सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 577, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 577

मुपलेपनमुदकुम्भांश्चगन्धहस्तो माल्य-दाम-प्रदीप-हिरण्य-हेम-रजत-मणि-
मुक्ता-विद्रुम-क्षौम-परिधि-कुश-लाज-सर्षपाक्षतांश्च शुक्लांश्च सुमनसोप्रथि-
ताप्रथितांश्च मेध्यांश्च भक्ष्यान् गन्धांश्च घृष्टानादायोपतिष्ठस्वेति । अथ
सोऽपि तथा कुर्यात् ॥ ८ ॥
इन उपरोक्त गुणों से युक्त अध्ययनार्थ शिष्य के सेवा में उपस्थित होने पर
आचार्य उसे कहे—कि "तू उत्तरायण ( माघ आदिके शुक्ल पक्ष में, प्रशस्त दिव्य
उत्तम तिथि, बार से युक्त दिन में, तिष्य, हस्त, श्रवण, अश्विनी इनमें से किसी
एक नक्षत्र के साथ कल्याणकारी करण और सुखप्रद मुहूर्त्त के अनुकूल होने
पर, मुण्डन करा, उपवास और स्नान करके, कषाय वस्त्र धारण करके, हाथों में
सुगन्ध ( धूप ) , समिधा, अग्नि, घी, उपलेपन ( चन्दन आदि ), जल के घड़े,
माला, हार, स्वर्ण, रजत, मोती, प्रवाल ( मूँगा ), क्षौम ( रेशम ), हवनकुण्ड
के चारों पाश्र्वों में रखने योग्य हस्तप्रमाण के पलाशदि समिधा, कुशा, लाजा,
सरसों, अक्षत, श्वेत, गुंथे और ग्रन्थन रहित ( छुटे, अनबिधे ) पुष्प-माला,
पवित्र खाद्य पदार्थ ( तिल से बने लड्डू आदि ), घिसे हुई चन्दन, आदि
सुगन्धों को लेकर उपस्थित हो।"
वह शिष्य उसी प्रकार से करे ॥ ८ ॥
तमपस्थितमाज्ञाय शुभे शुचौ देशे प्राक्प्रवणे उदक्प्रवणे वा चतु-
ष्किष्कुमात्रं चतुरस्रं स्थण्डिलं गोमयादकेनोपलिप्तं कुशास्तीर्णं सुपरिहितं
परिधिभिश्चतुर्दिशंयथोक्त-चन्दनोदक-कुम्भ-क्षौम-हेम-हिरण्य-रजत-मणि-
मुक्ता-विद्रुमालङ्कृतं मेध्य-भक्ष्य-गन्ध-शुक्ल-पुष्प-लाज-सर्षपाक्षतोपशो-
भितं कृत्वा, तत्र पालाशीभिरैङ्गुदीभीर्माधुकीभिर्वा समिद्भिरग्निमुपसमा-
धाय प्राङ्मुखः शुचिरध्ययनार्थाधमनुविधाय मधुसर्पिर्भ्यां त्रिस्त्रिर्जुहु-
यादग्निमाशीःसंप्रयुक्तैर्मन्त्रैर्ब्रह्माणमग्निं धन्वन्तरिं प्रजापतिमश्विनाव-
न्द्रमृषींश्च सूत्रकारानभिमन्त्रयमाणः पूर्वं स्वाहेति ॥ ९ ॥
दीक्षा—जिस समय अध्ययनार्थी शिष्य समिधा आदि वस्तुओं को लेकर
आचार्य के पास उपस्थित हो उस समय एक समान एवं पवित्र स्थान में
पूर्व या उत्तर दिशा में चार हाथ प्रमाण चौकोर जगह को गोबर और पानी
से लेप कर इस पर कुशा बिछा दे । इसके चारों ओर से भली प्रकार वेष्टित
कर दे । इसके चारों ओर चन्दन, पानी के घड़े, रेशम, स्वर्ण, चांदी, मणि,
मुक्ता, मूँगा आदि पवित्र भक्ष्य, गन्ध, श्वेतपुष्प, लाजा, सरसों, अक्षत आदि
वस्तुएं सजा देवे । इसमें पलाश ( ढाक ), इंगुदी ( हिंगोट ), गूलर,