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सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

वृन्दावनका दर्शन करते हुए नन्दभवनमें जाना, नन्दद्वारा उनका स्वागत-सत्कार, उन्हें श्रीकृष्णके विविध रूपोंमें दर्शन, उनके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा श्रीकृष्णको मथुरा चलनेकी सलाह देना, गोपियोंद्वारा अक्रूरका विरोध और उनके रथका भञ्जन, श्रीकृष्णका उन्हें समझाना और आकाशसे दिव्य रथका आगमन

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ६५१
पड़ा और उसके चार टुकड़े हो गये। फिर एक
ही समयमें आकाशके भीतर चन्द्रमा और सूर्यके
मण्डलको मैंने पूर्णतः राहुसे ग्रस्त और अत्यन्त
काला देखा। एक ही क्षणके बाद देखती हूँ कि
एक तेजस्वी ब्राह्मणने रोषपूर्वक आकर मेरी
गोदमें रखे हुए अमृत-कलशको फोड़ डाला।
क्षणभर बाद यह दिखायी दिया कि वह महारुष्ट
ब्राह्मण मेरे नेत्रगत पुरुषको पकड़कर लिये जा
रहा है। प्रभो! मेरे हाथसे क्रीड़ा-कमल-दण्ड
सहसा गिर पड़ा और उसके टुकड़े-टुकड़े हो
गये। उत्तम रत्नोंके सारभागसे बना हुआ दर्पण भी
सहसा हाथसे गिरकर टूक-टूक हो गया। जो
पहले निर्मल था, वह पीछे काला दिखायी देने
लगा था। मेरा रत्नसारनिर्मित हार और कमल
छिन्न-भिन्न हो वक्षःस्थलसे खिसककर पृथ्वीपर
गिर पड़ा। कमल अत्यन्त मलिन पड़ गया था।
मेरी अट्टालिकामें जो पुतलियाँ बनी हैं, वे सब-
की-सब क्षण-क्षणमें नाचती, हँसती, ताल ठोकती,
गाती और रोती दिखायी दीं। आकाशमें काले
रंगका एक विशाल चक्र बारंबार घूमता दिखायी
दिया, जो बड़ा भयंकर था। वह कभी नीचेको
गिरता और फिर ऊपरको उठ जाता था। मेरे
प्राणोंका अधिष्ठाता देवता पुरुषरूपमें भीतरसे बाहर
निकला और मुझसे बोला- 'राधे! बिदा होकर
अब मैं यहाँसे जा रहा हूँ।' काले वस्त्र पहने हुए
एक काली प्रतिमा दिखायी दी, जो मेरा आलिङ्गन
और चुम्बन करने लगी। प्राणवल्लभ ! यह विपरीत
लक्षण देखकर मेरे दायें अङ्ग फड़क रहे हैं
और प्राण आन्दोलित हो रहे हैं। वे शोकसे रोते
और क्षीण होते हैं। मेरा चित्त उद्विग्न हो उठा
है। नाथ! तुम वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हो। बताओ, यह
सब क्या है? क्या है?
यों कहकर राधिकादेवी शोकसे विह्वल
और भयभीत हो श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें गिर
पड़ीं। उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये थे।
भगवान् श्रीकृष्णने राधाको उठाकर सान्त्वना दी
और उनके प्रति अपना महान् स्नेह प्रकट किया।
तब राधा बोलीं- श्यामसुन्दर ! जब मैं आपके
साथ रहती हूँ, तब हर्षसे खिल उठती हूँ और
आपके बिना मलिन हो मृतक-तुल्य हो जाती हूँ।
आपके साथ रहनेपर मैं उसी प्रकार चमक उठती
हूँ, जैसे प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर विशिष्ट ओषधियाँ
तथा रजनीमें दीपशिखा। आपके बिना मैं दिन-
दिन उसी तरह क्षीण होने लगती हूँ, जैसे कृष्णपक्षमें
चन्द्रमाकी कला। आपके वक्षमें विराजमान होनेपर
मेरी दीप्ति पूर्ण चन्द्रमाकी प्रभाके समान प्रकाशित
होती है और जब आप मुझे त्यागकर अन्यत्र चले
जाते हैं, तब मैं तत्काल ऐसी हो जाती हूँ, मानो मर
गयी। मैं अमावास्याके चन्द्रमाकी कलाके समान
विलीन-सी हो जाती हूँ। घीकी आहुति पाकर
जैसे अग्निशिखा प्रज्वलित हो उठती है, उसी
प्रकार आपका साथ पाकर मैं दीप्तिसे दमक
उठती हूँ और आपके बिना शिशिर-ऋतुमें
कमलिनीकी भाँति बुझ-सी जाती हूँ। जब मेरे
पाससे तुम चले जाते हो, तब मैं चिन्तारूपी ज्वर
या जरासे ग्रस्त हो जाती हूँ। जैसे सूर्य और
चन्द्रमाके अस्त होनेपर सारी भूमि अन्धकारसे
आच्छन्न हो जाती है, उसी तरह जब तुम दृष्टिसे
ओझल होते हो, तब मैं शोक और दुःखमें डूब
जाती हूँ। तुम्हीं सबके आत्मा हो; विशेषतः मेरे
प्राणनाथ हो। जैसे जीवात्माके त्याग देनेपर शरीर
मुर्दा हो जाता है, उसी प्रकार मैं तुम्हारे बिना मरी-
सी हो जाती हूँ। तुम मेरे पाँचों प्राण हो।
तुम्हारे बिना मैं मृतक हूँ, ठीक उसी तरह जैसे
नेत्रगोलक आँखकी पुतलीके बिना अंधे होते हैं।
जैसे चित्रोंसे युक्त स्थानकी शोभा बढ़ जाती है,
उसी तरह तुम्हारे साथ मेरी शोभा अधिक हो
जाती है और जब तुम मेरे साथ नहीं रहते हो तब
मैं तिनकोंसे आच्छादित और झाड़-बुहार या
सजावटसे रहित भूमिकी भाँति शोभाहीन हो जाती

