चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 506, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें४८८ चरकसंहिता [ अ० १
सात्म्य—उस को कहते हैं कि जो अपनी देह के लिये सुखकारक या
अनुकूल होता है। क्योंकि 'सात्म्य' का अर्थ 'उपशय' है ।
तत् त्रिविधं—प्रवरावरमध्यविभागेन । सप्तविधं च रसैकैकत्वेन,
सर्वरसोपयोगाच्च ॥ १८॥
तत्र सर्वरसं प्रवरं, अवरमेकरसं, मध्यमं तु प्रवरावरमध्यस्थम् ।
तत्रावरमध्याभ्यां सात्म्याभ्यां क्रमेण प्रवरमुपपादयेत्सात्म्यम् । सर्वरस-
मपि च द्रव्यं सात्म्यमुपपन्नं प्रकृत्याद्युपयोक्तृष्टमानि सर्वाण्याहारविधि-
विशेषायतनान्यभिसमीक्ष्य हितमेवानुरुच्येत ॥ १६ ॥
सात्म्य के भेद—यह सात्म्य तीन प्रकार का है । ( १ ) प्रवर
( २ ) मध्यम और ( ३ ) अवर । अथवा सात प्रकार का है । जैसे एक एक
रस से छः प्रकार का और सब रसों के उपयोग से सात प्रकार का है । इन
सातों में सब रसों का सात्म्य 'प्रवर' है । 'एक रस का सात्म्य 'अवर' निकृष्ट
है । प्रवर और अवर के मध्य में स्थित सात्म्य को 'मध्यम' कहते हैं । इन में
अवर और मध्यम सात्म्य को क्रमशः प्रवर सात्म्य में परिवर्तित करने का प्रयत्न
करना चाहिये । सब रसों का सात्म्य होने पर भी अर्थात् आहार-विधि के विशेष
उपयोग और प्रकृति आदि सब प्रकार के आठों अंगों को देखकर हितकारक
पदार्थों का सेवन करना चाहिये ॥ १८-१६ ॥
तत्र खल्विमान्यष्टावाहारविधिविशेषायतनानि भवन्ति । तद्यथा प्रकृति-
करण-संयोग-राशि-देश-कालोपयोग-संस्थोपयोक्त्रष्टमानि भवन्ति ॥२०॥
आहार-विधि—ये निम्नलिखित आठ शर्ते आहार विधि में विशेष कारण
या उसके अंग होती हैं । ( १ ) प्रकृति, ( २ ) करण, ( ३ ) संयोग, ( ४ )
राशि, (५) देश, (६) काल, (७) उपयोग-संस्था और (८) उपयोक्ता ॥ २० ॥
तत्र प्रकृतिरुच्यते । स्वभावो यः स पुनराहारौषधद्रव्याणां स्वाभा-
विको गुर्वादिशुणयोगः । तद्यथा—माषमुद्गयोः, शूकरैणयोश्च ॥२१॥
उन में से प्रकृति का वर्णन करते हैं—( १ ) प्रकृति स्वभाव को कहते हैं ।
आहार-द्रव्य और औषध-द्रव्यों में जो गुरु, लघु आदि गुण स्वभाव से रहते हैं
उन का नाम प्रकृति है । जैसे माष ( उड़द ) और शूकर के मांस स्वभाव से
ही गुरु हैं और मूंग तथा हरिण के मांस स्वभाव से ही लघु होते हैं ॥ २१ ॥
करणं पुनः स्वाभाविकानां द्रव्याणामभिसंस्कारः, संस्कारो हि_
१.करीब सब रस के पदार्थ खाती है, इसलिये इस का मांस
निर्दोष माना है ।