Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

by महाकवि सोमदेव भट्ट

Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)

DevanagariHindipublished1,079 pages

१३४ कथासरित्सागर

Page 988Permalink

१३४ कथासरित्सागर
नवमस्तरङ्गः
नरवाहनदत्ताय गोमुखकथिता विविधाः कथाः
अथान्येषु पुनरिमां निशि प्राग्वद्विनोदयन्।
नरवाहनदत्ताय गोमुखोऽकथयत् कथाम् ॥१॥
बोधिसत्त्वांशस्य वणिजः कथा
बभूव नगरे क्वापि बोधिसत्त्वांशसम्भवः।
कस्याप्याढ्यस्य वणिजस्तनयो मृतमातृकः ॥२॥
अन्यजायाप्रसक्तेन पित्रा तत्प्रेरितेन सः।
निरस्तो वनवासाय सभार्यो निरगाद् गृहात् ॥३॥
स्वानुजं तु सहायातं तद्विप्रा निराकृतम्।
अक्षान्तचित्तमुत्सृज्य सोऽन्येनेव पथा ययौ ॥४॥
प्रव्रजंश्च क्रमात् प्राप निस्तोयतृणपादपम्।
पाथेयहीनश्चण्डांशुतप्तां मरुमहाटवीम् ॥५॥
तस्यां व्रजन् स सप्ताहं भार्यां क्लान्तां क्षुधातृषा।
अजीवयत् स्वमांसास्रैः पापा साम्याहरच्च सा ॥६॥
अष्टमेऽह्नि सरिद्वीचिवाचालं गिरिकाननम्।
प्राप सत्फलसञ्छायपादपं स्निग्धशाद्वलम् ॥७॥
तत्र सम्भाव्य भार्या तां क्लान्तां भूरुहफलाम्बुभिः।
अवातरद् गिरिनदीं स्नातुं कल्लोलमालिनीम् ॥८॥
तस्यां ददर्श च छिन्नहस्तपादचतुष्टयम्।
ह्रियमाणं जलौघेन पुरुषं त्राणकाङ्क्षिणम् ॥९॥
बहूपवासक्लान्तोऽपि तां विगाह्य नदीं ततः।
उज्जहार कृपालुस्तं महासत्त्वः स पूरुषम् ॥१०॥
केनेदं ते कृतं भ्रातरिति कारुणिकेन च।
तेनारोप्य स्थलं पृष्टः स रुवन् पुरुषोऽभ्यधात् ॥११॥
निकृत्तहस्तचरणो नद्यां क्षिप्तोऽस्मि शत्रुभिः।
विट्सुभिः क्लेशमरणं त्वयाहं सुखतस्ततः ॥१२॥
एवमुक्तवतस्तस्य स बबन्ध व्रणपट्टिकाम्।
दत्त्वाहारं महासत्त्वः स्नानादि व्यधितात्मनः ॥१३॥

दशम लम्बक १३५

Page 989Permalink

दशम लम्बक १३५
नवम तरंग
गोमुख द्वारा नरवाहनदत्त को सुनाई गई विविध कथाएँ
दूसरे दिन रात में फिर पहले के ही समान मनोविनोद करते हुए गोमुख मन्त्री ने
नरवाहनदत्त के लिए कथा सुनाई ॥१॥
बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन्न बनिये की कथा
किसी नगर में बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन्न किसी धनी बनिये (सेठ) का लड़का था
जिसकी मां मर गई थी ॥२॥
दूसरी स्त्री (सौतेली मां) के वशीभूत और उसी के द्वारा प्रेरित पिता से बनवास के
लिए निर्वासित वह पुत्र अपनी पत्नी के साथ घर से निकल गया ॥३॥
अपने साथ आते हुए अपने भ्रान्ताचित छोटे भाई को लौटाकर वह दूसरे ही मार्ग से
गया ॥४॥
चलते चलते मार्ग में भोजन-रहित वह क्रमशः प्रचंड सूर्य की किरणों से संतप्त महान्
मरुस्थल में जा पहुँचा ॥५॥
उस मरुस्थल में सात दिनों तक थकी-मांदी और भूखी-प्यासी स्त्री को वह अपने मांस
और रक्त से जिलाता रहा। वह पापिनी भी उसे खाती-पीती रही। ॥६॥
आठवें दिन वह एक पहाड़ी जंगल में पहुँचा जो पहाड़ी नदी की तरंगों से मुखरित फल-
वाले सघन वृक्षों की छायावाला और हरी घासों के मैदानों से रमणीय था ॥७॥
वहां पर थकी-मांदी अपनी पत्नी को कन्द, मूल फल जल आदि से स्वस्थ करके वह
स्वयं तरंगों से सुशोभित पहाड़ी नदी में स्नान करने के लिए उतरा ॥८॥
उसने नदी की धार में बहते हुए अपना बचाव चाहते हुए कटे हुए हाथपैर वाले एक
पुरुष को देखकर, अनेक उपवासों से थके और दुर्बल होते हुए भी उस दयालु महापुरुष ने नदी
की धार में जाकर उसे निकाला ॥९ १ ॥
और, उस दयालु राजकुमार ने उस वृद्ध पुरुष को अपनी पीठ पर उठाकर सूखे स्थान पर
रखा और पूछा कि 'भाई, तुम्हारी यह दुर्दशा किसने की' ॥१०॥
तब उस पुरुष ने कहा—'मेरे शत्रुओं ने मुझे कष्टपूर्वक मरने के लिए मेरे हाथ-पैर काट
कर मुझे नदी में फेंक दिया' ॥११॥
ऐसा कहते हुए उस पुरुष के घावों पर पट्टियां बांधकर और उसे भोजन आदि से सन्तुष्ट
करके उस महापुरुष ने स्नान आदि क्रिया समाप्त की ॥१२॥

२१६ कथासरित्सागर

Page 990Permalink

२१६ कथासरित्सागर
ततो मूलफलाहारो भार्यायुक्तोऽत्र कानने।
स तस्थौ बोधिसत्त्वांशो वणिक्पुत्रस्तपश्चरन् ॥१४॥
एकदा फलमूलार्थं गत तस्मिन् स्मरातुरा।
तद्भार्या तेन रुण्डेन रमे स्वव्रणन सा ॥१५॥
तत्सक्ता तेन सम्मन्त्र्य भर्तुस्तस्य वधैषिणी।
युक्त्या चकार सान्यद्युर्मान्द्यं दुष्टचारिणी मृषा ॥१६॥
स्वप्ने दुरवतारेऽद्य स्थिता दुस्तरनिम्नगे।
दर्शयित्वौषधिं पापा पतिं सा त्वमभाषत ॥१७॥
जीवाम्यहं त्वयैषा चेन्मयानीता महौषधिः।
जाने ह्येतामिहस्थां मे स्वप्ने वक्ति स्म देवता ॥१८॥
तच्छ्रुत्वा स तथैवेथ द्वबध्रे तत्रौषधं कृते।
तुषवेष्टितया रज्ज्वावातरत्स्तब्धया ॥१९॥
अवतीर्णस्य रज्जुं तां चिक्षेपोन्मुच्य तस्य सा।
ततः स पतितो नद्या तया जह्रे महौघया ॥२०॥
दूराद्वीची नीत्वा च तया सुकृतलक्षितः।
नद्या कस्यापि नगरस्यासन्ने सोऽर्पितस्तटे ॥२१॥
तत स स्थलमारुह्य चिन्तयन् स्त्रीविचेष्टितम्।
जलावगाहनक्लान्तो विशश्राम तरोस्तले ॥२२॥
तस्मिन् काले च नगरे राजा तत्र मृतोऽभवत्।
मृते राजनि चानादिदेशे छत्रेष्वसौ स्थितिः ॥२३॥
यन्मङ्गलगजःपौरैर्भ्राम्यमाणः करेण यम्।
आरोपयति पृष्ठे स्वे सोऽत्र राज्येऽभिषिच्यते ॥२४॥
स धैर्यतुष्टो धातेव भ्रमन् प्राप्तोऽन्तिकं गजः।
उत्क्षिप्यारोपयामास स्वपृष्ठे तं वणिक्सुतम् ॥२५॥
ततः स नगरं नीत्वा रम्ये प्रकृतिभिः क्षणात्।
वणिक्सुतोऽभिषिक्तोऽभूद् बोधिसत्त्वांशसम्भवः ॥२६॥
स राज्यं प्राप्य करुणामुदिताक्षान्तिभिः सह।
अरस्त न तु पापाभिः स्त्रीभिश्चपलवृत्तिभिः ॥२७॥
तद्भार्या सापि निःशङ्का मत्वा तं च नदीहृतम्।
वभ्रामतस्ततो जारं रुण्डं पृष्ठेऽधिरोप्य तम् ॥२८॥

