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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० २१] सूत्रस्थानम् २५१

अ० २१] सूत्रस्थानम् २५१
का उपयोग, प्रशान्तिक (नीवार धान्य), प्रियंगु, श्यामाक (सांवाक), क्षुद्रजव,
जौ, कँगनी, कोदों धान्य, मूंग, कुलथी, जंगली मूंग, अरहर की दाल, परवल,
आंवला इनके साथ खाने के लिये देवे; और पीने के लिये पानी में शहद मिला
के देना चाहिये। अनुपान के लिये मेद, मांस और कफ को नष्ट करने वाले
अरिष्टों को अतिस्थूलता नाश करने के लिये प्रयोग करना चाहिये। स्थूलता
का नाश करने की इच्छा वाले पुरुष को, रात में जागना, मैथुन, परिश्रम
करना, चिन्ता करना इनको क्रम से शनैः शनैः बढ़ाना चाहिये ॥ २०-२८ ॥
स्वप्नो हर्षः सुखा शय्या मनसो निर्वृतिः शमः ।
चिन्ता-व्यवाय-व्यायाम-विरामः प्रियदर्शनम् ॥ २९ ॥
नवान्नानि नवं मद्यं ग्राम्यानूपौदका रसाः ।
संस्कृतानि च मांसानि दधि सर्पिः पयांसि च ॥ ३० ॥
इक्षवः शालयो मांसा गोधूमा गुडवैकृतम् ।
बस्तयः स्निग्धमधुरास्तैलाभ्यङ्गश्च सर्वदा ॥ ३१ ॥
स्निग्धमुद्वर्तनं स्नानं गन्धमाल्यनिषेवणम् ।
शुक्लवासो यथाकालं दोषाणामवसेचनम् ॥ ३२ ॥
रसायनानां वृष्याणां योगानामुपसेवनम् ।
हत्वाऽतिकार्श्यमादत्ते नृणामुपचयं परम् ॥ ३३ ॥
अचिन्तनाच्च कार्याणां ध्रुवं संतर्पणेन च ।
स्वप्नप्रसङ्गाच्च नरो वराह इव पुष्यति ॥ ३४ ॥
कृश रोग की चिकित्सा—रात में और दिन में सोना, सदा प्रसन्न रहना,
आराम, गद्देदार पलंग पर सोना, बैठना, मनकी बेफिकरी, शान्ति, चिन्ता न
करना, सम्भोग का न करना, श्रम न करना और इच्छित वस्तुओं का दर्शन,
नये अन्न, नया मद्य, ग्राम्य और जलचर प्राणियों के मांस का रस, संस्कृत
(अच्छी प्रकार बनाये) मांस, दही, घी और दूध, गन्ने, चावल (लाल चावल)
मांस, गेहूँ, गुड़ से बनी वस्तुएं, स्निग्ध और मधुर बस्तियां, सर्वदा तैल मर्दन
स्निग्ध उबटन, स्नान, सुगन्ध और माला का धारण करना, सफेद वस्त्र, समय समय
पर वातादि दोषों का बाहर निकालना, रसायन एवं वाजीकरण-योगों का सेवन
करने से कृशता दूर होकर पुष्टि, बल (मोटापा) आता है। कार्यों की चिन्ता
न करने (बेफिक्री) से, नित्य प्रति सन्तर्पण क्रिया द्वारा और रात दिन सोने
से मनुष्य सूअर की तरह पुष्ट हो जाता है ॥ २९-३४ ॥
यदा तु मनसि क्लान्ते कर्मात्मानः क्लमान्विताः ।

