयस्त्रयश्चोपशमयन्ति ।
तद्यथा कटुतिक्तकषाया वातं जनयन्ति, मधुराम्ललवणास्त्वेनं शम-
यन्ति । कटुकाम्ललवणाः पित्तं जनयन्ति, मधुरतिक्तकषायास्त्वेनं
शमयन्ति । मधुराम्ललवणाः श्लेष्माणं जनयन्ति, कटुतिक्तकषाया-
स्त्वेनं शमयन्ति ॥ ७ ॥
रसों के प्रभाव—दोषों का शमन करना और दोषों को कुपित करना यह
रसों का ही प्रभाव है। इन में तीन तीन रस एक एक दोष को उत्पन्न करते
हैं और तीन तीन रस एक एक दोष को शान्त करते हैं। जैसे—कटु, तिक्त
और कषाय ये तीन रस वायु को उत्पन्न करते हैं। मधुर, अम्ल और लवण
ये तीन रस वायु का शमन करते हैं। कटु, अम्ल और लवण ये तीन रस
पित्त को उत्पन्न करते हैं। मधुर, तिक्त और कषाय ये तीन रस पित्त का
शमन करते हैं। मधुर, अम्ल और लवण ये तीन रस कफ को उत्पन्न करते
हैं और कटु, तिक्त और कषाय ये तीन रस कफ को शमन करते हैं ॥ ७ ॥
रसदोषासन्निपाते तु ये रसा यैर्दोषैः समानगुणाः समा-
निष्ठा वा भवन्ति ते तानभिवर्धयन्ति, विपरीतगुणास्तु
अ० १] विमानस्थानम् ४८३
भूयिष्ठा वा शमयन्त्यभ्यस्यमानाः—इत्येतद्व्यवस्थाहेतोः षट्त्वमुपदि-
श्यते रसानां परस्परेणासंसृष्टानां, त्रित्वं च दोषाणाम्। संसर्गविकल्प-
विस्तरो ह्येषामपरिसंख्येयो भवति, विकल्पभेदापरिसंख्येयत्वात् ॥८॥
रस और दोषों के सन्निपात होने पर जो जो रस दोषों के समान गुण वाले
तथा समान स्वभाव के होते हैं वे उन दोषों को बढ़ाते हैं, विशेषतः जब ये
रस नित्य प्रति निरन्तर सेवन किये जाते हैं। इसी प्रकार जो रस जिन दोषों
के साथ विपरीत गुण और विपरीत स्वभाव वाले होते हैं वे सेवन करने पर
उन दोषों को शमन करते हैं। इस सामान्य और विपर्यय के कारण जो
वृद्धि और ह्रास का नियम है उस की दृष्टि से परस्पर न मिले हुए रस छः
तथा परस्पर न मिले हुए दोष तीन हैं। इन्हीं में यह उपरोक्त व्यवस्था संभव
है। इन के पारस्परिक संसर्ग में यह संभव नहीं, क्योंकि इन रसो और दोषों
का परस्पर संयोग होने से वे असंख्य हो जाते हैं। क्योंकि विकल्पों के भेद
असंख्य हैं ॥८॥
तत्र खल्वनेकरसेषु द्रव्येष्वनेकदोषामकेषु च विकारेषु रस-
दोषप्रभावमेकैकत्वेनाभिसमीक्ष्य ततो द्रव्यविकारयोः प्रभावतत्त्वं व्यव-
स्येत्।
इन में अनेक रसवाले द्रव्यों में और अनेक दोषों को प्रारम्भ करने वाले
विकारों में रस प्रभाव और दोषों के प्रभाव को पृथक् पृथक् रूप से देखकर,
रसविकार द्रव्य-विकार के प्रभाव का निश्चय करे। अर्थात् जहां पर एक रस
और एक ही दोष हो वहां पर रस और दोष के प्रभाव से द्रव्य-विकार के प्रभाव
का ज्ञान हो ही जाता है; परन्तु जहां पर अनेक रस और अनेक दोष मिले हों
वहां पर भी छः रसों और तीन दोषों के प्रभाव का निश्चय कर लेना चाहिये।
नत्वेवं खलु सर्वत्र। न हि १विकृति-विषम-समवेतानां नानात्मकानां
१. रस का विकृति-समवाय जैसे मधुर भात में। मधुर रस स्वभाव से
स्नेहकारी और वृष्य है, परन्तु द्रव्य के विकार रूप भात में वह मधुरता वह गुण
नहीं करती। भात स्निग्ध और वृष्य नहीं है।
रसों का विषम समवाय अर्थात् विषम मेल जैसे तिल में कषाय, कटु, तिक्त
और मधुर चार रस मिले हैं। यदि वे बिना मात्रा के मिले न होते तो तिल भी
वात और श्लेष्मा को हरने वाला या त्रिदोष-हारी होता, परन्तु तिल में रसों का
[?] अर्थात् विषम रूप से मेल है। अतः वह वैसा नहीं है, प्रत्युत
[?] को उत्पन्न करता है। पदार्थों में कहीं तो ये रस अपना ठीक २
४८४ चरकसंहिता [ अ० १
द्रव्याणां परस्परेण चोपहतानामन्यैश्च विकल्पैर्विकल्पितानामवयवप्र-
भावानुमानेन समुदायप्रभावतत्त्वमभ्यवसातुं शक्यं । तथायुक्ते हि
समुदाये समुदायप्रभावतत्त्वमेवोपलभ्य ततो रस-द्रव्य-विकार-प्रभाव-
तत्त्वं व्यवस्येत् ॥ ९ ॥
परन्तु इस प्रकार सब स्थानों पर जाना नहीं जा सकता । क्योंकि द्रव्य
सम्पूर्ण विकृति भाव से और असमान परिमाण में परस्पर मिलते । इस मिलनेके
समय एक द्रव्य के द्वारा दूसरा द्रव्य नष्ट हो जाता है । इसी प्रकार नाना रूपमें
भी द्रव्य बदल जाता है। इन अवस्थाओं में अंशांश विकल्पना द्वारा प्रत्येक
अंश का प्रभाव अनुमान द्वारा जानकर उससे सम्पूर्ण समुदाय रूप द्रव्य का
प्रभाव जानना असम्भव है । इस अवस्था में सम्पूर्ण द्रव्य का सम्पूर्ण प्रभाव
जानना चाहिये ॥ ९ ॥
तस्माद्रसप्रभावतश्च द्रव्यप्रभावतश्च दोषप्रभावतश्च विकारप्रभाव-
तश्च तत्त्वमुपदेक्ष्यामः—तत्रैष रस-द्रव्य-दोष-विकार-प्रभाव उपदिष्टो
भवति ॥ १० ॥
इसलिये चिकित्सा में रस-प्रभाव, द्रव्य-प्रभाव, दोष प्रभाव और विकार-
