संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३
१५४ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ४३
अक्लेशतः प्राप्यमिदं विसृज्य | ''जो बिना कष्टके ही प्राप्त होनेयोग्य इस महान् सुख
महासुखं योऽन्यसुखानि वाञ्छेत्। | (परमेश्वर)-को त्यागकर अन्य तुच्छ सुखोंकी इच्छा
राज्यं करस्थं स्वमसौ विसृज्य | करता है, वह दीनहृदय मूर्ख पुरुष मानो हाथमें आये हुए
भिक्षामटेद्दीनमनाः सुमूढः॥ ११ | अपने राज्यको त्यागकर भीख माँगता है। भगवान् लक्ष्मीपतिके
तच्चार्च्यते श्रीपतिपादपद्म- | युगल-चरणारविन्दोंका यथार्थ पूजन वस्त्र, धन और परिश्रमसे
द्वन्द्वं न वस्त्रैर्न धनैः श्रमैर्न। | नहीं होता; किंतु मनुष्य यदि अनन्यचित्त होकर 'केशव',
अनन्यचित्तेन नरेण किंतु | 'माधव' आदि भगवन्नामोंका उच्चारण करे तो वही उनकी
उच्चार्यते केशव माधवेति॥ १२ | वास्तविक पूजा है। दैत्यकुमारो! इस प्रकार संसारको
एवं भवं दुःखमयं विदित्वा | दुःखमय जानकर भगवान्का ही भलीभाँति भजन करो।
दैत्यात्मजाः साधु हरिं भजध्वम्। | इस प्रकार करनेसे ही मनुष्यका जन्म सफल हो सकता
एवं जनो जन्मफलं लभेत | है; नहीं तो (भगवद्भजन न करनेके कारण) अज्ञानी पुरुष
नो चेद्भवब्धौ प्रपतेदधोऽधः॥ १३ | भवसागरमें ही नीचेसे और नीचे स्तरमें ही गिरता रहता
तस्माद्भवेऽस्मिन् हृदि शङ्खचक्र- | है। इसलिये इस संसारमें समस्त कामनाओंसे रहित हो
गदाधरं देवमनन्तमीड्यम्। | तुम सभी लोग अपने हृदयके भीतर विराजमान शङ्ख-
स्मरन्तु नित्यं वरदं मुकुन्दं | चक्र-गदाधारी, वरदाता, अविनाशी स्तवनीय भगवान्
सद्भक्तियोगेन निवृत्तकामाः॥ १४ | मुकुन्दका सच्चे भक्तिभावसे सदा चिन्तन करो। भवसागरमें
अनास्तिकत्वात् कृपया भवद्द्व्यो | पड़े हुए दैत्यपुत्रो! तुम लोग नास्तिक नहीं हो, इसलिये
वदामि गुह्यं भवसिन्धुसंस्थाः। | दयावश मैं तुमसे यह गोपनीय बात बतलाता हूँ-समस्त
सर्वेषु भूतेषु च मित्रभावं | प्राणियोंके प्रति मित्रभाव रखो; क्योंकि सबके भीतर
भजन्वयं सर्वगतो हि विष्णुः॥ १५ | भगवान् विष्णु ही विराजमान हैं''॥ ११-१५॥
दैत्यपुत्रा ऊचुः | दैत्यपुत्र बोले-महाबुद्धिमान् प्रह्लादजी! बचपनसे
प्रह्लाद त्वं वयं चापि बालभावान्महामते। | लेकर आजतक आप और हम भी षण्डामर्कके सिवा
षण्डामर्कात्परं मित्रं गुरुं चान्यं न विद्महे॥ १६ | दूसरे किसी गुरु तथा मित्रको नहीं जान सके। फिर
त्वयैतच्छिक्षितं कुत्र तथ्यं नो वद निस्तुषम्। | आपने यह ज्ञान कहाँ सीखा? हमसे पर्दा न रखकर
| सच्ची बात बताइये॥ १६ १/२॥