२५२ चरकसंहिता [ अ० २१
विषयेभ्यो निवर्तन्ते तदा स्वपिति मानवः ॥ ३५ ॥
निद्रायत्तं सुखं दुःखं पुष्टिः कार्श्यं बलाबलम् ।
वृषता क्लीबता ज्ञानमज्ञानं जीवितं न च ॥ ३६ ॥
अकालेऽतिप्रसङ्गाच्च न च निद्रा निषेविता ।
सुखायुषी पराकुर्यात्कालरात्रिरिवापरा ॥ ३७ ॥
सैव युक्ता पुनर्युङ्क्ते निद्रा देहं सुखायुषा ।
पुरुषं योगिनं सिद्ध्या सत्या बुद्धिरिवाऽऽगता ॥ ३८ ॥
गीताध्ययन-मद्य-स्त्री-कर्म-भाराध्व-कर्षिताः ।
अजीर्णिनः क्षताः क्षीणा वृद्धा बालास्तथाऽबलाः ॥ ३९ ॥
तृष्णातीसारशूलार्ताः श्वासिनो हिक्किनः कृशाः ।
पतिताभिहतोन्मत्ताः क्लान्ता यानप्रजागरैः ॥ ४० ॥
क्रोध-शोक-भय-क्लान्ता दिवास्वप्नोचिताश्च ये ।
सर्व एते दिवास्वप्नं सेवेरन् सार्वकालिकम् ॥ ४१ ॥
धातुसाम्यं तथा ह्येषां बलं चाप्युपजायते ।
श्लेष्मा पुष्णाति चाङ्गानि स्थैर्यं भवति चाऽऽयुषः ॥ ४२ ॥
जब मन से संयुक्त आत्मा निष्क्रिय हो जाती है, इन्द्रियां क्रियारहित हो
जाती हैं ( रूप, रसादि विषयों से हट जाती है ), तब पुरुष सो जाता है ।
यदि विधिपूर्वक नींद का सेवन किया जाय तो, सुख, शरीर की पुष्टि, बल,
पुरुषत्व ज्ञान और जीवन नींद के अधीन हैं और यदि निद्रा का विधि से सेवन
न किया जाय तो दुःख, कृशता, बलनाश, क्लीबता, अज्ञान, और मरण ये नींद
के अधीन हैं । इसलिये सुख चाहने वाले पुरुष को चाहिये कि दूसरी प्रलय
रात्रि के समान अकाल ( दिन में या सन्ध्याकाल में ) सोना, या बहुत सोना
छोड़ दे । ये नींद के मिथ्यायोग हैं । यदि निद्रा उचित रूप में सेवन की जाय
तो शरीर को सुख और आयु से ऐसे ही युक्त करती है जिस प्रकार योगी पुरुष
को सिद्धि से तत्त्वज्ञान प्राप्त होता है ।
गीत गाने से कृशपुरुष, पढ़ने से कृश, मद्यपान करने वाले स्त्री-सेवा
करने वाले, वमन विरेचनादि कर्म में, मार्ग चलने से कृश हुए, अतिसार आदि
से कृश, अजीर्ण रोगी, उरक्षत रोगी, क्षीण (जिनके रस रक्तादि धातु क्षीण) हों,
वृद्ध, बालक, स्त्रियां ( कमज़ोर ) तृणारोगी, शूल से पीड़ित, श्वास से कृश,
ऊपर से गिरे, चोट लगे हुए, उन्मत्त ( धतूरा आदि खाने से ), थके हुए,
सवारी करने से, रात में जागने से, क्रोध, शोक, भय से निष्क्रिय पुरुषों को दिन में
सोना उचित है । ये ऊपर लिखे पुरुष सब कालों में दिन में सो सकते हैं ।

दिन में सोने से इनके विषम धातु सम होते हैं, बल बढ़ता है, कफ अंगों को
पुष्ट करता है और आयु स्थिर होती है * ॥ ३५-४२ ॥
ग्रीष्मे चाऽऽदानरूक्षाणां वर्धमाने च मारुते ।
रात्रीणां चातिसङ्क्षेपाद्दिवास्वप्नः प्रशस्यते ॥ ४३ ॥
ग्रीष्मवर्ज्येषु कालेषु दिवास्वप्नात्प्रकुप्यतः ।
श्लेष्मपित्ते, दिवास्वप्नस्तस्मात्तेषु न शस्यते ॥ ४४ ॥
मेदस्विनः स्नेहहित्याः श्लेष्मलाः श्लेष्मरोगिणः ।
दूषीविषार्ताश्च दिवा न शयीरन् कदाचन ॥ ४५ ॥
हलीमकः शिरः शूलं स्तैमित्यं गुरुगात्रता ।
अङ्गमर्दोऽग्निनाशश्च प्रलेपो हृदयस्य च ॥ ४६ ॥
शोथारोचक-हल्लास-पीनसार्द्धावभेदकाः ।
कोठोऽरुः पिडकाः कण्डूस्तन्द्रा कासो गलामयाः ॥ ४७ ॥
स्मृति-बुद्धि-प्रमोहश्च संरोधः स्रोतसां ज्वरः ।
इन्द्रियाणामसामर्थ्यं विष-वेग-प्रवर्तनम् ॥ ४८ ॥
भवेन्नॄणां दिवास्वप्नस्याहितस्य निषेवणात् ।
तस्माद्धिताहितं स्वप्नं बुद्ध्वा स्वप्यात्सुखं बुधः ॥ ४९ ॥
रात्रौ जागरणं रूक्षं स्निग्धं प्रस्वपनं दिवा ।
अरूक्षमनाभिष्यन्दि त्वासीनप्रचलायितम् ॥ ५० ॥
देहवृत्तौ यथाऽऽहारस्तथा स्वप्नः सुखो मतः ।
स्वप्नाहारसमुत्थे च स्थौल्यकार्यं विशेषतः ॥ ५१ ॥
ग्रीष्म ऋतु आदान काल एवं रूक्ष है, इस समय वायु बढ़ती है, और
रातें बहुत छोटी होती हैं, इसलिये दिन में सोना उत्तम है। ग्रीष्म ऋतु को
छोड़कर और ऋतुओं में सोने से कफ और पित्त विकृत होते हैं, इसलिये इन
समयों में दिन के समय सोना ठीक नहीं है। मेदस्वी, नित्य स्नेह का सेवन करने
वाले, कफप्रकृति, कफरोगी, और दूषी विष से पीड़ित पुरुष दिन में खास कर
कभी भी न सोयें । दिन में सोने से हलीमक, शिरोवेदना, अंगों में भारीपन, अंगों

