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संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Sankshipta Narasimha Purana Gita Press

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished318 पृष्ठ

२२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण एवं सटीक पाठ दिया गया है:

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२२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ५


[मूल संस्कृत श्लोक - बायाँ स्तम्भ]

अदित्यां कश्यपाज्जाताः पुत्रा द्वादश शोभनाः ।
तानहं नामतो वक्ष्ये शृणुष्व गदतो मम ॥ ५०
भगोऽशुंश्चार्यमा चैव मित्रोऽथ वरुणस्तथा ।
सविता चैव धाता च विवस्वांश्च महामते ॥ ५१
त्वष्टा पूषा तथा चेन्द्रो द्वादशो विष्णुरुच्यते ।
दित्याः पुत्रद्वयं जज्ञे कश्यपादिति नः श्रुतम् ॥ ५२
हिरण्याक्षो महाकायो वाराहेण तु यो हतः ।
हिरण्यकशिपुश्चैव नरसिंहेन यो हतः ॥ ५३
अन्ये च बहवो दैत्या दनुपुत्राश्च दानवाः ।
अरिष्टायां तु गन्धर्वा जज्ञिरे कश्यपात्तथा ॥ ५४
सुरसायामथोत्पन्ना विद्याधरगणा बहु ।
गा वै स जनयामास सुरभ्यां कश्यपो मुनिः ॥ ५५
विनतायां तु द्वौ पुत्रौ प्रख्यातौ गरुडारुणौ ।
गरुडो देवदेवस्य विष्णोरमिततेजसः ॥ ५६
वाहनत्वमियात्प्रीत्या अरुणः सूर्यसारथिः ।
ताम्रायां कश्यपाज्जाताः षट्पुत्रास्तान्निबोध मे ॥ ५७
अश्वा उष्ट्रा गर्दभाश्च हस्तिनो गवया मृगाः ।
क्रोधायां जज्ञिरे तद्वद्ये भूम्यां दुष्टजातयः ॥ ५८
इरा वृक्षलतावल्लीशणजातींश्च जज्ञिरे ।
खसा तु यक्षरक्षांसि मुनिरप्सरसस्तथा ॥ ५९
कद्रूपुत्रा महानागा दंदशूका विषोल्बणाः ।
सप्तविंशति याः प्रोक्ताः सोमपत्न्योऽथ सुव्रताः ॥ ६०
तासां पुत्रा महासत्त्वा बुधाद्यास्त्वभवन् द्विज ।
अरिष्टनेमिपत्नीनामपत्यानीह षोडश ॥ ६१
बहुपुत्रस्य विदुषश्चतस्रो विद्युतः स्मृताः ।
प्रत्यङ्गिरस्सुताः श्रेष्ठा ऋषयश्चर्षिसत्कृताः ॥ ६२
कृशाश्वस्य तु देवर्षेर्देवाश्च ऋषयः सुताः ।
एते युगसहस्रान्ते जायन्ते पुनरेव हि ॥ ६३
एते कश्यपदायादाः कीर्तिताः स्थाणुजंगमाः ।
स्थितौ स्थितस्य देवस्य नरसिंहस्य धर्मतः ॥ ६४
एता विभूतयो विप्र मया ते परिकीर्तिताः ।
कथिता दक्षकन्यानां मया तेऽपत्यसंततिः ॥ ६५
श्रद्धावान् संस्मरेदेतां स सुसंतानवान् भवेत् ॥ ६६


[हिन्दी अनुवाद - दायाँ स्तम्भ]

महामते! अदितिके कश्यपजीसे बारह सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुए। उनके नाम बता रहा हूँ, सुनिये— महामते! भग, अंशु, अर्यमा, मित्र, वरुण, सविता, धाता, विवस्वान्, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र और बारहवें विष्णु कहे जाते हैं। दितिके कश्यपजीसे दो पुत्र हुए थे, ऐसा हमने सुना है। पहला महाकाय हिरण्याक्ष हुआ, जिसे भगवान् वाराहने मारा और दूसरा हिरण्यकशिपु हुआ, जो नृसिंहजीके द्वारा मारा गया। इनके अतिरिक्त अन्य भी बहुत-से दैत्य दितिसे उत्पन्न हुए। दनुके पुत्र दानव हुए और अरिष्टाके कश्यपजीसे गन्धर्वगण उत्पन्न हुए। सुरसासे अनेक विद्याधरगण हुए और सुरभिसे कश्यप मुनिने गौओंको जन्म दिया॥ ४८-५५॥

