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सर्वकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 662, कुल 810 में से

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पृष्ठ 662

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संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
हूँ। श्रीकृष्ण ! तुम्हारे साथ मैं चित्रयुक्त मिट्टीकी
प्रतिमाकी भाँति सुशोभित होती हूँ और तुम्हारे
बिना जलसे धोयी हुई मिट्टीकी मूर्तिकी तरह
कुरूप दिखायी देती हूँ। तुम रासेश्वर हो। तुमसे
ही गोपाङ्गनाओंकी शोभा होती है, जैसे सोनेकी
माला श्वेत मणिका संयोग पाकर अधिक सुशोभित
होने लगती है। व्रजराज ! तुम्हारे साथ राजाओंकी
श्रेणियाँ उसी तरह शोभा पाती हैं, जैसे आकाशमें
चन्द्रमाके साथ तारावलियाँ। नन्दनन्दन ! जैसे शाखा,
फल और तनोंसे वृक्षावलियाँ सुशोभित होती हैं,
उसी प्रकार तुमसे नन्द और यशोदाकी शोभा है।
गोकुलेश्वर ! जैसे समस्त लोकोंकी श्रेणियाँ राजेन्द्रसे
सुशोभित होती हैं, उसी प्रकार समस्त गोकुलवासियोंकी
शोभा तुम्हारे साथ रहनेसे ही है। रासेश्वर ! जैसे
स्वर्गमें देवराज इन्द्रसे ही अमरावतीपुरी शोभित
होती है, उसी प्रकार रासमण्डलको भी तुमसे ही
मनोहर शोभा प्राप्त होती है। जैसे बलवान् सिंह
अन्यान्य वनोंकी शोभा, स्वामी और सहारा है,
उसी प्रकार तुम्हीं वृन्दावनके वृक्षोंकी शोभा,
संरक्षक और आश्रयदाता हो। जैसे गाय अपने
बछड़ेको न पाकर व्याकुल हो डकराने लगती
है, उसी प्रकार माता यशोदा तुम्हारे बिना शोकसागरमें
निमग्न हो जाती हैं। जैसे तपे हुए पात्रमें धान्यराशि
जल जाती है, उसी प्रकार तुम्हारे बिना
नन्दजीका हृदय दग्ध होने लगता है और प्राण
आन्दोलित हो उठते हैं।
यों कहकर अत्यन्त प्रेमके कारण राधा
श्रीहरिके चरणोंमें गिर पड़ीं। श्रीहरिने पुनः
अध्यात्म-ज्ञानकी बातें कहकर उन्हें समझाया-
बुझाया। नारद ! आध्यात्मिक महायोग उसी तरह
मोहके उच्छेदका कारण कहा गया है, जैसे तीखी
धारवाला कुठार वृक्षोंके काटनेमें हेतु होता है।
नारदने कहा- वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन् !
लोकोंके शोकका उच्छेद करनेवाले आध्यात्मिक
महायोगका वर्णन कीजिये। मेरे मनमें उसे सुननेके
लिये उत्कण्ठा है।
श्रीनारायणने कहा-आध्यात्मिक महायोग
योगियोंकी भी समझमें नहीं आता। उसके अनेक
प्रकार हैं। उन सबको सम्यक्-रूपसे स्वयं
श्रीहरि ही जानते हैं। रमणीय क्रीड़ासरोवरके
तटपर कृपानिधान श्रीकृष्णने शोकाकुल राधिकाको
जो आध्यात्मिक योग सुनाया था, उसीका वर्णन
करता हूँ, सुनो।
श्रीकृष्ण बोले- प्रिये ! तुम्हें तो पूर्वजन्मकी
बातोंका स्मरण है। अपने-आपको याद करो। क्यों
भूली जा रही हो ? गोलोकका सारा वृत्तान्त और
सुदामाका शाप क्या तुम्हें याद नहीं है ? महाभागे !
उस शापके कारण कुछ दिनोंतक मुझसे तुम्हारा
वियोग रहेगा। शापकी अवधि समाप्त होनेपर
फिर हम दोनोंका मिलन होगा। फिर मैं गोलोकवासी
गोपों और गोपाङ्गनाओंके साथ अपने परमधाम
गोलोकको चलूँगा। इस समय मैं तुमसे कुछ
आध्यात्मिक ज्ञानकी बातें कहता हूँ, सुनो। यह
सारभूत ज्ञान शोकका नाशक, आनन्दवर्धक तथा
मनको सुख देनेवाला है। मैं सबका अन्तरात्मा
और समस्त कर्मोंसे निर्लिप्त हूँ। सबमें सर्वत्र
विद्यमान रहकर भी कभी किसीके दृष्टिपथमें
नहीं आता हूँ। जैसे वायु सर्वत्र सभी वस्तुओंमें
विचरती है, किंतु किसीसे लिप्त नहीं होती; उसी
प्रकार मैं समस्त कर्मोंका साक्षी हूँ। उन कर्मोंसे
लिप्त नहीं होता हूँ। सर्वत्र समस्त जीवधारियोंमें
जो जीवात्मा हैं, वे सब मेरे ही प्रतिबिम्ब हैं।
जीवात्मा सदा समस्त कर्मोंका कर्ता और उनके
शुभाशुभ फलोंका भोक्ता है। जैसे जलके घड़ोंमें
चन्द्रमा और सूर्यके मण्डलका पृथक्-पृथक्
प्रतिबिम्ब दिखायी देता है, किंतु उन घड़ोंके फूट
जानेपर वे सारे प्रतिबिम्ब चन्द्रमा और सूर्यमें ही
विलीन हो जाते हैं; उसी प्रकार अन्तःकरणरूपी
उपाधिके मिट जानेपर समस्त चित् प्रतिबिम्ब-जीव
मुझमें ही अन्तर्हित हो जाते हैं। प्रिये ! समयानुसार