संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२०० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४१
२०० श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४१
राममाह जनस्थाने भ्रात्रा सह महाबलम्।
ज्ञात्वा ते राघवं क्रुद्धाः प्रेषयामासूरूर्जितान्॥ ५१
चतुर्दशसहस्राणि राक्षसानां बलीयसाम्।
अग्रे निजग्मुस्तेनैव रक्षसां नायकास्त्रयः॥ ५२
रावणेन नियुक्तास्ते पुरैव तु महाबलाः।
महाबलपरीवारा जनस्थानमुपागताः॥ ५३
क्रोधेन महताऽऽविष्टा दृष्ट्वा तां छिन्ननासिकाम्।
रुदतीमश्रुदिग्धाङ्गीं भगिनीं रावणस्य तु॥ ५४
रामोऽपि तद्वलं दृष्ट्वा राक्षसानां बलीयसाम्।
संस्थाप्य लक्ष्मणं तत्र सीताया रक्षणं प्रति॥ ५५
गत्वा तु प्रहितैस्तत्र राक्षसैर्बलदर्पितैः।
चतुर्दशसहस्रं तु राक्षसानां महाबलम्॥ ५६
क्षणेन निहतं तेन शरैरग्निशिखोपमैः।
खरश्च निहतस्तेन दूषणश्च महाबलः॥ ५७
त्रिशिराश्च महारोषाद् रणे रामेण पातितः।
हत्वा तान् राक्षसान् दुष्टान् रामश्चाश्रममाविशत्॥ ५८
शूर्पणखा च रुदती रावणान्तिकमागता।
छिन्ननासां च तां दृष्ट्वा रावणो भगिनीं तदा॥ ५९
मारीचं प्राह दुर्बुद्धिः सीताहरणकर्मणि।
पुष्पकेण विमानेन गत्वाहं त्वं च मातुल॥ ६०
जनस्थानसमीपे तु स्थित्वा तत्र ममाज्ञया।
सौवर्णमृगरूपं त्वमास्थाय तु शनैः शनैः॥ ६१
गच्छ त्वं तत्र कार्यार्थं यत्र सीता व्यवस्थिता।
दृष्ट्वा सा मृगपोतं त्वां सौवर्णं त्वयि मातुल॥ ६२
स्पृहां करिष्यते रामं प्रेषयिष्यति बन्धने।
तद्वाक्यात्तत्र गच्छन्तं धावस्व गहने वने॥ ६३
लक्ष्मणस्यापकर्षार्थं वक्तव्यं वागुदीरणम्।
ततः पुष्पकमारुह्य मायारूपेण चाप्यहम्॥ ६४
तां सीतामहरानेष्ये तस्यामासक्तमानसः।
त्वमपि स्वेच्छया पश्चादागमिष्यसि शोभन॥ ६५
'महाबली श्रीराम इस समय जनस्थानमें अपने भाई लक्ष्मणके
साथ रहते हैं।' श्रीरामका पता पाकर वे तीनों बहुत ही
कुपित हुए और उनके साथ युद्धके लिये उन्होंने चौदह
हजार प्रतापी एवं बलवान् राक्षसोंको भेजा तथा वे तीनों
निशाचर-नायक स्वयं भी उस सेनाके साथ आगे-आगे
चले। उन महाबलवान् राक्षसोंको रावणने वहाँ पहलेसे ही
नियुक्त कर रखा था। वे बहुत बड़ी सेनाके साथ
जनस्थानमें आये। रावणकी बहिन शूर्पणखा नाक कट
जानेसे बहुत रो रही थी। उसके सारे अङ्ग आँसुओंसे
भीग गये थे। उसकी वह दुर्दशा देख वे खर-दूषण
आदि राक्षस अत्यन्त कुपित हो उठे थे॥ ५०-५४॥
श्रीरामने भी बलवान् राक्षसोंकी उस सेनाको देख
लक्ष्मणको सीताकी रक्षामें उसी स्थानमें रोक दिया और
अपने साथ युद्धके लिये वहाँ भेजे गये उन बलाभिमानी
राक्षसोंके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया। अग्निकी ज्वालाके
