संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२३० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५२
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२३० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५२
इन्द्रजिन्मन्त्रलब्धं तु रथमारुह्य वै पुनः।
वानरेषु च सर्वेषु शरवर्षं ववर्ष सः॥७२
रात्रौ तद्द्बाणभिन्नं तु बलं सर्वं च राघवम्।
निश्चेष्टमखिलं दृष्ट्वा जाम्बवत्प्रेरितस्तदा॥७३
वीर्यादौषधमानीय हनूमान् मारुतात्मजः।
भूम्यां शयानमुत्थाप्य रामं हरिगणांस्तथा॥७४
तैरेव वानरैः सार्धं ज्वलितोल्काकरैर्निशि।
दाहयामास लङ्कां तां हस्त्यश्वरथराक्षसाम्॥७५
वर्षन्तं शरजालानि सर्वदिक्षु घनो यथा।
स भ्रात्रा मेघनादं तं घातयामास राघवः॥७६
घातितेष्वथ रक्षस्सु पुत्रमित्रादिबन्धुषु।
कारितेष्वथ विघ्नेषु होमजप्यादिकर्मणाम्॥७७
ततः क्रुद्धो दशग्रीवो लङ्काद्वारे विनिर्गतः।
क्वासौ राम इति ब्रूते मानुषस्तापसाकृतिः॥७८
योद्धा कपिबलीत्युच्चैर्व्याहरद्राक्षसाधिपः।
वेगवद्भिर्विनीतैश्च अश्वैश्चित्ररथे स्थितः॥७९
अथायान्तं तु तं दृष्ट्वा रामः प्राह दशाननम्।
रामोऽहमत्र दुष्टात्मन्नेहि रावण मां प्रति॥८०
इत्युक्ते लक्ष्मणः प्राह रामं राजीवलोचनम्।
अनेन रक्षसा योत्स्ये त्वं तिष्ठेति महाबल॥८१
ततस्तु लक्ष्मणो गत्वा रुरोध शरवृष्टिभिः।
विंशद्बाहुविसृष्टैस्तु शस्त्रास्त्रैर्लक्ष्मणं युधि॥८२
रुरोध स दशग्रीवः तयोर्युद्धमभून्महत्।
देवा व्योम्नि विमानस्था वीक्ष्य तस्थुर्महाहवम्॥८३
ततो रावणशस्त्राणिच्छित्त्वा स्वैस्तीक्ष्णसायकैः।
लक्ष्मणः सारथिं हत्वा तस्याश्वानपि भल्लकैः॥८४
तत्पश्चात् इन्द्रजित् मन्त्रशक्तिसे प्राप्त हुए रथपर आरूढ़ हो समस्त वानरोंपर बाण-वृष्टि करने लगा। रात्रिके समय समस्त वानर-सेना तथा श्रीरामचन्द्रजीको मेघनादके बाणोंसे विद्ध हो सर्वथा निश्चेष्ट पड़े देख पवनकुमार हनूमान्जी जाम्बवान्के द्वारा प्रेरित हो अपने पराक्रमसे औषध ले आये। उन्होंने उस औषधके प्रभावसे भूमिपर पड़े हुए श्रीरामचन्द्रजी तथा वानरगणोंको उठाया और प्रज्वलित उल्का हाथमें लिये उन्हीं वानरोंके साथ रातमें जाकर हाथी, रथ और घोड़ोंसे युक्त राक्षसोंकी लङ्कामें आग लगा दी। तदनन्तर भगवान् रामने बादलके समान समस्त दिशाओंमें बाणोंकी वर्षा करते हुए मेघनादका अपने भाई लक्ष्मणके द्वारा वध करा दिया॥७२-७६॥
इस प्रकार जब पुत्र-मित्रादि समस्त राक्षस-बन्धु मारे गये तथा होम-जप आदि अभिचार-कर्मोंमें वानरोंद्वारा विघ्न डाल दिया गया, तब कुपित हो दशशीश रावण वेगशाली सुशिक्षित अश्वोंसे युक्त विचित्र रथमें बैठकर लङ्काके द्वारपर निकल आया और कहने लगा—'तपस्वीका वेष बनाये वह मनुष्य राम कहाँ है, जो वानरोंके बलपर योद्धा बना हुआ है?' राक्षसराज रावणने यह बात बड़े जोरोंसे कही। यह सुन भगवान् रामने दशानन रावणको आते देख उससे कहा—'दुष्टात्मा रावण! मैं ही राम हूँ और यहाँ खड़ा हूँ, तू मेरी ओर चला आ'॥७७-८०॥
उनके यों कहनेपर लक्ष्मणने कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—'महाबल! आप अभी ठहरें, मैं इस राक्षसके साथ युद्ध करूँगा।' तदनन्तर लक्ष्मणने आगे बढ़कर बाणोंकी वृष्टिसे रावणको ढक दिया। फिर दशग्रीव रावणने भी अपनी बीस भुजाओंद्वारा छोड़े हुए शस्त्रास्त्रोंसे लक्ष्मणको संग्राममें आच्छादित कर दिया। इस प्रकार उन दोनोंमें महान् युद्ध हुआ। विमानपर आरूढ़ देवतागण इस महान् संग्रामको देख [कौतूहलवश] आकाशमें स्थित हो गये॥८१-८३॥
तत्पश्चात् लक्ष्मणने अपने तीखे बाणोंद्वारा रावणके अस्त्र-शस्त्र काटकर उसके सारथिको मार डाला और भल्ल नामक बाणोंसे उसके घोड़ोंको भी नष्ट कर दिया।