विनताके 'गरुड' और 'अरुण' नामक दो विख्यात पुत्र हुए। गरुडजी प्रेमवश अमित-तेजस्वी देवदेव भगवान् विष्णुके वाहन हो गये और अरुण सूर्यके सारथि बने। ताम्राके कश्यपजीसे छः पुत्र हुए, उन्हें आप मुझसे सुनिये— घोड़ा, ऊँट, गदहा, हाथी, गवय और मृग। पृथ्वीपर जितने दुष्ट जीव हैं, वे क्रोधासे उत्पन्न हुए हैं। इरााने वृक्ष, लता, वल्ली और 'सन' जातिके तृणवर्गको जन्म दिया। खसाने यक्ष और राक्षसों तथा मुनिने अप्सराओंको प्रकट किया। कद्रूके पुत्र प्रचण्ड विषवाले 'दंदशूक' नामक महासर्प हुए। विप्रवर! चन्द्रमाकी सुन्दर व्रतवाली जिन सत्ताईस स्त्रियोंकी चर्चा की गयी है, उनसे बुध आदि महान् पराक्रमी पुत्र हुए। अरिष्टनेमिकी स्त्रियोंके गर्भसे सोलह संतानें हुईं ॥ ५६-६१ ॥

विद्वान् बहुपुत्रकी संतानें कपिला, अतिलोहिता, पीता और सिता—इन चार वर्णोंवाली चार बिजलियाँ कही गयी हैं। प्रत्यङ्गिराके पुत्रगण ऋषियोंद्वारा सम्मानित उत्तम ऋषि हुए। देवर्षि कृशाश्वके पुत्र देवर्षि ही हुए। ये एक-एक हजार युग (अर्थात् एक कल्प)- के बीतनेपर पुनः-पुनः उत्पन्न होते रहते हैं। इस प्रकार कश्यपके वंशमें उत्पन्न हुए चर-अचर प्राणियोंका वर्णन किया गया। विप्रवर! धर्मपूर्वक पालनकर्ममें लगे हुए भगवान् नरसिंहकी इन विभूतियोंका यहाँ मैंने आपके समक्ष वर्णन किया है। साथ ही दक्षकन्याओंकी वंश-परम्परा भी बतलायी है। जो श्रद्धापूर्वक इन सबका स्मरण करता है, वह सुन्दर संतानसे