६५२
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
हूँ। श्रीकृष्ण ! तुम्हारे साथ मैं चित्रयुक्त मिट्टीकी
प्रतिमाकी भाँति सुशोभित होती हूँ और तुम्हारे
बिना जलसे धोयी हुई मिट्टीकी मूर्तिकी तरह
कुरूप दिखायी देती हूँ। तुम रासेश्वर हो। तुमसे
ही गोपाङ्गनाओंकी शोभा होती है, जैसे सोनेकी
माला श्वेत मणिका संयोग पाकर अधिक सुशोभित
होने लगती है। व्रजराज ! तुम्हारे साथ राजाओंकी
श्रेणियाँ उसी तरह शोभा पाती हैं, जैसे आकाशमें
चन्द्रमाके साथ तारावलियाँ। नन्दनन्दन ! जैसे शाखा,
फल और तनोंसे वृक्षावलियाँ सुशोभित होती हैं,
उसी प्रकार तुमसे नन्द और यशोदाकी शोभा है।
गोकुलेश्वर ! जैसे समस्त लोकोंकी श्रेणियाँ राजेन्द्रसे
सुशोभित होती हैं, उसी प्रकार समस्त गोकुलवासियोंकी
शोभा तुम्हारे साथ रहनेसे ही है। रासेश्वर ! जैसे
स्वर्गमें देवराज इन्द्रसे ही अमरावतीपुरी शोभित
होती है, उसी प्रकार रासमण्डलको भी तुमसे ही
मनोहर शोभा प्राप्त होती है। जैसे बलवान् सिंह
अन्यान्य वनोंकी शोभा, स्वामी और सहारा है,
उसी प्रकार तुम्हीं वृन्दावनके वृक्षोंकी शोभा,
संरक्षक और आश्रयदाता हो। जैसे गाय अपने
बछड़ेको न पाकर व्याकुल हो डकराने लगती
है, उसी प्रकार माता यशोदा तुम्हारे बिना शोकसागरमें
निमग्न हो जाती हैं। जैसे तपे हुए पात्रमें धान्यराशि
जल जाती है, उसी प्रकार तुम्हारे बिना
नन्दजीका हृदय दग्ध होने लगता है और प्राण
आन्दोलित हो उठते हैं।
यों कहकर अत्यन्त प्रेमके कारण राधा
श्रीहरिके चरणोंमें गिर पड़ीं। श्रीहरिने पुनः
अध्यात्म-ज्ञानकी बातें कहकर उन्हें समझाया-
बुझाया। नारद ! आध्यात्मिक महायोग उसी तरह
मोहके उच्छेदका कारण कहा गया है, जैसे तीखी
धारवाला कुठार वृक्षोंके काटनेमें हेतु होता है।
नारदने कहा- वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन् !
लोकोंके शोकका उच्छेद करनेवाले आध्यात्मिक
महायोगका वर्णन कीजिये। मेरे मनमें उसे सुननेके
लिये उत्कण्ठा है।
श्रीनारायणने कहा-आध्यात्मिक महायोग
योगियोंकी भी समझमें नहीं आता। उसके अनेक
प्रकार हैं। उन सबको सम्यक्-रूपसे स्वयं
श्रीहरि ही जानते हैं। रमणीय क्रीड़ासरोवरके
तटपर कृपानिधान श्रीकृष्णने शोकाकुल राधिकाको
जो आध्यात्मिक योग सुनाया था, उसीका वर्णन
करता हूँ, सुनो।
श्रीकृष्ण बोले- प्रिये ! तुम्हें तो पूर्वजन्मकी
बातोंका स्मरण है। अपने-आपको याद करो। क्यों
भूली जा रही हो ? गोलोकका सारा वृत्तान्त और
सुदामाका शाप क्या तुम्हें याद नहीं है ? महाभागे !
उस शापके कारण कुछ दिनोंतक मुझसे तुम्हारा
वियोग रहेगा। शापकी अवधि समाप्त होनेपर
फिर हम दोनोंका मिलन होगा। फिर मैं गोलोकवासी
गोपों और गोपाङ्गनाओंके साथ अपने परमधाम
गोलोकको चलूँगा। इस समय मैं तुमसे कुछ
आध्यात्मिक ज्ञानकी बातें कहता हूँ, सुनो। यह
सारभूत ज्ञान शोकका नाशक, आनन्दवर्धक तथा
मनको सुख देनेवाला है। मैं सबका अन्तरात्मा
और समस्त कर्मोंसे निर्लिप्त हूँ। सबमें सर्वत्र
विद्यमान रहकर भी कभी किसीके दृष्टिपथमें
नहीं आता हूँ। जैसे वायु सर्वत्र सभी वस्तुओंमें
विचरती है, किंतु किसीसे लिप्त नहीं होती; उसी
प्रकार मैं समस्त कर्मोंका साक्षी हूँ। उन कर्मोंसे
लिप्त नहीं होता हूँ। सर्वत्र समस्त जीवधारियोंमें
जो जीवात्मा हैं, वे सब मेरे ही प्रतिबिम्ब हैं।
जीवात्मा सदा समस्त कर्मोंका कर्ता और उनके
शुभाशुभ फलोंका भोक्ता है। जैसे जलके घड़ोंमें
चन्द्रमा और सूर्यके मण्डलका पृथक्-पृथक्
प्रतिबिम्ब दिखायी देता है, किंतु उन घड़ोंके फूट
जानेपर वे सारे प्रतिबिम्ब चन्द्रमा और सूर्यमें ही
विलीन हो जाते हैं; उसी प्रकार अन्तःकरणरूपी
उपाधिके मिट जानेपर समस्त चित् प्रतिबिम्ब-जीव
मुझमें ही अन्तर्हित हो जाते हैं। प्रिये ! समयानुसार

