Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages
Page 110Permalink

१०८ मनुस्मृति।

˙ऐसी अवस्था में सविशेष पक्ष लेकर विष्णु वा शिव के
ऐच्छिक एकही आकार पर अथवा ऐच्छिक आकार के उप-
संहार पर निर्भर होकर ब्रह्मसूत्रों की योजना करना ऐच्छिक
व्याख्या ( ब्रह्मसूत्र-भाष्य ) नहीं है तो और क्या है ? उसे
क्या कहना चाहिये ? देखिये यदि किसी संहिता ब्राह्मण-
भाग, वा तदाश्रित ब्रह्मसूत्र में विष्णु वा शिव का सविशेष
( आकारघटक लिङ्ग ) प्राप्त होता तो पुराणों की तरह सविशेष
( विष्णु शिव आदि ) के अभिप्राय से ब्रह्मसूत्र की व्याख्या
करने में क्या दोष था ? कुछ भी नहीं । पर ऐसा न होने से
भगवान् वेदव्यास ने निर्विशेष के लक्ष्य से तदनुकूल 'ब्रह्म'
शब्द का प्रयोग 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इस शास्त्रारम्भ के सूत्र
में किया । ऐसी दशा में सविशेष पक्ष का आलम्बन करके
'ब्रह्म' शब्द का केवल विष्णु वा केवल शिव अर्थ करना
एकदेशीय-मत है। अत एव ये सब व्याख्यान एकदेशी हैं—
'ब्रह्मशब्देन च स्वभावतो निरस्तनिखिलदोषोऽनवधिकाति-
शयासंख्येयकल्याणगुणगणः पुरुषोत्तमोऽभिधीयते' श्रीभाष्य।
'अनन्ताचिन्त्यस्वाभाविकस्वरूपगुणशक्त्यादिभिर्बृहत्तमो यो
रमाकान्तः पुरुषोत्तमो, ब्रह्मशब्दाभिधेयः—' वेदान्तपा-
रिजातसौरभ.
'ब्रह्मशब्दश्च विष्णावेव' पूर्णप्रज्ञदर्शन.
तात्पर्य यह है कि 'सविशेष ब्रह्मवाद' में भी ब्रह्मशब्द
केवल विष्णु का वाचक नहीं होसकता क्योंकि ब्रह्मशब्द का
विष्णु में शक्तिग्रह नहीं है इसीलिये श्रुति स्मृति में ब्रह्म विष्णु
शिव आदि शब्द पर्याय ( प्रयोगप्रवाह से एकार्थक ) नहीं
माने गये । यदि वेदान्तप्रक्रिया से ब्रह्मशब्द का विष्णु अर्थ

माना जाय तब उसके शिवादि अर्थ भी किसी तरह खण्डित

Page 111Permalink

माना जाय तब उसके शिवादि अर्थ भी किसी तरह खण्डित
नहीं होसकते अर्थात् ब्रह्मशब्द पञ्चदेवतावाचक हुआ । विज्ञान-
भिक्षु ने भी कहा है कि-
“ यत्त्वाधुनिकाः केचन परस्य साक्षादपि लीलावग्रहं
कल्पयन्ति तदप्रामाणिकम्, विष्ण्वादीनामेव लीलावतारश्रव-
णात् । विष्ण्वादीनां च परमात्मन्येवाहं भावात्तेषामवतारा एव
परमेश्वरावतारतया श्रुतिस्मृतिषूच्यन्ते । तेन तु ते भ्रान्ताः
‘न तस्य कार्यं करणं च विद्यते-’ इत्यादि श्रुतिभ्यः परमे-
श्वरस्य कार्यकारणाख्यशरीरद्वयप्रतिषेधात् । ‘अनादिमत् परं
ब्रह्म सर्वदेहविवर्जितम् ’ इत्यादि स्मृतिभ्यश्चेति दिक् । ”
तथा-‘ब्रह्मविष्णुशिवादीनां यः परः स महेश्वरः ’ इति ।
( योगवार्तिक. )
और उक्तरीति से ब्रह्मशब्द केवल पञ्चदेवतामात्र का
वाचक नहीं है, किंतु राम-कृष्ण आदि इतिहास-पुराण-तन्त्र
प्रसिद्ध अनेकानेक लीलावग्रह का भी वाचक है । यही
तात्पर्य रामतापिनी-गोपालतापिनी आदि ग्रन्थों से स्पष्ट ज्ञात
होता है- ( राम )
‘ रमन्ते योगिनोऽनन्ते नित्यानन्दे चिदात्मनि ।
इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ॥
चिन्मयस्याद्वितीयस्य निष्कलस्याशरीरिणः ।
उपासनानां कार्यार्थे ब्रह्मणो रूपकल्पना ॥
रूपस्थानां देवतानां पुंस्त्र्यङ्गाङ्गादिकल्पना ।
द्विचत्वारिषडष्टासां दश द्वादश षोडश ॥
अष्टादशापि कथिता हस्ताः शङ्खादिभिर्युताः ।
सहस्रान्तास्तथा तासां वर्णवाहनकल्पना ॥