दशम लम्बक १६७

Page 991Permalink

दशम लम्बक १६७
तब कन्द और फल आदि का आहार करते हुए उस वैश्यपुत्र ने पत्नी के साथ तपस्या
करते हुए उसी वन में निवास किया ॥१४॥
एक बार उस वाणिग्दत्त के अंध वैश्यपुत्र के कन्द फल आदि लेने के लिए दूर
निकल जाने पर, काम-वासना से पीड़ित उसकी स्त्री उस रंड पर आसक्त हो गई और
उसके साथ रमण करने लगी ॥१५॥
उसके सम्पर्क में आकर और उससे सम्मति करके अपने पति का वध करने की इच्छा
से वह पापिन दुराचारिणी बीमारी का बहाना बनाकर पड़ गई ॥१६॥
दुस्तर नदी के करारे में नीचे की ओर उगी हुई किसी ओषधि को दिखाकर,
वह, अपने पति से बोली कि यदि तुम उस ओषधि को ला दो तो मैं जी सकती हूँ, ऐसा मुझे स्वप्न
में देवता ने कहा है ॥१७-१८॥
यह सुनकर साधु स्वभाव उसका पति उस औषधि को लेने के लिए बास की रस्सी
बनाकर, उसे वृक्ष से बाँधकर और उसमें लटककर नदी की ओर लटका। रस्सी के सहारे उसके
लटकने पर उस कामिनी ने रस्सी को खोलकर फेंक दिया। इस कारण उसका पति नदी में गिरकर
तेज धारा में बह गया ॥१९-२०॥
पूर्व पुण्यों से रक्षित उस वैश्यपुत्र को नदी ने दूर तक बहाकर एक किनारे पर ले जाकर
पटक दिया ॥२१॥
उस तट से ऊपर को चढ़ता हुआ अपनी स्त्री के कुकर्म को सोचता हुआ और पानी के
बहाव से थका-हारा वह वैश्यपुत्र एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगा ॥२२॥
उसी समय उस नगर का राजा मर गया। उस देश में प्राचीन समय से यह प्रथा
चली आ रही थी कि राजा के मरने पर, पुरवासी माङ्गलिक मत्तगज को घुमाते थे।
वह घूमते हुए सूँड़ से उठाकर जिसे अपनी पीठ पर बैठा लेता था वही राजगद्दी पर बैठाया
जाता था ॥२३-२४॥
उसी नियमानुसार धैर्य से सम्पुष्ट विधाता के समान वह हाथी वृक्ष के तले बैठे हुए
वैश्यपुत्र के पास आया और उसने उसे उठाकर अपनी पीठ पर बैठा लिया ॥२५॥
तब राजा के मन्त्रियों तथा अधिकारियों ने उस वैश्यपुत्र का नगर में ले जाकर उसका
राज्याभिषेक कर दिया ॥२६॥
बोधिसत्त्व के अंश से उत्पन्न वह वैश्यपुत्र राज्य पाकर मैत्री करुणा मुदिता क्षमा
आदि गुणों के साथ राज्यशासन करने लगा। चंचल वृत्तिवाली पापिनी स्त्रियों को उसने दूर
ही रखा ॥२७॥
उधर, उसकी पत्नी निःशंक होकर पति का नदी में डूबकर मरा हुआ जानकर, अपने
उस जार को पीठ पर चढ़ाकर इधर उधर घूमने लगी ॥२८॥
११८

Page 992Permalink

परिकृत्ताङ्घ्रिहस्तोऽयं भर्त्ता मेऽहं पतिव्रता।
भिक्षित्वा जीवयाम्येतं तद्भिक्षां मे प्रयच्छत॥२९॥
इति सा भिक्षमाणा च ग्रामं ग्रामं पुरे पुरे।
राज्यस्थस्यात्मनो भर्तुर्नगरं प्राप तस्य तत्॥३०॥
तथैव भिक्षमाणात्र राज्ञस्तस्य क्रमेण सा।
पतिव्रतेत्यर्च्यमाना पौरैः श्रुतिपथं ययौ॥३१॥
आनाययत्तस राजा च तां पृष्ठारूढरुण्डिकाम्।
का सा पतिव्रतेत्यारात् परिव्राजं च पृष्टवान्॥३२॥
साहं पतिव्रता देवेत्यप्रतिज्ञाय सापि तम्।
भर्तारमब्रवीत् पापा राजधीतेजसा वृतम्॥३३॥
ततः स बोधिसत्त्वांशो हसन् राजा जगाद ताम्।
दृष्टं पतिव्रतात्वं ते फलेनैव मयात्र च॥३४॥
स्वरक्तमांसं दत्त्वापि स्वीकृतुं शकिता न या।
स्वेनाबिलुप्तहस्तेन भर्त्रा मानुषराक्षसी॥३५॥
सा सदा रक्तमांसानि हरन्ती बत मे कषम्।
रुण्डेन विकलेनापि स्वीकृत्य वहनीकृता॥३६॥
किंस्विद्रूढः स भर्त्ता यो नद्यां क्षिप्तस्त्वयानघः।
कर्मणा तेन बहसे रुण्डमेतं बिभर्षि च॥३७॥
इत्युद्घाटितवृत्तं तं प्रतिज्ञाय पतिं ततः।
भयात् सा मूर्च्छितेवाभूल्लिखितेव मृतेव च॥३८॥
किमेतद्ब्रूहि देवेति सोऽथ राजा सकौतुकैः।
पृष्टोऽमात्यैर्यथावृत्तं तेभ्यः सर्वमवर्णयत्॥३९॥
ततो मत्तद्रुहं बुद्ध्वा छित्त्वा तां कर्णनासिकम्।
कृत्वाङ्क मन्त्रिणो देशात् सरुण्डां निरवासयन्॥४०॥
छिन्ननासिकया रुण्डं बोधिसत्त्व नृपधिया।
युक्तं सवृक्षत्तयोगं तथा बिभिरवर्णयत्॥४१॥
एवं दुरवधार्यैव गतिश्चित्तस्य योषिताम्।
देवस्येवाविचारस्य नीचैकाभिमुखस्य च॥४२॥
एवं चात्यन्तधीराणां सत्त्वानां जिततृष्णाम्।
तुष्ट्वेवाचिन्तिता एव स्वयमायान्ति सम्पदः॥४३॥

