संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
८० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २४
८० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय २४
नानाजनपदाकीर्णा पताकाध्वजशोभिता। वह पुरी नाना देशोंके मनुष्योंसे भरी-पूरी, ध्वजा-
देवतुल्यप्रभायुक्तैर्नृपपुत्रैश्च संयुता ॥ १२ पताकाओंसे सुशोभित तथा अनेकानेक कान्तिमान् देवोपम
राजकुमारोंसे युक्त थी। वहाँ देवाङ्गनाओंके समान श्रेष्ठ
सुरूपाभिर्वरस्त्रीभिर्देवस्त्रीभिरिवावृता । एवं रूपवती वनिताएँ निवास करती थीं। बृहस्पतिके
विप्रैः सत्कविभिर्युक्ता बृहस्पतिसमप्रभैः ॥ १३ समान तेजस्वी सत्कवि ब्राह्मण उस नगरीकी शोभा बढ़ाते
थे। कल्पवृक्षसे भी बढ़कर उदार नागरिकों और वैश्यों,
वणिग्जनैस्तथा पौरैः कल्पवृक्षवरैर्युता। उच्चैःश्रवाके समान श्रेष्ठ घोड़ों और दिग्गजोंके समान
अश्वैरुच्चैःश्रवस्तुल्यैर्दन्तिभिर्दिग्गजैरिव ॥ १४ विशालकाय हाथियोंसे वह पुरी बड़ी शोभा पाती थी।
इस प्रकार नाना वस्तुओंसे भरी-पूरी अयोध्यापुरी इन्द्रपुरी
इति नानाविधैर्भावैरयोध्येन्द्रपुरीसमा । अमरावतीकी समता करती थी। पूर्वकालमें नारदजीने
तां दृष्ट्वा नारदः श्लोकं सभामध्ये पुरोक्तवान् ॥ १५ उस पुरीको देखकर भरी सभामें यह श्लोक कहा था—
'स्वर्गकी सृष्टि करनेवाले विधाताका वह सारा प्रयत्न
स्वर्गं वै सृजमानस्य व्यर्थं स्यात् पद्मजन्मनः । व्यर्थ हो गया; क्योंकि अयोध्यापुरी उससे भी बढ़कर
जातायोध्याधिका स्वर्गात् कामभोगसमन्विता ॥ १६ मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न हो गयी' ॥ १२–१६॥
तामावसदयोध्यां तु स्वाभिषिक्तो महीपतिः । इक्ष्वाकु इसी अयोध्यामें निवास करते थे। वे राजाके
जितवान् सर्वभूपालान् धर्मेण स महाबलः ॥ १७ पदपर अभिषिक्त हो, पृथ्वीका पालन करने लगे। उन
महान् बलशाली नरेशने धर्मयुद्धके द्वारा समस्त भूपालोंको
माणिक्यमुकुटैर्युक्तै राजभिर्मण्डलाधिपैः । जीत लिया था। मानिकके बने मुकुटोंसे अलंकृत अनेक
नमद्भिर्भक्तिभीतिभ्यां पादौ तस्य किणीकृतौ ॥ १८ छोटे-छोटे मण्डलोंके शासक राजाओंके भक्ति तथा
भयपूर्वक प्रणाम करनेसे उनके दोनों चरणोंमें मुकुटोंकी
इक्ष्वाकुरक्षतबलः सर्वशास्त्रविशारदः । रगड़से चिह्न बन गया था॥ १७-१८॥
तेजसेन्द्रेण सदृशो मनोः सूनुः प्रतापवान् ॥ १९ मनुपुत्र प्रतापी राजा इक्ष्वाकु अपने राजोचित तेजसे
इन्द्रकी समानता करते थे। वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें
धर्मतो न्यायतश्चैव वेदज्ञैर्ब्राह्मणैर्युतः । निपुण थे। उनका बल कभी क्षीण नहीं होता था। वे