Page 112Permalink

११० मनुस्मृति ।

शक्तिसेनाकल्पना च ब्रह्मह्येवं हि पञ्चधा ।
कल्पितस्य शरीरस्य तस्य सेनादिकल्पना ॥
रामतापनी.
( कृष्ण )
‘कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निर्वृत्तिवाचकः ।
तयोरैक्यं परंब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते ॥’
गोपालतापनी.
‘कृष्यते विलिख्यते इति कृट्, भूमिः सर्वाधारः, निर्वृत्तिः
आनन्दः सुखम्; तयोरैक्यं सामानाधिकरण्यम् । तच्च यदा कर्म-
धारयेण भवति तदा परंब्रह्म कृष्णे इति शब्देनाभिधीयते ।
अथवा भूग्रहणं दृश्योपलक्षणम् , निर्वृत्तिः सुखस्वरूपं ब्रह्म,
तयोरैक्यम् अध्यासन्निवृत्त्या शुद्धात्मतापादनम् ।’ इति
नारायणः।
पश्चात्ताप का विषय है कि जब शास्त्रों में अथ से इति
तक यथास्थान निर्विशेष ब्रह्म का प्रतिपादन प्राप्त होता है
और उसी का प्राधान्य माना है; केवल उपासनार्थ सविशेष
ब्रह्म का निरूपण किया है; और निर्विशेष ब्रह्म की सिद्धि
के लिये अद्वैतवाद तथा उसके उपयोगी अध्यासवाद
विवर्तवाद आदि श्रुति युक्तिसिद्ध पदार्थ कल्पना किये हैं
और यह अद्वैतवाद आत्मसाक्षात्कार के पश्चात् अनुभव में
आता है यह बात—
‘देहात्मप्रत्ययो यद्वत्प्रमाणत्वेन कल्पितः ।
लौकिकं तद्वदेवेदं प्रमाणं त्वाऽऽत्मनिश्चयात् ॥’
इत्यादि श्रुति-स्मृति-युक्ति-सिद्ध प्रमाणों से स्पष्ट है और
व्यवहार दशा में द्वैतवाद ही मानागया है तोभी हठात् संप्र-

दायियों ने निर्विशेषवाद खण्डनपूर्वक सविशेषवाद की सिद्धि

Page 113Permalink

भूमिका । १११
दायियों ने निर्विशेषवाद खण्डनपूर्वक सविशेषवाद की सिद्धि
के लिये दुर्व्याख्याओं से भगवान् वेदव्यास के ब्रह्मसूत्रों को
आकुल कर दिया है और मायावाद के विरोधी होकर भी
श्रुति स्मृतियों को साधारण लोगों के लिये घोर मायावाद में
पटक दिया है, एवं कुकर्म से जो प्रत्यवाय होता है वह धर्मशास्त्र
में छिपा नहीं है । अब साधारण लोगों के भी समझ में आने
योग्य निर्विशेष ब्रह्म की प्रतिपादक कुछ श्रुतियां दिखलाते हैं,
जिनमें दृढ़ता के लिये वार वार उसी बात की चर्चा की गई है-
'यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥'
( निचाय्यतन्मृत्युमुखत्प्रमुच्यते )
केनोपनिषत्.
कई एक कारणों से ब्रह्मसूत्र ( वेदान्तदर्शन ) का अर्थ वही
माननीय (श्रवण-मनन-निदिध्यासनयोग्य) है जिसको भगवत्पादने
शारीरक-भाष्य में लिखा है और जिसका विस्तार ईश-केन-कठ-
प्रश्न-मुण्ड-माण्डूक्य-तैत्तिरीय-छान्दोग्य-बृहदारण्य-ऐतरेय उप-
निषदों के भाष्यों में तथा श्री ६ गीताभाष्य में किया है ।

Page 114Permalink

[Header]
११२ मनुस्मृति ।
[Body]
कारण- ' श्रौतस्मार्तप्रतिष्ठार्थं भक्तानां हितकाम्यया ।
उपदेक्ष्यति तज्ज्ञानं शिष्याणां ब्रह्मसंमितम् ॥
' युगे युगे ममांशश्च हरांशश्चैव शङ्करः ।
उद्धरिष्यति मे मूर्तीस्तावकीनहृदाच्छुभात् ॥'
इत्यादि प्रमाणों से श्री ६ शङ्कर-भगवत्पाद का अवतार
वेदान्त-सिद्धान्त तथा श्रौत-स्मार्त कर्म के स्थापन के लिये
हुआ है।
भगवत्पाद श्रीवेदव्यास की शिष्यपरम्परा में परिगणित
हैं इसलिये व्यासकृत ब्रह्मसूत्रों का आशय जो उन्होंने वर्णन
किया है वही प्रामाणिक है।
भगवत्पाद ने श्रुतियों के आधार पर जिस अद्वैतवाद के
अनुसार प्रस्थानत्रय का भाष्य किया है वही भगवान् वेदव्यास
का आशय था, वह भारत के अनेक स्थलों में विभक्त है जिसका
परिचय इस भारतीय-माङ्गलिक-श्लोक से भी होता है—
'नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥'
श्रीलक्ष्मणार्यश्रित-नीलकण्ठव्याख्या—' नरोऽविद्यावच्छिन्नं
चैतन्यं जीवः, तेन विषयीकृतेऽनवच्छिन्नचैतन्यरूपे ब्रह्मणि, शुक्तौ
रजतवत् कल्पितं चराचरमप्-शब्दवाच्यं नारम्, तदेव अयनं
शुक्तीदमंशस्य रजतमिव प्रवेशस्थानं यस्य स नारायणः।
स्वस्मिन् जीवकल्पितस्य प्रपञ्चस्य सत्तास्फूर्तिमदत्वेन कारणीभूत
इत्यर्थः । यथोक्तम्—'आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।
अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ' इति । तं नारायणं
नमस्कृत्य । तथा नरमुक्तरूपं नमस्कृत्य; एनं विशिनष्टि-नरो-
त्तममिति । जीवो हि चेतनत्वेन जडवर्गादुत्कृष्टः, तत उत्कृष्टतरः