  • नींद का स्थान कहां है ? यह तो कहना कठिन है, परन्तु जब मन या
    मन से युक्त आत्मा मस्तिष्क की पंचम जवनिका ( Fifth Ventrical ) में
    पहुंच जाती है तब पुरुष को नींद आती है। इस जवनिका के साथ किसी भी
    ज्ञानतन्तु का सम्बन्ध नहीं है। इसी से कहा है—"स्वप्नश्च निरिन्द्रियप्रदेशे
    मनोऽवस्थानम्” ॥

२४४ चरकसंहिता [ अ० २१
को गीले वस्त्र से ढांपने की भांति प्रतीति, अंगों का टूटना, जाठराग्नि की क्षीणता,
हृदय का कफ से लिप्त होना, सूजन, अरुचि, वमनेच्छा, पीनस, आधा सीसी, कोठ
(बर्रें के काटे के भांति), फुन्सियां, खाज, तन्द्रा, आलस्य, कास, गले के रोग
स्मृति नाश, बुद्धिनाश, मूर्च्छा, स्रोतों का अवरोध, ज्वर, इन्द्रियों में असमर्थता,
विष के वेग का जोर (फिर से चढ़ना) ये लक्षण अहितकारी निद्रा अर्थात्
दिन में सोने से उत्पन्न होते हैं। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अहि-
तकारी नींद का त्याग करे, और हितकारी नींद का सेवन करे इससे सुख होगा।
रात्रि में जागने से शरीर में रूक्षता और दिन में सोने से स्निग्धता बढ़ती है।
और बैठे-बैठे सोना न तो रूक्षता उत्पन्न करता है, न अभिष्यन्द अर्थात् स्निग्धता
उत्पन्न करता है। शरीर के धारण के लिये जिस प्रकार भोजन सुखकारक होता
है, उसी प्रकार नींद भी आवश्यक है। इसलिये स्थूलता और कृशता मुख्य
रूप से आहार और निद्रा पर अवलम्बित है ॥ ४३-५१ ॥
अभ्यङ्गोत्सादनं स्नानं ग्राम्यानूपौदका रसाः ।
शाल्यन्नं सदधि क्षीरं स्नेहो मद्यं मनःसुखम् ॥ ५२ ॥
मनसोऽनुगुणा गन्धाः शब्दाः संवाहनानि च ।
चक्षुषस्तर्पणं लेपः शिरसो वदनस्य च ॥ ५३ ॥
स्वास्तीर्णं शयनं वेश्म सुखं कालस्तथांचितः ।
आनयन्त्यचिरान्निद्रां प्रनष्टा या निमित्ततः ॥ ५४ ॥
तैलमर्दन, उबटन, स्नान, ग्राम्य या जलचर प्राणियों का मांस रस,
चावल, दही, दूध, स्नेह (घी-तैल) मद्य, मन की प्रिय वस्तुएं, मनोनुकूल
सुगन्धि, शब्द और संवाहन (मसाज, मुट्ठी भरना), आँखों का तर्पण, शिर
और मुख, शरीर पर चन्दनादि का लेप, अच्छा बिछा पलंग, सुन्दर घर तथा
उचित समय ये वस्तुएं कारण से नष्ट हुई नींद को शीघ्र ही उत्पन्न कर
देती हैं * ॥५२-५४॥
कायस्य शिरसश्चैव विरेकश्छर्दनं भयम् ।
चिन्ता क्रोधस्तथा धूमो व्यायाम रक्तमोक्षणम् ॥ ५५ ॥
उपवासोऽसुखा शय्या सत्त्वौदार्यं तमोजयः ।
निद्राप्रसङ्गमहितं वारयन्ति समुत्थितम् ॥ ५६ ॥

  • यदि मस्तिष्क में स्थित निद्रा को नियमित करने वाला केन्द्र नष्ट कर
    दिया जाय या चोट आदि से नष्ट हो जाय अथवा विक्षत हो जाय तो पुरुष
    को नींद का आना असम्भव हो जाता है। जब तक मस्तिष्क में यह केन्द्र ठीक
    है तभी तक यह चिकित्सा फलवती हो सकती है ।