द्वादश लम्बक १५१

Page 993Permalink

द्वादश लम्बक १५१

वह कहती थी—'यह मेरा पति है और शत्रुओने इसके हाथ-पैर काट दिये हैं। मैं
पतिव्रता हूँ इसलिए भीख मांगकर भी पति को जिलाती हूँ। इसलिए, मुझे भिक्षा
दो' ॥२९॥
इस प्रकार, गांव-गांव और नगर-नगर में भीख मांगती हुई वह दुष्टा स्त्री उस नगर म
पहुँची जहाँ उसका पहला पति राज्य करता था ॥३०॥
इसी प्रकार वहाँ भीख मांगती हुई वह पतिव्रता होने के कारण जनता में खूब मानी
जाने लगी। धीरे-धीरे राजा के कानों में भी उसकी प्रशंसा पहुँची ॥३१॥
राजा ने भी पीठ पर रूंड को चढ़ाई हुई उसे बुलवाया और भली भांति उसे पहचान कर
पूछा कि 'क्या तू ही वह पतिव्रता है ?' ॥३२॥
उस पापिनी ने भी राजलक्ष्मी के तेज से परिवर्तित स्वरूपवाले अपने उस पति को न
पहचान कर कहा—'हाँ महाराज मैं वही पतिव्रता हूँ' ॥३३॥
तब बोधिसत्त्व का अंश वह राजा हँसकर बोला—'इस परिणाम से मैं ने भी तेरा
पातिव्रत्य देख लिया। तू वह मनुष्य-रूपी राक्षसी है जिसे तेरा पति अपना रक्त और मांस
देकर भी वश में न कर सका और शरीरहीन रूंड ने तुझे अपना बाहुन बनाया। क्या यह वही
तेरा निष्पाप पति है जिस तूने नदी में फेंक दिया था। उसी कर्म से तू इस रूंड को ढो रही है
और पाल रही है ?' ॥३४-३५॥
इस प्रकार, गुप्त रहस्य को खोलनेवाले उस अपने पति को पहचानकर वह स्त्री भय
से मूर्च्छित-सी चित्र-लिखित और मूक-सी हो गई ॥३८॥
तदनन्तर, कौतुक-भरे मन्त्रियों से 'महाराज यह क्या बात है ?' इस प्रकार पूछे गये
राजा ने सब सत्य समाचार उन्हें सुना दिया ॥३९॥
तब मन्त्रियों ने उसे पति-विरोधिनी जानकर उसके नाक-कान कटवा दिये और उस
रूंड के साथ उसे उस नगर से बाहर निकलवा दिया ॥४०॥
नकटी को रूंड के साथ और राजलक्ष्मी को बोधिसत्त्व के साथ मिलाते हुए दैव ने समान
संयोग का उदाहरण प्रदर्शित किया ॥४१॥
इस प्रकार विवेकहीन और निम्न चित्तवृत्तिवाली स्त्रियों की चित्तवृत्ति दैव-गति के
समान नहीं जानी जा सकती ॥४२॥
इसी प्रकार, अपने स्वभाव और चरित्र के रक्षक विशाल हृदयवाले और क्रोध पर
विजय करनेवाले व्यक्तियों को सम्पत्तियां मान प्रसन्न होकर बिना साध ही प्राप्त हो
जाती हैं ॥४३॥

इत्याख्याय कथां मन्त्री गोमुखः पुनरेव सः।

Page 994Permalink

इत्याख्याय कथां मन्त्री गोमुखः पुनरेव सः।
नरवाहनदत्ताय कथामेतामवर्णयत् ॥४४॥
कोऽप्यासीद्बोधिसत्त्वांशो वने क्वापि कृतोटजः।
कारुणैकाग्रहृदयो महासत्त्वस्तपश्चरन् ॥४५॥
स तत्र जन्तूनापन्नान् पिशाचांश्च समुद्धरन्।
अपरांश्च जलेऽग्नौ स्वभावादतर्पयत् ॥४६॥
एकदान्योपकारार्थं भ्रमन् सोऽटावीभुवि।
महान्तं कूपमद्राक्षीत्तदन्तश्च ददौ दृशम् ॥४७॥
तावच्च स्त्री तदन्तस्था स दृष्ट्वैवोच्चैरभाषत।
भो महारम्भह नारी सिंहः स्वर्णशिखः खगः ॥४८॥
भुजङ्गश्चेति चत्वारः कूपेऽत्र रजनी वयम्।
पतितास्तदतः क्लेशादुद्धरास्मान् कृपो कुरु ॥४९॥
एतच्छ्रुत्वा जगादैतां स्त्रियं यूयं त्रयो यदि।
तमसान्धा निपतिताः खगोऽत्र पतितः कथम् ॥५०॥
तमवैषोऽपि पतितो व्याधजालेन सङ्गतः।
इति सापि महासत्त्वं तं नारी प्रत्यभाषत ॥५१॥
ततस्तान् स तपःशक्त्या यावदुद्धर्तुमिच्छति।
तावत्तच्छक्त्या नोद्धर्तुं सिद्धिस्तस्य त्वहीयत ॥५२॥
पापेयं स्त्री ध्रुवं सिद्धिरितत्सम्भाषणाद्धि मे।
नष्टा यतस्त्वत्र तावद्युक्तिं यां करोम्यहम् ॥५३॥
इति सञ्चिन्त्य रज्ज्वा तांस्तृणावेष्टितयाखिलान्।
उज्जहार महासत्त्वः स कूपात् कुर्वतः स्तुतिम् ॥५४॥
सविस्मयश्च पप्रच्छ सिंहपक्षिमृजङ्गमान्।
व्यक्ता वाग् वः कथं कीदृग्वृत्तान्ताद्वोच्यतामिति ॥५५॥
तत मिथोऽब्रवीद् व्यक्तवाचो जातिस्मरा वयम्।
अन्योन्यबाधकाश्चास्मद् वृत्तान्तं च क्रमाच्छृणु ॥५६॥
सिंहस्य कथा
इत्युक्त्वा स स्ववृत्तान्तं सिंहो वक्तुं प्रचक्रमे।
अस्ति बभ्रुमृगेन्द्रस्य तुषाराद्रौ पुरोत्तमम् ॥५७॥
पद्मगभिधानोऽस्ति तत्र विद्याधरेश्वरः।
पद्मगभिधानश्च पुत्रस्तस्याप्यदत्त ॥५८॥