Page 115Permalink

भूमिका । ११३
कारणात्मा नारायणः, ततोऽप्युत्कृष्टतमं निरुपाधि चैतन्यम् 'सत्यं
ज्ञानमनन्तं ब्रह्म-विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतिषु प्रसिद्धम् ।
तदेव नरोत्तमस्य निरस्ताविद्यस्य जीवस्य निष्प्रपञ्चं पारमा-
र्थिकं रूपमिति युक्तं तत्रोत्तमत्वविशेषणम् । यथोक्तम्-
'पिण्डब्रह्माण्डनेतुत्वान्नरो जीवेश्वरावुभौ ।
तयोश्च नयनाच्छुद्धं ब्रह्मापि नर उच्यते ॥
नरजानामपां कार्यं नारं ब्रह्माण्डमिष्यते ।
तद् यस्य वसति स्थानं तेन नारायणो विभुः ॥
स्वाविद्यासृष्टपिण्डेन तादात्म्यं यो गतो नरः ।
स जीवः स परब्रह्म नरोत्तमपदाभिधम् ॥
तद्द्योतिकां गिरं नत्वा ततो व्यासस्तथैव सन् ।
संसारजयिनं ग्रन्थं जयनामानमीरयेत् ॥
एवं जीवाविद्याकल्पितत्वाज्जगतो मिथ्यात्वम्, ब्रह्मणश्च
तत्र सत्तास्फूर्तिमदत्वेन सत्यत्वम्, जीवस्य तदभिन्नत्वं चेति
विषयो दर्शितः । अविद्यानिवृत्तौ तत्कृतस्य प्रपञ्चस्य त्रैका-
लिकवाधाद् आत्यन्तिकी अनर्थनिवृत्तिः प्रयोजनम् ।
भारत के पूर्व ग्रन्थ अध्यात्मरामायण ( रामहृदय-
रामगीता) और योगवासिष्ठ में भी अद्वैतवाद की परिपूर्ण
चर्चा है । किं बहुना, भेदवादसंबन्धी व्यावहारिक दशा को
छोड़ कर पारमार्थिक दशा में सर्वत्र अद्वैतवादही का प्राधान्य
है और अन्यान्य मार्गावलम्बी लोगों ने भी अद्वैतवादही का
आदर किया है । और पद्मपुराण के निम्नलिखित वाक्यों
से जो निन्दा प्राप्त होती है वह अविचारित-रमणीय है अर्थात्
जब तक उन वचनों का विचार न किया जावे तब तक ही वे

Page 116Permalink

११४ मनुस्मृति ।
वचन और निन्दा सत्य प्रतीत होते हैं विचार के बाद सब
निर्मूल हैं—
' शृणु देवि प्रवक्ष्यामि तामसानि यथाक्रमात् ।
येषां श्रवणमात्रेण पातित्यं ज्ञानिनामपि ॥
प्रथमं हि मयैवोक्तं शैवं पाशुपतादिकम् ।
मच्छक्त्यावेशितैर्विप्रैः संप्रोक्तानि ततः परम् ॥
काणादेन च संप्रोक्तं शास्त्रं वैशेषिकं मतम् ।
गौतमेन तथा न्यायं सांख्यं तु कपिलेन च ॥
धिषणेन तथा प्रोक्तं चार्वाकमतिगर्हितम् ।
दैत्यानां नाशनार्थाय विष्णुना बुद्धरूपिणा ॥
बौद्धशास्त्रमसत् प्रोक्तं नग्ननीलपटादिकम् ।
मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नं बौद्धमुच्यते ॥
मयैव कथितं देवि कलौ ब्राह्मणरूपिणा ।
अपार्थं श्रुतिवाक्यानां दर्शयल्लोकगर्हितम् ॥
परेशजीवयोरैक्यं मयात्र प्रतिपाद्यते ।
ब्रह्मणोऽस्य परं रूपं नैर्गुण्यं वक्ष्यते मया ॥
सर्वस्य जगतोऽप्यत्र मोहनार्थं कलौ युगे ।
वेदार्थवन्महाशास्त्रं मायावादमवैदिकम् ॥
मयैव वक्ष्यते देवि जगतां क्लेशकारणात् ।
द्विजन्मना जैमिनिना पूर्वं वेदमपार्थतः ॥
निरीश्वरेण वादेन कृतं शास्त्रं महत्तरम् ।
षोडशाध्यायसंयुक्तं तामसं तामसप्रियम् ॥'
पद्मपुराण उत्तरखण्ड.
देखिये—पञ्चरात्र को निकाल दिया है जिसके बारे में
पहिले मतामत का विचार होचुका है । वास्तव में निषिद्ध पाशु-