प्रभाव इन चारों की अपेक्षा है । इससे उन चारों प्रकार के प्रभावों का यथार्थ
उपदेश करेंगे। रसों और द्रव्यों का वात, पित्त और कफ इन दोषों को कुपित
और शान्त करने का प्रभाव रसनिरूपण अध्याय में कह दिया ॥ १० ॥
द्रव्यप्रभावं पुनरुपदेक्ष्यामः—तैलसर्पिर्मधूनि वात-पित्त-श्लेष्म-प्रश-
मनार्थानि द्रव्याणि भवन्ति । तत्र तैलं स्नेहोष्णगौरवोपपन्नतत्वाद्वातं
जयति सततमभ्यस्यमानम् । वातो हि रौक्ष्यशैत्यलाघवोपपन्नो विरुद्ध-
गुणो भवति, विरुद्धगुणसन्निपाते हि भूयसाऽल्पमवजीयते, तस्मा-
फल उत्पन्न करते हैं और कहीं नहीं करते, इसी से उनके सम-समवाय या
विषम-समवाय का अनुमान किया जाता है ।
एक ही पदार्थ के नाना रूप बन जाने से भी उनके गुणों में भेद आता है।
रसों और दोषों का दो प्रकार का समवाय अर्थात् मेल होता है । (१) प्रकृतिके
अनुकूल (२) प्रकृति के अननुकूल । जहां नाना रस मिलकर भी प्रकृति के गुणों
का नाश नहीं करते वैसा मेल 'प्रकृति-सम-समवाय' कहाता है । जहां वे विकृति
होकर मूल पदार्थ के गुणों का नाश कर देते हैं, वहां 'विकृति-विषम-समवाय'
कहाता है, क्योकि वहां विकृति हो जाने से विषम अर्थात् प्रकृति के
रसों का विपरीत मेल होता है ।
अ० १ ] विमानस्थानम् ४८५
अ० १ ] विमानस्थानम् ४८५
तैलं वातं जयति सततमभ्यस्यमानम् । सर्पिः खल्वेवमेव पित्तं जयति,
माधुर्याच्छैत्यान्मन्दवीर्यत्वाच्च, पित्तं ह्यमधुरमुष्णं तीक्ष्णं च । मधु
च श्लेष्माणं जयति, रौक्ष्यात्तैक्ष्ण्यात् कषायत्वाच्च । श्लेष्मा हि स्निग्धो
मन्दो मधुरश्च ॥ ११ ॥
द्रव्य के प्रभाव का अब उपदेश करते हैं। तैल वायु को, घी पित्त को
और मधु कफ को शान्त करने वाले द्रव्य हैं। इन में तैल, स्नेह, उष्ण और
गुरु होने के कारण निरन्तर सेवन करने से वायु को शान्त करता है। क्योंकि
वायु, रूक्ष, शीत और लघु होने से तैल से विपरीत गुण वाला है। दो विरोधी
गुणों के मिश्रण में जो गुण अधिक बलवान् होता है वह निर्बल को जीत लेता
है। इसलिये तैल निरन्तर सेवन से वायु को जीत लेता है। इसी प्रकार घी भी
पित्त को जीतता है, घी, मधुर, शीत एवं मन्दवीर्य है और पित्त अमधुर (कटु,
अम्ल), उष्ण और तीक्ष्ण है। वह भी विपरीत गुण होने से पित्त को जीतता है।
मधु कफ को जीतता (शमन) करता है। मधु रूक्ष, तीक्ष्ण और कषाय है। कफ
स्निग्ध, मन्द और मधुर है, इसलिये मधु कफ से विपरीत गुण वाला है ॥११॥
यच्चान्यदपि किंचिद् द्रव्यमेवं वातपित्तकफेभ्यो गुणतो विपरीतं
विरुद्धं तच्चैताञ्जयत्यभ्यस्यमानम् ॥ १२ ॥
इसी प्रकार अन्य जो कोई द्रव्य गुणों में वात, पित्त, कफ से विपरीत गुण-
वाला होता है, वह निरन्तर सेवन करने से वात, पित्त और कफ को शान्त
करता है ॥ १२ ॥
अथ खलु त्रीणि द्रव्याणि नात्युपयुञ्जीताधिकमन्येभ्यो द्रव्येभ्यः ।
तद्यथा पिप्पलीः, क्षारं, लवणमिति ॥ १३ ॥
इन निम्न-लिखित तीन द्रव्यों को अन्य द्रव्यों की अपेक्षा अधिक सेवन
नहीं करे। १. पिप्पली, २. क्षार और ३. लवण ॥ १३ ॥
पिप्पल्यो हि कटुकाः सत्यो मधुरविपाका गुर्व्यो नात्यर्थं स्निग्धो-
ष्णाः प्रक्लेदिन्यो भेषजाभिमताश्च। ताः सद्यः शुभाशुभकारिण्यो
भवन्ति, आपातभद्राः प्रयोगसमसाद्गुण्यात्, दोषसंचयानुबन्धाः।
सततमुपयुज्यमाना हि गुरुप्रक्लेदित्वाच्छ्लेष्माणमुत्क्लेशयन्ति, औष्ण्या-
त्पित्तं, न च वातप्रशमनायोपकल्पन्ते, अल्पस्नेहोष्णभावात्, योगवाहि-
न्यस्तु खलु भवन्ति । तस्मात्पिप्पलीर्नात्युपयुञ्जीत ॥ १४ ॥
(शुष्क पिप्पली) कटु रस की होकर भी विपाक में मधुर, गुरु, न
न अधिक उष्ण, शरीर के धातुओं को क्लिन्न करने (गलाने)
४८६ चरकसंहिता [ अ० १
वाली है, ओषधि रूप से ठीक भी है, तो भी शीघ्र ही शुभ-अशुभ फल को
दिखाने वाली हैं। सम्यक् प्रयोग करने में पूर्णरूप में गुणकारी और ठीक तरह
प्रयोग न करने पर दोष का संचय करने वाली होती है। क्योंकि पिप्पली का
निरन्तर उपयोग करने से यह भारी तथा क्लेद उत्पन्न करने वाली होने के
कारण कफ को कुपित करती है। उष्ण होने से पित्त को कुपित करती है। यह
विपरीत गुण होने पर भी वायु का शमन नहीं करती। क्योंकि इन में स्नेह
और उष्णगुण न्यून रहता है। पिप्पली योगवाही है अर्थात् जिस द्रव्य के
साथ मिलाकर देते हैं उसी द्रव्य के समान कर्म करने वाली होती है। इसीलिये
ज्वर, गुल्म, कुष्ठ आदि में इस का उपयोग है। इसलिये पिप्पली का अधिक
उपयोग नहीं करना चाहिये। (पिप्पली का भोजनादि में अति प्रयोग हानि-
कारक है, रसायन में नहीं) ॥ १४ ॥