पालयामास धर्मात्मा आसमुद्रां महीमिमाम् ॥ २० धर्मात्मा भूपाल वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके साथ धर्म और
न्यायपूर्वक इस समुद्रपर्यन्त पृथिवीका पालन करते थे।
अस्त्रैर्जिगाय सकलान् संयुगे भूपतीन् बली । उन बलशाली नरेशने संग्राममें अपने तीखे शस्त्रोंसे
अवजित्य सुतीक्ष्णैस्तु तन्मण्डलमथाहरत् ॥ २१ समस्त भूपोंको जीतकर उनका मण्डल अपने अधिकारमें
कर लिया था ॥ १९–२१ ॥
जितवान् परलोकांश्च क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । ब्रह्मन् ! प्रतापी राजा इक्ष्वाकुने प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञ
दानैश्च विविधैर्ब्रह्मन् राजेक्ष्वाकुः प्रतापवान् ॥ २२ और नाना प्रकारके दान करके परलोकोंपर भी विजय
प्राप्त कर ली थी। वे अपनी दोनों भुजाओंद्वारा पृथिवीका,
बाहुद्वयेन वसुधां जिह्वाग्रेण सरस्वतीम् । जिह्वाके अग्रभागसे सरस्वतीका, वक्षःस्थलसे राजलक्ष्मीका
बभार पद्मामुरसा भक्तिं चित्तेन माधवे ॥ २३ और हृदयसे भगवान् लक्ष्मीपतिकी भक्तिका भार वहन
करते थे। एक वस्त्रपर खड़े हुए भगवान् हरिका, बैठे हुए
संतिष्ठतो हरे रूपमुपविष्टं च माधवम् ।
शयानमप्यनन्तं तु कारयित्वा पटेऽमलम् ॥ २४
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अध्याय २४] सूर्यवंश—राजा इक्ष्वाकुका भगवत्प्रेम; उनका भगवद्दर्शनके हेतु तपस्याके लिये प्रस्थान [पृष्ठ: ८१]
[मूल संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अनुवाद]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्रिकालं त्रयमाराध्य रूपं विष्णोर्महात्मनः ।<br>गन्धपुष्पादिभिर्नित्यं रेमे दृष्ट्वा पटे हरिम् ॥ २५<br><br>कृष्णं तं कृष्णमेघाभं भुजगेन्द्रनिवासिनम् ।<br>पद्माक्षं पीतवासं च स्वप्नेष्वपि स दृष्टवान् ॥ २६<br><br>चकार मेघे तद्वर्णे बहुमानमतिं नृपः ।<br>पक्षपातं च तन्नाम्नि मृगे पद्मे च तादृशे ॥ २७ | लक्ष्मीपत्तिका और सोये हुए अनन्तदेवका निर्मल चित्र बनवाकर क्रमशः प्रातःकाल, मध्याह्नकाल और संध्याकालमें तीनों समय वे महात्मा भगवान् विष्णुके उन तीनों रूपोंका गन्ध तथा पुष्प आदिके द्वारा पूजन करते और उस पटपर प्रतिदिन भगवान् विष्णुका दर्शन करके प्रसन्न रहते थे। उन्हें स्वप्नमें भी नागराज अनन्तकी शय्यापर सोये हुए, काले मेघके समान श्यामवर्ण, कमललोचन, पीताम्बरधारी भगवान् श्रीकृष्ण (विष्णु)-का दर्शन हुआ करता था। राजाने भगवान्के समान श्यामवर्णवाले मेघमें अत्यन्त सम्मानपूर्ण बुद्धि कर ली थी। भगवान् श्रीकृष्णके नामसे युक्त कृष्णसार मृगमें और कृष्णवर्णवाले कमलमें वे पक्षपात रखते थे॥ २२—२७॥ |