पत और पञ्चरात्र का खण्डन ब्रह्मसूत्रही में आचुका है और

Page 117Permalink

भूमिका। ११५
पत और पञ्चरात्र का खण्डन ब्रह्मसूत्रही में आचुका है और
अनिषिद्ध पाशुपत तथा पञ्चरात्र सर्वथा ग्राह्य हैं यह विचार
भी पहिले आचुका है। सांख्य और तत्समान तन्त्र-योग के
प्रधान कारण वादादि कतिपय विषय का निरास ब्रह्मसूत्रही
में आया है बाकी के विषय माननीय हैं, इसीलिये सांख्य-योग
की महिमा सर्वत्र प्रसिद्ध है। न्याय और वैशेषिक के भी कति-
पय अंश दूष्य हैं उनका भी खण्डन ब्रह्मसूत्र में लिखा है।
चार्वाकादि नास्तिक दर्शन की अग्राह्यता सर्वत्र सुप्रसिद्ध है
जिसका यहां प्रस्ताव ही नहीं है। बाकी रही पूर्वोत्तरमीमांसा;
जिनमें पूर्वमीमांसा का निरास पद्मपुराण के ही वाक्य से प्राप्त
हुआ। और उत्तरमीमांसा का नामही नहीं है; यदि 'माया-
वाद' शब्द से उसका नाम ग्रहण किया जाय तो उत्तर-
मीमांसा का प्रतिपाद्य मायावाद सिद्ध होगा, वह इष्ट नहीं है;
यदि स्वतन्त्र ग्रन्थ माना जाय तो इस नाम का धार्मिक ग्रन्थ
मिलना चाहिये; यदि मायावाद स्वतन्त्र विषय मानाजाय तो
विषयी ग्रन्थों की गणना में विषयमात्र का निर्देश विरुद्ध है;
यदि वक्ता के अभिप्राय से शाङ्कर-भाष्य मानलिया जावे तो
भी पद्मपुराण के कथनमात्र से वह अग्राह्य कथमपि नहीं हो
सकता और पूर्वमीमांसा की मान्यता के बारे में पराशर-
पुराण का वाक्य लिखा जा चुका है। विचार का विषय है
कि जब मायावाद, ब्रह्म जीवैक्य तथा नैर्गुण्य (निर्विशेषत्व)
आदि वेदान्त के विषय अद्वैतवाद के अनुयायी हैं और अद्वैत
वाद तथा मायावाद आदि, श्रुति-स्मृति-इतिहास-पुराण
संस्कृत-भाषा निबन्धों में परिपूर्ण रीति से कहे हैं तब उनका
अन्यान्य अभिप्राय है यह कहना वा इसके लिये प्रयत्न करना

Page 118Permalink

११६ मनुस्मृति ।
आकाश में धूलिप्रक्षेप वा बीजवाप वा मुष्टिप्रकार के समान
गिना जाता है । और जो उक्त ग्रन्थों को तामस ठहराया है
वह उनकी पारिभाषिक संज्ञा है और जो पाहित्य कारणता
बतलाई है वह भी—
'शङ्खचक्रोर्ध्वपुण्ड्रादिरहितो ब्राह्मणाधमः ।
स जीवन्नेव चण्डालः सर्वधर्मबहिष्कृतः ॥'
इसके समान उनका हृद्योद्गार है । ऐसी दशा में उक्त
वाक्य पद्मपुराणीय हैं वा भविष्योत्तरखण्ड के समान
अनाकर हैं, यह विचारकों को उपायन किया जाता है ।
मायावाद—माया, अज्ञान, प्रकृति आदि नाम एकही
वस्तु के हैं वह सत् वा असत् रूप से निर्वचन करने योग्य नहीं
है इसीलिये अनिर्वचनीय कहलाती है । अनिर्वचनीय ख्याति
का प्रतिपादन गौड ब्रह्मानन्द प्रणीत ख्यातिवाद आदि ग्रन्थों
में है । उस अनिर्वचनीय-माया का विलास इन्द्रजाल आदि
दृष्टान्त से आध्यात्मिक प्रकरणों में कहा है । माया के संबन्धही
से वह निर्विशेष ब्रह्म 'मायी' कहलाता है 'जालवान्'
बतलाया जाता है; इस विषय में 'अस्मान् मायी सृजते विश्व-
मेतत्' 'य एको जालवानीशते' 'भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः'
इत्यादि श्रुति प्रसिद्ध हैं जिनके पूरे विचार होने के लिये
ग्रन्थान्तर की अपेक्षा है । यहां यह भी श्लोक द्रष्टव्य है—
'गुणानां परमं रूपं न दृष्टिपथमृच्छति ।
यत्तु दृष्टिपथं प्राप्तं तन्मायैव सुतुच्छकम् ॥'
योगसूत्रीय व्यासभाष्य.
'एवं बुद्ध्वा जगद्रूपं विष्णोर्मायामयं मृषा ।'
ब्रह्मपुराण.

Page 119Permalink

भूमिका । ११७
' तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा '
श्रीभागवत.
ऐसी दशा में जगत् को सत्य सिद्ध करने के लिये प्राति-
भासिक ( रज्जु सर्प-शुक्ति रजत-मरीचि सलिल ) वस्तुओं की
भी सत्यता साधन के वारे में श्रीभाष्यकारों के जो प्रतिवाद
भयंकर लेख हैं वे स्पृहणीय हैं। श्रीभाष्यकारों के प्रधानमूर्ति
शेष ने तो अपने परमार्थसार में यों कहा है—
' रज्ज्वां नास्ति भुजङ्गस्त्रासं कुरुते च मृत्युपर्यंतम् ।
भ्रान्तेर्महती शक्तिर्न विवेक्तुं शक्यते नाम ॥ '
जो ब्रह्मजिवैक्य—पूर्व्वलिखित प्रमाणों से शतधा सिद्ध
है तो भी अद्वैतानुरागियों के विनोदार्थ ये वचन लिखते हैं—
' राजसूनोः स्मृतिप्राप्तौ व्याधभावो निवर्तते ।
यथैवमात्मनोऽज्ञस्य तत्त्वमस्यादिवाक्यतः ॥ '
' ग्रहाविष्टो द्विजः कश्चिच्छूद्रोऽहमिति मन्यते ।
ग्रहनाशात्पुनः स्वीयं ब्राह्मएयं मन्यते यथा ॥
मायाविष्टस्तथा जीवो देहोऽहमिति मन्यते ।
मायानाशात्पुनः स्वीयं रूपं ब्रह्मास्मि मन्यते ॥ '
' आत्मा कर्त्रादिरूपश्चेन्माकाङ्क्षीस्तर्हि मुक्तताम् ।
नहि स्वभावो भावानां व्यावर्तेतौष्ण्यवद्रवेः ॥ '
' यद्यात्मा मलिनोऽस्वच्छो विकारी स्यात् स्वभावतः ।
नहि तस्य भवेन्मुक्तिर्जन्मान्तरशतैरपि ॥ '
' वस्तुस्थित्या न बन्धोऽस्ति तदभावान्न मुक्तता ।
विकल्पघटितावेतावुभावपि न किंचन ॥ '
सांख्यवृत्ति.

