संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६
२४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ६
यैरिदं वासरं नक्तं वर्तते क्रमशः सदा। उन्हींके द्वारा सर्वदा क्रमशः दिन और रात होते रहते
भगोंऽशुस्त्वर्यमा चैव मित्रोऽथ वरुणस्तथा॥ १० हैं। भग, अंशु, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता,
विवस्वान्, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र और बारहवें विष्णु हैं। ये
सविता चैव धाता च विवस्वांश्च महामते। बारह आदित्य तपते और वर्षा करते हैं॥ ९-११ १/२॥
त्वष्टा पूषा तथैवेन्द्रो विष्णुर्द्वादशमः स्मृतः॥ ११
अदितिके मध्यम पुत्र वरुण 'लोकपाल' कहे गये
एते च द्वादशादित्यास्तपन्ते वर्षयन्ति च। हैं; इनकी स्थिति वरुण-दिशा (पश्चिम)-में बतलायी
तस्याश्च मध्यमः पुत्रो वरुणो नाम नामतः॥ १२ जाती है। ये पश्चिम दिशामें पश्चिम समुद्रके तटपर
लोकपाल इति ख्यातो वारुण्यां दिशि शब्द्यते। सुशोभित होते हैं। वहाँ एक सुन्दर सुवर्णमय पर्वत है।
पश्चिमस्य समुद्रस्य प्रतीच्यां दिशि राजते॥ १३ उसके शिखर सब रत्नमय हैं। उनपर नाना प्रकारकी
जातरूपमयः श्रीमानास्ते नाम शिलोच्चयः। धातुएँ और झरने हैं। इनसे युक्त और नाना प्रकारके
सर्वरत्नमयैः शृङ्गैर्धातुप्रस्रवणान्वितैः॥ १४ रत्नोंसे परिपूर्ण वह सुन्दर पर्वत बड़ी शोभा पाता है।
उसमें बड़े-बड़े दर्रे और गुहाएँ हैं, जहाँ बाघ और सिंह
संयुक्तो भाति शैलेशो नानारत्नमयः शुभः। दहाड़ते रहते हैं। वहाँके अनेकानेक एकान्त स्थलोंपर
महादरीगुहाभिश्च सिंहशार्दूलनादितः॥ १५ सिद्ध और गन्धर्व वास करते हैं। जब सूर्य वहाँ पहुँचते
नानाविविक्तभूमीषु सिद्धगन्धर्वसेवितः। हैं, तब समस्त संसार अन्धकारसे पूर्ण हो जाता है। उसी
यस्मिन् गते दिनकरे तमसाऽऽपूर्यते जगत्॥ १६ पर्वतके शिखरपर विश्वकर्माकी बनायी हुई एक 'विश्वावती'
नामकी शोभनपुरी है, जो बड़ी, दिव्य तथा सुवर्णसे बनी
तस्य शृङ्गे महादिव्या जाम्बूनदमयी शुभा।
रम्या मणिमयैः स्तम्भैर्विहिता विश्वकर्मणा॥ १७ हुई है और उसमें मणियोंके खंभे लगे हैं। इस प्रकार वह
पुरी रमणीय एवं सम्पूर्ण भोग-साधनोंसे सम्पन्न है। उसीमें
पुरी विश्वावती नाम समृद्धा भोगसाधनैः। अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए 'वरुण' नामक आदित्य
तस्यां वरुण आदित्यो दीप्यमानः स्वतेजसा॥ १८ ब्रह्माजीकी प्रेरणासे इन सम्पूर्ण लोकोंका पालन करते हैं।
पाति सर्वानिमाँल्लोकान् नियुक्तो ब्रह्मणा स्वयम्। वहाँ उनकी सेवामें गन्धर्व और अप्सराएँ रहा करती
उपास्यमानो गन्धर्वैस्तथैवाप्सरसां गणैः॥ १९ हैं॥ १२-१९॥