क्षारः पुनरौष्ण्यतैक्ष्ण्यलाघवोपपन्नः क्लेदयत्यादौ पश्चादुपशो-
षयति । स पचन-दहन-भेदनाथर्मुुपयुज्यते । सोऽतिप्रयुज्यमानः केशा-
क्षिहृदयपुंस्त्वोपघातकरः संपद्यते । ये ह्येनं ग्राम-नगर-निगम-जनपदाः
सततमपुयुञ्जते तेऽन्धान्ध्य-पाण्ड्य-खालित्य-पालित्य-भाजो हृदयापकर्ति-
नश्च भवन्ति, तद्यथा प्राच्याश्चीनाश्च । तस्मात्क्षारं नात्युपयुञ्जीत ॥१५॥
क्षार, उष्ण, तीक्ष्ण और लवण रस से युक्त होते हैं। ये क्षार पहिले
तो शरीर को क्लिन्न करते हैं और पीछे से शुष्क करते हैं। शोफ आदि
संघात या पिण्डित हुए दोषों को जलाता है, पकाता है और फोड़ता है। इसलिये
पकाने, जलाने और फोड़ने के लिये इस का उपयोग किया जाता है। यही
क्षार यदि अधिक मात्रा में सेवन किया जाये तो केश (बाल), आंख, हृदय और
पुरुषत्व को नाश करता है। इसलिए जिस ग्राम, नगर, बस्ती प्रान्त वा देश
के लोग इस का अधिक उपयोग करते हैं वे अन्धे, नपुंसक, बालों का गिरने
(गंजे) या पकने (पलित) और हृदय के रोग से विशेष रूप से पीड़ित होते
हैं। जैसे-प्राच्य (कामरूप) देश के और चीनो। इसलिये क्षार का अधिक
उपयोग नहीं करना चाहिये ॥१५॥
लवणं पुनरौष्ण्यतैक्ष्ण्योपपन्नमनतिगुर्वनतिस्निग्धमुपक्लेदि विस्रंस-
नसमर्थमन्नद्रव्यरुचिकरं आपातभद्रं प्रयोगसमसादगुण्यात्, दोषसंच-
यानुबन्धं, तद्रोचनपाचनोपक्लेदनविस्रंसनार्थमुपयुज्यते । तदत्यर्थमुप-
युज्यमानं ग्लानि-शैथिल्य-दौर्बल्याभिनिर्वृत्तिकरं शरीरस्य
ह्येनद् ग्राम-नगर-निगम-जनपदाः सततमपुयुञ्जते, ते भूयिष्ठं
अ० १ ] विमानस्थानम् ४७७
अ० १ ] विमानस्थानम् ४७७
शिथिल-मांस-शोणिता अपरिक्लैशसहाश्च भवन्ति। तद्यथा बाह्रीक-सौरा-
ष्ट्रिक-सैन्धव-सौवीरकाः, ते हि पयसाऽपि सदा लवणमश्नन्ति, येऽपीह
भूमेरत्यूषरा देशास्तेष्वौषधिवीरुद्वनस्पतिवानस्पत्या न जायन्तेऽल्पतेजसो
वा भवन्ति लवणोपहतत्वात्। तस्माल्लवणं नात्युपयुञ्जीत। ये ह्यतिल-
वणसात्म्याः पुरुषास्तेषामपि खालित्येन्द्रलुप्तपालित्यानि तथा वलयश्चा-
काले भवन्ति ॥ १६ ॥
लवण, उष्ण एवं तीक्ष्ण दोनों गुणों से युक्त है, न तो बहुत गुरु और न
बहुत स्निग्ध होता है। क्लिन्न करने वाला, विस्रंसन (बहाने की) शक्ति वाला,
भोजन में रुचि पैदा करने वाला, भली प्रकार उपयोग करने पर सम्पूर्णरूप
में कल्याणकारी है, ठीक प्रकार से न बरतने से दोषों को कुपित करने वाला
होता है। इस का उपयोग रुचि पैदा करने में, पाचन के लिये, क्लिन्न करने
के लिये और विस्रंसन के लिये प्रयुक्त होता है। इस का उपयोग बहुत अधिक
मात्रा में करने से शरीर में ग्लानि, शिथिलता और दुर्बलता उत्पन्न होती है।
जिस ग्राम, नगर, प्रान्त वा देश के व्यक्ति इस का निरन्तर उपयोग करते हैं,
उन को ग्लानि बहुत रहती है और उन के रुधिर, स्नायु और मांस शिथिल हो
जाते हैं। वे निर्बल होने से क्लेश सहने में असमर्थ रहते हैं। जैसे—बाह्लीक
(बल्ख), सौराष्ट्रिक (गुजराती, काठियावाड़ी), सैन्धव (सिन्धु देशी) और
सौवीर देश के लोग। ये लोग दूध के साथ भी लवण खाते हैं।
ऊषर भूमियों में ओषधि (फलवाली), लता, वनस्पति, फल-पुष्पवाले
वृक्ष उत्पन्न नहीं होते। यदि होते हैं तो वे अल्पबल होते हैं। नमक ही इन की
शक्ति को मार देता है, इसलिये नमक का अधिक उपयोग नहीं करना चाहिये।
इस के अतिरिक्त जिन को लवण बहुत अनुकूल पड़ता है उन के बाल
शीघ्र गिर जाते हैं, जल्दी सफेद हो जाते हैं, इन्द्रलुप्त का रोग हो जाता है और
युवावस्था में ही चेहरे पर झुर्रियां पड़ जाती हैं ॥ १६ ॥
तस्मात्तेषां तत्सात्म्यतः क्रमेणापगमनं श्रेयः; सात्म्यमपि हि क्रमे-
णोपनिर्वर्त्यमानमदोषमल्पदोषं वा भवति ॥ १७ ॥
इसलिये इन पुरुषों को 'न वेगान्धारणीय' (सूत्र ० ७) अध्याय में बतलाये
हुए क्रम से नमक के इस प्रकार सात्म्य (अनुकूलता) से पृथक् होना ही कल्या-
णकारी है, क्योंकि ऐसे सात्म्य से क्रमपूर्वक हटना दोषरहित अथवा थोड़े दोष-
: ॥ १७ ॥
४८८ चरकसंहिता [ अ० १
सात्म्य—उस को कहते हैं कि जो अपनी देह के लिये सुखकारक या
अनुकूल होता है। क्योंकि 'सात्म्य' का अर्थ 'उपशय' है ।
तत् त्रिविधं—प्रवरावरमध्यविभागेन । सप्तविधं च रसैकैकत्वेन,
सर्वरसोपयोगाच्च ॥ १८॥
तत्र सर्वरसं प्रवरं, अवरमेकरसं, मध्यमं तु प्रवरावरमध्यस्थम् ।
तत्रावरमध्याभ्यां सात्म्याभ्यां क्रमेण प्रवरमुपपादयेत्सात्म्यम् । सर्वरस-
मपि च द्रव्यं सात्म्यमुपपन्नं प्रकृत्याद्युपयोक्तृष्टमानि सर्वाण्याहारविधि-
