चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ११] सूत्रस्थानम् १३७
अ० ११] सूत्रस्थानम् १३७
जो अन्य ज्योतिष, व्याकरण, आयुर्वेद स्मृति आदि हैं, वे भी आप्नागम अर्थात्
शब्द प्रमाण हैं। आप्तागम से भी जाना जाता है कि ज्ञान, तप (द्वन्द्व-सहि-
ष्णुता), यज्ञ (अग्निहोत्रादि), सत्य अहिंसा, ब्रह्मचर्य्य आदि कर्म अभ्युदय
(इस लोक में कल्याण) और निःश्रेयस (परलोक में मङ्गल) करने वाले हैं।
मनोदोष, रजम् और तमस् जिन के शान्त नहीं हो गये उन रजोगुणी या तमो-
गुणी पुरुषों को अपुनर्भव नहीं कहा गया, अर्थात् रजोगुणी या तमोगुणी पुरुषों का
पुनर्जन्म होता है। ऐसा धर्म शास्त्रों में उपदेश किया गया है। धर्मशास्त्रों में
सावधान, राग, मोह, द्वेष, भय, लोभ, मोह, मान से रहित, ब्रह्मचारी, आप्त
विद्वान्, कर्म योग को जानने वाले, जिन के मन, बुद्धि एवं प्रचार (व्यवहार)
ठीक बने हुए हैं, ऐसे अति प्राचीन महर्षियों ने दिव्य चक्षुओं से देखकर
निश्चयपूर्वक पुनर्जन्म का उपदेश किया है, इसलिये उनका निश्चय सत्य
करके जाने ॥ २८ ॥
प्रत्यक्षमपि चोपलभ्यते-मातापित्राविसदृशान्यपत्यानि, तुल्यसंभ-
वानां वर्ण-स्वराकृति-सत्त्व-बुद्धि-भाग्यविशेषाः, प्रवरावर-कुल-जन्म,
दास्यैश्वर्यम्, सुखासुखमायुः, आयुषो वैषम्यम्, इहाकृतस्याप्राप्तिः, अशि-
क्षितानां च रुदित-स्तन-पान-हास-त्रासादीनां च प्रवृत्तिः, लक्षणोत्पत्तिः,
कर्मसामान्ये फलविशेषः, मेधा कचित्कचित्कर्मण्यमेधा, जातिस्मरणम्,
इहाऽऽगमनमितश्च्युतानां च भूतानां समदर्शने प्रियाप्रियत्वम् ॥२६॥
प्रत्यक्ष से भी जाना जाता है कि पुनर्जन्म है, माता पिता से विभिन्न
प्रकृति के पुत्र (रूपवान् माता पिता का काला पुत्र) होते हैं। एक ही माता
पिता के दो पुत्रों में सगे भाइयों में रंग, स्वर, आकृति, चेहरा, मन, ज्ञान और
भाग्य, प्रारब्ध भिन्न होते हैं, श्रेष्ठ और नीच कुल में जन्म होते हैं। किसी की
दासता और किसी की ऐश्वर्य-सम्पत्ति होती है, कोई सुख पूर्वक जिन्दगी
बसर करता है, कोई दुःख से जीवन व्यतीत करता है, आयु की विषमता, थोड़ा
जीना या अधिक देर जीना, यहां किए कर्म का फल न मिलना, पढ़े सीखे
बिना ही रोने, दुग्ध पान (स्तन्य पान), हँसने डरने आदि कार्यों में प्रवृत्ति
का होना, शरीर पर राज्यचिह्न या दारिद्र्यसूचक चिह्नों का होना, एक सदृश
काम करने पर भी फल में भिन्नता का रहना, कहीं पर बुद्धि का होना और
कहीं पर बुद्धि का न होना, जाति, पूर्व जन्म वृत्तान्त का स्मरण करना, यहां
से मरने पर फिर यहां आना, एक समान एक दृष्टि से देखने पर प्रिय एवं