श्रीकृष्णजन्मखण्ड
६५३
समस्त जीवधारियोंकी मृत्यु हो जानेपर जीव
मुझसे ही संयुक्त होता है। हम दोनों सदा समस्त
जन्तुओंमें विद्यमान हैं। सम्पूर्ण जगत् आधेय है
और मैं इसका आधार हूँ। आधारके बिना आधेय
उसी तरह नहीं रह सकता, जैसे कारणके बिना
कार्य। सुन्दरि ! संसारके समस्त द्रव्य नश्वर हैं।
कहीं किन्हीं पदार्थोंका आविर्भाव अधिक होता
है और कहीं कम। कुछ देवता मेरे अंश हैं, कुछ
कला हैं, कुछ कलाकी कलाके भी अंश हैं और
कुछ उस अंशके भी अंशांश हैं। मेरी अंशस्वरूपा
प्रकृति सूक्ष्मरूपिणी है। उसकी पाँच मूर्तियाँ हैं-
सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा, तुम (राधा) और वेदजननी
सावित्री। जितने भी मूर्तिधारी देवता हैं, वे सब
प्राकृतिक हैं। मैं सबका आत्मा हूँ और भक्तोंके
ध्यानके लिये नित्य देह धारण करके स्थित हूँ।
राधे ! जो-जो प्राकृतिक देहधारी हैं, वे प्राकृत
प्रलयमें नष्ट हो जाते हैं। सबसे पहले मैं ही था
और सबके अन्तमें भी मैं ही रहूँगा। जैसा मैं हूँ,
वैसी ही तुम भी हो। जैसे दूध और उसकी
धवलतामें कभी भेद नहीं होता, उसी प्रकार
निश्चय ही हम दोनोंमें भेद नहीं है। प्रारम्भिक
सृष्टिमें मैं ही वह महान् विराट् हूँ, जिसकी
रोमावलियोंमें असंख्य ब्रह्माण्ड विद्यमान हैं। वह
महाविराट् मेरा अंश है और तुम अपने अंशसे
उसकी पत्नी हो। बादकी सृष्टिमें मैं ही वह क्षुद्र
विराट् हूँ, जिसके नाभिकमलसे इस विश्व-
ब्रह्माण्डका प्राकट्य हुआ है। विष्णुके रोमकूपमें
मेरा आंशिक निवास है। तुम्हीं अपने अंशसे उस
विष्णुकी सुन्दरी स्त्री हो। उसके प्रत्येक विश्वमें
ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता विद्यमान हैं।
वे ब्रह्मा, विष्णु और शिव तथा अन्य ब्रह्माण्डोंके
ब्रह्मा आदि देवता भी मेरी ही कलाएँ हैं। देवि !
समस्त चराचर प्राणी मेरी कलाकी अंशांशकलासे
प्रकट हुए हैं। तुम वैकुण्ठमें महालक्ष्मी हो और
मैं वहाँ चतुर्भुज नारायण हूँ। वैकुण्ठ भी उसी
