संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
११६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३
११६ श्रीनरसिंहपुराण [ अध्याय ३३
प्रतिष्ठां नरसिंहस्य यः करोति यथाविधि । नरश्रेष्ठ! जो निष्कामभावसे नृसिंहदेवकी विधिवत् प्रतिष्ठा
निष्कामो नरशार्दूल देहबाधात् प्रमुच्यते ॥ १४ करता है, वह दैहिक दुःखोंसे मुक्त हो जाता है। जो
नरसिंहं प्रतिष्ठाप्य यः पूजामाचरेन्नरः । भगवान् नृसिंहकी स्थापना करके सदा उनकी पूजा
तस्य कामाः प्रसिध्यन्ति परमं पदमाप्नुयात् ॥ १५ करता है, उसके सब मनोरथ पूर्ण होते हैं तथा वह परम
ब्रह्मादयः सुराः सर्वे विष्णुमाराध्य ते पुरा। पदको प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मादि सभी देवता पूर्वकालमें
स्वं स्वं पदमनुप्राप्ताः केशवस्य प्रसादतः ॥ १६ भगवान् विष्णुकी आराधना करके उनके प्रसादसे अपने-
ये ये नृपवरा राजन् मान्धातृप्रमुखा नृपाः । अपने लोकको प्राप्त हुए थे। राजन्! मांधाता आदि जो-
ते ते विष्णुं समाराध्य स्वर्गलोकमितो गताः ॥ १७ जो प्रधान नरेश हो गये हैं, वे सभी भगवान् विष्णुकी
यस्तु पूजयते नित्यं नरसिंहं सुरेश्वरम् । आराधना करके यहाँसे स्वर्गलोकको चले गये। जो
स स्वर्गमोक्षभागी स्यान्नात्र कार्या विचारणा ॥ १८ सुरेश्वर नृसिंहका प्रतिदिन पूजन करता है, वह स्वर्ग
तस्मादेकमना भूत्वा यावज्जीवं प्रतिज्ञया। और मोक्षका भागी होता है—इसमें अन्यथा विचार
अर्चनान्नरसिंहस्य प्राप्स्यसे स्वाभिवाञ्छितम् ॥ १९ करनेकी आवश्यकता नहीं है। इसलिये तुम भी प्रतिज्ञापूर्वक
विधिवत्स्थापयेद्यस्तु कारयित्वा जनार्दनम् । एकचित्त होकर जीवनपर्यन्त भगवान् नृसिंहकी पूजा
न तु निर्गमनं तस्य विष्णुलोकाद् भवेन्नृप ॥ २० करते हुए अपना मनोरथ प्राप्त करोगे। नृप! जो भगवान्
नरो नृसिंहं तमनन्तविक्रमं जनार्दनकी प्रतिमा बनवाकर विधिवत् उसकी स्थापना
सुरासुरैरर्चितपादपङ्कजम् । करता है, उसका विष्णुलोकसे कभी निष्क्रमण नहीं
संस्थाप्य भक्त्या विधिवच्च पूजयेत् होता। यदि मनुष्य उन अनन्त विक्रमशाली भगवान्
प्रयाति साक्षात् परमेश्वरं हरिम् ॥ २१ नरसिंहकी, जिनके चरण-कमलोंकी देवता तथा असुर,
दोनों ही पूजा करते हैं, विधिवत् स्थापना करके भक्तिपूर्वक
पूजा करे तो वह साक्षात् परमेश्वर भगवान् विष्णुको
प्राप्त कर लेता है ॥ १२–२१ ॥
इति श्रीनरसिंहपुराणे सहस्रानीकचरिते द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें सहस्रानीक-चरित्रके अन्तर्गत बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
तैंतीसवाँ अध्याय
भगवान्के मन्दिरमें झाडू देने और उसको लीपनेका महान् फल—राजा जयध्वजकी कथा
राजोवाच राजा बोले—भगवान्! मैं आपके प्रसादसे भगवान्के
हरेरर्चाविधिं पुण्यां श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । पूजनकी पावन विधिको विशेषरूपसे यथावत् सुनना
त्वत्प्रसादाद्विशेषेण भगवन् प्रब्रवीहि मे ॥ १ चाहता हूँ; कृपया आप मुझे विस्तारसे बतायें। भगवान्
सम्मार्जनकरो यश्च नरसिंहस्य मन्दिरे । नृसिंहके मन्दिरमें जो झाडू देता है वह तथा जो उसे
यत्पुण्यं लभते तद्वदुपलेपनकृन्नरः ॥ २ लीपता-पोतता है, वह पुरुष किस पुण्यको प्राप्त करता
शुद्धोदकेन यत्पुण्यं स्नापिते केशवे भवेत् । है? केशवको शुद्ध जलसे स्नान करानेपर कौन-सा पुण्य
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अध्याय ३३ ] भगवान्के मन्दिरमें झाडू देने और उसको लीपनेका महान् फल ११७
क्षीरस्नानेन यत्पुण्यं दध्ना च मधुना तथा। प्राप्त होता है तथा दूध, दही, मधु, घी एवं पञ्चगव्यद्वारा