| दिव्याकृतिं हरेः साक्षाद् द्रष्टुं तस्य महीभृतः ।<br>अतीव तृष्णा संजाता अपूर्वैव हि सत्तम ॥ २८<br><br>तृष्णायां तु प्रवृद्धायां मनसैव हि पार्थिवः ।<br>चिन्तयामास मतिमान् राज्यभोगमसारवत् ॥ २९<br><br>वेश्मदारसुतक्षेत्रं संन्यस्तं येन दुःखदम् ।<br>वैराग्यज्ञानपूर्वेण लोकेऽस्मिन् नास्ति तत्समः ॥ ३०<br><br>इत्येवं चिन्तयित्वा तु तपस्यासक्तचेतनः ।<br>वसिष्ठं परिपप्रच्छ तत्रोपायं पुरोहितम् ॥ ३१<br><br>तपोबलेन देवेशं नारायणमजं मुने ।<br>द्रष्टुमिच्छाम्यहं तत्र उपायं तं वदस्व मे ॥ ३२ | साधुशिरोमणे! उस राजाके मनमें भगवान् विष्णुके दिव्य स्वरूपको प्रत्यक्ष देखनेकी अत्यन्त उत्कट अभिलाषा जागृत हुई; उनकी वह तृष्णा अपूर्व ही थी। जब उनकी तृष्णा बहुत बढ़ गयी, तब वे बुद्धिमान् भूपाल मन-ही-मन सारे राज्य-भोगको निस्सार-सा समझने लगे। उन्होंने सोचा—'जिस पुरुषने गेह, स्त्री, पुत्र और क्षेत्र आदि दुःखद भोगोंको वैराग्य और ज्ञानपूर्वक त्याग दिया है, उसके समान बड़भागी इस संसारमें कोई नहीं है।' इस प्रकार सोच-विचारकर, तपस्यामें आसक्तचित्त हो उन्होंने उसके लिये अपने पुरोहित वसिष्ठजीसे उपाय पूछा—'मुने! मैं तपस्याके बलसे देवेश्वर, अजन्मा भगवान् नारायणका दर्शन करना चाहता हूँ; इसके लिये आप मुझे कोई उत्तम उपाय बताइये'॥ २८—३२॥ |
| इत्युक्तः प्राह राजानं तपस्यासक्तमानसम् ।<br>वसिष्ठः सर्वधर्मज्ञः सदा तस्य हिते रतः ॥ ३३<br><br>यदीच्छसि महाराज द्रष्टुं नारायणं परम् ।<br>तपसा सुकृतेनेह आराधय जनार्दनम् ॥ ३४<br><br>केनाप्यतमतपसा देवदेवो जनार्दनः ।<br>द्रष्टुं न शक्यते जातु तस्मात् तं तपसार्चय ॥ ३५<br><br>पूर्वदक्षिणदिग्भागे सरयूतीरगे नृप ।<br>गालवप्रमुखानां च ऋषीणामस्ति चाश्रमः ॥ ३६<br><br>पञ्चयोजनमध्वानं स्थानमस्मात्तु पावनम् ।<br>नानाद्रुमलताकीर्णं नानापुष्पसमाकुलम् ॥ ३७ | उनके इस प्रकार कहनेपर राजाके हितमें सदा लगे रहनेवाले सर्वधर्मज्ञ मुनिवर वसिष्ठजीने तपमें आसक्तचित्त उन नरेशसे कहा—'महाराज! यदि तुम परमात्मा नारायणका साक्षात्कार करना चाहते हो तो तपस्या और शुभकर्मोंके द्वारा उन भगवान् जनार्दनकी आराधना करो। कोई भी पुरुष तपस्या किये बिना देवदेव जनार्दनका दर्शन नहीं पा सकता। इसलिये तुम तपस्याके द्वारा उनका पूजन करो। यहाँसे पाँच योजन दूर सरयूके तटपर पूर्व और दक्षिण भागमें एक पवित्र स्थान है, जहाँ गालव आदि ऋषियोंका... |
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