षष्ठम लम्बक १४१

Page 995Permalink

षष्ठम लम्बक १४१
मन्त्री गोमुख इस प्रकार कथा कहकर नरवाहनदत्त के लिए फिर यह दूसरी कथा कहने
लगा ॥४४॥
बोधिसत्त्व का अंशावतार कोई व्यक्ति किसी वन में पर्णकुटी बनाकर करुणा में सदा
एकाग्रचित्त होकर तपस्या करता हुआ रहता था ॥४५॥
वह उस वन में विपद्ग्रस्त प्राणियों और पिपासुओं का उद्धार करता हुआ वन्याश्रय
प्राणियों की जल और अन्न से सेवा करता था ॥४६॥
एक बार, दूसरे के उपकार के लिए, जंगलों में घूमते हुए उसने एक भारी कुँआ देखा और
उसके भीतर झाँका ॥४७॥
तब उसके भीतर पड़ी हुए एक स्त्री उसे देखकर जोर से बोली—'हे महात्मन्, मैं
(स्त्री) सिंह, स्वर्णचूड़ पक्षी और सर्प इस प्रकार हम चार व्यक्ति रात को इस कुएँ में गिर
पड़े हैं। अतः कृपाकर हम चारों को निकालो ॥४८-४९॥
यह सुनकर वह महात्मा उस स्त्री से बोला—'तुम तीनों यदि अँधेरे में न दीख पड़ने के
कारण गिर पड़े हो तो ठीक है, परन्तु यह पक्षी कैसे गिरा ? ॥५०॥
'बहेलिये के जाल से बँधा हुआ यह पक्षी भी इसी तरह गिरा'—इस प्रकार उस स्त्री ने
उत्तर दिया ॥५१॥
तब उस महात्मा ने अपनी तपस्या के बल से उन्हें ऊपर लाना चाहा, किन्तु वह ऐसा न
कर सका। उसकी वह सिद्धि नष्ट हो गई ॥५२॥
'यह स्त्री पापिनी है, अवश्य ही इससे बात करने से मेरी सिद्धि नष्ट हुई है, अतः दूसरी
युक्ति करता हूँ'—यह सोचकर उस महात्मा ने घासों से रस्सी बटकर, उसके द्वारा अपनी
दृढमत्ता साबित करते हुए उन सबको कुएँ से बाहर निकाला ॥५३-५४॥
तदनन्तर, आश्चर्य के साथ उसने सिंह, पक्षी और सर्प से पूछा—'तुम्हारी वाणी मनुष्यों
के समान क्यों स्पष्ट है और तुम्हारी यह स्थिति क्यों है? बताओ। तब उनमें पहले सिंह बोला—पूर्व
जन्म का स्मरण करनेवाले तथा एक-दूसरे के बाधक हम चारों की बात क्रमसे सुनो ॥५५-५६॥
सिंह की आत्म-कथा
यह कहकर सिंह ने अपनी कथा शुरू की। हिमालय पर्वत पर वैदूर्यभूम नाम का एक
उत्तम नगर है। वहाँ पद्मवेग नाम का विद्याधरों का राजा है। उसको वज्रवेग नाम का
एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥५७-५८॥

१४२ कथासरित्सागर

Page 996Permalink

१४२ कथासरित्सागर
स वज्रवेगोऽहङ्कारी विरोधं येन केनचित्।
साकं शौर्यमदान्चक्रे लोके विद्याधरे वसन् ॥५९॥
निषेधतः पितुस्तस्य यदा नागणयद्वचः।
तदा पिता तमशपन्मर्त्यलोके पतति सः॥६०॥
ततो नष्टमदो भ्रष्टविद्यः शापहतो रुदन्।
वज्रवेगः स पितरं शापान्तं तमयाचत ॥६१॥
तत स तत्पिता पद्मवेगो ध्यात्वाऽब्रवीत् क्षमात्।
भुवि विप्रसुतो भूत्वा कृत्वाप्यत्र भव पुनः॥६२॥
पितुः शापात् ततः सिंहो भूत्वा कूपे पतिष्यसि।
महासत्त्वश्च कृपया कश्चित् त्वामुद्धरिष्यति ॥६३॥
तस्य प्रत्युपकारं च विधायापदि मोक्ष्यसे।
शापादस्मादिति पिता शापान्तं तस्य स व्यधात् ॥६४॥
अथेह वज्रवेगोऽसौ विप्रस्याजनि माठरे।
हरधोपाभिधानस्य देवधोपाभिधः सुतः॥६५॥
स तत्राप्यकरोद्वैरं बहुभिः शौर्यगर्वितः।
बहुभिर्मा कृथा वैरमिति तं चावदत् पिता ॥६६॥
अकुर्वाणं वचस्तस्य शप्तवान् स पिता क्रुधा।
शौर्याभिमानी दुर्बुद्धे सिंहस्त्वं भव साम्प्रतम् ॥६७॥
एवं तस्य पितुः शापाद्देवधोपः पुनश्च सः।
विद्याधरावतारः सन् सिंहो जातोऽत्र कानने ॥६८॥
तमिमं विद्धि मां सिंहं सोऽहं दैवाद् भ्रमन्क्षितौ।
कूपेऽद्य पतितोऽमुष्मिन् महासत्त्वोद्धृतस्त्वया ॥६९॥
तद्यामि तावदापन्नं यदा स्यात् क्वापि ते सखा।
मां स्मरेरुपकारं ते कृत्वा मोक्ष्ये स्वशापतः ॥७०॥
इत्युदीर्य गते सिंहे बोधिसत्त्वेन तेन सः।
पृष्टः सुवर्णचूलोऽथ पक्षी स्वोदन्तमभ्यधात् ॥७१॥
स्वर्णचूडपक्षिण आत्म कथा
अस्ति विद्याधराधीशो वज्रदंष्ट्रो हिमाचले।
तस्य दम्भाभजायन्त पञ्च कन्या निरन्तराः ॥७२॥

दशम लम्बक १४३

Page 997Permalink

दशम लम्बक १४३
वह वज्रवेग उस विद्याधरनगर में रहता हुआ अपने बल के घमंड से जिस किसी के
साथ वैर-विरोध कर लेता था ॥५९॥
पिता के बार-बार मना करने पर भी जब उसने उसकी बात नहीं मानी तब उसके
पिता ने उसे शाप दिया कि 'तू मर्त्यलोक में जाकर गिर' ॥६०॥
तब वह मदहीन और विद्या रहित होकर रोता हुआ वज्रवेग अपने पिता से शाप का
अन्त करने के लिए प्रार्थना करने लगा ॥६१॥
तब उसके पिता ने क्षणभर सोचकर कहा—'पृथ्वी पर, ब्राह्मण का पुत्र बनकर और
वहाँ भी इसी प्रकार मद करने के कारण पुनः पिता के शाप से सिंह बनकर कुएँ में गिरेगा। तब
आकर जो महात्मा तुझे निकालेगा उसका प्रत्युपकार करके तू शापमुक्त हो जायगा ऐसा कह
कर पिता ने उसके शाप का अन्त बतलाया ॥६२-६४॥
तदनन्तर, वह वज्रवेग मालव देश में हरघोष नामक ब्राह्मण के घर में देवघोष इस नाम
से उत्पन्न हुआ। वहाँ भी उसने अपने बल के घमंड से बहुतों के साथ विरोध किया। उसके
पिता ने रोका कि 'बहुतों के साथ विरोध न करो' ॥६५-६६॥
किन्तु, उसकी बात न माननेवाले पुत्र को पिता ने शाप दिया कि 'हे बल के घमंडी
दुष्टबुद्धि जा अब तू सिंह बन जा' ॥६७॥
तब पिता के शाप से वह देवघोष जो विद्याधर का अवतार था इस वन में सिंह बन
गया ॥६८॥
मुझे वही सिंह समझो। दैवयोग से वन में घूमता हुआ मैं रात को इस कूप में गिरा और
आज तुझ महात्मा से उबारा गया ॥६९॥
इसलिए, अब मैं जाता हूँ। तुम्हें कहीं पर भी कोई विपत्ति आवे तो मुझे स्मरण कर
लेना। उस समय तुम्हारा प्रत्युपकार करके मैं शापमुक्त हो जाऊँगा ॥७०॥
ऐसा कहकर सिंह के चले जाने पर उस बोधिसत्त्व से पूछा गया सुवर्णचूड पक्षी अपना
वृत्तान्त कहने लगा ॥७१॥
सुवर्णचूड पक्षी की आत्म कथा
हिमालय पर वज्रदंष्ट्र नाम का विद्याधरों का राजा है। उसकी रानी से यथावार पाँच
कन्याएं उत्पन्न हुईं ॥७२॥