Page 120Permalink

११८ मनुस्मृति ।
इत्यादि प्रमाणों से श्रीभाष्यकार श्रीरामानुजाचार्य के
निम्नलिखित लेख मान्य नहीं होसकते—
'यतो वाक्यादपरोक्षज्ञानासम्भवाद् वाक्यार्थज्ञानेनाविद्या न
निवर्तते, तत एव जीवन्मुक्तिरपि दूरोत्सारिता' एवमादि ।
नैर्गुण्य—आत्मा, सांख्य-योग और वेदान्तों में असकृत्
निर्गुण कहा है । जैसा—'निर्गुणत्वमात्मनोऽसङ्गादिति श्रुतेः।'
'असङ्गोऽयं पुरुष इति ।' इत्यादि.
श्रीरामानुजाचार्य नारायण के कलावतार थे यह इन वचनों
से ज्ञात होता है—
'यत्र मे लोककल्याणकारिणी परमा कला ।
द्विजरूपेण भविता या तु संकर्षणाभिधा ॥ ६६ ॥
द्वापरान्ते कलेरादौ पाखण्डप्रचुरे जने ।
रामानुज इति ख्याता विष्णुधर्मप्रवर्तिका ॥ ६७ ॥
श्रीरङ्गेश-दयापात्रं विद्धि रामानुजं मुनिम् ।
येन संदर्शितः पन्थां वैकुण्ठाख्यस्य सञ्जनः ॥ ६८ ॥
परमैकान्तिको धर्मो भवपाशविमोचकः ।
यत्रानन्यतया प्रोक्त आवयोः पादसेवनम् ॥ ६९ ॥
कालेनाच्छादितो धर्मो मदीयोऽयं वरानने ।
तदा मया प्रवृत्तोऽयं तत्कालोचितमूर्तिना ॥ ७० ॥
विष्वक्सेनादिभिर्भक्तैः शठारिप्रमुखैर्द्विजैः ।
रामानुजेन मुनिना कलौ संस्थापयिष्यते ॥ ७१ ॥
बृहद्ब्रह्मसंहिता-द्वितीयपाद.
और श्रीरामानुजाचार्य निर्णीत विशिष्टाद्वैत का नामो-
ल्लेख यों आया है—

Page 121Permalink

भूमिका । ११६
' गुणिनस्तु गुणो यद्वद् गुणादेव गुणी यथा ।
एवं विशिष्टाद्वैतं हि श्रुतिस्मृत्युदितं नृप ॥ ८ ॥'
बृहद्ब्रह्मसंहिता-रुद्रगीता.
श्रीरामानुजाचार्य के विषय में कल्पक ने जो कुछ लिखा
है सो सब 'यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं' के न्याय से माननीय है,
परंतु द्वापरान्त और कलि के आदि में श्री ६ कृष्ण आदि की
सत्ता में मनुष्यों का विधर्मी होना तथा उसी समय में वा उस
के आसपास भी श्रीरामानुजाचार्य का अवतार लेना तथा
श्रीशठकोप आदि का उनसे भी पूर्व विराजमान रहना तथा
'श्रुतिस्मृत्युदित' इस लेख के अनुसार 'विशिष्टाद्वैत' शब्द
का आनुपूर्वीक न मिलना तथा वाल्मीकि-व्यास आदिकों के
वचनानुसार विशिष्टाद्वैत प्रतिपाद्य ब्रह्मजीवैक्य के निरूपण को
न पाना तथा अन्यान्य शङ्काओं का उठना-विचारशीलों के
सामने उक्त प्रमाणों को अप्रामाणिक ठहराता है।
श्रीरामानुजाचार्य जिनका दूसरा नाम लक्ष्मणाचार्य है,आपने
अपने श्रीभाष्य में विशिष्टाद्वैत वादसे अतिरिक्त जो श्रीमद्ध्वाचार्य
का द्वैतवाद, श्रीनिम्बार्काचार्यका द्वैताद्वैतवाद आदि हैं, उनका
खण्डन किया है परंतु वे भी पारम्परिक-वैष्णवसंप्रदायसे सिद्ध हैं।
१ विशिष्टं च विशिष्टं च विशिष्टे, विशिष्टयोरद्वैतं विशिष्टाद्वैतम् । अर्थात् अव्या-
कृत नामरूप विशिष्टचिदचित्, व्याकृत नामरूपविशिष्ट चिदचित् ।
२ 'कपर्दिमतकर्दमे कपिलकल्पनावागुरां दुरत्ययमतीत्य तद् द्रुहिणतन्त्रयन्त्रोदरम् ।
कुदृष्टिकुहनामुखे निपततः परब्रह्मणः करग्रहविचक्षणो जयति लक्ष्मणोऽयं मुनिः॥'
इति निगमन्तमहादेशिकाः ।
३ 'कलौ प्रवृत्ते बौद्धादिमतं रामानुजं तथा ।
शाके चैकोनपञ्चाशदधिकान्दसहस्रके १०४६ ॥
निराकर्तुं मुख्यवपुं सन्मतस्थापनाय च ।
एकादशशते शाके ११०० विंशत्यष्टयुगे गते ॥
अवतीर्णं मध्वगुरुं सदा वन्दे महागुणम् ॥' .इति माध्वाः ।