समान दीप्तिमान् बाणोंद्वारा उन्होंने चौदह हजार राक्षसोंकी
प्रबल सेनाको क्षणभरमें मार गिराया। साथ ही खर और
महाबली दूषणका भी वध किया। इसी प्रकार त्रिशिराको
भी श्रीरामने अत्यन्त रोषपूर्वक रणक्षेत्रमें मार गिराया।
इस तरह उन सभी दुष्ट राक्षसोंका वध करके श्रीरामचन्द्रजी
अपने आश्रममें लौट आये॥ ५५-५८॥
तब शूर्पणखा रोती हुई रावणके पास आयी। दुर्बुद्धि
रावणने अपनी बहिनकी नाक कटी देख सीताको हर
लानेके उद्देश्यसे मारीचसे कहा—'मामा! हम और तुम
पुष्पकविमानसे चलकर जनस्थानके पास ठहरें। वहाँसे
तुम मेरी आज्ञाके अनुसार सोनेके मृगका वेष धारणकर
धीरे-धीरे मेरा कार्य सिद्ध करनेके लिये उस स्थानपर
जाना, जहाँ सीता रहती है। मामा! वह जब तुम्हें
सुवर्णमय मृगशावकके रूपमें देखेगी, तब तुम्हें लेनेकी
इच्छा करेगी और श्रीरामको तुम्हें बाँध लानेके लिये
भेजेगी। जब सीताकी बात मानकर वे तुम्हें बाँधने चलें,
तब तुम उनके सामनेसे गहन वनमें भाग जाना। फिर
लक्ष्मणको भी उधर ही खींचनेके लिये उच्चस्वरसे [हा
भाई लक्ष्मण! इस प्रकार] कातर वचन बोलना। तत्पश्चात्
मैं भी मायामय वेष बनाकर, पुष्पक विमानपर आरूढ़
हो, उस असहाया सीताको हर लाऊँगा; क्योंकि मेरा
मन उसमें आसक्त हो गया है। फिर भद्र! तुम भी
स्वेच्छानुसार चले आना'॥ ५९-६५॥
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अध्याय ४९ ] श्रीरामका जयन्तको दण्ड देना; शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्यसे मिलना २०१
इत्युक्ते रावणेनाथ मारीचो वाक्यमब्रवीत्।
त्वमेव गच्छ पापिष्ठ नाहं गच्छामि तत्र वै ॥ ६६
पुरैवानेन रामेण व्यथितोऽहं मुनेर्मखे।
इत्युक्तवति मारीचे रावणः क्रोधमूर्च्छितः ॥ ६७
मारीचं हन्तुमारेभे मारीचोऽप्याह रावणम्।
तव हस्तवधाद्वीर रामेण मरणं वरम् ॥ ६८
अहं गमिष्यामि तत्र यत्र त्वं नेतुमिच्छसि ।
अथ पुष्पकमारुह्य जनस्थानमुपागतः ॥ ६९
मारीचस्तत्र सौवर्णं मृगमास्थाय चाग्रतः।
जगाम यत्र सा सीता वर्तते जनकात्मजा ॥ ७०
सौवर्णं मृगपोतं तु दृष्ट्वा सीता यशस्विनी।
भाविकर्मवशाद्राममुवाच पतिमात्मनः ॥ ७१
गृहीत्वा देहि सौवर्णं मृगपोतं नृपात्मज।
अयोध्यायां तु मद्गेहे क्रीडनार्थमिदं मम ॥ ७२
तयैवमुक्तो रामस्तु लक्ष्मणं स्थाप्य तत्र वै।
रक्षणार्थं तु सीताया गतोऽसौ मृगपृष्ठतः ॥ ७३
रामेण चानुयातोऽसौ अभ्यधावद्वने मृगः।
ततः शरेण विव्याध रामस्तं मृगपोतकम् ॥ ७४
हा लक्ष्मणेति चोक्त्वासौ निपपात महीतले।
मारीचः पर्वताकारस्तेन नष्टो बभूव सः ॥ ७५
आकर्ण्य रुदतः शब्दं सीता लक्ष्मणमब्रवीत्।
गच्छ लक्ष्मण पुत्र त्वं यत्रायं शब्द उत्थितः ॥ ७६
भ्रातुर्ज्येष्ठस्य तत्त्वं वै रुदतः श्रूयते ध्वनिः।