प्रह्लाद उवाच | प्रह्लादजी बोले-कहते हैं, जिस समय मेरे पिताजी
यदा तातः प्रयातो मे तपोऽर्थं काननं महत्॥ १७ | तपस्या करनेके लिये महान् वनमें चले गये, उसी समय
तदा चेन्द्रः समागत्य पुरं तस्य रुरोध ह। | इन्द्रने यहाँ आकर पिता दैत्यराज हिरण्यकशिपुको मरा
मृतं विज्ञाय दैत्येन्द्रं हिरण्यकशिपुं तदा॥ १८ | हुआ समझकर उनके इस नगरको घेर लिया। इन्द्र
इन्द्रो मे जननीं गृह्य प्रयातो मन्मथाग्निना। | कामाग्निसे पीड़ित हो मेरी महाभागा माताजीको पकड़कर
दह्यमानो महाभागां मार्गे गच्छति सत्वरम्॥ १९ | यहाँसे चल दिये। वे मार्गमें बड़ी तेजीसे पैर बढ़ाते
तदा मां गर्भंगं ज्ञात्वा नारदो देवदर्शनः। | हुए चले जा रहे थे। इसी समय देवदर्शन नारदजी मुझे
आगत्येन्द्रं जगादोच्चैर्मूढ मुञ्च पतिव्रताम्॥ २० | माताके गर्भमें स्थित जान सहसा वहाँ पहुँचे और
| चिल्लाकर इन्द्रसे बोले-'मूर्ख! इस पतिव्रताको छोड़
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अध्याय ४३ ] प्रह्लादजीका दैत्यपुत्रोंको उपदेश देना १५५
अस्या गर्भे स्थितो योऽसौ स वै भागवतोत्तमः ।
तच्छ्रुत्वा नारदवचो मातरं प्रणिपत्य मे ॥ २१
विष्णुभक्त्या प्रमुच्याथ गतः स्वं भुवनं हरिः ।
नारदस्तां समानीय आश्रमं स्वं शुभव्रतः ॥ २२
मामुद्दिश्य महाभागामेतद्वै कथितं तदा ।
तथा मे विस्मृतं नैव बालाभ्यासाद्हनोः सुताः ॥ २३
विष्णोश्चानुग्रहेणैव नारदस्योपदेशतः ।
मार्कण्डेय उवाच
एकदा गुप्तचर्यायां गतोऽसौ राक्षसाधिपः ॥ २४
शृणोति रात्रौ नगरे जय रामेति कीर्तनम् ।
अवैत्पुत्रकृतं सर्वं बलवान् दानवेश्वरः ॥ २५
अथाहूयाह दैत्येन्द्रः क्रोधान्धः स पुरोहितान् ।
रे रे क्षुद्रद्विजा यूयमतिमुमूर्षतां गताः ॥ २६
प्रह्लादोऽयं मृषालापान् वक्तव्यान्यान् पाठयत्यपि ।
इति निर्भर्त्स्य तान् विप्रान् श्वसन राजाविशद् गृहम् ॥ २७
न च पुत्रवधे चिन्तां जहौ स्ववधकारिणीम् ।
आसन्नमरणोऽमर्षात्कृत्यमेकं विमृश्य सः ॥ २८
अकृत्यमेव दैत्यादीनाहूयोपादिशद्रहः ।
अद्य क्षपायां प्रह्लादं प्रसुप्तं दुष्टमुल्बणैः ॥ २९
नागपाशैर्दृढं बद्ध्वा मध्ये निक्षिपताम्बुधेः ।
तदाज्ञां शिरसाऽऽदाय ददृशुस्तमुपेत्य ते ॥ ३०
रात्रिप्रियं समाधिस्थं प्रबुद्धं सुप्तवत् स्थितम् ।
संछिन्नरागलोभादिमहाबन्धं क्षपाचराः ॥ ३१
बबन्धुस्तं महात्मानं फल्गुभिः सर्परज्जुभिः ।
गरुडध्वजभक्तं तं बद्ध्वाहिभिरबुद्धयः ॥ ३२
जलशायिप्रियं नीत्वा जलराशौ निचिक्षिपुः ।
बलिनस्तेऽचलान् दैत्या तस्योपरि निधाय च ॥ ३३
शशंसुस्तं प्रियं राज्ञे द्रुतं तान् सोऽप्यमानयत् ।
