संक्षिप्त नृसिंह पुराण (सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Sankshipta Narasimha Purana Gita Press
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१०४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ३१ ]
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१०४ | श्रीनरसिंहपुराण | [ अध्याय ३१ ]
[संस्कृत श्लोक]
सुरुचिरुवाच
दौर्भागेय किमारोढुमिच्छेरङ्के महीपतेः।
बाल बालिशबुद्धित्वादभाग्याजाठरोद्भवः॥ ७
अस्मिन् सिंहासने स्थातुं सुकृतं किं त्वया कृतम्॥ ८
यदि स्यात् सुकृतं तत्किं दुर्भाग्योदरगोऽभवः।
अनेनैवानुमानेन बुध्यस्व स्वल्पपुण्यताम्॥ ९
भूत्वा राजकुमारोऽपि नालंकुर्या ममोदरम्।
सुकुक्षिजममूं पश्य त्वमुत्तममनुत्तमम्॥ १०
अधिजानु धरापान्वोर्मानेन परिबृंहितम्।
सूत उवाच
मध्येराजसभां बालस्तयेति परिभर्त्सितः॥ ११
निपतन्नेत्रबाष्पाम्बुधैर्यात् किंचिन्न चोक्तवान्।
उचितं नोचितं किंचिन्नोचिवान् सोऽपि पार्थिवः॥ १२
नियन्त्रितो महिष्याश्च तस्याः सौभाग्यगौरवात्।
विसर्जितसभालोकं शोकं संहृत्य चेष्टितैः॥ १३
शैशवैः स शिशुर्नत्वा नृपं स्वसदनं ययौ।
सुनीतिर्नीतिनिलयमवलोक्याथ बालकम्॥ १४
मुखलक्ष्म्यैव चाज्ञासीद् ध्रुवं राज्ञापमानितम्।
अथ दृष्ट्वा सुनीतिं तु रहोऽन्तःपुरवासिनीम्॥ १५
आलिङ्ग्य दीर्घं निःश्वस्य मुक्तकण्ठं रुरोद ह।
सान्त्वयित्वा सुनीतिस्तं वदनं परिमार्ज्य च॥ १६
दुकूलाञ्चलसम्पर्कैर्वीज्य तं मृदुपाणिना।
पप्रच्छ तनयं माता वद रोदनकारणम्॥ १७
विद्यमाने नरपतौ शिशो केनापमानितः।
ध्रुव उवाच
सम्पृच्छे जननि त्वाहं सम्यक् शंस ममाग्रतः॥ १८
भार्यात्वेऽपि च सामान्ये कथं सा सुरुचिः प्रिया।
कथं न भवती माततः प्रिया क्षितिपतेरसि॥ १९
[हिन्दी अनुवाद]
सुरुचि बोली— अभागिनीके बच्चे! क्या तू भी महाराजकी गोदमें चढ़ना चाहता है? बालक! मूर्खतावश ही ऐसी चेष्टा कर रहा है। तू इसके योग्य कदापि नहीं है; क्योंकि तू एक भाग्यहीना स्त्रीके गर्भसे पैदा हुआ है। बता तो सही, तूने इस सिंहासनपर बैठनेके लिये कौन-सा पुण्यकर्म किया है? यदि पुण्य ही किया होता तो क्या अभागिनीके गर्भसे जन्म लेता? राजकुमार होनेपर भी तू मेरे उदरकी शोभा नहीं बढ़ा सका है। इसी बातसे जान ले कि तेरा पुण्य बहुत कम है। उत्तम कोखसे पैदा हुआ है—कुमार 'उत्तम' जो सर्वश्रेष्ठ है; देखो, वह कितने सम्मानके साथ पृथ्वीनाथ महाराजके दोनों घुटनोंपर बैठा है॥ ७—१० १/२॥
