सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

अध्याय ३८ ] कूर्मावतार; समुद्रमन्थन और मोहिनी-अवतार १३३

अध्याय ३८ ] कूर्मावतार; समुद्रमन्थन और मोहिनी-अवतार १३३
केशवः शार्ङ्गनिर्मुक्तैः शरैराशीविषोपमैः। लगे। इस प्रकार परस्पर अस्त्र-शस्त्रका प्रहार करते हुए
तानि शस्त्राणि सर्वाणि चिच्छेद तिलशस्तदा ॥ ३१ उन दोनों पक्षोंमें समानरूपसे युद्ध हुआ। भगवान् विष्णुने
अपने शार्ङ्ग धनुषद्वारा छोड़े हुए सर्पके समान तीखे
तौ युद्ध्वा सुचिरं तेन दानवौ मधुकैटभौ। बाणोंसे उन दैत्योंके समस्त अस्त्र-शस्त्र तिलकी भाँति
हतौ शार्ङ्गविनिर्मुक्तैः शरैः कृष्णेन दुर्मदौ ॥ ३२ टुकड़े-टुकड़े कर डाले। वे दोनों उन्मत्त दानव-मधु
और कैटभ चिरकालतक भगवान्‌के साथ लड़कर अन्तमें
तयोस्तु मेदसा राजन् विष्णुना कल्पिता मही। उनके शार्ङ्ग धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा मारे गये। राजन्!
मेदिनीति ततः संज्ञामवापेयं वसुंधरा ॥ ३३ तब श्रीविष्णुभगवान्ने उन दोनों दैत्योंके मेदेसे इस
पृथ्‍वीका निर्माण किया। इसीसे इस वसुंधराका नाम
एवं कृष्णप्रसादेन वेदाँल्लब्ध्वा प्रजापतिः। 'मेदिनी' हुआ ॥ २९-३३ ॥
प्रजाः ससर्ज भूपाल वेददृष्टेन कर्मणा ॥ ३४ भूपाल ! इस प्रकार भगवान् विष्णुकी कृपासे वेदोंको
प्राप्तकर प्रजापति ब्रह्माजीने वेदोक्त विधिसे प्रजाकी सृष्टि
य इदं शृणुयान्नित्यं प्रादुर्भावं हरेर्नृप। की। नृप ! जो भगवान्‌की इस अवतार-कथाका प्रतिदिन
उषित्वा चन्द्रसदने वेदविद्ब्राह्मणो भवेत् ॥ ३५ श्रवण करता है, वह [शरीर-त्यागके बाद] चन्द्रलोकमें
निवास करके [पुनः इस लोकमें] वेदवेत्ता ब्राह्मण होता
मात्स्यं वपुस्तन्महदद्रितुल्यं है। भूमिपाल! जो भगवान् विष्णु लोकहितके लिये
विद्यामयं लोकहिताय विष्णुः। पर्वतके समान भीमकाय मत्स्यरूप धारणकर जनलोक-
आस्थाय भीमं जनलोकसंस्थैः निवासियोंद्वारा स्तुत हुए थे, उनका ही तुम सदा स्मरण
स्तुतोऽथ यस्तं स्मर भूमिपाल ॥ ३६ करो ॥ ३४-३६ ॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे मत्स्यप्रादुर्भावो नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः॥ ३७॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें 'मत्स्यावतार' नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७॥

अड़तीसवाँ अध्याय
कूर्मावतार; समुद्रमन्थन और मोहिनी-अवतार

मार्कण्डेय उवाच मार्कण्डेयजी बोले- पूर्वकालमें देवासुर-संग्राममें
पुरा देवासुरे युद्धे देवा दैत्यैः पराजिताः। जब देवगण दैत्योंद्वारा पराजित हो गये, तब वे सभी
सर्वे ते शरणं जग्मुः क्षीराब्धितनयापतिम् ॥ १ मिलकर क्षीरसागरनन्दिनी श्रीलक्ष्मीजीके पति भगवान्
विष्णुकी शरणमें गये। राजन्! वहाँ ब्रह्मा आदि सभी
स्तोत्रेण तुष्टुवुः सर्वे समाराध्य जगत्पतिम्। देवता जगदीश्वरकी आराधना करके हाथ जोड़ निम्नाङ्कित
कृताञ्जलिपुटा राजन् ब्रह्माद्या देवतागणाः ॥ २ स्तोत्रसे उनकी स्तुति करने लगे ॥ १-२ ॥
देवा ऊचुः देवगण बोले- जिनकी नाभिसे कमल प्रकट
नमस्ते पद्मनाभाय लोकनाथाय शार्ङ्गिणे। हुआ है, जो समस्त लोकोंके स्वामी हैं, उन
नमस्ते पद्मनाभाय सर्वदुःखापहारिणे ॥ ३ शार्ङ्ग धनुषधारी आप परमेश्वरको नमस्कार है।

In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth