संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ३७ ] मत्स्यावतार तथा मधु-कैटभ-वध १३१
अध्याय ३७ ] मत्स्यावतार तथा मधु-कैटभ-वध १३१
अथ तस्य प्रसुप्तस्य देवदेवस्य शार्ङ्गिणः। | शय्यापर योगनिद्राका आश्रय लेकर सोये हुए थे। नृप!
श्रोत्राभ्यामपतत् तोये स्वेदबिन्दुद्वयं नृप॥ ३ | कुछ कालके बाद उन गहरी नींदमें सोये हुए देवदेव
मधुकैटभनामानौ तस्माज्जातौ महाबलौ। | शार्ङ्गधन्वा विष्णुके कानोंसे पसीनेकी दो बूँदें निकलकर
महाकायौ महावीर्यौ महाबलपराक्रमौ॥ ४ | जलमें गिरीं। उन दोनों बूँदोंसे मधु और कैटभ नामके
अच्युतस्य प्रसुप्तस्य महत्पद्ममजायत। | दो दैत्य उत्पन्न हुए, जो महाबली, महान् शक्तिशाली,
नाभिमध्ये नृपश्रेष्ठ तस्मिन् ब्रह्माभ्यजायत॥ ५ | महापराक्रमी और महाकाय थे। नृपश्रेष्ठ! इसी समय उन
स चोक्तो विष्णुना राजन् प्रजाः सृज महामते। | सोये हुए भगवान्की नाभिके बीचमें महान् कमल प्रकट
तथेत्युक्त्वा जगन्नाथं ब्रह्मापि कमलोद्भवः॥ ६ | हुआ और उससे ब्रह्माजी उत्पन्न हुए॥ १-५॥
वेदशास्त्रावशाद्यावत् प्रजाः स्रष्टुं समुद्यतः। | राजन्! भगवान् विष्णुने ब्रह्माजीसे कहा—'महामते !
तावत्तत्र समायातौ तावुभौ मधुकैटभौ॥ ७ | तुम प्रजाजनोंकी सृष्टि करो।' यह सुन उन कमलोद्भव
आगत्य वेदशास्त्रार्थविज्ञानं ब्रह्मणः क्षणात्। | ब्रह्माजीने 'तथास्तु' कहकर भगवान् जगन्नाथकी आज्ञा
अपहृत्य गतौ घोरौ दानवौ बलदर्पितौ॥ ८ | स्वीकार कर ली तथा वेदों और शास्त्रोंकी सहायतासे
ततः पद्मोद्भवो राजन् ज्ञानहीनोऽभवत् क्षणात्। | वे ज्यों ही सृष्टि-रचनाके लिये उद्यत हुए, त्यों ही उनके
दुःखितश्चिन्तयामास कथं स्रक्ष्यामि वै प्रजाः॥ ९ | पास वे दोनों दैत्य—मधु और कैटभ आये। आते ही
चोदितस्त्वं सृजस्वेति प्रजा देवेन तत्कथम्। | वे बलाभिमानी घोर दानव क्षणभरमें ब्रह्माजीके वेद और
स्रक्ष्येऽहं ज्ञानहीनस्तु अहो कष्टमुपस्थितम्॥ १० | शास्त्र-ज्ञानको लेकर चले गये। राजन्! तब ब्रह्माजी एक
इति संचिन्त्य दुःखार्तो ब्रह्मा लोकपितामहः। | ही क्षणमें ज्ञानशून्य हो दुःखी हो गये और सोचने
यत्नतो वेदशास्त्राणि स्मरन्नपि न दृष्टवान्॥ ११ | लगे—"हाय! अब मैं कैसे प्रजाकी सृष्टि करूँगा?
ततो विषण्णचित्तस्तु तं देवं पुरुषोत्तमम्। | भगवान्ने मुझे आज्ञा दी कि 'तुम प्रजाकी सृष्टि करो।'
एकाग्रमनसा सम्यक् शास्त्रेण स्तोतुमारभत्॥ १२ | परंतु अब तो मैं सृष्टिविज्ञानसे रहित हो गया, अतः
ब्रह्मोवाच | किस प्रकार सृष्टिरचना करूँगा? अहो! मुझपर यह
ॐ नमो वेदनिधये शास्त्राणां निधये नमः। | बहुत बड़ा कष्ट आ पहुँचा।" लोकपितामह ब्रह्माजी इस
विज्ञाननिधये नित्यं कर्मणां निधये नमः॥ १३ | प्रकार चिन्ता करते-करते शोकसे कातर हो गये। वे
विद्याधराय देवाय वागीशाय नमो नमः। | प्रयत्नपूर्वक वेद-शास्त्रोंका स्मरण करने लगे, तथापि
अचिन्त्याय नमो नित्यं सर्वज्ञाय नमो नमः॥ १४ | उन्हें उनकी स्मृति नहीं हुई। तब वे मन-ही-मन
अमूर्तिस्त्वं महाबाहो यज्ञमूर्तिरधोक्षज। | अत्यन्त दुःखी हो, एकाग्रचित्तसे भगवान् पुरुषोत्तमकी
साम्नां मूर्तिस्त्वमेवाद्य सर्वदा सर्वरूपवान्॥ १५ | शास्त्रानुकूल विधिसे स्तुति करने लगे॥ ६-१२॥
सर्वज्ञानमयोऽसि त्वं हृदि ज्ञानमयोऽच्युत। | ब्रह्माजी बोले—जो वेद, शास्त्र, विज्ञान और कर्मोंकी
देहि मे त्वं सर्वज्ञानं देवदेव नमो नमः॥ १६ | निधि हैं, उन ॐकार-प्रतिपाद्य परमेश्वरको मेरा बार-
| बार नमस्कार है। समस्त विद्याओंको धारण करनेवाले
| वाणीपति भगवान्को प्रणाम है। अचिन्त्य एवं सर्वज्ञ
| परमेश्वरको नित्य बारंबार नमस्कार है। महाबाहो!
| अधोक्षज! आप निराकार एवं यज्ञस्वरूप हैं। आप ही
| साममूर्ति एवं सदा सर्वरूपधारी हैं। अच्युत! आप
| सर्वज्ञानमय हैं; आप सबके हृदयमें ज्ञानरूपसे विराजमान
| हैं। देवदेव! आप मुझे सब प्रकारका ज्ञान दीजिये;
| आपको बारंबार नमस्कार है॥ १३-१६॥
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१३२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३७
[संस्कृत मूल पाठ]
मार्कण्डेय उवाच
इत्थं स्तुतस्तदा तेन शङ्खचक्रगदाधरः।
ब्रह्माणमाह देवेशो दास्ये ते ज्ञानमुत्तमम् ॥ १७
इत्युक्त्वा तु तदा विष्णुश्चिन्तयामास पार्थिव ।
केनास्य नीतं विज्ञानं केन रूपेण चादधे ॥ १८
मधुकैटभकृतं सर्वमिति ज्ञात्वा जनार्दनः ।
मात्स्यं रूपं समास्थाय बहुयोजनमायतम्।
बहुयोजनविस्तीर्णं सर्वज्ञानमयं नृप ॥ १९
स प्रविश्य जलं तूर्णं क्षोभयामास तद्धरिः ।
प्रविश्य च स पातालं दृष्टवान्मधुकैटभौ ॥ २०
तौ मोहयित्वा तुमुलं तज्ज्ञानं जगृहे हरिः ।
वेदशास्त्राणि मुनिभिः संस्तुतो मधुसूदनः ॥ २१
आनीय ब्रह्मणे दत्त्वा त्यक्त्वा तन्मात्स्यकं नृप।
जगद्धिताय स पुनर्योगनिद्रावशं गतः ॥ २२
ततः प्रबुद्धौ संक्रुद्धौ तावुभौ मधुकैटभौ ।
आगत्य ददृशाते तु शयानं देवमव्ययम् ॥ २३
अयं स पुरुषो धूर्त्त आवां सम्मोह्य मायया ।
आनीय वेदशास्त्राणि दत्त्वा शेतेऽत्र साधुवत् ॥ २४
इत्युक्त्वा तौ महाघोरौ दानवौ मधुकैटभौ ।