सूतजी कहते हैं— राजसभाके बीच सुरुचिके द्वारा इस प्रकार झिड़के जानेपर बालक ध्रुवकी आँखोंसे अश्रुबिन्दु झरने लगे; किंतु वह धैर्यपूर्वक कुछ भी न बोला। इधर राजा भी रानीके सौभाग्य-गौरवसे आबद्ध हो, उसका कार्य उचित था या अनुचित, कुछ भी न कह सके। जब सभासद्गण बिदा हुए, तब अपनी शैशवोचित चेष्टाओंसे शोकको दबाकर वह बालक राजाको प्रणाम करके अपने घरको गया॥ ११—१३ १/२॥
सुनीतिने अपने नीतिके खजाने बालकको देखकर उसके मुखकी कान्तिसे ही जान लिया कि ध्रुवका राजाके द्वारा अपमान किया गया है। माता सुनीतिको अन्तःपुरके एकान्त स्थानमें देखकर ध्रुव अपने दुःखके आवेगको न रोक सका। वह माताके गलेसे लगकर लम्बी साँस खींचता हुआ फूट-फूटकर रोने लगा। सुनीतिने उसे सान्त्वना देकर कोमल हाथसे उसका मुख पोंछा और साड़ीके अञ्चलसे हवा करती हुई माता अपने लालसे पूछने लगी—'बेटा! अपने रोनेका कारण बताओ। राजाके रहते हुए किसने तुम्हारा अपमान किया है?'॥ १४—१७ १/२॥
ध्रुव बोला— माँ! मैं तुमसे एक बात पूछता हूँ, मेरे आगे तुम ठीक-ठीक बताओ। जैसे सुरुचि राजाकी धर्मपत्नी है, वैसे ही तुम भी हो; फिर उन्हें सुरुचि ही क्यों प्यारी है? माता, तुम उन नरेशको क्यों प्रिय नहीं [हो?]
अध्याय ३१ ] ध्रुव-चरित्र तथा ग्रह, नक्षत्र एवं पातालका संक्षिप्त वर्णन १०५
कथमुत्तमतां प्राप्त उत्तमः सुरुचेः सुतः। हो ? सुरुचिका पुत्र उत्तम क्यों श्रेष्ठ है ? राजकुमार होनेमें
कुमारत्वेऽपि सामान्ये कथं चाहमनुत्तमः ॥ २० तो हम दोनों एक समान हैं। फिर क्या कारण है कि
कथं त्वं मन्दभाग्यासि सुकुक्षिः सुरुचिः कथम्। मैं उत्तम नहीं हूँ ? तुम क्यों मन्दभागिनी हो और सुरुचि
कथं नृपासनं योग्यमुत्तमस्य कथं न मे ॥ २१ क्यों उत्तम कोखवाली है ? राजसिंहासन क्यों उत्तमके
कथं मे सुकृतं तुच्छमुत्तमस्योत्तमं कथम्। ही योग्य है ? मेरे योग्य क्यों नहीं है ? मेरा पुण्य तुच्छ
इति श्रुत्वा वचस्तस्य सुनीतिर्नीतिमच्छिशोः ॥ २२ और उत्तमका पुण्य उत्तम कैसे है ? ॥ १८-२११/२ ॥
किंचिदुच्छ्वस्य शनकैः शिशुशोकोपशान्तये। सुनीति अपने पुत्रके इस नीतियुक्त वचनको
स्वभावमधुरां वाणीं वक्तुं समुपचक्रमे ॥ २३ सुनकर धीरेसे थोड़ी लम्बी साँस खींच बालकका दुःख
शान्त करनेके लिये स्वभावतः मधुर वाणीमें बोलने
सुनीतिरुवाच लगी ॥ २२-२३ ॥
अयि तात महाबुद्धे विशुद्धेनान्तरात्मना । सुनीति बोली-तात! तुम बड़े बुद्धिमान् हो।