आचार्य दूसरे के मत का खण्डन करके अपने मन्तव्य को

Page 122Permalink

१२० मनुस्मृति।
प्रमाण में उनके भाष्यादि साधन मौजूद हैं और जब एक
आचार्य दूसरे के मत का खण्डन करके अपने मन्तव्य को
स्थिर करते हैं तब स्पष्ट है कि उनका परस्पर में मतभेद है
ऐसी दशा में कौन मत सर्वोत्तम माना जावे ? इनसे अति-
रिक्त श्रीचैतन्यमहाप्रभु श्रीस्वामिनारायण आदिके मत हैं
जो अब सज्जित होरहे हैं । प्रासङ्गिक श्लोक याद आता है-
‘ एकस्यैव महेश्वरस्य निगमे कृष्णादिरूपश्रुतौ
सिद्धायामपि भेदवादनिपुणाः स्वस्वार्थनिष्पत्तये ।
वेदान्तान् परिवर्त्य शास्त्रवचनान्युन्मथ्य नानाशयै-
र्भेदान् वैष्णवमण्डलेऽप्यजनयन्शैवादिवार्तैव का ॥’
किं बहुना, उपास्य ( ध्येयाकार ) भेद, मन्त्रभेद, तिलक
भेद, अङ्कनभेद, मालाभेद, एकादशी आदि व्रतभेद,
आचारभेद ने वर्णाश्रमशृङ्खला को शिथिल करदिया, शिथिल
तो कलि ने किया पर ये सब भी निमित्त कारण हुए और
बहुधा आकार के भेद न होने पर भी शैवापसदों से भी
वर्णाश्रमाचार को धक्का ही पहुँचा । इधर दुराग्रही वैष्णवों का
१ आप का अवतार बङ्गाल में हुआ है ।
२ आपकी जन्मभूमि अयोध्यामण्डल और विकासभूमि गुर्जरमण्डल है ।
३ अरुणोदयवेध, प्राक्कापालिकवेध । एकादशी सर्वमान्य व्रत है पर इसका
अत्याचार दो देशों में अधिक देखा जाता है । एक वङ्ग में, जहां अदीक्षित बाल-
विधवा भी एकादशी के घोर नियमों से मृतप्राय करडाली जाती हैं । धन्य हैं
वङ्गपण्डित महाशय । दूसरे अयोध्याप्रान्त में किती किसी स्थान पर एकादशी
के दिन हाथी घोड़े दाना नहीं पाते ।
४ अपने अपने मतानुसार दीक्षा पाये हुए शूद्रों के स्पृष्ट पक्वान्न तक के ग्रहण
में परहेज न होगा परंतु अदीक्षित वैदिक ब्राह्मण के स्पर्श किये हुए जल का भी
ग्रहण न किया जायगा ......।

Page 123Permalink

[Page Header]
भूमिका। १२१

ऐसा विष्णुभक्ति में अभिनिवेश न रहा जैसा कि शिवद्रोह
करने कराने में अभिनिवेश फैला, उधर दुराग्रही शैवों का
भी यही प्रकार बढ़ा, दोनों वर्गों में मनमानी लौकिकी भक्तिही
की घमाशानी उठी और सब भक्ति के प्रकार भूल गये इसी
लौकिक-भक्ति के आडम्बर से भारत के अज्ञान नरनारी को
मोहित कर अपने अपने वर्ग की वृद्धि करने लगे........।
यह कथन उन महात्माओं वा उनके अनुयायियों के लिये
है जो वर्णाश्रम-शृङ्खला को घसीटते हुए अत्याचार कर रहे
हैं। जो कोई अपने को अतिवर्णी वा अत्याश्रमी मानते हैं
और वैसाही बर्ताव करते हैं उनके लिये यह कोई कथन वा
आक्षेप नहीं है, न हो सकता है। किं बहुना, अधिकारी ही
कहे जाते हैं-
'ये ये हि वर्णाश्रमधर्मनिष्ठास्तानेव तानेव विशिष्यशिष्मः ।
ये केऽपि वर्णाश्रमबाह्यवृत्तास्तान्वेश्महे वक्तुमहानि षिष्मः ॥'
मुक्तक.

भगवान् मनु और मनुस्मृति ।
पहले स्मृतियों की गणना होचुकी है उन सब स्मृतियों में
मनुस्मृति ही प्रधान मानी जाती है । इसीकी सहानुभूति से
अन्यान्यस्मृतियां प्रामाणिक गिनी जाती हैं। इसके बारे में
वृहस्पति ने तो यह कहा है कि मनु से विरुद्ध जो कोई स्मृति
है उसका प्रमाण ही नहीं है-
' वेदार्थोपनिबन्धत्वात् प्रामाण्यं हि मनोः स्मृतम् ।
मन्वर्थविपरीता तु या स्मृतिः सा न शस्यते ॥'
ऐसा क्यों न कहा जाय, जब स्मृतियों की मूलभूत श्रुतियों
ही में मनु के उपदेश की प्रशंसा प्राप्त होती है-