प्रायो रामस्य संदेहं लक्षयेऽहं महात्मनः ॥ ७७
इत्युक्तः स तथा प्राह लक्ष्मणस्तामनिन्दिताम्।
न हि रामस्य संदेहो न भयं विद्यते क्वचित् ॥ ७८
रावणके यों समझानेपर मारीचने कहा—'अरे
पापिष्ठ! तुम्हीं जाओ, मैं वहाँ नहीं जाऊँगा। मैं तो
विश्वामित्रमुनिके यज्ञमें पहले ही श्रीरामके हाथों भारी
कष्ट उठा चुका हूँ।' मारीचके यों कहनेपर रावण
क्रोधसे मूर्च्छित हो उसे मार डालनेको उद्यत हो
गया। तब मारीचने उससे कहा—'वीर! तुम्हारे हाथसे
वध हो, इसकी अपेक्षा तो श्रीरामके हाथसे ही मरना
अच्छा है। तुम मुझे जहाँ ले चलना चाहते हो, वहाँ
अब मैं अवश्य चलूँगा' ॥ ६६-६८१/२ ॥
यह सुनकर वह पुष्पकविमानपर आरूढ हो
उसके साथ जनस्थानके निकट आया। वहाँ पहुँचकर
मारीच सुवर्णमय मृगका रूप धारणकर, जहाँ
जनकनन्दिनी सीता विद्यमान थीं, वहाँ उनके सामने
गया। उस सुवर्णमय मृगकिशोरको देखकर यशस्विनी
सीता भावी कर्मके वशीभूत हो अपने पति भगवान्
श्रीरामसे बोलीं—'राजपुत्र! आप उस सुवर्णमय
मृगशावकको पकड़कर मेरे लिये ला दीजिये। यह
अयोध्यामें मेरे महलके भीतर क्रीड़ा-विनोदके लिये
रहेगा' ॥ ६९-७२ ॥
सीताके यों कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उनकी रक्षाके
लिये लक्ष्मणको वहाँ रख दिया और स्वयं उस
मृगके पीछे चले। श्रीरामके पीछा करनेपर वह मृग
वनकी ओर भागा, तब श्रीरामने उस मृगशावकको
बाणसे बींध डाला। मारीच 'हा! लक्ष्मण!'—यों
कहकर पर्वताकार शरीरसे पृथ्वीपर गिरा और प्राणहीन
हो गया। रोते हुए मारीचके उस आर्तनादको सुनकर
सीताने लक्ष्मणसे कहा—'वत्स लक्ष्मण! जहाँसे यह
आवाज आयी है, वहीं तुम भी जाओ। निश्चय ही
तुम्हारे ज्येष्ठ भ्राताके रोदनका शब्द कानोंमें आ रहा
है, मुझे प्रायः महात्मा श्रीरामका जीवन संशयमें पड़ा
दिखायी देता है' ॥ ७३-७७ ॥
सीताकी यह बात सुनकर उन अनिन्दिता देवीसे
लक्ष्मणने कहा—'देवि! श्रीरामके लिये कोई
संदेहकी बात नहीं है, उन्हें कहीं भी भय नहीं है।'
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२०२ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४९
इति ब्रुवाणं तं सीता भाविकर्मबलाद्धृतम्। यों कहते हुए लक्ष्मणसे उस समय विदेहकुमारी सीताने
लक्ष्मणं प्राह वैदेही विरुद्धवचनं तदा॥ ७९ कुछ विरुद्ध वचन कहा, जो भवितव्यताकी प्रेरणासे
उनके मुखसे सहसा निकल पड़ा था। वे बोलीं—'मैं
मृते रामे तु मामिच्छन्न्रतस्त्वं न गमिष्यसि। जानती हूँ, तुम श्रीरामके मर जानेपर मुझे अपनी बनाना
इत्युक्तः स विनीतात्मा असहन्नप्रियं वचः॥ ८० चाहते हो; इसीसे इस समय वहाँ नहीं जा रहे हो।'
सीताके यों कहनेपर विनयशील राजकुमार लक्ष्मण