निवेदयामि ते सर्वं मावमाने मतिं कृथाः ॥ २४ तुमने जो कुछ पूछा है, वह सब शुद्ध हृदयसे मैं निवेदन
तया यदुक्तं तत्सर्वं तथ्यमेव न चान्यथा। करती हूँ; तुम अपमानकी बात मनमें न लाओ। सुरुचिने
यदि सा महिषी राज्ञो राज्ञीनामतिवल्लभा ॥ २५ जो कुछ कहा है, वह सब ठीक ही है, अन्यथा नहीं
महासुकृतसम्भारैरुत्तमश्चोत्तमोदरे । है। यदि वह पटरानी है तो सभी रानियोंसे बढ़कर
उवास तस्याः पुण्याया नृपसिंहासनोचितः ॥ २६ राजाकी प्यारी है ही। राजकुमार उत्तमने बहुत बड़े
आतपत्रं च चन्द्राभं शुभे चापि हि चामरे। पुण्योंका संग्रह करके उस पुण्यवती रानीके उत्तम गर्भमें
भद्रासनं तथोच्चं च सिन्धुराश्च मदोत्कटाः ॥ २७ निवास किया था, अतः वही राजसिंहासनपर बैठनेके
तुरंगमाश्च तुरगा अनाधिव्याधि जीवितम् । योग्य है। चन्द्रमाके समान निर्मल श्वेत छत्र, सुन्दर
निःसपत्नं शुभं राज्यं प्राप्यं विष्णुप्रसादतः ॥ २८ युगल चँवर, उच्च सिंहासन, मदमत्त गजराज, शीघ्रगामी
तुरग, आधि-व्याधियोंसे रहित जीवन, शत्रुरहित सुन्दर
सूत उवाच राज्य-ये वस्तुएँ भगवान् विष्णुकी कृपासे प्राप्त होती
इत्याकर्ण्य सुनीत्यास्तन्मातुर्वाक्यमनिन्दितम्। हैं ॥ २४-२८ ॥
सौनीतेयो ध्रुवो वाचमाददे वक्तुमुत्तरम् ॥ २९ सूतजी बोले-माता सुनीतिके इस उत्तम वचनको
सुनकर सुनीतिकुमार ध्रुवने उन्हें उत्तर देनेके लिये
ध्रुव उवाच बोलना आरम्भ किया ॥ २९ ॥
जनयित्रि सुनीते मे शृणु वाक्यमनाकुलम्। ध्रुव बोला-जन्मदायिनी माता सुनीते ! आज मेरे
उत्तानचरणादन्यन्नास्तीति मे मतिः शुभे ॥ ३० शान्तिपूर्वक कहे हुए वचन सुनो। शुभे ! आजतक मैं यही
सिद्धार्थोऽस्यम्ब यद्यस्ति कश्चिदाश्रितकामधुक्। समझता था कि पिता उत्तानपादसे बढ़कर और कुछ नहीं
अद्यैव सकलाराध्यं तमाराध्य जगत्पतिम् ॥ ३१ है। परंतु अम्ब! यदि अपने आश्रितजनोंकी कामना पूर्ण
तत्तदासादितं विद्धि पदमन्यैर्दुरासदम्। करनेवाला कोई और भी है तो यह जानकर आज मैं कृतार्थ
एकमेव हि साहाय्यं मातर्मे कर्तुमर्हसि ॥ ३२ हो गया। माँ ! तुम ऐसा समझो कि उन सर्वाराध्य जगदीश्वरकी
आराधना करके जो-जो स्थान दूसरोंके लिये दुर्लभ है, वह
अनुज्ञां देहि मे विष्णुं यथा चाराधयाम्यहम्। सब मैंने आज ही प्राप्त कर लिया। माता ! तुम्हें मेरी एक ही
सहायता करनी चाहिये। केवल आज्ञा दे दो, जिससे मैं
भगवान् विष्णुकी आराधना करूँ ॥ ३०-३२१/२ ॥
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