विशेषायतनान्यभिसमीक्ष्य हितमेवानुरुच्येत ॥ १६ ॥
सात्म्य के भेद—यह सात्म्य तीन प्रकार का है । ( १ ) प्रवर
( २ ) मध्यम और ( ३ ) अवर । अथवा सात प्रकार का है । जैसे एक एक
रस से छः प्रकार का और सब रसों के उपयोग से सात प्रकार का है । इन
सातों में सब रसों का सात्म्य 'प्रवर' है । 'एक रस का सात्म्य 'अवर' निकृष्ट
है । प्रवर और अवर के मध्य में स्थित सात्म्य को 'मध्यम' कहते हैं । इन में
अवर और मध्यम सात्म्य को क्रमशः प्रवर सात्म्य में परिवर्तित करने का प्रयत्न
करना चाहिये । सब रसों का सात्म्य होने पर भी अर्थात् आहार-विधि के विशेष
उपयोग और प्रकृति आदि सब प्रकार के आठों अंगों को देखकर हितकारक
पदार्थों का सेवन करना चाहिये ॥ १८-१६ ॥
तत्र खल्विमान्यष्टावाहारविधिविशेषायतनानि भवन्ति । तद्यथा प्रकृति-
करण-संयोग-राशि-देश-कालोपयोग-संस्थोपयोक्त्रष्टमानि भवन्ति ॥२०॥
आहार-विधि—ये निम्नलिखित आठ शर्ते आहार विधि में विशेष कारण
या उसके अंग होती हैं । ( १ ) प्रकृति, ( २ ) करण, ( ३ ) संयोग, ( ४ )
राशि, (५) देश, (६) काल, (७) उपयोग-संस्था और (८) उपयोक्ता ॥ २० ॥
तत्र प्रकृतिरुच्यते । स्वभावो यः स पुनराहारौषधद्रव्याणां स्वाभा-
विको गुर्वादिशुणयोगः । तद्यथा—माषमुद्गयोः, शूकरैणयोश्च ॥२१॥
उन में से प्रकृति का वर्णन करते हैं—( १ ) प्रकृति स्वभाव को कहते हैं ।
आहार-द्रव्य और औषध-द्रव्यों में जो गुरु, लघु आदि गुण स्वभाव से रहते हैं
उन का नाम प्रकृति है । जैसे माष ( उड़द ) और शूकर के मांस स्वभाव से
ही गुरु हैं और मूंग तथा हरिण के मांस स्वभाव से ही लघु होते हैं ॥ २१ ॥
करणं पुनः स्वाभाविकानां द्रव्याणामभिसंस्कारः, संस्कारो हि_
१.करीब सब रस के पदार्थ खाती है, इसलिये इस का मांस
निर्दोष माना है ।
अ० १ ] विमानस्थानम् ४८१
अ० १ ] विमानस्थानम् ४८१
गुणान्तराधानमुच्यते । ते गुणाश्च तोयाग्निसंनिकर्षशौचमन्थनदेश-
काल-वशेन भावनादिभिः कालप्रकर्षभाजनादिभिश्चाऽऽधीयन्ते ॥२२॥
( २ ) करण—स्वाभाविक द्रव्यों के संस्कार का नाम 'करण' है । स्वा-
भाविक गुण से भिन्न दूसरे गुण को उत्पन्न कर देने का नाम 'संस्कार' है । ये
गुण जल, अग्नि के संयोग से, शौच ( धोने आदि से ), मन्थन ( बिलोने से ),
देश, काल और स्वरस आदि की भावना से, समय की अधिकता से, ( पात्र
आदि की भिन्नता से ), उत्पन्न कर दिये जाते हैं १।
बिलोने पर दही के गुण भिन्न हो जाते हैं । दूध को मिट्टी के बर्त्तन और
लोहे के बर्त्तन में पकाने पर उसके स्वाद में अन्तर आ जाता है ॥ २२ ॥
संयोगस्तु द्वयोर्बहूनां द्रव्याणां संहतीभावः, स विशेषमारभते
यन्नैकैकशो द्रव्याण्यारभन्ते । तद्यथा मधुसर्पिषोः, मधुमत्स्यपयसां
च संयोगः ॥ २३ ॥
( ३ ) संयोग—दो या दो से अधिक पदार्थों का मिलना 'संयोग' कहाता
है । संयोग विशेष कार्य उत्पन्न करता है जब कि अकेला २ द्रव्य वह कार्य
उत्पन्न नहीं करता । जैसे, मधु और घी का समान मात्रा में संयोग मारक है,
पृथक् पृथक् नहीं । इसी प्रकार मछली और दूध का संयोग कुछ रोग को उत्पन्न
करता है, पृथक् पृथक् नहीं ॥२३॥
राशिस्तु सर्वग्रहपरिग्रहौ, मात्रामात्राफलविनिश्चयार्थः प्रकृतः । तत्र
सर्वस्याऽऽहारस्य प्रमाणग्रहणमेकपिण्डेन सर्वग्रहः । परिग्रहश्च पुनः
प्रमाणग्रहणमेकैकत्वेनाऽऽहारद्रव्याणाम् । सर्वस्य हि ग्रहः सर्वग्रहः ।
सर्वतश्च ग्रहः परिग्रह उच्यते ॥ २४ ॥
( ४ ) राशि—दो प्रकार की होती है । ( १ ) सर्वग्रह और ( २ )
परिग्रह । राशि का प्रयोजन मात्रा और अमात्रा अर्थात् कम या अधिक
मात्रा में भोजन या औषध के लेने से उत्पन्न अच्छे या बुरे परिणाम का
निश्चय करना है । सम्पूर्ण आहार को एक पिण्ड की मात्रा में ग्रहण करने
का नाम 'सर्वग्रह' है । आहार द्रव्यों को एक एक करके नियत प्रमाण में
१. पानी से बार बार धोने पर पदार्थ के गुण बदल जाते हैं । यथा—
'सुधौतः, प्रस्रुतः, स्विन्नः, संतप्तश्चौदनो लघुः ।' मथने से—दधि शोथ करती है,
[ मथने पर स्नेह होने पर भी शोथघ्न है । पात्र में—चांदी के पात्र में दही,
[ के पात्र में पानी रखना उत्तम है । काल के कारण पन्द्रह दिन के पीछे या
पिये । देशमें—राख के ढेर में रक्खे ।
४९० चरकसंहिता [अ० १
ग्रहण करने का नाम 'परिग्रह' है। सब भोज्य पदार्थों के समुदाय रूप में एक
साथ मिलाकर उस में से ग्रहण करना 'सर्वग्रह' है और सब में से प्रत्येक से
पृथक् पृथक् ग्रहण करना 'परिग्रह' है। (आहार मात्रा—अग्नि और आहार-