घृतस्नानेन यत्पुण्यं पञ्चगव्येन यद्भवेत् ॥ ३ स्नान करानेसे क्या पुण्य होता है ? भगवान्की प्रतिमाको
क्षालिते चोष्णतोयेन प्रतिमायां च भक्तितः। गर्म जलसे भक्तिपूर्वक स्नान करानेपर तथा कर्पूर और
कर्पूरागुरुतोयेन मिश्रेण स्नापितेन च ॥ ४ अगुरु मिले हुए जलसे स्नान करानेपर कौन-सा पुण्य
अर्घ्यदानेन यत्पुण्यं पाद्याचमनदानके। प्राप्त होता है ? भगवान्को अर्घ्य देनेसे, पाद्य और
मन्त्रेण स्नापिते यच्च वस्त्रदानेन यद्भवेत् ॥ ५ आचमन अर्पण करनेसे, मन्त्रोच्चारणपूर्वक नहलानेसे
श्रीखण्डकुङ्कुमाभ्यां तु अर्चिते किं फलं भवेत्। और वस्त्र-दान करनेसे क्या पुण्य होता है ? ॥ १—५ ॥
पुष्पैर्अभ्यर्चिते यच्च यत्फलं धूपदीपयोः ॥ ६ चन्दन और केसरद्वारा पूजा करनेपर तथा फूलोंसे
नैवेद्यैर्यत्फलं प्रोक्तं प्रदक्षिणकृते तु यत्। पूजा करनेपर क्या फल होता है ? तथा धूप और दीप
नमस्कारकृते यच्च फलं यत्स्तोत्रगीतयोः ॥ ७ देनेका क्या फल है ? नैवेद्य निवेदन करनेका और
तालवृन्तप्रदानेन चामरस्य च यद्भवेत्। प्रदक्षिणा करनेका क्या फल है ? इसी प्रकार नमस्कार
ध्वजप्रदाने यद्विष्णोः शङ्खदानेन यद्भवेत् ॥ ८ करनेसे एवं स्तुति और यशोगान करनेसे कौन-सा फल
एतच्चान्यच्च यत्किंचिदज्ञानान्न प्रचोदितम्। प्राप्त होता है ? भगवान् विष्णुके लिये पंखा दान करने,
तत्सर्वं कथय ब्रह्मन् भक्तस्य मम केशवे ॥ ९ चँवर प्रदान करने, ध्वजाका दान करने और शङ्ख-दान
सूत उवाच करनेसे क्या फल होता है ? ब्रह्मन् ! मैंने जो कुछ पूछा
इति सम्प्रेरितो विप्रस्तेन राज्ञा भृगुस्तदा। है, वह तथा अज्ञानवश मैंने जो नहीं पूछा है, वह सब
मार्कण्डेयं नियुज्याथ कथने स गतो मुनिः ॥ १० भी मुझसे कहिये; क्योंकि भगवान् केशवके प्रति मेरी
सोऽपि तस्मिन् मुदायुक्तो हरिभक्त्या विशेषतः। हार्दिक भक्ति है ॥ ६—९ ॥
राज्ञे प्रवक्तुमारेभे भृगुणा चोदितो मुनिः ॥ ११ सूतजी बोले—राजाके इस प्रकार पूछनेपर वे ब्रह्मर्षि
मार्कण्डेय उवाच भृगु मुनि मार्कण्डेयजीको उत्तर देनेके लिये नियुक्त करके
राजपुत्र शृणुष्वेदं हरिपूजाविधिं क्रमात्। स्वयं चले गये। भृगुजीकी प्रेरणासे मुनिवर मार्कण्डेयजीने
विष्णुभक्तस्य वक्ष्यामि तवाहं पाण्डुवंशज ॥ १२ राजापर उनकी हरिभक्तिसे विशेष प्रसन्न होकर उनके प्रति
नरसिंहस्य नित्यं च यः सम्मार्जनमारभेत्। इस प्रकार कहना आरम्भ किया ॥ १०-११ ॥
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके स मोदते ॥ १३ मार्कण्डेयजी बोले—पाण्डुकुलनन्दन राजकुमार !
गोमयेन मृदा तोयैर्यः करोत्युपलेपनम्। भगवान् विष्णुकी इस पूजा-विधिको क्रमशः सुनो; तुम
स चाक्षयफलं प्राप्य विष्णुलोके महीयते ॥ १४ विष्णुके भक्त हो, अतः मैं तुम्हें यह सब बताऊँगा। जो
अत्रार्थे यत्पुरावृत्तमितिहासं पुरातनम्। भगवान् नरसिंहके मन्दिरमें नित्य झाडू लगाता है, वह सब
यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुक्तिर्भवति सत्तम ॥ १५ पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें आनन्दित होता है। जो
पुरा युधिष्ठिरो राजा पञ्चभिर्भ्रातृभिर्युतः। गोबर, मिट्टी तथा जलसे वहाँकी भूमि लीपता है, वह
द्रौपद्या सह राजेन्द्र काननं विचचार ह ॥ १६ अक्षय फल प्राप्त करके विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
सत्तम ! इस विषयमें एक प्राचीन सत्य इतिहास है, जिसे
सुनकर सब पापोंसे मुक्ति मिल जाती है ॥ १२-१५ ॥
राजेन्द्र ! पूर्वकालमें राजा युधिष्ठिर द्रौपदी तथा
अपने पाँच भाइयोंके साथ वनमें विचरते थे। घूमते-
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