दो। इसके गर्भमें जो बालक है, वह भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ है।'
नारदजीका कथन सुनकर इन्द्रने विष्णुभक्तिके कारण मेरी
माताको प्रणाम करके छोड़ दिया और वे अपने लोकको
चले गये। फिर शुभ सङ्कल्पवाले नारदजी मेरी माताको
अपने आश्रममें ले आये और मेरे उद्देश्यसे मेरी महाभागा माताके
प्रति इस पूर्वोक्त ज्ञानका वर्णन किया। दानवो! बाल्यकालके
अभ्यास, भगवान्की कृपा तथा नारदजीका उपदेश होनेसे
वह ज्ञान मुझे भूला नहीं है॥ १७-२३१/२ ॥
मार्कण्डेयजी बोले-एक दिन राक्षसराज हिरण्य-
कशिपु रात्रिके समय गुप्तरूपसे नगरमें घूम रहा था। उस
समय उसे 'जय राम' का कीर्तन सुनायी देने लगा। तब
बलवान् दानवराजने यह सब अपने पुत्रकी ही करतूत
समझी। तब उस दैत्यराजने क्रोधान्ध होकर पुरोहितोंको
बुलाया और कहा-'नीच ब्राह्मणो! जान पड़ता है,
तुमलोग मरनेके लिये अत्यधिक उत्सुक हो गये हो।
तुम्हारे देखते-देखते यह प्रह्लाद स्वयं तो व्यर्थकी बातें
बकता ही है, दूसरोंको भी यही सिखाता है।' इस प्रकार
उन ब्राह्मणोंको फटकारकर राजा हिरण्यकशिपु लम्बी
साँसें खींचता हुआ घरमें आया। उस समय भी वह
पुत्रवधके विषयमें होनेवाली चिन्ताको, जो उसका ही
नाश करनेवाली थी, नहीं छोड़ सका। उसकी मृत्यु निकट
थी; अतः उसने अमर्षवश एक ऐसा काम सोचा, जो
वास्तवमें न करने योग्य ही था। हिरण्यकशिपुने दैत्यादिकोंको
बुलाया और उनसे एकान्तमें कहा-'देखो, आज रातमें
प्रह्लाद जब गाढी नींदमें सो जाय, उस समय उस दुष्टको
भयंकर नागपाशोंद्वारा खूब कसकर बाँध दो और बीच
समुद्रमें फेंक आओ'॥ २४-२९१/२ ॥
उसकी आज्ञा शिरोधार्य करके उन दैत्योंने प्रह्लादजीके
पास जाकर उन्हें देखा। वे रात्रिके ही प्रेमी थे (क्योंकि
रातमें ही उन्हें ध्यान लगानेकी सुविधा रहती थी)। प्रह्लादजी
समाधिमें स्थित होकर जाग रहे थे, फिर भी खूब सोये
हुएके समान स्थित थे। उन्होंने राग और लोभ आदिके
महान् बन्धनोंको काट डाला था, तो भी उन महात्मा
प्रह्लादको निशाचरोंने तुच्छ नागपाशोंसे बाँध दिया। जिनकी
ध्वजामें साक्षात् गरुडजी विराजमान हैं, उन भगवान्के
भक्त प्रह्लादको उन मूर्खोंने सर्पोंद्वारा बाँधा और जलशायीके
प्रियजनको ले जाकर जलराशि समुद्रमें डाला। तदनन्तर
उन बली दैत्योंने प्रह्लादके ऊपर पर्वतकी चट्टानें रख दीं
और तुरंत ही जाकर राजा हिरण्यकशिपुको यह प्रिय
संवाद कह सुनाया। उसे सुनकर उस दैत्यराजने भी उन
सबका सम्मान किया॥ ३०-३३१/२ ॥
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