९४४ कथासरित्सागर

Page 998Permalink

९४४ कथासरित्सागर

ततः स हरमाराध्य तपसा प्राप्तवान् सुतम्।
राजा रजतदंष्ट्राख्यं जीवितादधिकप्रियम् ॥७३॥
स तेन पित्रा बालोऽपि विद्याः स्नेहेन लम्भितः।
वृद्धिं रजतदंष्ट्रोऽथ बन्धुनेत्रोत्सवो ययौ ॥७४॥
एकदा भगिनीं ज्येष्ठां नाम्ना सोमप्रभां च सः।
गौर्या पुरः पिञ्जरकं वादयन्तीमवेक्षत ॥७५॥
देहि पिञ्जरकं मह्यं वादयाम्यहमप्यथ।
इत्ययाचत तां सोऽथ बालत्वादन्वबध्नत ॥७६॥
सा तन्नादात्तदा तस्मै तया धापल्लत' स्वयं।
तस्यास्तत् सोऽपहृत्यैव पक्षीवोदपतन्नभः ॥७७॥
साथ स्वसा तमशपत्तन्मे पिञ्जरक हठात्।
धृत्वोड्डीनोऽसि तत्पक्षी स्वर्णचूलो भविष्यसि ॥७८॥
तच्छ्रुत्वा पादपतितेनेय सा तेन याचिता।
स्वसा रजतदंष्ट्रण तस्य शापान्तमब्रवीत् ॥७९॥
पक्षी भूत्वान्धकूपे त्व यदा मूढ पतिष्यसि।
उद्धरिष्यति कश्चिन्च तदा त्वां करुणापरः ॥८० ॥
तस्य कृत्वोपकारार्थं शापमन्त तरिष्यसि।
इत्युक्तः स तया भ्राता स्वर्णचूलः खगोऽजनि ॥८१॥
स एव स्वर्णचूलोऽह पक्षी भ्रष्टोऽभ्रटे निधि।
इहोद्धृतोऽस्मि भवता तदिदानीं व्रजाम्यहम् ॥८२॥
आपदि त्वं स्मरमां च तव कृत्वा ह्युपक्रियाम्।
शापान् मोक्ष्यद्युमिस्युक्त्वा सोऽपि पक्षी ययौ तत' ॥८३॥
तत स दाधिखस्तेन तन पृष्टा भुजङ्गम।
स्वोदन्त कथयामास तस्मायत्र महारमने ॥८४॥

सर्पस्यात्मकथा

पुरा मुनिकुमाराऽहमभूय कश्यपाथमे।
अभवतय चैको मे वयस्यो मुनिपुत्रकः ॥८५॥
एकदा पावतीजेंऽस्मिन् सट स्नातुं वयस्यके।
तटस्थिताञ्जुमद्राक्ष त्रिकण मपमागतम् ॥८६॥

द्वादश लम्बक १४५

Page 999Permalink

द्वादश लम्बक १४५
तब उसने शिवजी की तपस्या करके एक बालक प्राप्त किया। राजा ने जीवन से भी
अधिक प्यारे उस बालक का नाम रजतदंष्ट्र रख दिया ॥७३॥
पिता ने बाल्यरूप में ही स्नेह के कारण उसे सभी विद्याएँ सिखा दीं और बन्धुओं की
आँखों का तारा वह रजतदंष्ट्र क्रमशः बड़ा हुआ ॥७४॥
एक बार, उसने अपनी बड़ी बहन सोमप्रभा को गौरी के सामने पिञ्जरक नाम का बाजा
बजाते हुए देखा ॥७५॥
'बहन यह पिञ्जरक मुझे दो मैं भी बजाऊँ—इस प्रकार बाल-हठ के कारण बाजा माँगते
हुए उसे जब बहन ने बाजा नहीं दिया तब वह चंचलता के कारण उसकी बीन छीनकर पक्षी के
समान आकाश में उड़ गया ॥७६-७७॥
तब उसकी बहन ने उसे शाप दिया कि 'तू मेरे पिञ्जरक को हठपूर्वक लेकर पक्षी के
समान उड़ा इसलिए तू स्वर्णचूड़ पक्षी बनेगा' ॥७८॥
यह सुनकर उसके चरणों पर गिरे हुए भाई रजतदंष्ट्र द्वारा प्रार्थना की गई सोमप्रभा ने
उसके शाप का अन्त इस प्रकार बतलाया ॥७९॥
'मूर्ख तू पक्षी बनकर जब अँधेरे कुएँ में गिरेगा तब तुझे जो भी दयालु उससे बाहर
निकालेगा उसका उपकार करने पर तेरे शाप का अन्त होगा बहन से इस प्रकार कहा गया वह
भाई रजतदंष्ट्र स्वर्णचूड़ पक्षी के रूप में उत्पन्न हुआ ॥८०-८१॥
यह वही मैं स्वर्णचूड़ पक्षी रात को इस कूप में गिरा हुआ आज तुझ महात्मा द्वारा
निकाला गया हूँ सो अब मैं जाता हूँ ॥८२॥
'संकट के समय तुम मुझे स्मरण करना। तब तुम्हारा प्रत्युपकार करके मैं शाप से मुक्त
हो जाऊँगा' ऐसा कहकर वह पक्षी चला गया ॥८३॥
तदनन्तर बोधिसत्त्व से पूछे गये सर्प ने अपना वृत्तान्त इस प्रकार सुनाया ॥८४॥
सर्प की आत्मकथा
मैं पूर्वजन्म में कश्यप ऋषि के आश्रम में मुनिकुमार था। वहाँ एक मुनिकुमार मेरा
मित्र था ॥८५॥
एक बार स्नान के लिए सरोवर में उतरने पर मैंने तीर पर आये हुए तीन फना वाले
एक सर्प को देखा ॥८६॥
१९०

१४६ कथासरित्सागर

Page 1000Permalink

१४६ कथासरित्सागर
तेन भीषयितुं तं च वयस्यं नर्मणा मया।
उत्ससर्जूरगस्तटान्ते स वंशो मन्त्रबलाद्बहिः॥८७॥
क्षणात् स्नात्वा तटं प्राप्तो मध्यस्थो विलोक्य सः।
अशङ्कितं महाहिं च त्रस्तो मोहमुपागमत्॥८८॥
चिरादाश्वसितः सोऽथ मया ध्यानावधृत्य तत्।
मत्कृतं त्रासनं कोपाच्छपति स्म सखापि माम्॥८९॥
गच्छेदृगेव त्रिफणः सर्पो भव महानिति।
अनुनीतोऽथ शापान्तमृषिपुत्रः स मेऽब्रवीत्॥९०॥
सर्पीभूतश्च्युतं कूपे योऽसौ त्वामुद्धरिष्यति।
तस्योपकृत्यावसरे शापमुक्तो भविष्यसि॥९१॥
इत्युक्तेनैव गते तस्मिन्नपोऽहं सर्पतां गतः।
उद्धृतोऽस्मि त्वया चाद्य कूपात्तद्यामि सम्प्रति॥९२॥
स्मृतश्चैषोपकारं ते कृत्वा मोक्ष्य स्वशापतः।
इत्युक्त्वा भुजगे याते स्त्री स्ववृत्तमवर्णयत्॥९३॥
दुष्टस्त्रिय आत्मकथा
अह क्षत्रियपुत्रस्य भार्या राजोपसेविनः।
शूरस्य रूपिणो मूनरुचारुरूपस्य मानिनः॥९४॥
कृतोऽन्यपुरुषासङ्गो मया तदपि पापया।
तद्विज्ञाय स भर्त्ता मे निग्रहायाकरोन्मतिम्॥९५॥
सखीमुखाच्च तद्बुद्ध्वा तदवाहं पलायिता।
रात्रौ वनं प्रविष्टैव कूपभ्रष्टोद्धृता त्वया॥९६॥
स्वत्प्रसादादिदानीं च गत्वा जीवामि कुत्रचित्।
भूयात्तन्मे दिनं यत्र कुर्यां ते प्रत्युपक्रियाम्॥९७॥
इत्युक्त्वा बोधिसत्त्वं तं कुलटा निकटासतं।
गोत्रवर्धनसञ्ज्ञस्य राज्ञः सा नगरं ययौ॥९८॥
तस्य सङ्गतिमुत्पाद्य परिवारजनैः सह।
तस्यौ राजमहादेव्या दासीभावाश्रयेण सा॥९९॥
तस्यापि बोधिसत्त्वस्य तस्याः सम्भाषणात् स्त्रियाः।
नाचिरासीद्वने नष्टसिद्धमूलफलादिकम्॥१००॥