अप्रिय, राग-द्वेष बुद्धि का उत्पन्न होना ये सब बातें पुनर्जन्म को सिद्ध करती हैं॥
१३८ चरकसंहिता [ अ० ११
अत एवानुमीयते—यत्स्वकृतमपरिहार्यमविनाशि पौर्वदेहिकं
दैवसंज्ञकमानुबन्धिकं कर्म, तस्यैतत्फलम्, इतश्चान्यद्भविष्यतीति ।
फलाद्बीजमनुमीयते, फलं च बीजात् ॥ ३० ॥
उपरोक्त बातों को देखकर ही अनुमान भी किया जाता है कि अपना किया
हुआ कर्म नहीं छोड़ा जा सकता, उसका विनाश नहीं हो सकता, पूर्व जन्म में
किया हुआ 'भाग्य' नामक आनुबन्धिक अर्थात् आत्मा के साथ परलोक में भी
निश्चित रूप से बँधा हुआ है । उसी का यह फल है जो कि माता पिता से
पुत्र भिन्न प्रकृति के उत्पन्न होते हैं इत्यादि । यहां किये कर्म से दूसरा जन्म
होगा, बीज से फल का अनुमान होता है, कर्म से पुनर्जन्म का और पुनर्जन्म
से कर्म का अनुमान होता है ॥ ३० ॥
युक्तिश्चैषा—षड्धातुसमुदायाद् गर्भजन्म, कर्तृकरणसंयोगात्
क्रिया, कृतस्य कर्मणः फलं नाकृतस्य, नाङ्कुरोत्पत्तिरबीजात्, कर्म-
सदृशं फलं नान्यस्माद्बीजादन्यस्योत्पत्तिरिति युक्तिः ॥ ३१ ॥
युक्ति भी है कि—पृथ्वी, अप्, तेज, वायु, आकाश और चेतना इन छः
धातुओं के समुदाय मिलने से गर्भ उत्पन्न होता है और कर्त्ता और करण
(साधन) के मिलने से क्रिया उत्पन्न होती है, कर्त्ता आत्मा, करण स्त्री पुरुष
उनके संयोग से गर्भाशय रूप क्षेत्र में जन्म होता है । किये हुए ही कर्म का
फल होता है, न किये हुए कर्म का फल नहीं होता । जिस प्रकार बिना बीज
के अंकुर उत्पन्न नहीं होता वैसे कर्म के अनुसार समान ही फल मिलता है
यथा—एक जाति के बीज से दूसरी जाति का फल उत्पन्न नहीं होता ॥ ३१ ॥
एवं प्रमाणैश्चतुर्भिरुपदिष्टे पुनर्भावे धर्मद्वारेष्ववदधीयेत, तद्यथा-
गुरुशुश्रूषायामध्ययने व्रतचर्यायां दारक्रियायामपत्योत्पादने भृत्यभरणेऽ-
तिथिपूजायां दानेऽनभिध्यायां तपस्यनसुआयां देहवाङ्मानसे कर्मण्य-
क्लिष्टे देहेन्द्रिय-मनोऽर्थ-बुद्ध्यात्म-परीक्षायां मनःसमाधाविति, यानि
चान्यान्यप्येवंविधानि कर्माणि सतामविगर्हितानि स्वर्ग्याणि वृत्तिपुष्टि-
कराणि विद्यात्तान्यारभेत कर्तुम् , तथा हि कुर्वन्निह चैव यशो लभते
प्रेत्य च स्वर्गमिति तृतीया परलोकैषणा व्याख्याता भवति ॥ ३२ ॥
इस प्रकार आप्तोपदेश, प्रत्यक्ष, अनुमान और युक्ति चारों प्रमाणों द्वारा
पुनर्जन्म के सिद्ध होने पर धर्म-साधन के मार्गों में चित्त लगावे । यथा—गुरु
माता, पिता, आचार्य की सेवा, अध्ययन-पठन में, ब्रह्मचर्य काय, मन, वाणी
से मैथुन त्याग, ब्रह्मचर्यपालन, विवाह कर्म में, सन्तानोत्पत्ति, आश्रित जन-