तरह विश्वब्रह्माण्डसे बाहर है, जैसे गोलोक।
सत्यलोकमें तुम्हीं सरस्वती तथा ब्रह्मप्रिया सावित्री
हो। शिवलोकमें जो मूलप्रकृति ईश्वरी शिवा हैं,
वे भी तुमसे भिन्न नहीं हैं, वे दुर्गम संकटका नाश
करनेके कारण सर्वदुर्गतिनाशिनी 'दुर्गा' कहलाती
हैं। वे ही दक्षकन्या सती हैं और वे ही हैं
गिरिराजकुमारी पार्वती। कैलासमें सौभाग्यशालिनी
पार्वती शिवके वक्षःस्थलपर विराजमान होती हैं।
तुम्हीं अपने अंशसे सिन्धुकन्या होकर क्षीरसागरमें
श्रीविष्णुके वक्षःस्थलपर विराजमान होती हो।
सृष्टिकालमें मैं ही अपने अंशसे ब्रह्मा, विष्णु और
शिवरूप धारण करता हूँ तथा तुम लक्ष्मी, शिवा,
धात्री एवं सावित्री आदि पृथक् पृथक् रूप
धारण करती हो। गोलोकके रासमण्डलमें तुम
स्वयं ही सदा रासेश्वरीके पदपर प्रतिष्ठित हो।
रमणीय वृन्दावनमें वृन्दा तथा विरजा-तटपर
विरजाके रूपमें तुम्हीं शोभा पाती हो। वही तुम
इस समय सुदामाके शापसे पुण्यभूमि भारतवर्षमें
आयी हो। सुन्दरि ! भारतवर्ष और वृन्दावनको
पवित्र करना ही तुम्हारे शुभागमनका उद्देश्य है।
समस्त लोकोंमें जो सम्पूर्ण स्त्रियाँ हैं, वे तुम्हारी
ही कलांश-कलासे प्रकट हुई हैं। जो स्त्री है, वह
तुम हो; जो पुरुष है, वह मैं हूँ। मैं ही अपनी
कलासे अग्निरूपमें प्रकट हुआ हूँ और तुम
अग्निकी दाहिका शक्ति एवं प्रियपत्नी स्वाहा हो।
तुम्हारे साथ रहनेपर ही मैं जलानेमें समर्थ हूँ,
तुम्हारे बिना नहीं। मैं दीप्तिमानोंमें सूर्य हूँ और
तुम्हीं अपनी कलासे संज्ञा होकर प्रभाका विस्तार
करती हो। तुम्हारे सहयोगसे ही मैं प्रकाशित होता
हूँ। तुम्हारे बिना मैं दीप्तिमान् नहीं हो सकता। मैं
कलासे चन्द्रमा हूँ और तुम शोभा तथा रोहिणी
हो। तुम्हारे साथ रहकर ही मैं मनोहर बना हूँ;
तुम्हारे न होनेपर तो मुझमें कोई सौन्दर्य नहीं है।
मैं ही अपनी कलासे इन्द्र हुआ हूँ और तुम्हीं
स्वर्गकी मूर्तिमती लक्ष्मी शची हो। तुम्हारे साथ