दशम लम्बक १४७

Page 1001Permalink

दशम लम्बक १४७
तब मैंने स्नान करनेवाले अपने मित्र को हास्य-विनोद से डराने के लिए उस सर्प को
मन्त्र के बल से किनारे पर बाँध दिया ॥८७॥
स्नान करके तुरन्त किनारे पर आया हुआ मित्र निश्चल बैठे हुए उस सर्प को सहसा
देखकर मूर्च्छित हो गया ॥८८॥
मैंने ध्यान से यह जानकर चिरकाल के पश्चात् मित्र को चेतन किया। तब मेरे द्वारा
डराये गये उसन मित्र ज्ञान पर भी क्रोध से मुझे शाप दिया ॥८९॥
'जा तू भी ऐसा ही तीन फणोवाला साँप हो जा। मेर अनुनय-विनय पर उस मित्र ने
मेरे शाप का अन्त इस प्रकार बतलाया ॥९०॥
साप बनकर कूँएँ में गिरे हुए तुझे जो उबारेगा समय पर उसी का उपकार करके तू
शाप मुक्त होगा' ॥९१॥
इस प्रकार सर्प बने और कुएँ में गिरे हुए मुझे तुमने निकाला है। अब मैं जाता हूँ।
तुम्हारे स्मरण करने पर प्रत्युपकार करके मैं शाप से छूट जाऊँगा' ऐसा कहकर सर्प के चले
जाने पर उस स्त्री ने अपना वृत्तान्त सुनाया ॥९२-९३॥
दुष्टा स्त्री की आत्मकथा
मैं राजा के सेवक एक क्षत्रिय-पुत्र की भार्या हूँ। मेरा पति शूरवीर और त्यागी है।
युवा है, सुन्दर और आत्ममानी है ॥९४॥
तो भी पापिनी मैं ने दूसरे पुरुष का प्रणय कर लिया। यह जानकर मेरे पति ने मुझे
मारने का विचार किया ॥९५॥
अपनी एक सहेली से यह जानकर उसी समय मैं घर से भागी और रात को इस बन
में प्रवेश करके इस कुएँ में गिरी और तुमसे उबारी गई ॥९६॥
अब तुम्हारी ही कृपा से कहीं जाकर जीवन बिताती हूँ और वह दिन भी आय कि मैं
आपका प्रत्युपकार कर सकूँ। —बोधिसत्त्व से ऐसा कहकर वह दुष्टा वहाँ से घोषकर्दम नामक
राजा के नगर को गई और उसके परिवारवालों से मित्रता करके राजा की महारानी के पास
सेविका बनकर रहने लगी ॥९७-९९॥
उस स्त्री के साथ भाषण करने से उस बोधिसत्त्व की सिद्धि नष्ट हो जाने के कारण उस
बन में फल-मूलों की भी उत्पत्ति नष्ट हो गई ॥१००॥

Page 1002Permalink

ततः क्षुत्तृष्णया क्लान्तः प्राक्तं सिंहं समस्मरत्।
स्मृतागतः स चैतस्य व्यधाद्वृत्तिं मृगामिषैः ॥१०१॥
कञ्चित्कालं स तन्मांसैः प्रकृतिस्थं विधाय तम्।
केसरी सोऽब्रवीत् क्षीणः सशापो मे व्रजाम्यहम् ॥१०२॥
इत्युक्त्वा सिंहतां मुक्त्वा भूत्वा विद्याधरश्च सः।
जगाम तदनुज्ञातस्तमामन्त्र्य निजं पदम् ॥१०३॥
ततः स बोधिसत्त्वांशो वृत्तिम्लानः पुनः खगम्।
सस्मार स्वर्णचूडं तमुपागात् सोऽपि तत्स्मृतः ॥१०४॥
आवेदितार्तिस्तेनाऽसौ गत्वानीय खगः क्षणात्।
रत्नाभरणसम्पूर्णां ददौ तस्मै करण्डिकाम् ॥१०५॥
उवाच चैतेनार्थेन वृत्तिः स्याच्छाश्वती तव।
मम जातश्च शापान्तः स्वस्ति ते साधयाम्यहम् ॥१०६॥
इत्युक्त्वा सोऽपि भूत्वैव विद्याधरकुमारकः।
स्वलोकं नभसा गत्वा प्राप राज्यं निजात् पितुः ॥१०७॥
सोऽपि रत्नानि विक्रेतुं बोधिसत्त्वः परिभ्रमन्।
तत्प्राप नगरं यत्र सा स्त्री कूपोद्धृता स्थिता ॥१०८॥
तत्रैकस्याश्च वृद्धाया ब्राह्मण्या विजने गृहे।
निधाय तान्याभरणान्यापणं यावदेति सः ॥१०९॥
तावद्ददर्श तामेव वने कूपात् समुद्धृताम्।
स्त्रियं सम्मुखमायान्तीं सापि स्त्री पश्यति स्म तम् ॥११०॥
सम्भाषणे श्रुतान्योन्यमथ सा स्त्री कथाक्रमात्।
स्वं राजमहिषीपार्श्वस्थितमस्मै न्यवेदयत् ॥१११॥
सोऽपि पृष्टस्ववृत्तान्तस्तया सत्यं शशंस ताम्।
रत्नाभरणसम्प्राप्तिं स्वर्णचूडखगाद्बहु ॥११२॥
नीत्वा चाभरणं तस्मै वृद्धावदमन्यदर्शयत्।
सापि गत्वा शठा राज्ञ्यै स्वस्वामिन्यै शशंस तत् ॥११३॥
तस्याश्च राज्ञ्या गृहान्तः स्वर्णचूलेन पक्षिणा।
नीतं छलेन पश्यन्त्या एवाभरणभाण्डकम् ॥११४॥
तच्च सा स्वपुरप्राप्तं राज्ञी तस्या मुखात् स्त्रियाः।
श्रुत्वा विदिततच्छाया राजानं तं न्यजिज्ञपत् ॥११५॥