बोधयामासतुस्तूर्णं शयानं केशवं नृप ॥ २५
युद्धार्थमागतावत्र त्वया सह महामते।
आवयोर्देहि संग्रामं युध्यस्वोत्थाय साम्प्रतम् ॥ २६
इत्युक्तो भगवांस्ताभ्यां देवदेवो नृपोत्तम।
तथेति चोक्त्वा तौ देवः शाङ्गं सज्यमथाकरोत् ॥ २७
ज्याघोषतलघोषेण शङ्खशब्देन माधवः ।
खं दिशः प्रदिशश्चैव पूरयामास लीलया ॥ २८
तौ च राजन् महावीर्यौ ज्याघोषं चक्रतुस्तदा ।
युयुधाते महाघोरौ हरिणा मधुकैटभौ ॥ २९
कृष्णश्च युयुधे ताभ्यां लीलया जगतः पतिः।
समं युद्धमभूद्देवं तेषामस्त्राणि मुञ्चताम् ॥ ३०
[हिन्दी अनुवाद]
**मार्कण्डेयजी बोले—**ब्रह्माजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले देवेश्वर विष्णुने उनसे कहा—'मैं तुम्हें उत्तम ज्ञान प्रदान करूँगा।' राजन्! भगवान् विष्णु यों कहकर तब सोचने लगे— 'कौन इसका विज्ञान हर ले गया और किस रूपसे उसने उसे धारण कर रखा है?' भूपाल! अन्तमें यह जानकर कि यह सब मधु और कैटभकी करतूत है, भगवान् जनार्दनने अनेकों योजन लंबा-चौड़ा पूर्णज्ञानमय मत्स्यरूप धारण किया। फिर मत्स्यरूपधारी हरिने तुरंत ही जलमें प्रविष्ट होकर उसे क्षुब्ध कर डाला और भीतर-ही-भीतर पाताललोकमें पहुँचकर मधु तथा कैटभको देखा। तब मुनियोंद्वारा स्तवन किये जानेपर भगवान् मधुसूदनने मधु और कैटभ—दोनोंको मोहितकर वह वेदशास्त्रमय ज्ञान ले लिया और उसे ले आकर ब्रह्माजीको दे दिया। राजन् ! तत्पश्चात् वे भगवान् उस मत्स्यरूपको त्यागकर जगत्के हितके लिये पुनः योगनिद्रामें स्थित हो गये॥ १७—२२ ॥
तदनन्तर मोह निवृत्त होनेपर [वेद-शास्त्रको न देख] मधु तथा कैटभ—दोनों ही बहुत कुपित हुए और वहाँसे आकर उन्होंने अविनाशी भगवान् विष्णुको सोते देखा। तब वे परस्पर कहने लगे—'यह वही धूर्त पुरुष है, जिसने हम दोनोंको मायासे मोहित करके वेद-शास्त्रोंको ले आकर ब्रह्माको दे दिया और अब यहाँ साधुकी भाँति सो रहा है।' राजन्! यों कहकर उन महाघोर दानव मधु और कैटभने वहाँ सोये हुए भगवान् केशवको तत्काल जगाया और कहा—'महामते! हम दोनों यहाँ तुम्हारे साथ युद्ध करने आये हैं; तुम हमें संग्रामकी भिक्षा दो और अभी उठकर हमसे युद्ध करो'॥ २३—२६ ॥
नृपवर ! उनके इस प्रकार कहनेपर देवदेव भगवान्ने 'बहुत अच्छा' कहकर अपने शार्ङ्ग धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ायी। उस समय भगवान् माधवने लीलापूर्वक धनुषकी टंकार और शङ्खनादसे आकाश, दिशाओं और अवान्तर-दिशाओं (कोणों)-को भर दिया ॥ २७-२८ ॥
राजन्! फिर उन महापराक्रमी महाभयानक मधु और कैटभने भी उस समय अपनी प्रत्यञ्चाको टंकार दी और वे भगवान् विष्णुके साथ युद्ध करने लगे। जगत्पति भगवान् विष्णु भी लीलासे ही उनके साथ युद्ध करने
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