Page 124Permalink

१२२ मनुस्मृति ।
'मनुर्वै यत्किंचिदवदत्तद्भेषजं भेषजतायाः ।'
अर्थात् मनु ने जो कुछ कहा है वह सब औषध के तुल्य
ग्राह्य है उस बारे में कुतर्क करने का अवकाश नहीं है । भारत
में भी कहा है कि-
'पुराणं मानवो धर्मः साङ्गो वेदश्चिकित्सितम् ।
आज्ञासिद्धानि चत्वारि न हन्तव्यानि हेतुभिः ॥'
यहां पुराण से वेदार्थसंवादी पुराणभाग का ग्रहण इष्ट है
और जब सांख्ययोग आदि परिच्छिन्न-दर्शन का ही निरंकुश
प्रामाण्य नहीं है तो अपरिच्छिन्न पुराणों का निरंकुश प्रामाण्य
होना कैसे संभव है ? यह बात वैयासिक ब्रह्मसूत्रों से भी
स्पष्ट है किंबहुना-पदार्थसंशय में साधुदृष्टि से अनूचान-विद्व-
ज्जन पूर्वोत्तरमीमांसा के अनुसार प्रमेय परीक्षा कर सकते हैं,
यह बात मनुस्मृति से भी स्पष्ट जानी जाती है । परंतु फिरभी
'ऐकोऽप्यध्यात्मवित्तमः' की आवश्यकता पड़ती है, यह
१ 'मनोर्ऋचः सामधेन्यो भवन्ति' इत्यस्य विधेर्वाक्यशेषे श्रूयते ।
२ 'सयथार्द्रैधाग्नेरभ्याहितस्य पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो
भूतस्य निश्वसितमेतद्यग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसइतिहासः पुराणं विद्या
उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानि-' श० प० कां० १४
अ० ६ ब्रा० ६ कं० ११ ।
३ । यद्यपि पुराण परिच्छिन्न है तो भी साधन के दौर्बल्य से अपरिच्छिन्न कहना
पड़ा ।
४ परपक्षनिराकरण-रीति के अनुसार ।
५ गुरुमुख से वेदवेदाङ्ग पढ़े हुए ।
६ ' विरोधेत्वनपेक्ष्यं स्यादसतिह्यनुमानम्' पू० मी० १ अ० ३ पा० ३ सू०
'स्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्ग इति चेन्नान्यस्मृत्यनवकाशदोषप्रसङ्गात्' उ० मी० २ अ०
१ पा० १ सू० ।
७ याज्ञवल्क्यस्मृति ।

Page 125Permalink

बात औपनिषद् कथाभाग से भी स्पष्ट है । वर्तमान काल में
तो हम सब अध्यात्मवित्त्तम होरहे हैं ।
मनुस्मृति के प्रत्येक अध्यायोंके अन्त में ‘भृगुप्रोक्तायां संहि-
तायां’ ऐसा लेख प्राप्त होताहै उसे देखकर संदेह होताहै कि यह
मनुस्मृति साक्षात् मनु की निर्मित न होगी, उसका यह तात्पर्य
है कि जैसे वेदव्यास ने भगवान् श्रीकृष्ण-अर्जुन के संवाद को
सात सौ श्लोकों में यथार्थ संकलित किया और उसका नाम
भगवद्गीता हुआ वह भगवान् की साक्षात् उक्ति (उपदेश)
होने के सबव भगवान् श्रीकृष्ण की ही बनाई मानी गई-इसी
प्रकार भगवान् मनुसे सारे धर्मों को महर्षि भृगु पढ़कर मनुही
की आज्ञा से ऋषियों को पढ़ाया और उसको लोकोपकार
के लिये श्लोकबद्ध कर दिया वही स्मृति ‘मनुस्मृति’ नाम
से लोक में विख्यात हुई। यह कथाभाग भी मनुस्मृति के
प्रथमाध्याय के (५६-६०, तथा ११६) इन श्लोकों में
लिखा हुआ है। और मनु से साक्षात् अथवा शिष्यपरम्परा
द्वारा समय समय पर अन्यान्य ऋषियों को जो धर्म ज्ञात हुए
उनका उल्लेख भी मनु के नाम से अन्यस्मृतियों में आया
करता है। जैसा पाराशरस्मृति में-
‘अग्निरापश्च वेदाश्च सोमसूर्यानिलास्तथा ।
एते सर्वेऽपि विप्राणां श्रोत्रे तिष्ठन्ति दक्षिणे ॥ ३६ ॥
प्रभासादीनि तीर्थानि गङ्गाद्याः सरितस्तथा ।
विप्रस्य दक्षिणे कर्णे सांनिध्यं मनुरब्रवीत् ॥ ४० ॥’
‘मनुना चैवमेकेन सर्वशास्त्राणि जानता ।
प्रायश्चित्तं तु तेनोक्तं गोघ्नश्चान्द्रायणं चरेत् ॥ ४१ ॥’
भगवान् वाल्मीकि ने भी ‘शासनाद्-८ । ३१६’ ‘राज-

निर्धूतदण्डास्तु-८ । ३१= ' इन मानव श्लोकों को रामायण

Page 126Permalink

१२४ मनुस्मृति ।
निर्धूतदण्डास्तु-८ । ३१= ' इन मानव श्लोकों को रामायण
में उद्धृत किया है-
' श्रूयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्रवत्सलौ ।
गृहीतौ धर्मकुशलैस्तथा तच्चरितं मया ॥ ३० ॥
राजभिर्धूतदण्डाश्च कृत्वा पापानि मानवाः ।
निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ ३१ ॥
शासनाद्वापि मोक्षाद्वा स्तेनः पापात्प्रमुच्यते ।
राजा त्वशासत् पापस्य तदवाप्नोति किल्विषम् ॥ ३२ ॥'
रामायण किष्किन्धाकाण्डवालिवध.
कालवश किंचित् पाठभेद होगया है परंतु अर्थ एकही
है। देखिये बड़े संतोष की वार्ता है कि-वही यह मनुस्मृति है
जो कि वाल्मीक के समय में प्रचलित थी। मूल वाक्यों के
ढूंढने में बड़ा क्लेश उठाना पड़ता है तो भी सफलता नहीं
प्राप्त होती, कैसी सुविधा होती, यदि धर्मानुरागी प्रेसस्वामी
स्मृति-इतिहास-पुराणों की अकारादि अनुक्रमणी भी छपा
डालते, उस दशा में थोड़े प्रयास से भी बहुत कुछ सुधार
की आशा थी.... ... ।
पहिले मनु के विषय में श्रुति लिखी है उसको देखने से
यह शंका उत्पन्न होती है-मनु एक अनित्य पुरुष हैं जिसकी
चर्चा श्रुति में आई है इस कारण मनु से पीछे की बनी श्रुति
क्यों न हो ? इस शंका का समाधान मीमांसादर्शन के तन्त्र-
वार्तिक में जो लिखा है उसका यह सारांश है-जैसे यज्ञ में
१ ' वेदाङ्गोपाङ्गशास्त्राणां वर्णादिक्रमसूचना ।
मौलिकैः सह संवादो विद्याशोधनमुच्यते ॥'
द्विवेदी.