षष्ठम लम्बक १४९

Page 1003Permalink

[Header]
षष्ठम लम्बक १४९

तब (फल मूल आदि के अभाव में) भूख से मूच्छित बोधिसत्त्व ने सबसे पहले सिंह का
स्मरण किया। स्मरण करते ही आये हुए सिंह ने मृगों का मांस लाकर बोधिसत्त्व का जीवन-
निर्वाह किया ॥१११॥
कुछ समय तक मांस खिलाकर उस महात्मा को स्वस्थ बनाकर सिंह ने कहा—'अब
मेरा शाप नष्ट हो गया मैं जाता हूँ' ॥११२॥
ऐसा कहकर वह सिंह शरीर का त्यागकर विद्याधर हो गया और महात्मा से आज्ञा लेकर
उन्हें प्रणाम करके अपने स्थान को गया ॥११३॥
उसके चले जाने पर भोजन के अभाव से म्लान उस बोधिसत्त्व ने स्वर्णचूड़ का स्मरण
किया और स्मरण करते ही वह उसके पास उपस्थित हो गया ॥११४॥
महात्मा द्वारा उसे अपनी पीड़ा बताने पर, उस पक्षी ने तुरन्त जाकर रत्नों से जड़े आभूषणों
से भरी एक पिटारी लाकर उसे दी ॥११५॥
और बोला—'इतने धन से सदा के लिए तुम्हारा जीवन-निर्वाह चलेगा। अब मेरे शाप
का अन्त हो गया तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं जाता हूँ' ॥११६॥
ऐसा कहकर और विद्याधरकुमार बनकर वह अपने लोक को चला गया और जाने पर
उसने पिता का राज्य प्राप्त किया ॥११७॥
वह बोधिसत्त्व भी उन रत्नों को बेचने के लिए घूमता हुआ उसी नगर में जा पहुँचा
जहाँ वह कुएँ से निकाली हुई स्त्री रानी की दासी के रूप में काम कर रही थी ॥११८॥
उस नगर में जाकर बोधिसत्त्व ने एकान्त में एक वृद्धा के घर में रत्न आभूषणों को रख
दिया और उनमें से कुछ लेकर वह बाजार में बेचने के लिए गया ॥११९॥
उसने बाजार में जाते हुए सामने से आती हुई उस स्त्री को देखा जिसे उसने
कूप से निकाला था। परस्पर बात होने पर उस स्त्री ने अपने को महारानी की दासी
बतलाया ॥१२०-१२१॥
उसके द्वारा अपना हाल-समाचार पूछने पर उस सरल महात्मा ने स्वर्णचूड़ पक्षी से रत्नों
से मण्डित आभूषणों का प्राप्त होना बताया और उस वृद्धा के घर में ले जाकर आभूषण भी
दिखा दिये उस दुष्टा ने जाकर अपनी स्वामिनी से सब कह दिया। सुवर्णचूड़ पक्षी ने
उस रानी के घर के भीतर से उसके हँसते-खेलते गहनों की पेटी छत से उठा ली थी।
उस पिटारी को फिर उस स्त्री के द्वारा अपने नगर में आई हुई जानकर रानी ने राजा से कह
दिया ॥१२२-१२५॥

१५ कथासरित्सागर

Page 1004Permalink

१५ कथासरित्सागर
राजापि बोधिसत्त्वं स दर्शितं कुस्त्रिया तया।
आनाययत् साभरणं भृत्यैर्बद्ध्वा गुहातस्तत् ॥११६॥
परिपृच्छ्य च वृत्तान्तं सत्यं मत्वापि तद्वचः।
स्थापयामास बद्धं तं गृहीत्वाभरणान्यपि ॥११७॥
स बन्धस्थोऽत्र सस्मार बोधिसत्त्वो भुजङ्गमम्।
ऋषिपुत्रावतारं समुपतस्थे च सोऽपि तम् ॥११८॥
दृष्ट्वा च तं स पृष्टाथ सर्पं साधुमभाषत।
गत्वाऽङ्गे वेष्टयाम्येतमामूर्धान्तं महीपतिम् ॥११९॥
न च मुञ्चाम्यमुं यावदागत्योक्तोऽस्मि न त्वया।
मोक्ष्याम्यहं नृपं सर्पादिति त्वं च वदेरिह ॥१२०॥
त्वय्यागते त्वद्वचसा मोक्ष्याम्यहमतो नृपम्।
संमुक्तश्चैष राजा ते स्वराज्यर्धं प्रदास्यति ॥१२१॥
इत्युक्त्वा तं स गत्वैव परिवेष्टितवानहिः।
राजानमास्त चैतस्य मूर्ध्नि कृत्वा फणत्रयम् ॥१२२॥
हा हा दष्टोऽहिना राजेत्याक्रन्दति जनश्च सः।
बोधिसत्त्वोऽब्रवीद्रक्षाम्यहं नृपमहरिति ॥१२३॥
श्रुतवद्भिश्च तद्राज्ञे विज्ञप्तं सोऽनुजीविभिः।
आनाय्य बोधिसत्त्वं तं सर्पाक्रान्तोऽब्रवीन्नृपः ॥१२४॥
यदि मां मोचयस्यस्मात् सर्पात् तस्मै वदाम्यहम्।
राज्यार्धमन्तरस्थाश्च तत्रत मन्त्रिणोऽत्र मे ॥१२५॥
तं दृष्ट्वा बाढमित्युक्ते मन्त्रिभिः स जगाद तम्।
भुजङ्ग याहिमत्स्यागा मुञ्च राजानमाद्यिति ॥१२६॥
ततस्तेनाहिना मुक्तो राज्यार्धं नृपतिर्ददौ।
स तस्मै बोधिसत्त्वाय सोऽपि स्वस्थोऽभवत् क्षणात् ॥१२७॥
संपदश्च क्षणेनाप मन् भूत्वा मुनिकुमारकः।
सन्मन्त्र्याख्यातवृत्तान्तो जगाम निजमाश्रमम् ॥१२८॥
एवं निश्चितमभ्येति शुभमेव शुभात्मनाम्।
एष पाशिक्रमो नाम वक्तव्यो महतामपि ॥१२९॥
अविज्ञाताशयं चैव स्त्रीणां शृण्वन्ति नाशताम्।
प्राप्तान्तान्तर्गताञ्छीघ्रं किं नामाभवदुच्यते ॥१३०॥

दशम लम्बक १५१

Page 1005Permalink

दशम लम्बक १५१
राजा ने भी उस दुष्टा स्त्री द्वारा दिखाये हुए आभूषणों के साथ उस बोधिसत्त्व को
सेवकों से बँधवाकर बुलवाया ॥११६॥
उससे सारा वृत्तान्त पूछकर और उसे सच मानकर भी राजा ने सारे आभूषण ले लिये
और उसे कारागार में डाल दिया ॥११७॥
कारागार में पड़े हुए उस बोधिसत्त्व ने ऋषिनन्दन के अवतार उस सर्प का स्मरण किया।
स्मरण करते ही वह उसके पास आकर उपस्थित हुआ ॥११८॥
उसे देखकर और समाचार पूछकर सर्प ने साधु से कहा-'मैं जाता हूँ और पैर से सिर
तक राजा को लपेट लेता हूँ ॥११९॥
जबतक तुम आकर नहीं कहोगे कि इसे छोड़ दो तबतक मैं उसे नहीं छोडूंगा। तुम
भी यहाँ से कहना कि मैं राजा को सर्प से छुड़वा देता हूँ ॥१२०॥
तुम्हारे वहाँ आने पर और कहने पर मैं राजा को छोड़ दूँगा और मुझसे मुक्त किया गया
राजा तुम्हें अपना आधा राज्य दे देगा' ॥१२१॥
ऐसा कहकर सर्प ने जाकर राजा को लपेट लिया और उसके सिर पर तीनों फन
फैला दिये ॥१२२॥
तदनन्तर, चारों ओर कोलाहल मच गया कि राजा को सर्प ने काट लिया। तब बोधि-
सत्त्व ने कहा- मैं राजा की सर्प से रक्षा कर सकता हूँ ॥१२३॥
उसकी बात को सुननेवाले सेवकों ने यह बात राजा से कही तब राजा ने बोधिसत्त्व को
बुलाकर कहा-॥१२४॥
'यदि तू मुझे इस सर्प से बचा लो मैं तुझे आधा राज्य दे दूँगा। ये मेरे मन्त्री मेरी और
तेरी इस बात के साक्षी हैं ॥१२५॥
यह सुनकर मन्त्रियों के स्वीकार करने पर बोधिसत्त्व ने सर्प से कहा-'राजा को शीघ्र
छोड़ दो' ॥१२६॥
तब उस सर्प से छोड़े गये राजा ने उस महात्मा को आधा राज्य दे दिया और स्वयं
भी वह पूर्ण स्वस्थ हो गया ॥१२७॥
सर्प-रूपी वह मुनिकुमार भी शाप से मुक्त होकर, सभा में अपना वृत्तान्त सुनाकर अपने
आश्रम को चला गया ॥१२८॥
इस प्रकार, शुभ विचारवाला को अवश्य ही कल्याण प्राप्त होता है और बुरे विचार
वाले महान् व्यक्तियों को भी क्लेश प्राप्त होता है ॥१२९॥
अविश्वास की खान स्त्रियों के हृदय में प्राण देने पर भी उपकार स्थान प्राप्त नहीं कर
सकता अधिक क्या कहा जाय ॥१३०॥