दिव्यगन्धानुलिप्ताङ्गो दिव्याभरणभूषितः। एक दिन वरुण अपने अङ्गोंमें दिव्य चन्दनका अनुलेप
कदाचिद्वरुणो यातो मित्रेण सहितो वनम्॥ २० लगाये, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो 'मित्र' के साथ वनको
गये। ब्रह्मर्षिगण सदा जिसका सेवन करते हैं, जो नाना
कुरुक्षेत्रे शुभे रम्ये सदा ब्रह्मर्षिसेविते। प्रकारके फल और फूलोंसे युक्त तथा अनेक तीर्थोंसे व्याप्त
नानापुष्पफलोपेते नानातीर्थसमाकुले॥ २१ है; जहाँ ऊर्ध्वरेता मुनियोंके आश्रम दृष्टिगोचर होते हैं तथा
आश्रमा यत्र दृश्यन्ते मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्। जो प्रचुर फल-फूल और जलसे पूर्ण है, उस सुन्दर सुरम्य
तस्मिंस्तीर्थे समाश्रित्य बहुपुष्पफलोदके॥ २२ कुरुक्षेत्र तीर्थमें पहुँचकर वे दोनों देवता चीर और कृष्णमृगचर्म
चीरकृष्णाजिनधरौ चरन्तौ तप उत्तमम्। धारण करके तपस्या करने लगे। वहाँपर वनके एक
तत्रैकस्मिन् वनोद्देशे विमलोदो ह्रदः शुभः॥ २३ भागमें निर्मल जलसे भरा हुआ एक सुन्दर सरोवर है,
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अध्याय ६ ] अगस्त्य तथा वसिष्ठजीके मित्रावरुणके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेका प्रसङ्ग २५
बहुगुल्मलताकीर्णो नानापक्षिनिषेवितः । जो बहुत-सी झाड़ियों और बेलोंसे आवृत है; अनेकानेक
नानातरुवनच्छन्नो नलिन्या चोपशोभितः ॥ २४ पक्षी उसका सेवन करते हैं। वह भाँति-भाँतिके वृक्षसमूहोंसे
आच्छन्न और कमलोंसे सुशोभित है। उस सरोवरकी
पौण्डरीक इति ख्यातो मीनकच्छपसेवितः । 'पौण्डरीक' नामसे प्रसिद्धि है। उसमें बहुत-सी मछलियाँ
ततस्तु मित्रावरुणौ भ्रातरौ वनचारिणौ । और कछुए निवास करते हैं। तप आरम्भ करनेके
तं तु देशं गतौ देवौ विचरन्तौ यदृच्छया ॥ २५ पश्चात् वे दोनों भाई—मित्र और वरुणदेवता एक दिन
वनमें विचरण करते और स्वेच्छानुसार घूमते हुए उस
सरोवरकी ओर गये ॥ २०-२५ ॥
ताभ्यां तत्र तदा दृष्टा उर्वशी तु वराप्सराः । वहाँ उन दोनोंने उस समय श्रेष्ठ एवं सुन्दरी अप्सरा
स्नायन्ती सहितान्याभिः सखीभिः सा वरानना । उर्वशीको देखा, जो अपनी अन्य सहेलियोंके साथ स्नान
गायन्ती च हसन्ती च विश्वस्ता निर्जने वने ॥ २६ कर रही थी। वह सुमुखी अप्सरा उस निर्जन वनमें विश्वस्त
होकर हँसती और गाती थी। उसका वर्ण गोरा था। कमलके
गौरी कमलगर्भाभा स्निग्धकृष्णाशिरोरुहा । भीतरी भागके समान उसकी कान्ति थी। उसकी अलकें
पद्मपत्रविशालाक्षी रक्तोष्ठी मृदुभाषिणी ॥ २७ काली-काली और चिकनी थीं, आँखें कमल-दलके
समान बड़ी-बड़ी थीं, होठ लाल थे, उसका भाषण