जगाम राममन्वेष्टुं तदा पार्थिवनन्दनः। उस अप्रिय वचनको न सह सके और तत्काल ही
संन्यासवेषमास्थाय रावणोऽपि दुरात्मवान्॥ ८१ श्रीरामचन्द्रजीकी खोजमें चल पड़े॥ ७८—८०१/२॥
इसी समय दुरात्मा रावण भी संन्यासीका वेष बनाकर
स सीतापाश्र्वमासाद्य वचनं चेदमुक्तवान्। सीताके पास आया और यों बोला—'देवि! अयोध्यासे
आगतो भरतः श्रीमानयोध्याया महामतिः॥ ८२ महाबुद्धिमान् भरतजी आये हैं। वे श्रीरामचन्द्रजीके साथ
बातचीत करके वहीं काननमें ठहरे हुए हैं। श्रीरामचन्द्रजीने
रामेण सह सम्भाष्य स्थितवांस्तत्र कानने। मुझे तुम्हें बुलानेके लिये यहाँ भेजा है। तुम इस विमानपर
मां च प्रेषितवान् रामो विमानमिदमारुह॥ ८३ चढ़ चलो। भरतजीने मनाकर श्रीरामको अयोध्या चलनेके
लिये राजी कर लिया है, अतः वे अयोध्या जा रहे हैं।
अयोध्यां याति रामस्तु भरतेन प्रसादितः। वैदेहि! तुम्हारी क्रीडा—विनोदके लिये उन्होंने उस मृग-
मृगबालं तु वैदेहि क्रीडार्थं ते गृहीतवान्॥ ८४ शावकको भी पकड़ लिया है। अहो! तुमने इस विशाल
वनमें बहुत दिनोंतक ऐसा महान् कष्ट उठाया है। अब
क्लेशितासि महारण्ये बहुकालं त्वमीदृशम्। तुम्हारे स्वामी सुन्दर मुखवाले श्रीरामचन्द्रजी तथा उनके
सम्प्राप्तराज्यस्ते भर्ता रामः स रुचिराननः॥ ८५ विनयशील भाई लक्ष्मण भी राज्यग्रहण कर चुके हैं।
अतः तुम उनके पास चलनेके लिये इस विमानपर चढ़
लक्ष्मणश्च विनीतात्मा विमानमिदमारुह। जाओ'॥ ८१—८५१/२॥
इत्युक्ता सा तथा गत्वा नीता तेन महात्मना॥ ८६ उसके यों कहनेपर उसकी कपटपूर्ण बातोंसे प्रेरित
हो सती सीता वह सब सत्य मानकर उस तथाकथित
आरुरोह विमानं तु छद्मना प्रेरिता सती। महात्माके साथ विमानके निकट गयीं और उसपर आरूढ
तज्जगाम ततः शीघ्रं विमानं दक्षिणां दिशम्॥ ८७ हो गयीं। तब वह विमान शीघ्रतापूर्वक दक्षिण दिशाकी
ओर चल पड़ा। यह देख सीता अत्यन्त शोकसे पीड़ित
ततः सीता सुदुःखार्ता विललाप सुदुःखिता। हो, अत्यन्त दुःखसे विलाप करने लगीं। यद्यपि सीता
विमाने खेऽपि रोदन्त्याश्चक्रे स्पर्शं न राक्षसः॥ ८८ आकाशमें उसके अपने ही विमानपर बैठी थीं, तथापि
रावणने वहाँ रोती हुई सीताका स्पर्श नहीं किया। अब
रावणः स्वेन रूपेण बभूवाथ महातनुः। रावण अपने असली रूपमें आ गया। उसका शरीर बहुत
दशग्रीवं महाकायं दृष्ट्वा सीता सुदुःखिता॥ ८९ बड़ा हो गया। दस मस्तकवाले उस विशालकाय राक्षसपर
दृष्टि पड़ते ही सीता अत्यन्त दुःखमें डूब गयीं और
हा राम वञ्चिताद्याहं केनापिच्छद्मरूपिणा। विलाप करने लगीं—'हाय राम! किसी कपटवेषधारी
रक्षसा घोररूपेण त्रायस्वेति भयार्दिता॥ ९० भयानक राक्षसने आज मुझे धोखा दिया है, मैं भयसे
पीड़ित हो रही हूँ; मुझे बचाओ। हे महाबाहु लक्ष्मण!