द्रव्य की अपेक्षा करती है। इसलिये अग्नि बल की अपेक्षा से सर्वग्रह' और
द्रव्य की अपेक्षा से परिग्रह समझना चाहिये ) ॥ २४ ॥
देशः पुनः स्थानं द्रव्याणामुत्पत्तिप्रचारौ देशसात्म्यं चाऽऽचष्टे ॥ २५॥
(५) देश का अर्थ है स्थान । यह स्थान (स्थावर और जंगम) द्रव्यों
की उत्पत्ति, प्रचार के साथ साथ देश-सात्म्य को भी बताता है । उत्पत्ति से
जैसे—हिमालय में उत्पन्न अन्नादि गुरु और मरु में लघु होता है। प्रचार से
जैसे—लघु पदार्थ खाने वाले, मरु भूमि में विचरने वाले, बहुत फिरने वाले
प्राणियों का मांस लघु होता है, अन्यों का गुरु । देशसात्म्य जैसे अनूप देश
में उष्ण, रूक्ष और मरुभूमि में शीत स्निग्ध पदार्थ हितकारी हैं ॥ २५ ॥
कालो हि नित्यगश्चाऽऽवस्थिकश्च । तत्राऽऽवस्थिको विकारमपेक्षते,
नित्यगस्तु खल्वृतुसात्म्यापेक्षः ॥ २६ ॥
(६) काल दो प्रकार का है। नित्यग और आवस्थिक । रोगी की
अवस्थानुरूप इन में आवस्थिक-काल विकार को अपेक्षा करता है। नित्यग
काल ऋतु, सात्म्य, शीत, उष्ण, वर्षा आदि की अपेक्षा करता है ॥ २६ ॥
उपयोगसंस्था तु उपयोगनियमः, स जीर्णलक्षणापेक्षः ॥ २७ ॥
(७) उपयोग संस्था—उपयोग-व्यवस्था या उपयोग-नियम को उपयोग-
संस्था कहते हैं। यह भोजन के पचने की अपेक्षा करता है । 'जीर्णेऽश्नीयात्'
यह आगे कहेंगे ॥ २७ ॥
उपयोक्ता पुनः यस्तमाहारमुपयुङ्क्ते यदायत्तमोकसात्म्यम् ॥ २८ ॥
(८) उपयोक्ता—जो उस आहार का उपयोग करता है, उस भोक्ता को
'उपयोक्ता' कहते हैं । जिस के अधीन अभ्यास-सात्म्य है ॥ २८ ॥
इत्यष्टावाहारविधिविशेषायतनानि भवन्ति । एषां विशेषाः
शुभाशुभफलप्रदाः परस्परोपकारका भवन्ति, तान् बुभुत्सेत । बुद्ध्वा
च हितेप्सुरेव स्यात्, न च मोहात्प्रमादाद्वा प्रियमहितमसुखोदर्कमु-
पसेव्यं किञ्चिदाहारजातमन्यद्वा ॥ २९ ॥
१ सर्वग्रह-एक मनुष्य का भोजन आठ छटांक होना चाहिये। परिग्रह-
चावल, दो छटांक, आटा-५ छटांक, दाल एक छटांक, शाक-एक प्रकार से आठ छटांक ।
अ० १ ] विमानस्थानम् ४९१
अ० १ ] विमानस्थानम् ४९१
इस प्रकार से आहार विधि के विशेष आठ आयतन कह दिये हैं। ये
प्रकृति आदि आठों आयतन शुभ और अशुभ फल (स्वास्थ्य एवं अस्वास्थ्य)
को उत्पन्न करने में परस्पर एक दूसरे के सहायक होते हैं। इस लिये वैद्य
इन को भी जाने। इन में जो सम-धातुओं को प्रकृति में रक्खें और विषम
धातुओं को समान करें उन को जानकर हितकारक का सेवन करे। मोह,
अज्ञान अथवा लापरवाही से आपातप्रिय (सेवन के समय अतिप्रिय), परन्तु
उत्तरकाल में परिणाम में दुःख विकार वा रोगकारक अहित आहार पदार्थों या
अन्य इस प्रकार के विहार का सेवन नहीं करना चाहिये ॥ २९ ॥
तत्रेद्माहारविधिविधानमरोगाणामातुराणां च केषाञ्चित्काले प्रकृ-
त्यैव हिततमं भुञ्जानानां भवति । उष्णं स्निग्धं मात्रावज्जीर्णे वीर्या-
विरुद्धमिष्टे देशे इष्टसर्वोपकरणं नातिद्रुतं नातिविलम्बितमजल्पन्नह-
संस्तन्मना भुञ्जीताऽऽत्मानमभिसमीक्ष्य सम्यक् ॥ ३० ॥
यहां आगे कही जाने वाली आहार विधि स्वस्थ एवं रोगी दोनों के लिये
उचित समय में स्वभाव से हितकारक होती है।
आहार विधि-उष्ण (गरम) भोजन खावे, स्निग्ध भोजन करे, मात्रानु-
सार खाये, पूर्व भोजन के जीर्ण होने पर खाये, अविरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों को
खाये, मनोवाञ्छित स्थान पर, मन के अनुकूल उपकरणों के साथ, न बहुत
जल्दी, न बहुत धीरे, बिना बोले, बिना हँसे, पूर्ण मन देकर, आत्मा के सात्म्य
या अपनी शक्ति को देखकर भली भांति विचार कर खाये ॥ ३० ॥
तस्य साद्गुण्यमुपदेक्ष्यामः-उष्णमश्नीयात् । उष्णं हि भुज्यमानं
स्वदते, भुक्तं चाग्निमौदर्यमुदीरयति, क्षिप्रं च जरां गच्छति, वातं
चानुलोमयति, श्लेष्माणं च परिशोषयति, तस्मादुष्णमश्नीयात् ॥३१॥
इस प्रकार भोजन करने के सद्गुणों का उपदेश करते हैं-गरम, जितना-
गरम मुख में सहन हो सके, उतना गरम भोजन करे। गरम भोजन रुचि उत्पन्न
करता है, खाने में अच्छा लगता है। खाने पर जाकर अग्नि को बढ़ाता है,
शीघ्र पाचन हो जाता है। वायु का अनुलोमन करता है, कफ को सुखाता है।
इस लिये गरम भोजन खावे ॥ ३१ ॥
स्निग्धमश्नीयात् । स्निग्धं हि भुज्यमानं स्वदते, युक्तमौदर्यमग्नि-
न्ति, क्षिप्रं जरां गच्छति, वातमनुलोमयति, दृढीकरोति शरीरो-
पचाभिवृद्धिं चाभिजमयति, वर्णप्रसादमपि चाभिनिर्वर्तयति
यात् ॥ ३२ ॥
स्निग्ध भोजन करे। स्निग्ध भोजन खाने में अच्छा लगता है। खाने पर
निर्बल जाठराग्नि को बढ़ाता है। शीघ्र परिपाक होता है। वायु का अनुलोमन