शङ्खकुन्देन्दुधवलैर्दन्तैरविरलैः समैः । बहुत ही मधुर था। उसके दाँत शङ्ख, कुन्द और चन्द्रमाके
सुभ्रूः सुनासा सुमुखी सुललाटा मनस्विनी ॥ २८ समान श्वेत, परस्पर मिले हुए और बराबर थे। उस
मनस्विनीकी भौंहें, नासिका, मुख और ललाट—सभी
सिंहवत् सूक्ष्ममध्याङ्गी पीनोरुजघनस्तनी । सुन्दर थे। कटिभाग सिंहके कटिप्रदेशकी भाँति पतला
मधुरालापचतुरा सुमध्या चारुहासिनी ॥ २९ था। उरोज, ऊरु और जघन—ये मोटे और घने थे।
वह मधुर भाषण करनेमें चतुर थी। उसका मध्यभाग
रक्तोत्पलकरा तन्वी सुपदी विनयान्विता । सुन्दर और मुस्कान मनोहर थी। दोनों हाथ लाल कमलके
पूर्णचन्द्रनिभा बाला मत्तद्विरदगामिनी ॥ ३० समान सुन्दर एवं कोमल थे। शरीर पतला और पैर
सुन्दर थे। वह बाला बड़ी ही विनीता थी। उसका मुख
दृष्ट्वा तस्यास्तु तद्रूपं तौ देवौ विस्मयं गतौ । पूर्णचन्द्रके समान आह्लादजनक और गति मत्त गजराजके
तस्या हास्येन लास्येन स्मितेन ललितेन च ॥ ३१ समान मन्द थी। उर्वशीके उस दिव्य रूपको देखकर
वे दोनों देवता विस्मयमें पड़ गये। उसके लास्य (नृत्य),
मृदुना वायुना चैव शीतानिलसुगन्धिना । हास्य, ललितभाव-मिश्रित मन्द मुस्कान और मधुर सुरीले
मत्तभ्रमरगीतेन पुंस्कोकिलरुतेन च ॥ ३२ गानसे तथा शीतल-मन्द-सुगन्धित मलयानलके स्पर्शसे
एवं मतवाले भौंरोंके संगीत और कोकिलोंके कलरवसे
सुस्वरेण हि गीतेन उर्वश्या मधुरेण च । उन दोनोंका मन और भी मुग्ध हो गया। साथ ही
ईक्षितो च कटाक्षेण स्कन्दतुस्तावूभावपि । उर्वशीकी तिरछी चितवनके शिकार होकर वे दोनों
निमेः शापादथोत्क्रम्य स्वदेहान्मुनिसत्तम ॥ ३३ ही वहाँ स्खलित हो गये (उनके वीर्यका पतन हो गया)।
मुनिसत्तम ! इसके बाद निमिके शापवश* वसिष्ठजीका
वसिष्ठ मित्रावरुणात्मजोऽसी- जीवात्मा अपने शरीरसे पृथक् होकर (मित्रावरुणके
त्यथोचुरागत्य हि विश्वदेवाः । वीर्यमें आविष्ट हुआ) ॥ २६-३३ ॥
रेतस्त्रिभागं कमलेऽचरत्तद् 'वसिष्ठ ! तुम मित्रावरुणके पुत्र होओगे'—इस प्रकार
वसिष्ठ एवं तु पितामहोक्तेः ॥ ३४ विश्वेदेवोंने (निमिके शुक्रमें) आकर कहा था तथा ब्रह्माजीका
भी यही कथन था; अतएव मित्रावरुणके तीन स्थानोंपर
- एक बार राजा निमिने यज्ञ करनेकी इच्छासे अपने पुरोहित वसिष्ठजीसे परामर्श किया। वसिष्ठजीने कहा—'मैं देवलोकमें एक
यज्ञ आरम्भ करा चुका हूँ। उसके समाप्त होनेतक आप अपना यज्ञ रोके रहें। वहाँसे आकर हम आपका यज्ञ आरम्भ करायेंगे।' निमिने
उनकी प्रतीक्षा नहीं की। वसिष्ठजीने लौटनेपर यज्ञ होता देख राजाको शाप दिया कि 'तुम विदेह हो जाओ।' तब राजाने भी शाप दिया
कि 'आपका भी यह शरीर न रहे।'