ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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समस्त जीवधारियोंकी मृत्यु हो जानेपर जीव
मुझसे ही संयुक्त होता है। हम दोनों सदा समस्त
जन्तुओंमें विद्यमान हैं। सम्पूर्ण जगत् आधेय है
और मैं इसका आधार हूँ। आधारके बिना आधेय
उसी तरह नहीं रह सकता, जैसे कारणके बिना
कार्य। सुन्दरि ! संसारके समस्त द्रव्य नश्वर हैं।
कहीं किन्हीं पदार्थोंका आविर्भाव अधिक होता
है और कहीं कम। कुछ देवता मेरे अंश हैं, कुछ
कला हैं, कुछ कलाकी कलाके भी अंश हैं और
कुछ उस अंशके भी अंशांश हैं। मेरी अंशस्वरूपा
प्रकृति सूक्ष्मरूपिणी है। उसकी पाँच मूर्तियाँ हैं-
सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा, तुम (राधा) और वेदजननी
सावित्री। जितने भी मूर्तिधारी देवता हैं, वे सब
प्राकृतिक हैं। मैं सबका आत्मा हूँ और भक्तोंके
ध्यानके लिये नित्य देह धारण करके स्थित हूँ।
राधे ! जो-जो प्राकृतिक देहधारी हैं, वे प्राकृत
प्रलयमें नष्ट हो जाते हैं। सबसे पहले मैं ही था
और सबके अन्तमें भी मैं ही रहूँगा। जैसा मैं हूँ,
वैसी ही तुम भी हो। जैसे दूध और उसकी
धवलतामें कभी भेद नहीं होता, उसी प्रकार
निश्चय ही हम दोनोंमें भेद नहीं है। प्रारम्भिक
सृष्टिमें मैं ही वह महान् विराट् हूँ, जिसकी
रोमावलियोंमें असंख्य ब्रह्माण्ड विद्यमान हैं। वह
महाविराट् मेरा अंश है और तुम अपने अंशसे
उसकी पत्नी हो। बादकी सृष्टिमें मैं ही वह क्षुद्र
विराट् हूँ, जिसके नाभिकमलसे इस विश्व-
ब्रह्माण्डका प्राकट्य हुआ है। विष्णुके रोमकूपमें
मेरा आंशिक निवास है। तुम्हीं अपने अंशसे उस
विष्णुकी सुन्दरी स्त्री हो। उसके प्रत्येक विश्वमें
ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता विद्यमान हैं।
वे ब्रह्मा, विष्णु और शिव तथा अन्य ब्रह्माण्डोंके
ब्रह्मा आदि देवता भी मेरी ही कलाएँ हैं। देवि !
समस्त चराचर प्राणी मेरी कलाकी अंशांशकलासे
प्रकट हुए हैं। तुम वैकुण्ठमें महालक्ष्मी हो और
मैं वहाँ चतुर्भुज नारायण हूँ। वैकुण्ठ भी उसी
तरह विश्वब्रह्माण्डसे बाहर है, जैसे गोलोक।
सत्यलोकमें तुम्हीं सरस्वती तथा ब्रह्मप्रिया सावित्री
हो। शिवलोकमें जो मूलप्रकृति ईश्वरी शिवा हैं,
वे भी तुमसे भिन्न नहीं हैं, वे दुर्गम संकटका नाश
करनेके कारण सर्वदुर्गतिनाशिनी 'दुर्गा' कहलाती
हैं। वे ही दक्षकन्या सती हैं और वे ही हैं
गिरिराजकुमारी पार्वती। कैलासमें सौभाग्यशालिनी
पार्वती शिवके वक्षःस्थलपर विराजमान होती हैं।
तुम्हीं अपने अंशसे सिन्धुकन्या होकर क्षीरसागरमें
श्रीविष्णुके वक्षःस्थलपर विराजमान होती हो।
सृष्टिकालमें मैं ही अपने अंशसे ब्रह्मा, विष्णु और
शिवरूप धारण करता हूँ तथा तुम लक्ष्मी, शिवा,
धात्री एवं सावित्री आदि पृथक् पृथक् रूप
धारण करती हो। गोलोकके रासमण्डलमें तुम
स्वयं ही सदा रासेश्वरीके पदपर प्रतिष्ठित हो।
रमणीय वृन्दावनमें वृन्दा तथा विरजा-तटपर
विरजाके रूपमें तुम्हीं शोभा पाती हो। वही तुम
इस समय सुदामाके शापसे पुण्यभूमि भारतवर्षमें
आयी हो। सुन्दरि ! भारतवर्ष और वृन्दावनको
पवित्र करना ही तुम्हारे शुभागमनका उद्देश्य है।
समस्त लोकोंमें जो सम्पूर्ण स्त्रियाँ हैं, वे तुम्हारी
ही कलांश-कलासे प्रकट हुई हैं। जो स्त्री है, वह
तुम हो; जो पुरुष है, वह मैं हूँ। मैं ही अपनी
कलासे अग्निरूपमें प्रकट हुआ हूँ और तुम
अग्निकी दाहिका शक्ति एवं प्रियपत्नी स्वाहा हो।
तुम्हारे साथ रहनेपर ही मैं जलानेमें समर्थ हूँ,
तुम्हारे बिना नहीं। मैं दीप्तिमानोंमें सूर्य हूँ और
तुम्हीं अपनी कलासे संज्ञा होकर प्रभाका विस्तार
करती हो। तुम्हारे सहयोगसे ही मैं प्रकाशित होता
हूँ। तुम्हारे बिना मैं दीप्तिमान् नहीं हो सकता। मैं
कलासे चन्द्रमा हूँ और तुम शोभा तथा रोहिणी
हो। तुम्हारे साथ रहकर ही मैं मनोहर बना हूँ;
तुम्हारे न होनेपर तो मुझमें कोई सौन्दर्य नहीं है।
मैं ही अपनी कलासे इन्द्र हुआ हूँ और तुम्हीं
स्वर्गकी मूर्तिमती लक्ष्मी शची हो। तुम्हारे साथ