करता है, शरीर को बढ़ाता है, इन्द्रियों को बलवान् बनाता है, शरीर में बलकी
वृद्धि करता है, रंग में कान्ति, चिकनाई उत्पन्न करता है, इसलिये स्निग्ध
भोजन करे ॥ ३२ ॥
मात्रावदश्नीयात् । मात्रावद्धि भुक्तं वात-पित्त-कफानप्रपीडयदायुरेव
विवर्धयति केवलं, सुखं गुदमनुपर्येति, न चोष्माणमुपहन्ति, अव्यथं
च परिपाकमेति, तस्मान्मात्रावदश्नीयात् ॥ ३३ ॥
मात्रा में खावे। मात्रा में खाया हुआ अन्न वात, पित्त और कफ को कुपित
नहीं करता, केवल आयु को ही बढ़ाता है। परिपाक होकर सुखपूर्वक गुदा
मार्ग से बाहर निकल आता है। शरीर की अन्तराग्नि को नहीं बिगाड़ता, बिना
कष्ट के परिपाक हो जाता है, इसलिये मात्रा में भोजन करे ॥ ३३ ॥
जीर्णेऽश्नीयात् । अजीर्णे हि भुञ्जानस्याभ्यवहृतमाहारजातं
पूर्वस्याऽऽहारस्य रसमपरिणतमुत्तरेणाऽऽहाररसेनोपसृजत् सर्वान्दो-
षान् प्रकोपयत्याशु, जीर्णे तु भुञ्जानस्य स्वस्थानस्थेषु दोषेष्वग्नौ चोदीर्णे,
जातायां च बुभुक्षायां, विवृतेषु च स्रोतसां मुखेषु, चोद्गारे विशुद्धे,
विशुद्धे च हृदये, वातानुलोम्ये, विसृष्टेषु च वात-मूत्र-पुरीष-वेगेष्वभ्य-
वहृतमाहारजातं सर्वशरीरधातूनप्रदूषयदायुरेवाभिवर्धयति केवलम्,
तस्माज्जीर्णेऽश्नीयात् ॥ ३४ ॥
पूर्व-भुक्त भोजन के जीर्ण होने पर खावे। अजीर्ण अवस्था में भोजन
करने से पूर्व में खाये हुए भोजन के अपरिपक्व रस से नवीन आहार का रस
मिलकर शीघ्र ही दोषों को प्रकुपित कर देता है। इसलिये पूर्व भुक्त भोजन के
जीर्ण होने पर, दोषों के अपने स्थान में स्थित होने पर, अग्नि के उदीप्त होने
पर, भूख लगने पर, अन्नवह स्रोतों के मुखों के खुल जाने पर, डकार के
विशुद्ध होने पर, हृदय ( आमाशय ) के साफ होने पर, वायु के अनुकूल होने
पर वायु, मूत्र, मल के वेगों के साफ होने पर किया हुआ भोजन शरीर के सब
धातुओं को समान अवस्था में रखता हुआ, केवल आयु को ही बढ़ाता है, इस
लिये जीर्ण अवस्था में भोजन करे ॥ ३४ ॥
वीर्याविरुद्धमश्नीयात् । अविरुद्धवीर्यमश्नन् हि न विरुद्ध-
जैर्विकारैरुपसृज्यते, तस्माद्वीर्याविरुद्धमश्नीयात् ॥ ३५ ॥
अविरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों को खावे। अविरुद्ध
वाले पदार्थ के सेवन करने से, विरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों के सेवन से उत्पन्न
होने वाले (कुष्ठ, वीसर्प आदि) रोगों से मनुष्य बचा रहता है, इसलिये
अविरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों को खावे ॥ ३५ ॥
इष्टे देशेऽश्नीयात् । इष्टे हि देशे भुञ्जानो नानिष्टदेशजैर्मनोवि-
घातकरैर्भावैर्मनोविघातं प्राप्नोति, तथेष्टैः सर्वोपकरणैः, तस्मादिष्टे देशे
तथेष्टसर्वोपकरणं चाश्नीयात् ॥ ३६ ॥
अभिमत प्रदेश में मनोनुकूल उपकरणों के साथ भोजन करे । मनो-
वाञ्छित स्थान में भोजन करने से, अनिष्ट देश में उत्पन्न होने वाले, मन को
दुःखी करने वाले भावों से मनुष्य दुःखी नहीं होता है। यही बात मन के
अनुकूल उपकारणों के साथ भी जाने । इसलिये इष्ट स्थान में और अभिमत
उपकरणों के साथ भोजन करें ॥ ३६ ॥
नातिद्रुतमश्नीयात्, अतिद्रुतं हि भुञ्जानस्योत्स्नेहनमवसादनं, भोज-
नस्याप्रतिष्ठानं, भोज्यदोषसाद्गुण्यौपलब्धिश्च न नियता, तस्मान्नाति-
द्रुतमश्नीयात् ॥ ३७ ॥
बहुत जल्दी जल्दी भोजन नहीं करे। बहुत जल्दी भोजन खाने से भोजन
उन्मार्ग अर्थात् विरुद्ध मार्ग में जाने लगता है। जल्दी खाया हुआ भोजन
अवसन्नता पैदा करता है, तथा भोजन आमाशय में नहीं रहता, वमन हो जाता
है। जल्दी खाने से भोजन के गुण दोष की पहिचान भी नहीं होती, इसलिये
बहुत जल्दी भोजन नहीं करे ॥ ३७ ॥
नातिविलम्बितमश्नीयात् । अतिविलम्बितं हि भुञ्जानो न तृप्तिम-
धिगच्छति, बहु भुङ्क्ते, शीतीभवति चाऽऽहारजातं, विषमपाकं च
भवति, तस्मान्नातिविलम्बितमश्नीयात् ॥ ३८ ॥
बहुत धीरे रुक रुक कर भी भोजन नहीं करे। बहुत धीरे धीरे खाने से
पुरुष को कभी तृप्ति नहीं होती, इसलिये बहुत खा जाता है। भोजन भी ठण्डा
पड़ जाता है, भोजन विषम रूप में पचता है, इसलिये बहुत धीरे धीरे भोजन
नहीं करे ॥ ३८ ॥
अञ्जल्पन्नहसंस्तन्मना भुञ्जीत—जल्पतो हसतोऽन्यमनसो वा भुञ्जा-
नस्य त एव हि दोषा भवन्ति य एवातिद्रुतमश्नतः, तस्मादजल्पन्नह-
संस्तन्मना भुञ्जीत ॥ ३९ ॥
बातें न करते हुए या न हंसते हुए मनोयोग के साथ भोजन करे। बातें
हुए और हंसते हुए अथवा दूसरी तरफ अन्य कार्य में मन को लगाये
४६४ चरकसंहिता [ अ० २
हुए भोजन करने पर वे ही दोष उत्पन्न होते हैं जो जल्दी खाने में उत्पन्न होते