Page 127Permalink

भूमिका । १२५
अध्वर्यु आदि किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं है किन्तु
ऋत्विजों की उपाधि (पदवी) है; इसी प्रकार मनु (स्वायं-
भुव-वैवस्वत आदि) भी किसी एक व्यक्ति की संज्ञा नहीं है
किंतु ब्रह्मा के दिन में एकहत्तर महायुगपर्यन्त प्रजापालन
करनेवाले अधिकारी की पदवी है।
प्रमाणवचन-
'न वैतच्छ्रुतिसामान्यमात्रं नित्येऽपि संभवात् ।
यज्ञेऽध्वर्युरिव ह्यस्ति मनुर्मन्वन्तरे सदा ॥
प्रतिमन्वन्तरं चैवं श्रुतिरन्या विधीयते ।
स्थिताश्च मनवो नित्यं कल्पे कल्पे चतुर्दश ॥
तेन तद्वाक्यचेष्टानां सर्वदैवास्ति संभवः ।
तदुक्तिज्ञापनाद् वेदो नानित्योऽतो भविष्यति ॥
प्रतियज्ञं भवन्त्यन्ये षोडश षोडशर्त्विजः ।
आदिमत्त्वं च वेदस्य न तच्चरितबन्धनात् ॥'
इत्यादि ।

श्लोक वाल्मीकीय-रामायण में भी प्राप्त हैं (देखिये भूमिका

Page 128Permalink

मनुस्मृति में क्षेपक की आशङ्का—
'मनुस्मृति' अत्यन्त प्राचीन स्मृतिशास्त्र है । जिसके
श्लोक वाल्मीकीय-रामायण में भी प्राप्त हैं (देखिये भूमिका
पृष्ठ १२४ ) -और- अन्यान्य स्मृतिग्रन्थों में भी मिलते हैं
(देखिये भू० १२३) और धर्माब्धिसार-स्मृतिचन्द्रिका-हेमाद्रि-
पराशरमाधव-स्मृतिरत्नाकर-मिताक्षरा-निर्णयसिन्धु-संस्कार-
कौस्तुभ आदि ग्रन्थों में 'मनु' के नाम से जो कतिपय श्लोक
लिखे हैं वे मनुस्मृति में नहीं उपलब्ध होते हैं देखिये मण्ड-
लीक संगृहीत (मनुस्मृति परिशिष्ट) उसका कारण उक्तप्राय है
(देखिये भू० १२३) इस दशा में विप्रकीर्ण मानववाक्य
विरोधी होनेपर चिन्तनीय हैं, न कि सहसा उनकी अप्रमा-
णिकता सिद्ध होसकती है यह 'मनुस्मृति' (इसकी श्लोक-
संख्या विषय संकलन में स्पष्ट है) अत्यन्त प्रामाणिक है, इसमें
क्षेपक का गन्धमात्र नहीं है इसके ऊपर अनेक टीकायें हुई हैं
जिनमें मेधातिथि, सर्वज्ञनारायण, गोविन्दराज, कुल्लूक,
राघवानन्द, नन्दन और रामचन्द्र की बनाई टीकायें सुप्रसिद्ध
हैं । इस दशा में भी इस 'मनुस्मृति' में वही लोग क्षेपक
कह सकते हैं जो वैदिकरहस्य नहीं जानते हैं, अथवा जो कोई

'मनु ५ अध्याय ५६ श्लोक.

Page 129Permalink

मनुस्मृति में क्षेपक की आशङ्का । १२७
शब्दतः किंवा अर्थतः वेद के कण्टक हैं। यहां एक सुप्रसिद्ध
उदाहरण दिखलाया जाता है-
‘ न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने ।
प्रवृत्तिरेषां भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ॥ ’
'मनु ५ अध्याय ५६ श्लोक.
इसको प्रायः क्षेपक बतलाया करते हैं, पर यह श्लोक उक्त
सातों टीकाओं में व्यवस्था के साथ व्याख्यात हुआ है तब कैसे
क्षेपक होसकता है ? श्रीमद्भागवत में भी इसकी यों व्यवस्था
लिखी है-
'लोके व्यवायामिषमद्यसेवा
नित्यास्तु जन्तोर्नहि तत्र चोदना ।
व्यवस्थितिस्तत्रविवाहदीक्षा-
सुराग्रहैरासुर्निवृत्तिरिष्टा ॥ 'इत्यादि.
११ स्कं० ५ अध्याय ११ श्लोक.
इस प्रकार, पूज्यपाद श्री ६ द्विवेदीजी की धर्मसंहिता के
आधार पर, यह मानवधर्मशास्त्र की भूमिका लिखी गई है।
इसमें वैदिक सनातन धर्मादि का विवेचन निष्पक्षपातभाव से
श्रुति-स्मृति के प्रमाणोंद्वारा जिस प्रकार किया गया है, उसका
महत्त्व विद्वानों कोही यथार्थरूप से ज्ञात.होगा, क्योंकि ‘ वेत्ति
विश्वम्भरा भारं गिरीणां गरिमाश्रयम् ’ कालगति से धर्मादि
में चाहे जितना विपर्यय और विप्लव हो, परन्तु सत्य का लोप
होना सर्वथा असम्भव है, और उसकी मर्यादा सर्वदा अजरा-
मर ही रहेगी । जगत् का प्रवाह तो सदा से ही नियन्त्रित
चला आता है ।