६५४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

होनेसे ही मैं देवताओंका राजा इन्द्र हूँ; तुम्हारे बिना तो मैं श्रीहीन हो जाऊँगा। मैं ही अपनी कलासे धर्म हूँ और तुम धर्मकी पत्नी मूर्ति हो। यदि धर्म-क्रियारूपिणी तुम साथ न दो तो मैं धर्मकृत्यके सम्पादनमें असमर्थ हो जाऊँ। मैं ही कलासे यज्ञरूप हूँ और तुम अपने अंशसे दक्षिणा हो। तुम्हारे साथ ही मैं यज्ञफलका दाता हूँ; तुम न हो तो मैं फल देनेमें कदापि समर्थ न होऊँ। मैं ही अपनी कलासे पितृलोक हूँ और तुम अपने अंशसे सती स्वधा हो। तुम्हारे सहयोगसे ही मैं कव्य (श्राद्ध)-दानमें समर्थ होता हूँ; तुम न हो तो मैं उसमें कदापि समर्थ न हो सकूँगा। मैं पुरुष हूँ और तुम प्रकृति हो; तुम्हारे बिना मैं सृष्टि नहीं कर सकता। ठीक वैसे ही, जैसे कुम्हार मिट्टीके बिना घड़ा नहीं बना सकता। तुम सम्पत्तिरूपिणी हो और मैं तुम्हारे साथ उस सम्पत्तिका ईश्वर हूँ। लक्ष्मीस्वरूपा तुमसे संयुक्त होकर ही मैं लक्ष्मीवान् बना हूँ; तुम्हारे न होनेसे तो मैं सर्वथा लक्ष्मीहीन ही हूँ। मैं कलासे शेषनाग हुआ हूँ और तुम अपने अंशसे वसुधा हो। सुन्दरि! शस्य तथा रत्नोंकी आधारभूता तुमको मैं अपने मस्तकपर धारण करता हूँ। तुम कान्ति, शान्ति, मूर्तिमती, सद्द्भूति, तुष्टि, पुष्टि, क्षमा, लज्जा, क्षुधा, तृष्णा, परा, दया, निद्रा, शुद्धा, तन्द्रा, मूर्च्छा, संनति और क्रिया हो। मूर्ति और भक्ति तुम्हारी ही स्वरूपभूता हैं। तुम्हीं देहधारियोंकी देह हो; सदा मेरी आधारभूता हो और मैं तुम्हारा आत्मा हूँ। इस प्रकार हम दोनों एक-दूसरेके शरीर और आत्मा हैं। जैसी तुम, वैसा मैं; दोनों सम—प्रकृति-पुरुषरूप हैं। देवि! हममेंसे एकके बिना भी सृष्टि नहीं हो सकती।