हे लक्ष्मण महाबाहो मां हि दुष्टेन रक्षसा। मुझे दुष्ट राक्षस हरकर लिये जा रहा है। मैं भयसे व्याकुल
द्रुतमागत्य रक्षस्व नीयमानामथाकुलाम्॥ ९१ हूँ तुम जल्दी आकर मुझ असहायाकी रक्षा करो'॥ ८६—९१॥
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अध्याय ४९ ] श्रीरामका जयन्तको दण्ड देना; शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्यसे मिलना २०३
एवं प्रलपमानायाः सीतायास्तन्महत्स्वनम्। इस प्रकार उच्चस्वरसे विलाप करती हुई सीताके उस
आकर्ण्य गृध्रराजस्तु जटायुस्तत्र चागतः॥ ९२ महान् आर्तनादको सुनकर गृध्रराज जटायु वहाँ आ पहुँचे
(और बोले-) 'अरे दुष्टात्मा रावण! ठहर जा; तू
तिष्ठ रावण दुष्टात्मन् मुञ्च मुञ्चात्र मैथिलीम्। सीताको छोड़ दे, छोड़ दे।' यह कहकर पराक्रमी जटायु
इत्युक्त्वा युयुधे तेन जटायुस्तत्र वीर्यवान्॥ ९३ उसके साथ युद्ध करने लगे। उन्होंने अपने दोनों पंखोंसे
रावणकी छातीमें चोट की। उनको इस प्रकार प्रहार करते
पक्षाभ्यां ताडयामास जटायुस्तस्य वक्षसि। देख रावणने समझ लिया कि 'यह पक्षी बड़ा बलवान्
ताडयन्तं तु तं मत्वा बलवानिति रावणः॥ ९४ है।' जब जटायुके मुख और चोंचकी मारसे वह बहुत
पीड़ित हो गया, तब उस दुष्टने बड़े वेगसे 'चन्द्रहास'
तुण्डचञ्चुप्रहारैस्तु भृशं तेन प्रपीडितः। नामक विशाल खड्ग उठाया और उससे धर्मात्मा जटायुपर
तत उत्थाप्य वेगेन चन्द्रहासमसिं महत्॥ ९५ घातक प्रहार किया। इससे उनकी चेतना क्षीण हो गयी
और वे पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ९२-९६॥
जघान तेन दुष्टात्मा जटायुं धर्मचारिणम्।
निपपात महीपृष्ठे जटायुः क्षीणचेतनः॥ ९६ उस समय उन्होंने रावणसे कहा- 'अरे दुष्टात्मन्!
ओ नीच राक्षस ! मुझे तूने नहीं मारा है। मैं तो तेरे
उवाच च दशग्रीवं दुष्टात्मन् न त्वया हतः। 'चन्द्रहास' नामक खड्गके प्रभावसे मारा गया हूँ। अरे
चन्द्रहासस्य वीर्येण हतोऽहं राक्षसाधम ॥ ९७ मूर्ख ! तेरे सिवा दूसरा कौन शस्त्रधारी योद्धा होगा, जो
किसी निहत्थेपर हथियार चलायेगा ? अरे दुष्ट राक्षस !
निरायुधं को हनेन्मूढ सायुधस्त्वामृते जनः। तू यह जान ले कि सीताका हर ले जाना तेरी मौत
सीतापहरणं विद्धि मृत्युस्ते दुष्ट राक्षस ॥ ९८ है। दुष्टात्मा रावण ! निस्संदेह श्रीरामचन्द्रजी तेरा वध
कर डालेंगे' ॥ ९७-९८१/२ ॥
दुष्ट रावण रामस्त्वां वधिष्यति न संशयः।
रुदती दुःखशोकार्ता जटायुं प्राह मैथिली ॥ ९९ जटायुके मारे जानेसे अत्यन्त दुःख और शोकसे
पीड़ित हुई मिथिलेशकुमारी सीता उनसे रोकर बोलीं-
मत्कृते मरणं यस्मात्त्वया प्राप्तं द्विजोत्तम । 'हे पक्षिराज! तुमने मेरे लिये मृत्युका वरण किया है,
तस्माद्रामप्रसादेन विष्णुलोकमवाप्स्यसि ॥ १०० इसलिये तुम श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे विष्णुलोकको
प्राप्त होओगे। खगश्रेष्ठ! जबतक श्रीरामचन्द्रजीसे तुम्हारी
यावद्रामेण सङ्गस्ते भविष्यति महाद्विज। भेंट न हो, तबतक तुम्हारे प्राण शरीरमें ही रहें।' उन
तावत्तिष्ठन्तु ते प्राणा इत्युक्त्वा तु खगोत्तमम् ॥ १०१ पक्षिराजसे यों कहकर अत्यन्त दुःखिनी सीताने अपने
शरीरसे धारण किये हुए समस्त आभूषणोंको उतारा
ततस्तान्यर्पितान्यङ्गाद्भूषणानि विमुच्य सा। और शीघ्रतापूर्वक वस्त्रमें बाँधकर कहा- 'तुम सब-
शीघ्रं निबध्य वस्त्रेण रामहस्तं गमिष्यथ ॥ १०२ के-सब श्रीरामके हाथमें पहुँच जाओगे।' और तब उन्हें
भूमिपर गिरा दिया ॥ ९९-१०२१/२॥
इत्युक्त्वा पातयामास भूमौ सीता सुदुःखिता।
एवं हृत्वा स सीतां तु जटायुं पात्य भूतले ॥ १०३ इस प्रकार सीताको हरकर तथा जटायुको धराशायी
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