हैं । इसलिये बिना बोले, बिना हंसे, पूर्ण मनोयोग के साथ भोजन करे ॥ ३९ ॥
आत्मानमभिसमीक्ष्य भुञ्जीत सम्यक् । इदं ममोपशेते, इदं नोपशेते
इति, विदितं ह्यस्य आत्मन आत्मसात्म्यं भवति, तस्मादात्मानमभि-
समीक्ष्य भुञ्जीत सम्यगिति ॥ ४० ॥
अपनी रुचि वा हित-अहित को देखकर भोजन करे । मेरी आत्मा को यह
अनुकूल है, यह प्रतिकूल है, यह मेरे सात्म्य है, यह मेरे असात्म्य है,
ऐसा विचार कर खावे । इस प्रकार खाने से आत्मसात्म्य का ज्ञान रहता है ।
इसलिये अपनी शक्ति और हित-अहित का विवेचन करके खाना चाहिये ॥४०॥
भवति चात्र—रसान् द्रव्याणि दोषांश्च विकारांश्च प्रभावतः ।
वेद यो देशकालौ च शरीरं च स नो भिषक् ॥ ४१ ॥
जो पुरुष रस, द्रव्य, दोष, विकार, प्रभाव, देश, काल, शरीर ( प्रकृति,
सत्त्व और सात्म्य ) इन को भली प्रकार जानता है वही हम में से वैद्य होने
योग्य है ॥ ४१ ॥
तत्र श्लोकौ—विमानार्थो रसद्रव्यदोषरोगाः प्रभावतः ।
द्रव्याणि नातिसेव्यानि त्रिविधं सात्म्यमेव च ॥ ४२ ॥
आहारायतनान्यष्टौ भोज्यसाद्गुण्यमेव च ।
विमाने रससंख्याते सर्वमेतत्प्रकाशितम् ॥ ४३ ॥
विमानस्थान का प्रयोजन, रस, द्रव्य, दोष और रोग इन चारों का प्रभाव,
बहुत अधिक सेवन न करने योग्य द्रव्य, तीन प्रकार का सात्म्य, आठ आहार
विधि के आयतन, भोजन का साद्गुण्य, ये सब बातें इस 'रस' संज्ञक विमान
में भगवान् आत्रेय ने प्रकाशित कर दी हैं ॥ ४२-४३ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने
रसविमानं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः ।
—०*०—
अथातस्त्रिविधकुक्षीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे 'त्रिविध कुक्षीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करें
जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
अ० २ ] विमानस्थानम् ४६५
अ० २ ] विमानस्थानम् ४६५
त्रिविधं कुक्षौ स्थापयेदवकाशांशमाहारस्याऽऽहारमुपयुञ्जानः; तद्यथा-
कमवकाशांशं मूर्तानामाहारविकाराणामेकं द्रवाणामेकं पुनर्वातपित्त-
श्लेष्मणाम् । एतावती ह्याहारमात्रामुपयुञ्जानो नामात्राहारजं किञ्चि-
दशुभं प्राप्नोति ॥ ३ ॥
आहार करने वाले मनुष्य को चाहिये कि वह भोजन के निमित्त पेट में
तीन विभागों की कल्पना करे । एक स्थान मूर्त्त (स्थूल) आहार के लिये,
दूसरा द्रव (पेय) पदार्थों के लिये और तीसरा वात, पित्त और कफ के लिये ।
इस प्रकार तीन विभाग करके आहार मात्रा का उपयोग करनेवाले पुरुष को
आहार की अमात्रा से उत्पन्न होने वाले किसी भी प्रकार के अशुभ परिणाम
नहीं होते ॥ ३ ॥
न च केवलं मात्रावत्त्वादेवाऽऽहारस्य कृत्स्नमाहारफलसौष्ठवमवाप्तुं
शक्यं, प्रकृत्यादीनामष्टानामाहारविधिविशेषायतनानां प्रविभक्त-
फलत्वात् ॥ ४ ॥
तत्र तावदाहारराशिमधिकृत्य मात्रामात्राफलविनिश्चयार्थः प्रकृतः।
एतावानेव ह्याहारराशिविधिविकल्पो यावन्मात्रावत्त्वममात्रा-
वत्त्वं च ॥ ५ ॥
केवल आहार की मात्रा से ही सम्पूर्ण आहार फल की उच्चमता प्राप्त नहीं
हो सकती, क्योंकि प्रकृति आदि जो आठ आहार-विधि के विशेष अंग हैं, इन
का भी भिन्न भिन्न फल होता है । यहां पर प्रकृति आदि आठ आहार-विधि
विशेषों में आहार की राशि को लेकर मात्रा और अमात्रा के फल का निश्चय
करने के लिये यह प्रकरण है । आहार की राशि-विधि का भेद इतना ही है कि
मात्रा का परिमाण इतना और अमात्रा का परिमाण इतना है ॥४-५॥
तत्र मात्रावत्त्वं पूर्वमुपदिष्टं कुक्ष्यंशविभागेन, तद् भूयो विस्तरे-
णानुव्याख्यास्यामः । तद्यथा—कुक्षेरप्रपीड़नमाहारेण, हृदयस्यानव-
रोधः, पार्श्वयोरविपाटनं, अनतिगौरवमुदरस्य, प्रीणनमिन्द्रियाणां,
क्षुत्पिपासोपरमः, स्थानासन-शयन-गमन-प्रश्वासोच्छ्वास-हास-संकथासु
च सुखानुवृत्तिः, सायं प्रातश्च सुखेन परिणमनं, बलवर्णोपचयकरत्वं
चेति मात्रावतो लक्षणमाहारस्य भवति ॥ ६ ॥
इन में मात्रावत्त्व (मात्रा) को कुक्षि के विभाग से प्रथम संक्षेप में कह
चुके हैं। अब मात्रा और अमात्रा दोनों को विस्तार से कहते हैं। जैसे—
आहार से कोष्ठ का पीड़ित (दबना) न होना, हृदय (श्वास प्रश्वास) का
४८६ चरकसंहिता [ अ. २
न रुकना, भोजन के भार से पाश्र्वों का न फटना ( फटते हुए प्रतीत न होना,
अधिक न तनना ), पेट में बहुत भारीपन का प्रतीत न होना, आंख आदि
इन्द्रियों का पूर्ण सन्तुष्ट होना, भूख और प्यास का शान्त होना, स्थान ( सीधा
खड़ा होने में ) आसन ( बैठने में ), सोने में, चलने में, श्वास लेने एवं