९५ कथासरित्सागर

Page 1006Permalink

९५ कथासरित्सागर

राजापि बोधिसत्त्वं तं दर्शितं कुस्त्रिया तया ।
आनावयत् साभरणं भृत्यैर्बन्धेवा गृहातस्त ॥११६॥
परिपृच्छंश्च च वृत्तान्तं सत्यं मत्वापि तद्वचः ।
स्थापयामास बद्धं तं गृहीत्वाभरणान्यपि ॥११७॥
स बन्धस्थोऽथ सस्मार बोधिसत्त्वो भुजङ्गमम् ।
ऋषिपुत्रावतारं तमृपतस्थे च सोऽपि तम् ॥११८॥
दृष्ट्वा च तं स पृष्टार्थः सर्पः साधुमभाषत ।
गत्वाऽहं वेष्टयाम्येतमामूर्धान्तं महीपतिम् ॥११९॥
न च मुञ्चाम्यमुं यावदागत्योक्तोऽस्मि न त्वया ।
मोक्ष्याम्यहं नृपं सर्पादिति स्वं च वदेरिह ॥१२०॥
त्वय्यागते त्वद्वचसा मोक्ष्याम्यहमतो नृपम् ।
मन्मुक्तश्चथ राजा ते स्वराज्यर्धं प्रदास्यति ॥१२१॥
इत्युक्त्वा तं स गत्वैव परिवेष्टितवानहिः ।
राजानमास्त चैतस्य मूर्ध्नि कृत्वा फणत्रयम् ॥१२२॥
हा हा दष्टोऽहिना राजेत्याक्रन्दति जनेऽथ सः ।
बोधिसत्त्वोऽब्रवीद्रक्षाम्यहं नृपमहैरिति ॥१२३॥
श्रुतवद्भिश्च तद्वाक्यं विज्ञप्तः सोऽनुजीविभिः ।
आनाय्य बोधिसत्त्वं तं सर्पाक्रान्तोऽब्रवीन्नृपः ॥१२४॥
यदि मां मोषयस्यस्मात् सर्पात् तत्ते ददाम्यहम् ।
राज्यार्धमन्तरस्थाश्च धवैते मन्त्रिणोऽत्र मे ॥१२५॥
तच्छ्रुत्वा बाढमित्युक्ते मन्त्रिभिः स जगाद तम् ।
भुजङ्ग बोधिसत्त्वांशो मुञ्च राजानमाश्र्विति ॥१२६॥
ततस्तेनाहिना मुक्तो राज्यार्धं नृपतिर्ददौ ।
स तस्मै बोधिसत्त्वाय सोऽपि स्वस्थोऽभवत् क्षणात् ॥१२७॥
सर्पेश्च क्षीणशापः सन् भूत्वा मुनिकुमारकः ।
सदस्याख्यातवृत्तान्तो जगाम निजमाश्रमम् ॥१२८॥
एष निश्चितमन्वेति शुभमेव शुभार्समम् ।
एव नातिक्रमो नाम क्लेशाय महतामपि ॥१२९॥
अविश्वासास्पदं चैव स्त्रीणां स्पृशति नाश्चर्यम् ।
प्राणदानोपकारोऽपि किं चासामन्यदुच्यते ॥१३०॥

दशम लम्बक १५१

Page 1007Permalink

दशम लम्बक १५१
राजा ने भी उस दुष्टा स्त्री द्वारा दिखाये हुए आभूषणों के साथ उस बोधिसत्त्व को
सेवकों से बँधवाकर बुलवाया ॥११९६॥
उससे सारा वृत्तान्त पूछकर और उसे सच मानकर भी राजा ने सारे आभूषण ले लिये
और उसे कारागार में डाल दिया ॥११९७॥
कारागार में पड़े हुए उस बोधिसत्त्व ने ऋषिकुमार के अवतार उस सर्प का स्मरण किया।
स्मरण करते ही वह उसके पास आकर उपस्थित हुआ ॥११९८॥
उसे देखकर और समाचार पूछकर सर्प ने साधु से कहा- मैं जाता हूँ और पैर से सिर
तक राजा को लपेट लेता हूँ ॥११९९॥
जबतक तुम जाकर नहीं कहोगे कि इसे छोड़ दो तबतक मैं उसे नहीं छोडूंगा। तुम
भी यहाँ से कहना कि मैं राजा को सर्प से छुड़वा देता हूँ ॥१२००॥
तुम्हारे वहाँ आने पर और कहने पर मैं राजा को छोड़ दूँगा और मुझसे मुक्त किया गया
राजा तुम्हें अपना आधा राज्य दे देगा' ॥१२०१॥
ऐसा कहकर सर्प ने जाकर राजा को लपेट लिया और उसके सिर पर तीनों फन
फैला दिये॥१२०२॥
तदनन्तर, चारों ओर कोलाहल मच गया कि राजा को सर्प ने काट लिया। तब बोधि-
सत्त्व ने कहा—मैं राजा की सर्प से रक्षा कर सकता हूँ ॥१२०३॥
उसकी बात को सुननेवाले सेवकों ने यह बात राजा से कही तब राजा ने बोधिसत्त्व को
बुलाकर कहा—॥१२०४॥
'यदि तू मुझे इस सर्प से बचा ले तो मैं तुझे आधा राज्य दे दूँगा। ये मेरे मन्त्री मेरी और
तेरी इस बात के साक्षी हैं' ॥१२०५॥
यह सुनकर मन्त्रियों के स्वीकार करने पर बोधिसत्त्व ने सर्प से कहा— राजा को शीघ्र
छोड़ दो' ॥१२०६॥
तब उस सर्प से छोड़े गये राजा ने उस महात्मा को आधा राज्य दे दिया और स्वयं
भी वह पूर्ण स्वस्थ हो गया ॥१२०७॥
सर्प-रूपी वह मुनिकुमार भी शाप से मुक्त होकर, सभा में अपना वृत्तान्त सुनाकर अपने
आश्रम को चला गया ॥१२०८॥
इस प्रकार, शुभ विचारवाला को अवश्य ही कल्याण प्राप्त होता है और बुरे विचार
वाले महान् व्यक्तित्व को भी क्लेश प्राप्त होता है ॥१२०९॥
अविश्वास की पात्र स्त्रियों के हृदय में ज्ञान होने पर भी उपकार स्थान प्राप्त नहीं कर
सकता अधिक क्या कहा जाय ॥१२१०॥