चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३२६
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३२६
काकुलीम्मृग (मालुया सर्प) की चार श्रेणियां हैं यथा—श्वेत, काली, चित-
कबरी और कालक, कूर्चाका चिल्लट (चियार), मेंढक, शल्लक, गोह, गाण्डक
(गोह का भेद, सर्पणी), कदली, नेवला, श्वावित् ये भूमिशय या बिलेशय
अर्थात् बिल में रहनेवाले हैं ॥ ३७-३८ ॥
सृमरश्चमरः खङ्गो महिषो गवयो गजः ।
न्यङ्कुर्बराहश्चानूपा मृगाः सर्वे रुरुस्तथा ॥ ३६ ॥
सृमरः (सूवर) चमर (चमरिया गाय), गेंडा, भैसा, नील गाय, हाथी
न्यंकु (हरिण), सुअर (छोटा) और रुरु (बारह सींगा) ये सब 'आनूप'
अर्थात् जल बहुल प्रदेश के पशु हैं ॥३६॥
कूर्मः कर्कटको मत्स्यः शिशुमारस्तिमिंगिलः ।
शुक्ति-शङ्खोद्र-कुम्भीर-चुलुकी-मकरादयः ॥ ४० ॥
इति वारिशयाः प्रोक्ताः, वक्ष्यन्ते वारिचारिणः ।
कछुआ, केकड़ा, मछली, तिमिंगिल (मछली भेद), सीप शंखमें होने वाले
जन्तु शिशुमार, उद्र (जल बिडाल, ऊदबिलाव) कुम्भीर (नाका), चुलुकी,
और मकर ये 'वारिशय' अर्थात् जल में रहने बाले जन्तु हैं। पानी पर रहने वाले
प्राणियों के नाम कहते हैं ॥ ४० ॥
हंसः क्रौञ्चो बलाका च बकः कारण्डवः प्लवः ॥ ४१ ॥
शरारिः पुष्कराह्वश्च केशरी मानतुण्डकः ।
मृणालकण्ठो मद्गुश्च कादम्बः काकतुण्डकः ॥ ४२ ॥
उत्क्रोशः पुण्डरीकाक्षो मेघरावोऽम्बुकुकुटी ।
आरा नन्दीमुखी वाटी सुमुखाः सहचारिणः ॥ ४३ ॥
रोहिणी कामकाली च सारसो रक्तशीर्षकः ।
चक्रवाकास्तथाऽन्ये च खगाः सन्त्यम्बुचारिणः ॥ ४४ ॥
हंस, क्रौंच, बलाका, बगुला, कारण्डव (हंसभेद बत्तख), प्लव, शरारि,
पुष्कराह, केशरी, मानतुण्डक, मद्गु (जलकौवा), कादम्ब, काकतुण्ड,
उत्क्रोश (कुरल), पुण्डरीकाक्ष, मेघराव (मेघनाद मोर), अम्बुकुकुटी (पानी
की मुर्गी), आरा, नन्दीमुखी, वाटी, सुमुख, सहचारी, रोहिणी, कामकाली,
सारस, लाल शिर बाला सारस, चक्रवाक (चकवा) और अन्य जलचर पक्षी
पानीमें विचरने वाले हैं ॥४१-४४॥
पृषतः शरभो रामः श्वदंष्ट्रा मृगमातृका ।
शशोगण्डो कुरङ्गश्च गोकर्णः कोट्टकारकः ॥ ४५ ॥
३३० चरकसंहिता [ अ० २७
चारुष्को हरिणैणौ च शम्बरः कालपुच्छकः ।
ऋष्यश्च वरपोतश्च विज्ञेया जाङ्गला मृगाः ॥ ४६ ॥
चित विरंगे हरिण, शरभ ( आठ पांव का ऊंठ के आकार का मोटे सींगों
का एक हरिण, इस के पीठ में चार पाये होते हैं, काश्मीर देश में प्रसिद्ध है ),
राम ( हिमालय का महामृग ) श्वदंष्ट्रा ( चार दांत का एक जाति का पशु ),
मृगमातृका ( छोटा-मोटे उदर वाला पशु ), शश हरिण, कुरङ्ग ( हरिणभेद )
गोकर्ण ( गाय के से मुख का हरिण ), कोट्टकारक, चारुष्क, हरिण, एण,
शम्बर ( सांभर ), कालपुच्छ, ऋष्य और वरपोत ये जंगली मृग हैं । यहां पर
शश-शब्द मृगवाची है । जैसे चन्द्रमा को शशांक और मृगाङ्क कहते हैं इसमें
वस्तु तो एक होनी चाहिये या तो शशका चिन्ह हो या मृग का ॥ ४५-४६ ॥
लावो वर्ती बकश्चैव वार्तीकः सकपिञ्जलः ।
चकोरश्चोपचक्रश्च कुकुभो रक्तवर्णकः ॥ ४७ ॥
लावाद्या विष्किरास्त्वेते वक्ष्यन्ते वर्तकादयः ।
वर्तको वर्तिका चैव बर्ही तित्तिरिकुक्कुटौ ॥ ४८ ॥
कङ्क-सारपदेन्द्राभ-गोनर्द-गिरिवर्तकाः
क्रकरोऽवकरश्चैव वारटाश्चेति विष्किराः ॥ ४६ ॥
बटेर, वर्त्ती ( तीतर ), बक ( बगुला ), वार्तीक ( बतख ), कपिञ्जल
(श्वेत तीतर), चकोर, उपचक्र (चकोर भेद), कुकुभ, रक्तवर्णक, विष्किर पक्षी हैं ।
वर्त्तक ( बटेर ), वर्त्तिका, बर्ही ( मोर ), तीतर, कुक्कुट, कङ्क, सारपद, इन्द्राभ,
गोनर्द, गिरिवर्त्तक, क्रकर, अवकर और वारटा से सब मुर्गा जाति के 'विष्किर'
पक्षी हैं ॥ ४७-४९ ॥
शतपत्रो भृङ्गराजः कोयष्टी जीवजीवकः ।
कैरातः कोकिलोऽत्यूहो गोपापुत्रः प्रियात्मजः ॥ ५० ॥
लट्वा लट्वषको बभ्रुर्वटहा डिण्डिमानकः ।
जटी दुन्दुभिवा ( पा ) कार-लोह-पृष्ठ-कुलिङ्गकाः ॥ ५१ ॥
कपोत-शुक-सारङ्गाश्चिरिटी-ककुयष्टिकाः ।
शारिका कलविङ्कश्च चतकोऽङ्गारचूडकः ॥ ५२ ॥
पारावतः पानविक इत्युक्ताः प्रतुदा द्विजाः ।
शतपत्र ( कटफोड़ा ) भृंगराज ( भांवरा ), कोयष्टि ( कोड़ा ) जीवजीवक,
कैरात, कोकिल, अत्यूहा, गोपापुत्र, प्रियात्मज, लट्वा, लट्वषक, बभ्रु ( [?]
पक्षी, पीले बालोंवाला पक्षी ), वटहा डिंडिमानक ( ऊटकटम्भा