छोड़ने में, हास्य और बातचीत में सुखपूर्वक प्रवृत्ति, दिन में किये भोजन का
सायंकाल और रात्रि में किये भोजन का प्रातःकाल तक सुखपूर्वक जीर्ण हो
जाना, बल, वर्ण, उपचय ( पुष्टि ) का शरीर से होना ये सब मात्रा में किये
भोजन के लक्षण हैं ॥ ६ ॥
अमात्रावत्त्वं पुनर्द्विविधमाचक्षते । हीनमधिकं चेति । तत्रै हीन-
मात्रमाहारराशिं बलवर्णोपचयक्षयकरमतृप्तिकरमुदावर्त्तकरमवृष्यम-
नायुष्यमनौजस्यं शरीरमनोबुद्धीन्द्रियोपघातकरं सारविधमनमलक्ष्म्य-
वहमशीतेश्च वातविकाराणामायतनमाचक्षते ॥ ७ ॥
अमात्रा-आहार की अमात्रा दो प्रकार की बतलाते हैं । ( १ ) हीन
और ( २ ) अधिक । इन में आहार राशि की हीन मात्रा बल और वर्ण को
पुष्ट नहीं करती, न मनुष्य को तृप्त करती है, वह उदावर्त्त-रोग को उत्पन्न
करती है, आयु, वीर्य एवं ओज के लिये हितकारी नहीं है, मन, बुद्धि, इन्द्रिय
( आंख आदि ) को नष्ट करने वाली है । सार ( त्वग् रक्त आदि ) को नष्ट
करती है । अलक्ष्मी ( गरीबी ) को पैदा करती है । हीनमात्रा अस्सी प्रकार के
वायु रोगों का कारण होती है ऐसा वैद्य लोग बतलाते हैं ॥ ७ ॥
अतिमात्रं पुनः सर्वदोषप्रकोपणमिच्छन्ति सर्वकुशलाः ॥ ८ ॥
यो हि मूर्तानामाहारविकाराणां सौहित्यं गत्वा पश्चाद् द्रवैस्तृप्ति-
मापद्यते भूयस्तस्याऽऽमाशयगता वातपित्तश्लेष्माणोऽभ्यवहारेणातिमात्रे-
णातिप्रपीड्यमानाः सर्वे युगपत्प्रकोपमापद्यन्ते ॥ ६ ॥
ते प्रकुपितास्तमेवाऽऽहारराशिमपरिणतमाविश्य कुक्ष्यैकदेशमाश्रिता
विष्टम्भयन्तः सहसा वाऽप्युत्तराधराभ्यां मार्गाभ्यां प्रच्यावयन्तः पृथक्
पृथगिमान् विकारानभिनिर्वर्तयन्त्यतिमात्रभोक्तुः ॥ १० ॥
आहार राशि की अतिमात्रा से सब दोष प्रकुपित होते हैं, ऐसा कुशल
चिकित्सक मानते हैं। जो मनुष्य मूर्त्त ( स्थूल ) आहार पदार्थों से पेट भर
लेता है और ऊपर से पेय पदार्थों को पूर्णरूप से पी लेता है; उसके आमाशयमें
स्थित वात, पित्त और कफ दोष इस अति अधिक भार से पीड़ित होकर
साथ कुपित हो जाते हैं। वे प्रकुपित हुए दोष इस कच्ची ( अपरिपु
अ० २ ] ३२ विमानस्थानम् ४३७
अ० २ ] ३२ विमानस्थानम् ४३७
राशि के साथ मिलकर इस आहार राशि को उदर के एक भाग में रोक देते हैं
अथवा सहसा ऊपर या नीचे के ( ऊर्ध्व या अधः ) मार्गों से बाहर निकालने
लगते हैं। अधिक खानेवाले, पुरुष में भिन्न २ नाना रोग पृथक् २ रूप से
उत्पन्न करते हैं ॥ ६-१० ॥
तत्र वातः शूलानाहाङ्गमर्द-मुखशोष-मूर्च्छा-भ्रमाग्निवैषम्य-सिरासं-
कोचन-संस्तम्भनानि करोति । पित्तं पुनर्ज्वरातीसारमन्तर्दाहं तृष्णा-
मदभ्रमप्रलपनानि । श्लेष्मा तु छर्द्यरोचकाविपाकशीतज्वरालस्यगात्रगौ-
रवाभिनिर्वृत्तिकरः संपद्यते ॥ ११ ॥
वायु, शूल, अफारा, अंगमर्द (अंगों का टूटना), मुख का शुष्क
होना, मूर्च्छा, भ्रम, अग्नि की विषमता, पार्श्वग्रह, पृष्ठग्रह, कटिग्रह, शिराओं का
आकुञ्चन (संकोच) और स्तम्भन (जड़ता), इन विकारों को उत्पन्न करता है।
पित्तज्वर, अतिसार, अन्तर्दाह (शरीर में जलन), तृष्णा, मद, भ्रम और
प्रलाप को उत्पन्न करता है और कफ छर्दि (वमन), अरुचि, अविपाक,
शीतज्वर, आलस्य और शरीर में भारीपन पैदा करता है ॥ ११ ॥
न खलु केवलमतिमात्रमेवाऽऽहारराशिमामप्रदोषकरमिच्छन्ति, अपि
तु खलु गुरु-रूक्ष-शीत-शुष्क-द्विष्ट विष्टम्भि-विदाह्यशुचि-विरुद्धनामकाले
चान्नपानानामुपसेवनं, काम-क्रोध-लोभ-मोहेर्ष्या-ह्री-शोक-मानोद्वेग-भयो-
पतप्तेन मनसा वा यदन्नपानमुपयुज्यते तदप्या ममेव प्रदूषयति ॥१२॥
कुशल वैद्य केवल आहार राशि की अतिमात्रा को ही आमदोष का कारण
नहीं मानते। किन्तु प्रकृति से भारी, रूक्ष, शीत, शुष्क, द्वेषयुक्त (मन के प्रति-
कूल), विष्टम्भी (वायु, दर्द के होने पर भी मल का न आना), दाह (जलन)
करने वाले, अपवित्र, प्रकृति, संस्कार, राशि में विरोधी खान-पान का सेवन
अथवा हितकारी अन्न को भी अनुचित काल में वा वमन, क्रोध, लोभ, मोह,
ईर्ष्या, लज्जा, शोक, मन के उद्वेग, भय आदि अवस्था में किया हुआ अन्न-पान
भी आम को ही दूषित करता है ॥ १२ ॥
भवति चात्र—मात्रयाऽप्यभ्यवहृतं पथ्यं चान्नं न जीर्यति ।
चिन्ता-शोक-भय-क्रोध-दुःख-शय्या-प्रजागरैः ॥ १३ ॥
तं द्विविधमामप्रदोषमाचक्षते भिषजो विसूचिकामलसकं च ।
तत्र विसूचिकामूर्ध्वं चाधश्च प्रवृत्तामदोषां यथोक्तरूपां विद्यात् ॥१४॥
हितकारी, पथ्य अन्न मात्रा से खाने पर भी चिन्ता, शोक, भय, क्रोध,
दुःख, शय्या में सोने, रात्रि में जागने से जीर्ण नहीं होता है। इस आम-