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अध्याय ५२ ] श्रीराम आदिका समुद्रतटपर जाना; विभीषणकी शरणागति और राज्याभिषेक २३१
रावणस्य धनुश्छित्त्वा ध्वजं च निशितैः शरैः । फिर तीखे बाणोंसे रावणका धनुष और उसकी ध्वजा
वक्षःस्थलं महावीर्यो विव्याध परवीरहा ॥ ८५ काटकर शत्रु-वीरोंका नाश करनेवाले महान् पराक्रमी
लक्ष्मणजीने उसके वक्षःस्थलको बेध दिया। तब राक्षसराज
ततो रथान्निपत्याधः क्षिप्रं राक्षसनायकः । रावण रथसे नीचे गिर पड़ा। किंतु शीघ्र ही उठकर कुपित
शक्तिं जग्राह कुपितो घण्टानादविनादिनीम् ॥ ८६ हो उसने हाथमें शक्ति उठायी, जो सैकड़ों घड़ियालोंके
समान आवाज करनेवाली थी। उसकी धार अग्निकी
अग्निज्वालाज्वलज्जिह्वां महोल्कासदृशद्युतिम् । ज्वालाके समान प्रज्वलित थी तथा उसकी कान्ति महती
दृढमुष्ट्या तु निक्षिप्ता शक्तिः सा लक्ष्मणोरसि ॥ ८७ उल्काके समान प्रतीत होती थी। उसने दृढ़तापूर्वक मुट्ठी
बाँधकर उस शक्तिको लक्ष्मणकी छातीपर फेंका। वह
विदार्यान्तःप्रविष्टाथ देवास्त्रस्तास्ततोऽम्बरे । शक्ति उनकी छाती छेदकर भीतर घुस गयी। इससे आकाशमें
लक्ष्मणं पतितं दृष्ट्वा रुदद्भिर्वानरेश्वरैः ॥ ८८ स्थित देवतागण भयभीत हो गये। लक्ष्मणको गिरा देख
रोते हुए वानराधिपतियोंके साथ दुःखी हो भगवान् श्रीराम
दुःखितः शीघ्रमागम्य तत्पार्श्वं प्राह राघवः । शीघ्र ही उनके पास आये और कहने लगे— 'मेरे मित्र
क्व गतो हनुमान् वीरो मित्रो मे पवनात्मजः ॥ ८९ पवनकुमार हनुमान् कहाँ चले गये? पृथ्वीपर पड़ा हुआ
मेरा भाई लक्ष्मण जिस-किसी प्रकार भी जीवित हो सके,
यदि जीवति मे भ्राता कथंचित्पतितो भुवि । वह उपाय होना चाहिये' ॥ ८४-८९१/२ ॥
इत्युक्ते हनुमान् राजन् वीरो विख्यातपौरुषः ॥ ९० राजन् ! उनके इस प्रकार कहनेपर, विख्यात पराक्रमी
बद्ध्वाञ्जलिं बभाषेदं देह्यनुज्ञां स्थितोऽस्मि भोः । वीर हनुमान्जी हाथ जोड़कर बोले— 'देव ! आज्ञा दें, मैं
रामः प्राह महावीर विशल्यकरणी मम ॥ ९१ सेवामें उपस्थित हूँ' ॥ ९०१/२ ॥
श्रीरामने कहा— 'महावीर ! मुझे 'विशल्यकरणी'
अनुजं विरुजं शीघ्रं कुरु मित्र महाबल । ओषधि चाहिये। महाबली! उसे लाकर मेरे भाईको
ततो वेगात्समुत्पत्य गत्वा द्रोणगिरिं कपिः ॥ ९२ शीघ्र ही नीरोग करो ॥ ९११/२ ॥
तब हनुमान्जी बड़े वेगसे उछले और द्रोणगिरिपर
बद्ध्वा च शीघ्रमानीय लक्ष्मणं नीरुजं क्षणात् । जाकर शीघ्र ही वहाँसे दवा बाँधकर ले आये और उसका
चकार देवदेवेशां पश्यतां राघवस्य च ॥ ९३ प्रयोग करके देवदेवेश्वरों तथा रामचन्द्रजीके देखते-देखते
क्षणभरमें लक्ष्मणको नीरोग कर दिया ॥ ९२-९३ ॥
ततः क्रुद्धो जगन्नाथो रामः कमललोचनः । तदनन्तर जगदीश्वर कमलनयन श्रीराम बहुत ही कुपित
रावणस्य बलं शिष्टं हस्त्यश्वरथराक्षसम् ॥ ९४ हुए और रावणकी बची हुई सेनाको हाथी, घोड़े, रथ तथा
राक्षसोंसहित क्षणभरमें मार गिराया। उन्होंने तीखे बाणोंसे
हत्वा क्षणेन रामस्तु तच्छरीरं तु सायकैः । रावणका शरीर जर्जर कर दिया और रणभूमिमें वानरोंसे
तीक्ष्णैर्जर्जरितं कृत्वा तस्थिवान् वानरैर्वृतः ॥ ९५ घिरे हुए खड़े रहे। रावण निश्चेष्ट होकर गिर पड़ा। फिर
धीरे-धीरे होशमें आनेपर वह उठकर कुपित हो सिंहनाद
अस्तचेष्टो दशग्रीवः संज्ञां प्राप्य शनैः पुनः । करने लगा। उसकी गर्जना सुनकर आकाशवर्ती देवता लोग
उत्थाय रावणः क्रुद्धः सिंहनादं ननाद च ॥ ९६ दहल गये ॥ ९४-९६१/२ ॥
तन्नादश्रवणैर्व्योम्नि वित्रस्तो देवतागणः । इसी समय रावणके प्रति वैर बाँधे महामुनि अगस्त्य
एतस्मिन्नेव काले तु रामं प्राप्य महामुनिः ॥ ९७ श्रीरामचन्द्रजीके पास आये और शत्रुओंपर विजय
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