अध्याय ६ ] अगस्त्य तथा वसिष्ठजीके मित्रावरुणके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेका प्रसङ्ग २३
सर्गानुसर्गौ कथितौ मया ते युक्त होता है। ब्रह्मन् ! सृष्टि-विस्तारके लिये ब्रह्मा तथा
समासतः सृष्टिविवृद्धिहेतोः। अन्य प्रजापतियोंद्वारा जो सर्ग और अनुसर्ग सम्पादित
पठन्ति ये विष्णुपराः सदा नरा हुए, उन सबको मैंने संक्षेपसे आपको बता दिया। जो
द्विजाति मानव भगवान् विष्णुमें मन लगाकर इन
इदं द्विजास्ते विमला भवन्ति ॥ ६७ प्रसङ्गोंको सदा पढ़ेंगे वे निर्मल हो जायेंगे ॥ ६२-६७ ॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे सृष्टिकथने पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणके सृष्टिवर्णनमें पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५ ॥
छठा अध्याय
अगस्त्य तथा वसिष्ठजीके मित्रावरुणके पुत्ररूपमें उत्पन्न होनेका प्रसङ्ग
सूत उवाच सूतजी बोले—ब्रह्मन् ! परमात्मा भगवान् विष्णुसे जिस
सृष्टिस्ते कथिता विष्णोर्मायास्य जगतो द्विज। प्रकार देव, दानव और यक्ष आदि उत्पन्न हुए, वह जगत्की
देवदानवयक्षाद्या यथोत्पन्ना महात्मनः॥ १ सृष्टिका वृत्तान्त मैंने आपसे कह दिया। अब ऋषियोंके
यमुद्दिश्य त्वया पृष्टः पुराहमृषिसंनिधौ। निकट जिस उद्देश्यको लेकर पहले आपने मुझसे प्रश्न
मित्रावरुणपुत्रत्वं वसिष्ठस्य कथं त्विति॥ २ किया था कि 'वसिष्ठजी मित्रावरुणके पुत्र कैसे हो गये ?' उसी
तदिदं कथयिष्यामि पुण्याख्यानं पुरातनम्। पुरातन पवित्र कथाको कहूँगा। भरद्वाजजी ! आप एकाग्रचित्त
शृणुष्वैकाग्रमनसा भरद्वाज विशेषतः॥ ३ हो, विशेष सावधानीके साथ उसे सुनिये ॥ १-३ ॥
सर्वधर्मार्थतत्त्वज्ञः सर्ववेदविदां वरः। सम्पूर्ण धर्म और अर्थोंके तत्त्वको जाननेवाले,
पारगः सर्वविद्यानां दक्षो नाम प्रजापतिः॥ ४ समस्त वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ तथा समग्र विद्याओंके पारदर्शी
तेन दत्ताः शुभाः कन्याः सर्वाः कमललोचनाः। 'दक्ष' नामक प्रजापतिने अपनी तेरह सुन्दरी कन्याओंको,
सर्वलक्षणसम्पूर्णाः कश्यपाय त्रयोदश॥ ५ जो सभी कमलके समान नेत्रोंवाली और समस्त शुभ
तासां नामानि वक्ष्यामि निबोधत ममाधुना। लक्षणोंसे सम्पन्न थीं, कश्यप मुनिको दिया था। उनके
अदितिर्दितिर्दनुः काला मुहूर्ता सिंहिका मुनिः॥ ६ नाम बतलाता हूँ, आप लोग इस समय मुझसे उनके
नाम जान लें—अदिति, दिति, दनु, काला, मुहूर्ता,
इरा क्रोधा च सुरभिर्विनता सुरसा खसा। सिंहिका, मुनि, इरा, क्रोधा, सुरभि, विनता, सुरसा,
कद्रूश्च सरमा चैव या तु देवशुनी स्मृता॥ ७ खसा, कद्रू और सरमा, जो देवताओंकी कुतिया कही
दक्षस्यैता दुहितरस्ताः प्रादात् कश्यपाय सः। गयी हैं—ये सभी दक्ष-प्रजापतिकी कन्याएँ हैं*।
तासां ज्येष्ठा वरिष्ठा च अदितिर्नाम्तो द्विज॥ ८ इनको दक्षने कश्यपजीको समर्पित किया था। विप्रवर !
अदिति नामकी जो कन्या थी, वही इन सबमें श्रेष्ठ और
अदितिः सुषुवे पुत्रान् द्वादशाग्निसमप्रभान्। बड़ी थी॥ ४-८॥
तेषां नामानि वक्ष्यामि शृणुष्व गदतो मम॥ ९ अदितिने बारह पुत्रोंको उत्पन्न किया†, जो
अग्निके समान कान्तिमान् एवं तेजस्वी थे। उन
सबके नाम बतला रहा हूँ, आप मुझसे उन्हें सुनें।

  • अध्याय पाँचके ४८-४९ श्लोकोंमें कश्यपकी तेरह पत्नियोंके नाम आये हैं। यहाँ पंद्रह नाम आये हैं; इनमें 'मुहूर्ता' और
    'सरमा'—ये दो नाम अधिक हैं। 'मुहूर्ता' तो धर्मकी पत्नी थीं। 'सरमा' कश्यपकी पत्नी होनेपर भी दक्षकन्या नहीं थी। इसके अतिरिक्त
    अरिष्टा एवं ताम्राके स्थानपर यहाँ काला और सिंहिका नाम आये हैं। ये नाम अन्यत्र पुराणोंमें भी आते हैं।
    † यद्यपि पाँचवें अध्यायके ५१-५२ श्लोकोंमें अदितिकी सन्तानोंका वर्णन आ गया है; अतः यहाँ इस प्रसङ्गकी पुनरुक्ति जान पड़ती
    है; तथापि इसका समाधान यह है कि वहाँ सृष्टिवर्णनके प्रसङ्गमें वह बात कही गयी है और यहाँ 'वसिष्ठ तथा अगस्त्यजीकी मित्रावरुणके
    पुत्ररूपमें पुनरुत्पत्ति कैसे हुई ?' इस प्रश्नके समाधानके प्रसङ्गमें मित्र और वरुण देवताका परिचय देना आवश्यक हुआ। वे दोनों बारह
    आदित्योंमें परिगणित हैं; अतः अदितिके उन बारहौं पुत्रोंका पुनः वर्णन प्रसंगवशात् आ गया है; अतः पुनरुक्ति-दोष नहीं मानना चाहिये।
    In Public Domain. Digitzed by Sarvagya Sharda Peeth