नारद! इस प्रकार परमप्रसन्न परमात्मा श्रीकृष्णने प्राणाधिका प्रिया श्रीराधाको हृदयसे लगाकर बहुत समझाया-बुझाया। फिर वे पुष्प-शय्यापर सो गये।

(अध्याय ६६-६७)

श्रीकृष्णको ब्रजमें जाते देख राधाका विलाप एवं मूर्च्छा, श्रीहरिका उन्हें समझाना, श्रीराधाके सो जानेपर ब्रह्मा आदि देवताओंका आना और स्तुति करके श्रीकृष्णको मथुरा जानेके लिये प्रेरित करना, श्रीकृष्णका जाना, श्रीराधाका उठना और प्रियतमके लिये विलाप करके मूर्च्छित होना, श्रीकृष्णका लौटकर आना, रत्नमालाका श्रीकृष्णको राधाकी अवस्था बताना, श्रीकृष्णका राधाके लिये स्वप्नमें मिलनेका वरदान देकर ब्रजमें जाना

**श्रीनारायण कहते हैं—**नारद! पुरातन परमेश्वर श्यामसुन्दर श्रीकृष्णने पुष्पशय्यासे उठकर निद्रामें निमग्न हुई अपनी प्राणोपमा प्रियतमा श्रीराधाको तत्काल ही जगाया। वस्त्रके अञ्चलसे उनके मुँहको पोंछ निर्मल करके मधुसूदनने मधुर एवं शान्त वाणीमें उनसे कहा।

**श्रीकृष्ण बोले—**पवित्र मुस्कानवाली रासेश्वरि! व्रजस्वामिनि! क्षणभर रासमण्डलमें ही ठहरो अथवा वृन्दावनमें घूमो या गोष्ठमें ही चली जाओ। अथवा तुम रासकी अधिष्ठात्री देवी हो; इसलिये क्षणभर इस रासमण्डलमें ही रासरसका आस्वादन करो। जैसे ग्राम-ग्राममें सर्वत्र ग्रामदेवता रहते हैं, उसी तरह रासेश्वरीको रासमें सदा रहना चाहिये। अथवा सुन्दरि! तुम अपनी प्यारी सखियोंके साथ क्षणभरके लिये चन्दनवन या चम्पकवनमें घूम आओ, या यहीं रहो; मैं कुछ क्षणके लिये घरको जाऊँगा, वहाँ मुझे एक विशेष कार्य करना है; अतः प्राणवल्लभे! थोड़ी देरके लिये प्रसन्नतापूर्वक